भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| ४०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गार्हस्थ्यञ्च हरेर्ब्रूहि बहुभार्यस्य चानघ॥ १०<br><br>कार्याणि तत्र तान्येव देहत्यागं च तस्य वै।<br>किंवदन्त्या श्रुतं यत्तन्मनो मोहयतीव मे॥ ११<br><br>चरितं वासुदेवस्य त्माख्याहि यथातथम्।<br>नरनारायणौ देवौ पुराणावृषिसत्तमौ॥ १२हे अनघ! बहुत-सी पत्नियोंवाले श्रीकृष्णके गृहस्थ-जीवन, उसमें उनके द्वारा किये गये कार्यों तथा अन्तमें उनके शरीर-त्यागके विषयमें बताइये। किंवदन्तीके आधारपर मैंने भगवान् श्रीकृष्णका जो चरित्र सुना है, उससे मेरा मन परम विस्मयमें पड़ गया है। अतः आप उनके चरित्रका सम्यक् रूपसे वर्णन कीजिये॥ १०-११ १/२॥
धर्मपुत्रौ महात्मानौ तपश्चेरतुरुत्तमम्।<br>यौ मुनी बहुवर्षाणि पुण्ये बदरिकाश्रमे॥ १३<br><br>निराहारौ जितात्मानौ निःस्पृहौ जितषड्गुणौ।<br>विष्णोरंशौ जगत्क्षेम्ने तपश्चेरतुरुत्तमम्॥ १४<br><br>तयोरंशावतारौ हि जिष्णुकृष्णौ महाबलौ।<br>प्रसिद्धौ मुनिभिः प्रोक्तौ सर्वज्ञैर्नारदादिभिः॥ १५<br><br>विद्यमानशरीरौ तौ कथं देहान्तरं गतौ।<br>नरनारायणौ देवौ पुनः कृष्णार्जुनौ कथम्॥ १६पुरातन, धर्मपुत्र, महात्मा तथा देवस्वरूप ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायणने उत्तम तप किया था। जगत्के कल्याणार्थ निराहार, जितेन्द्रिय तथा स्पृहारहित रहते हुए काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य—इन छहोंपर पूर्ण नियन्त्रण रखकर साक्षात् भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप जिन नर-नारायण मुनियोंने पुण्यक्षेत्र बदरिकाश्रममें बहुत वर्षोंतक श्रेष्ठ तपस्या की थी, नारद आदि सर्वज्ञ मुनियोंने प्रसिद्ध तथा महाबलसम्पन्न अर्जुन तथा श्रीकृष्णको उन्हीं दोनोंका अंशावतार बताया है। उन भगवान् नर-नारायणने एक शरीर धारण करते हुए भी दूसरा जन्म क्यों प्राप्त किया और पुनः वे कृष्ण तथा अर्जुन कैसे हुए?॥ १२—१६॥
यौ चक्रतुस्तपश्चोग्रं मुक्त्यर्थं मुनिसत्तमौ।<br>तौ कथं प्राप्तुर्देंहौ प्राप्तयोगौ महातपौ॥ १७जिन मुनिप्रवर नर-नारायणने मुक्तिहेतु कठोर तपस्या की थी; उन महातपस्वी तथा योगसिद्धिसम्पन्न दोनों देवोंने मानव-शरीर क्यों प्राप्त किया?॥ १७॥
शूद्रः स्वधर्मनिष्ठस्तु देहान्ते क्षत्रियस्तु सः।<br>शुभाचारो मृतो यो वै स शूद्रो ब्राह्मणो भवेत्॥ १८<br><br>ब्राह्मणो निःस्पृहः शान्तो भवरोगाद्विमुच्यते।<br>विपरीतमिदं भाति नरनारायणौ च तौ॥ १९<br><br>तपसा शोषितात्मानौ क्षत्रियौ तौ बभूवतुः।<br>केन तौ कर्मणा शान्तौ जातौ शापेन वा पुनः॥ २०<br><br>ब्राह्मणौ क्षत्रियौ जातौ कारणं तन्मुने वद।<br>यादवानां विनाशश्च ब्रह्मशापादिति श्रुतः॥ २१अपने धर्ममें निष्ठा रखनेवाला शूद्र अगले जन्ममें क्षत्रिय होता है और जो शूद्र वर्तमान जन्ममें पवित्र आचरण करता है, वह मृत्युके अनन्तर ब्राह्मण होता है। कामनाओंसे रहित शान्त-स्वभाव ब्राह्मण पुनर्जन्मरूपी रोगसे मुक्त हो जाता है, किंतु उनके विषयमें तो सर्वथा विपरीत स्थिति दिखायी देती है। उन नर-नारायणने तपस्यासे अपना शरीरतक सुखा दिया, फिर भी वे ब्राह्मणसे क्षत्रिय हो गये। शान्त-स्वभाव वे दोनों अपने किस कर्मसे अथवा किस शापसे ब्राह्मणसे क्षत्रिय हुए? हे मुने! वह कारण बताइये॥ १८—२० १/२॥
कृष्णास्यापि हि गान्धार्याः शापेनैव कुलक्षयः।<br>प्रद्युम्नहरणं चैव शम्बरेण कथं कृतम्॥ २२मैंने यह भी सुना है कि यादवोंका विनाश ब्राह्मणके शापसे हुआ था और गान्धारीके शापसे ही श्रीकृष्णके वंशका विनाश हुआ था। शम्बरासुरने