भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

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४६८ | दशकुमारचरितम् ।

क्षणेन पराजिग्ये निहतश्च। ततस्तद्दुहितरमवन्तिसुन्दरीं समादाय चण्डव- र्मणा तन्मन्त्रिणा पूर्वं कारागृहे रक्षितं पुष्पोद्भवं कुमारं सकुदुम्बं तत उन्मो- चितं सह नीत्वा मालवेन्द्रराज्ये वशीकृत्य तद्रक्षणाय कांश्चित्सैन्यसहिता- न्मन्त्रिणो नियुज्यावशिष्टपरिमितसैन्यसहितास्ते कुमाराः पुष्पपुरं समेत्य राजवाहनं पुरस्कृत्य तस्य राजहंसस्य मातुर्वसुमत्याश्च चरणानभिवन्दित- वन्तः। तौ च पुत्रसमागमं प्राप्य परमानन्दमधिगतौ। ततो राज्ञो वसुस- त्याश्च देव्याः समक्षं वामदेवो राजवाहनप्रमुखानां दशानामपि कुमाराणा- मभिलाषं विज्ञाय तानाज्ञापयत्-'भवन्तः सर्वेऽप्येकवारं गत्वा स्त्रानि स्वानि राज्यानि न्यायेन परिपालयन्तु। पुनर्यदेच्छा भवति तदा पित्रोश्चरणाभि- वन्दनायागन्तव्यम्' इति। ततस्ते सर्वेऽपि कुमारास्तन्मुनिवचनं शिरस्या- धाय तं प्रणम्य पितरौ च, गत्वा दिग्विजयं विधाय प्रत्यागमनान्ते स्वस्व-

समर्थानि। आप्तान् विश्वस्तान्। परिमितेन स्वल्पेन। तद्दुहितरं मानसार- नन्दिनीम्। ततः कारागारात्। तौ च-वसुमतीराजहंसौ। तान् कुमारान्। अतिदुर्घटानि दुःसाध्यानि। मनुजमनोरथाधिकं यत्तु मनुष्या मनसापि कल्पयितुं

पहुँचकर उन्हीं कुमारोंकी सहायतासे, परिमित सेनासे बलवान मालवेश मानसारको क्षणभरमें पराजित करके मार डाला। तत्पश्चात् उस मालवेशकी कन्या अवन्तिसुन्दरीको लेकर उसके मन्त्री चण्डवर्माको जो पहिलेसे ही कारागारमें बन्द था उस पुष्पोद्भव- कुमारको कुटुम्ब सहित मुक्त करके अपने साथ लेकर और मालवेन्द्रके राज्यको अधीन करके, उसकी रक्षाके लिये कुछ सेनाके साथ आत्मीय सचिवको वहां नियुक्त करके, कुछ परिमित सेनाके साथ वे कुमारगण पुष्पपुरमें आकर, राजवाहनको आगे करके, उन राजा राजहंस और रानी वसुमतीके चरणोंको उन कुमारोंने खूब अभिनन्दन किया । वे दोनों राजा-रानी भी पुत्रोंकी प्राप्तिपर बड़े हर्षित हुए। तब फिर राजा और रानी वसुमतीके समक्ष वामदेवमुनिने दशों कुमार राजवाहन आदिके मनोगत अभिलाषको जानकर कहा-'आप लोग फिर एक बार अपने-अपने राज्यका न्यायपूर्वक शासन करें और पुनः जब आप लोगोंकी इच्छा होवे तब पिता-माताके चरणस्पर्शको आवें।' ततः वे सब राजकुमार उन मुनि-वचनोंको शिरपर धारण करके तथा उन्हें और माता-पिताको प्रणाम करके चले गये। जाकर दिग्विजयका विधान करके लौट आये और अपने-अपने वृत्तान्तको अलग-अलग मुनिराजसे उन कुमारोंने निवेदित किया। माता-पिता भी, कुमारोंके दुःसाध्य चरित तथा पराक्रमोंको सुनकर परम प्रमुदित हुए। तब राजा राजहंसने मुनिवरसे निवेदन किया-'हे भगवन्!