दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंतावत्पुष्पपुराद्राज्ञो राजहंसस्याज्ञापत्रमादाय समागता राजपुरुषाः प्रणम्य राजवाहनं व्यजिज्ञपन्-'स्वामिन् , एतज्जनकस्य राजहंसस्याज्ञापत्रं गृह्य- ताम्' इत्याकर्ण्य समुत्थाय भूयोभूयः सादरं प्रणम्य सदसि तदाज्ञापत्र- मग्रहीत् । शिरसि चाधाय तत उत्तार्योत्कील्य राजा राजवाहनः सर्वेषां शृण्वतामेवावाचयत्-'स्वस्ति श्रीपुष्पपुरराजधान्याः श्रीराजहंसभूपतिश्च- म्पानगरीमधिवसतो राजवाहनप्रमुखान् कुमारानाशास्याज्ञापत्रं प्रेषयति । यथा यूयमितो मामामन्र्त्र्य प्रणम्य प्रस्थिताः पथि कस्मिंश्चिद्गनोद्देश उपशिवालयं स्कन्धावारमवस्थाप्य स्थिताः। तत्र राजवाहनं शिवपूजार्थं निशि शिवालये स्थितं प्रातरनुपलभ्यावशिष्टाः सर्वेऽपि कुमाराः 'सहैव राजवाहनेन राजहंसं प्रणंस्यामो न चेत्प्राणांस्त्यक्ष्यामः' इति प्रतिज्ञाय सैन्यं परावर्त्य राजवाहनमन्वेष्टुं पृथक्प्रस्थिता । एवं भवद्वृत्तान्तं ततः पूर्वकृतसंकेतं-पूर्वं प्राक् कृतः संकेतो येन तम् । सेवकैर्भृत्यैः । आनाय्य आनी- येत्यर्थः। संभूय मिलित्वा । मिथः परस्परम् । यावत्-यावत्कालपर्यन्तम् । भूयो- भूयः वारंवारम् । आधाय संस्थाप्य । ततः मस्तकात् । उत्तार्य अवतार्य । सेवकोंद्वारा बुलाकर राजवाहनके सहित एक साथ प्रेमपूर्वक आपसमें कथा वार्ता कह रहे थे कि उसी समय पुष्पपुरसे राजा राजहंसके आज्ञापत्रको लेकर, राजसेवकगण आये । राजवाहनको उन्होंने प्रणाम करके विज्ञापित किया-'हे स्वामिन् ! अपने जनक राजा राजहंसका यह आज्ञापत्र लीजिये।' यह सुनकर सभामें बार-बार उस पत्रको प्रणाम करके ग्रहण किया । फिर शिरपर धरकर पुनः शिरसे उतारकर राजा राजवाहनने सबको सुनाते हुए ही वह पत्र पढ़ा-'स्वस्ति श्रीपुष्पपुरी राजधानीसे श्रीराजहंस भूपति चम्पा- नगरीमें अधिवास करनेवाले राजवाहन आदि सभी कुमारोंको आशीर्वाद देकर आज्ञा- पत्र भेज रहा है कि आप लोगोंने मुझे प्रणाम करके और मुझसे आज्ञा लेकर गमन किया । मार्गमें एक शिवमन्दिरके समीप शिविरमें ठहरे वहाँपर रातमें शिवपूजनके लिये बैठे हुए राजकुमारको प्रभातमें न पाकर सभी कुमारोंने यह प्रतिज्ञा की कि 'हम लोग राजवाहनके साथ ही राजहंसको प्रणाम करेंगे नहीं तो प्राणोंको त्याग देंगे ।' इस प्रकार प्रतिज्ञा करके उन लोगोंने सेनाको लौटा दिया और राजवाहनका अन्वेषण करनेके लिये अलग-अलग चल पड़े । आप लोगोंके ऐसे समाचारको लौटे हुए सैनिकोंके मुखसे सुनकर मैं और आप लोगोंकी माता असहनीय दुःखरूपी समुद्रमें डूबकर दोनों जने वामदेवके आश्रममें गये कि यह वृतान्त उन्हें ज्ञात कराकर हम दोनों 'प्राणपरित्याग कर देंगे' ऐसा निश्चय करके दोनों जने उनके आश्रममें उन मुनिको प्रणाम करके जब