भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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१६८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां स्रवति' इति मयोक्ते सोऽतिहृष्टः प्रतिपद्य 'मामेव त्वदुपप्रलोभने नियुज्य बहिरवस्थितः । प्राप्तमितः परं चिन्त्यताम्' इति । ( ६३ ) प्रीतेन च मयोक्तम्—'मदुक्तमल्पम् , त्वन्नय एवात्र भूयान् । आनयैनम्' इति । अथानीतेनामुना मन्मोचनाय शपथः कृतः, अहं च रहस्यानिर्भेदाय विनिगडीकृतश्च स्नानभोजनविलेपनान्यनुभूय नित्यान्ध- काराद्भित्तिकोणादारभ्यौरगास्येन सुरङ्गामकरवम् । अचिन्तयं चैवम्— 'हन्तुमनसैवामुना मन्मोचनाय शपथः कृतः । तदेनं हत्वापि नासत्यवा- लिकाम् । त्वदुपप्रलोभने-तवापहारवर्म्मण उपप्रलोभने वशीकरणे । बहिः कारागृह- बहिर्भागे । प्राप्तम् अनन्तरकरणीयम् । ( ६३) मया अपहारवर्मणा । मदुक्तमित्यादि-मया यदुक्तं तदल्पमेव किन्तु त्वन्नयस्त्वन्नीतिरेव भूयानधिक इति । एनं कान्तकम् । आनय मत्समपिम्इति शेषः । अहमपहारवर्मा । रहस्यानिर्भेदाय रहस्याप्रकाशाय । विनिगडीकृतः बन्धनान्मोचितः । अनुभूय कृत्वा । नित्यान्धकारात् सततान्धकाराच्छन्नात् । उरगास्येन-सर्पमुखाकारास्त्रविशेषेण । हन्तुमनसा मां हन्तुकामेन । अमुना कान्त- केन । असत्यवाददोषेण मिथ्यावचनरूपापराधेन । स्पृश्ये स्पृष्टो भवामि । निष्पततः कारागृहान्निर्गच्छतः । प्रसार्यमाणपाणेः प्रसारितकरस्य । तस्य कान्तकस्य । पादेन वर्माको ) वशमें लानेके लिये, नियुक्त किया है । और स्वयं बाहर बैठा हुआ है । इसके विषयमें जो कर्त्तव्य आप समझें सो करें ।' ( ६३ ) मैंने प्रसन्नतापूर्वक कहा—'मैंने तुमसे ( शृगालिकासे ) थोड़ा कहा था किन्तु, तुम्हारी नीतिने इसे अधिकरूपमें रच दिया । उस कान्तकको बुला लाओ ।' कान्तकके आनेके अनन्तर उसने मेरे लिये छोड़ देनेकी शपथ की । मैंने रहस्य न प्रकट करनेकी शपथ खायी । शपथादिके बाद उसने मेरी बेड़ियां खोल दी । स्नान, भोजन, तैल, इत्र आदिसे मेरा स्वागत सम्मान किया । मैंने भी सदा अन्धेरी रहनेवाली दीवालके कोनेमें सर्पमुखाकार कुदालसे खोदना प्रारम्भ किया और सेंध लगा दी । मनमें मैंने विचार किया कि, 'इस कान्तकने मुझे मार डालनेकी इच्छासे ही यह शपथ, मुझे छोड़नेके बहाने से ली है । यदि मैं ही इसे मार डालूं, तो, मुझे मिथ्या वचनरूपापराधदोष न लगेगा ।' ( ऐसा सोच करके ) ज्यों ही कारागाराध्यक्ष कान्तकने मुझे बद्ध करनेके लिए हाथोंको बढ़ाया त्यों ही मैंने उसकी छातीमें लात मारी और उसे पटक दिया । उसके Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu