देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 416, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 416
| अ० २ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४०७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विच्छिन्नस्तु त्वया वंशो रक्षितो मुनिसत्तम।<br>समुत्पाद्य सुतानाशु गोलकाञ्छत्रुनाशनान्॥ ४५ | हे मुनिसत्तम! आपने वंशके समाप्त हो जानेपर शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ गोलक पुत्रोंको [नियोगद्वारा] उत्पन्न करके शीघ्र ही वंशकी रक्षा की थी॥ ४५॥ |
| सोऽल्पेनैव तु कालेन विराटतनयासुतः।<br>तापसस्य गले सर्पं न्यस्तवान्कथमद्भुतम्॥ ४६ | कुछ ही समयके पश्चात् विराटपुत्री उत्तराके पुत्र महाराज परीक्षित्ने एक तपस्वीके गलेमें मृत सर्प डाल दिया। यह अद्भुत घटना कैसे घटित हो गयी?॥ ४६॥ |
| न कोऽपि ब्राह्मणं द्वेष्टि क्षत्रियस्य कुलोद्भवः।<br>तापसं मौनसंयुक्तं पित्रा किं तत्कृतं मुने॥ ४७ | क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न कोई भी व्यक्ति ब्राह्मणसे द्वेष नहीं करता है। हे मुने! मेरे पिताने मौनव्रत धारण किये हुए उन तपस्वीके साथ ऐसा क्यों किया?॥ ४७॥ |
| एतैरन्यैश्च सन्देहैर्र्विकलं मे मनोऽधुना।<br>स्थिरं कुरु पितः साधो सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ ४८ | इन तथा अन्य कई प्रकारकी शंकाओंसे मेरा मन इस समय आकुलित हो रहा है। हे तात! हे साधो! हे दयानिधे! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव [सन्देहोंको दूर करके] मेरे मनको शान्त कीजिये॥ ४८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे जनमेजयप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
व्यासजीका जनमेजयको कर्मकी प्रधानता समझाना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सूत उवाच<br>एवं पृष्टः पुराणज्ञो व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>परीक्षितसुतं शान्तं ततो वै जनमेजयम्॥ १<br>उवाच संशयच्छेत्तृ वाक्यं वाक्यविशारदः। | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! ऐसा पूछे जानेपर पुराणवेत्ता, वाणीविशारद सत्यवती-पुत्र महर्षि व्यासने शान्त स्वभाववाले परीक्षित्-पुत्र जनमेजयसे उनके सन्देहोंको दूर करनेवाले वचन कहे— ॥ १ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>राजन् किमेतद्वक्तव्यं कर्मणां गहना गतिः॥ २<br><br>दुर्ज्ञेया किल देवानां मानवानां च का कथा।<br>यदा समुत्थितं चैतद् ब्रह्माण्डं त्रिगुणात्मकम्॥ ३<br><br>कर्मणैव समुत्पत्तिः सर्वेषां नात्र संशयः।<br>अनादिनिधना जीवाः कर्मबीजसमुद्भवाः॥ ४<br><br>नानायोनिषु जायन्ते म्रियन्ते च पुनः पुनः।<br>कर्मणा रहितो देहसंयोगो न कदाचन॥ ५ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस विषयमें क्या कहा जाय। कर्मोंकी बड़ी गहन गति होती है। कर्मकी गति जाननेमें देवता भी समर्थ नहीं हैं, मानवोंकी क्या बात! जब इस त्रिगुणात्मक ब्रह्माण्डका आविर्भाव हुआ, उसी समयसे कर्मके द्वारा सभीकी उत्पत्ति होती आ रही है, इस विषयमें सन्देह नहीं है। आदि तथा अन्तसे रहित होते हुए भी समस्त जीव कर्मरूपी बीजसे उत्पन्न होते हैं। वे जीव नानाविध योनियोंमें बार-बार पैदा होते हैं और मरते हैं। कर्मसे रहित जीवका देह-संयोग कदापि सम्भव नहीं है॥ २–५॥ |