भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० १ ]चतुर्थ स्कन्ध४०५

| वर्तमाने वासुदेवे देवदेवे जनार्दने।<br>पुत्रस्य सूतिकागेहाद्धरणं चातिदुर्घटम्॥ २३<br><br>द्वारकादुर्गमध्याद्वै हरिवेश्मादुरत्ययात्।<br>न ज्ञातं वासुदेवेन तत्कथं दिव्यचक्षुषा॥ २४<br><br>सन्देहोऽयं महान्ब्रह्मन्निःसन्देहं कुरु प्रभो।<br>यत्पत्न्यो वासुदेवस्य दस्युभिर्लुण्ठिता हृताः॥ २५ | कृष्ण-पुत्र प्रद्युम्नका अपहरण क्यों किया? देवाधिदेव जनार्दन वासुदेवके रहते सूतिकागृहसे पुत्रका हरण हो जाना एक अत्यन्त अद्भुत बात है। द्वारकाके किलेमें श्रीकृष्णके दुर्गम राजमहलसे पुत्रका हरण हो गया; किंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपनी दिव्य दृष्टिसे क्यों नहीं देख लिया? हे ब्रह्मन्! यह एक महान् शंका मेरे समक्ष उपस्थित है। हे प्रभो! आप मुझे सन्देह-मुक्त कर दीजिये॥ २१—२४ १/२॥ | | स्वर्गते देवदेवे तु तत्कथं मुनिसत्तम।<br>संशयो जायते ब्रह्मंश्चित्तान्दोलनकारकः॥ २६ | देवदेव श्रीकृष्णके स्वर्गगमनके अनन्तर उनकी पत्नियोंको लुटेरोंने लूट लिया; हे मुनिराज! वह कैसे हुआ? हे ब्रह्मन्! मनको आन्दोलित कर देनेवाला यह संदेह मुझे हो रहा है॥ २५-२६॥ | | विष्णोरंशः समुद्भूतः शौरिर्भूभारहारकृत्।<br>स कथं मथुराराज्यं भयात्त्यक्त्वा जनार्दनः॥ २७<br><br>द्वारवत्यां गतः साधो ससैन्यः ससुहृद्गणः।<br>अवतारो हरेः प्रोक्तो भूभारहरणाय वै॥ २८<br><br>पापात्मनां विनाशाय धर्मसंस्थापनाय च।<br>तत्कथं वासुदेवेन चौरास्ते न निपातिताः॥ २९<br><br>यैर्हृता वासुदेवस्य पत्न्यः संलुण्ठिताश्च ताः।<br>स्तेनास्ते किं न विज्ञाताः सर्वज्ञेन सता पुनः॥ ३० | श्रीकृष्ण भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए थे और उन्होंने पृथ्वीका भार उतारा था। हे साधो! ऐसे वे जनार्दन जरासन्धके भयसे मथुराका राज्य छोड़कर अपनी सेना तथा बन्धु-बान्धवोंके सहित द्वारकापुरी क्यों चले गये? ऐसा कहा जाता है कि श्रीकृष्णका अवतार पृथ्वीको भारसे मुक्त करने, पापाचारियोंको विनष्ट करने तथा धर्मकी स्थापना करनेके लिये हुआ था, फिर भी वासुदेवने उन लुटेरोंको क्यों नहीं मार डाला, जिन लुटेरोंने श्रीकृष्णकी पत्नियोंको लूटा तथा उनका हरण किया? सर्वज्ञ होते हुए भी श्रीकृष्ण उन चोरोंको क्यों नहीं जान सके?॥ २७—३०॥ | | भीष्मद्रोणवधः कामं भूभारहरणे मतः।<br>अर्चिताश्च महात्मानः पाण्डवा धर्मतत्पराः॥ ३१<br><br>कृष्णभक्ताः सदाचारा युधिष्ठिरपुरोगमाः।<br>ते कृत्वा राजसूयञ्च यज्ञराजं विधानतः॥ ३२<br><br>दक्षिणा विविधा दत्त्वा ब्राह्मणेभ्योऽतिभावतः।<br>पाण्डुपुत्रास्तु देवांशा वासुदेवाश्रिता मुने॥ ३३<br><br>घोरं दुःखं कथं प्राप्ताः क्व गतं सुकृतञ्च तत्।<br>किं तत्पापं महद्रौद्रं येन ते पीडिताः सदा॥ ३४ | भीष्मपितामह तथा द्रोणाचार्यका वध पृथ्वीका भार-हरणस्वरूप कार्य कैसे माना गया? युधिष्ठिर आदि सदाचारवान्, महात्मा, धर्मपरायण, पूज्य तथा श्रीकृष्ण-भक्त उन पाण्डवोंने यज्ञोंके राजा कहे जानेवाले राजसूय-यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान करके उस यज्ञमें ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ दीं। हे मुने! वे पाण्डु-पुत्र देवताओंके अंशसे प्रादुर्भूत थे तथा श्रीकृष्णके आश्रित थे, फिर भी उन्हें इतने महान् कष्ट क्यों भोगने पड़े? उस समय उनके पुण्य कार्य कहाँ चले गये थे? उन्होंने ऐसा कौन-सा महाभयानक पाप किया था, जिसके कारण वे सदा कष्ट पाते रहे?॥ ३१—३४॥ |