भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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३४८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां

नातिस्थूला नातिकृशा नातिह्रस्वा नातिदीर्घा न विकटा मृजावन्तश्च रक्ततलाङ्गुली यवमत्स्यकमलकलशाद्यनेकपुण्यलेखालाञ्छितौ करौ, सम- गुल्फसंधी मांसलावशिरालौ चाङ्‍घ्री, जङ्घे चानुपूर्ववृत्ते पीवरोरुग्रस्ते इव दुरुपलक्ष्ये जानुनी, सकृद्विभक्तश्चतुरस्रः कुकुन्दरविभागशोभी रथाङ्गाका- रसंस्थितश्च नितम्बभागः, तनुतरमीषन्निम्नं गम्भीरं नाभिमण्डलम्, (२८) वलित्रयेण चालंकृतमुदरम्, उरोभागव्यापिनावुन्मग्न चूचु- कौ विशालारम्भशोभिनौ पयोधरौ, धनधान्यपुत्रभूयस्त्वचिह्नलेखालाञ्छि-

अवयवा अङ्गानि । विकटाः कर्कशाः । मृजावन्तः=स्वच्छाः । रक्ततलेति-रक्तं अरुणं तलं यासां तादृश्योऽङ्गुलयो ययोस्तादृशौ । यवमत्स्येति-यवः शस्यविशेषः मत्स्यो मीनः कमलमब्जं कलशो घटस्तदाद्यनेकपुण्यलेखाभिः शुभसूचकरे- खाभिलांञ्छितौ चिह्नितौ । समेति-समौ समानौ गुल्फयोः संधी ययोस्तौ । मांसलौ पुष्टौ । अशिरालौ शिरारहितौ । अंघ्री चरणौ जंघे जंघाद्वयम् । आनुपूर्ववृत्ते क्रमशः स्थूले गोपुच्छाकारे । पीवरेति-पीवराभ्यामूरुभ्यां ग्रस्ते आक्रान्ते इव दुरुपलक्ष्ये दुर्दर्श । तादृशं जानुद्वयमिति शेषः । नितम्बभागः कटिपश्चाद्भागः सकृद्विभक्तः समविभागेन निमितः चतुरस्रः सर्वतः शोभमानः । तथा कुकुन्दरयोः नितम्बस्थावर्त्ताकारगर्त्तयोर्विभागेन शोभते एवं शीलः । रथाङ्गस्य चक्रस्याकारेण संस्थितः संनिवेशितः । तनुतरं सूक्ष्मतरम् । ईषन्निम्नं किञ्चिदवनतम् । (२८) वलित्रयेण-त्रिवल्या । अलंकृतं शोभितम् । उरोभागव्यापिनौ-सम- स्तं वक्षोदेशं व्याप्य वर्त्तमानौ । उन्मग्नचूचुकौ-उद्गतकुचाग्रौ । विशालारम्भशो-

दृष्टि देखकर मैंने विचार किया-‘निश्चय है कि, इस कन्याके अङ्ग न तो मोटे हैं न दुर्बल हैं । यह न नाटी है न लम्बी है । न कठिन स्वभाववाली ही है । और शरीरका रंग भी स्वच्छ है । इसके हाथकी अङ्गुलियोंका तलप्रदेश लाल है । इसके हाथमें यव, मछली, कमल और कलश आदि पुण्य रेखाएँ पड़ी हैं । इसके चरण शिरा रहित हैं तथा मांसल (पुष्ट) हैं और इसके गुल्फभाग सन्धिहीन एवं समान हैं । इसकी दोनों जंघें गोपुच्छाकार हैं । सुश्लिष्ट, मोटे मोटे इसके ऊरु हैं । इसके दोनों घुटने दुर्लक्ष्य हैं । इसका कटिपश्चाद्भाग (नितम्ब भाग) समान भागोंमें विभक्त सब ओर शोभाय- मान नितम्बस्थित कूपोंसे सुशोभित और चमत्कार रूपमें हैं । कुछ गम्भीर तथा सूक्ष्मतर इसका नाभिमण्डल है । (२८) इसका उदरदेश त्रिवलियोंसे मनोहर है । समस्त वक्षःस्थलको परिव्याप्त करनेवाले और विस्तीर्णतासे शोभावाले इसके दोनों स्तन हैं । इस कन्याकी लतारूपी

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu