देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| द्रौपदी च महाभागा वेदीमध्यात्समुत्थिता।<br>रमांशजा च साध्वी च कृष्णभक्तियुता तथा॥ ३५<br><br>सा कथं दुःखमतुलं प्राप घोरं पुनः पुनः।<br>दुःशासनेन सा केशे गृहीता पीडिता भृशम्॥ ३६<br><br>रजस्वला सभायां तु नीता भीतैकवाससा।<br>विराटनगरे दासी जाता मत्स्यस्य सा पुनः॥ ३७<br><br>धर्षिता कीचकेनाथ रुदती कुररी यथा।<br>हृता जयद्रथेनाथ क्रन्दमानातिदुःखिता॥ ३८<br><br>मोचिता पाण्डवैः पश्चाद् बलवद्भिर्महात्मभिः।<br>पूर्वजन्मकृतं पापं किं तद्येन च पीडिताः॥ ३९ | पुण्यात्मा द्रौपदी यज्ञकी वेदीके मध्यसे प्रकट हुई थी। वह लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थी, साध्वी थी तथा सदा श्रीकृष्णकी भक्तिमें लीन रहती थी। उस द्रौपदीने भी बार-बार महाभीषण संकट क्यों प्राप्त किया? दुःशासनके द्वारा उसे बाल पकड़कर घसीटा गया तथा अत्यधिक प्रताड़ित किया गया। केवल एक वस्त्र धारण की हुई वह भयाकुल द्रौपदी रजस्वलावस्थामें ही कौरवोंकी सभामें ले जायी गयी। पुनः उसे विराटनगरमें मत्स्यनरेशकी दासी बनना पड़ा। कीचकके द्वारा अपमानित होनेपर वह कुररी पक्षीकी भाँति बहुत रोयी थी। पुनः जयद्रथने उसका अपहरण कर लिया, जिसपर वह करुणक्रन्दन करती हुई अत्यधिक दुःखित हुई थी। बादमें बलवान् महात्मा पाण्डवोंने उसे मुक्त कराया था। क्या यह उन सबके पूर्वजन्ममें किये गये पापकृत्यका फल था, जो वे इतने पीड़ित हुए?॥ ३५-३९॥ | | दुःखान्यनेकान्याप्तास्ते कथयाद्य महामते।<br>राजसूयं क्रतुवरं कृत्वा ते मम पूर्वजाः॥ ४०<br><br>दुःखं महत्तरं प्राप्ताः पूर्वजन्मकृतेन वै।<br>देवांशानां कथं तेषां संशयोऽयं महान्हि मे॥ ४१ | हे महामते! उन्हें नानाविध कष्ट प्राप्त हुए, मुझे इसका कारण बताइये। यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूययज्ञ करनेपर भी मेरे उन पूर्वजोंने महान् कष्ट प्राप्त किया। लगता है पूर्वजन्ममें कृत कर्मोंका ही यह फल है। देवताओंके अंश होनेपर भी उन्हें कष्ट प्राप्त हुआ; मुझे यह महान् सन्देह है!॥ ४०-४१॥ | | सदाचारैस्तु कौन्तेयैर्भीष्मद्रोणादयो हताः।<br>छलेन धनलाभार्थं जानानैर्नश्वरं जगत्॥ ४२ | महान् सदाचारपरायण पाण्डवोंने जगत्को नाशवान् जाननेके बावजूद भी धनके लोभसे छद्मका आश्रय लेकर भीष्मपितामह तथा द्रोणाचार्य आदिका संहार किया॥ ४२॥ | | प्रेरिता वासुदेवेन पापे घोरे महात्मना।<br>कुलं क्षयितवन्तस्ते हरिणा परमात्मना॥ ४३ | महात्मा वासुदेवने उन्हें इस घोर पापकृत्यके लिये प्रेरित किया और उन्हीं परमात्मा श्रीकृष्णके द्वारा प्रेरित किये जानेपर उन पाण्डवोंने अपने कुलका विनाश कर डाला॥ ४३॥ | | वरं भिक्षाटनं साधोर्नीवारैर्जीवनं वरम्।<br>योधान् हत्वा लोभेन शिल्पेन जीवनं वरम्॥ ४४ | सज्जन पुरुषोंके लिये भिक्षा माँगकर अथवा नीवार आदि खाकर जीवन बिता लेना श्रेयस्कर होता है। लोभके वशीभूत होकर वीर पुरुषोंका वध न करके शिल्पकार्य आदिके माध्यमसे जीवन-यापन करना उत्तम होता है॥ ४४॥ |