भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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४०८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २

| शुभाशुभैस्तथा मिश्रैः कर्मभिर्वेष्टितं त्विदम्।<br>त्रिविधानि हि तान्याहुर्बुधास्तत्त्वविदश्च ये॥ ६<br><br>सञ्चितानि भविष्यन्ति प्रारब्धानि तथा पुनः।<br>वर्तमानानि देहेऽस्मिंस्त्रैविध्यं कर्मणां किल॥ ७ | शुभ, अशुभ तथा मिश्र—इन कर्मोंसे यह जगत् सदा व्याप्त रहता है। तत्त्वोंके ज्ञाता जो विद्वान् हैं; उन्होंने संचित, प्रारब्ध तथा वर्तमान—ये तीन प्रकारके कर्म बताये हैं। कर्मोंका त्रैविध्य इस शरीरमें अवश्य विद्यमान रहता है॥ ६-७॥ | | ब्रह्मादीनां च सर्वेषां तद्वशत्वं नराधिप।<br>सुखं दुःखं जरामृत्युहर्षशोकादयस्तथा॥ ८<br><br>कामक्रोधौ च लोभश्च सर्वे देहगता गुणाः।<br>दैवाधीनाश्च सर्वेषां प्रभवन्ति नराधिप॥ ९ | हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी उस कर्मके वशवर्ती होते हैं। सुख, दुःख, वृद्धावस्था, मृत्यु, हर्ष, शोक, काम, क्रोध, लोभ आदि—ये सभी देहगत गुण हैं। हे राजेन्द्र! ये दैवके अधीन होकर सभी जीवोंको प्राप्त होते हैं॥ ८-९॥ | | रागद्वेषादयो भावाः स्वर्गेऽपि प्रभवन्ति हि।<br>देवानां मानवानाञ्च तिरश्चां च तथा पुनः॥ १० | राग, द्वेष आदि भाव स्वर्गमें भी होते हैं और इस प्रकार ये भाव देवताओं, मनुष्यों तथा पशु-पक्षियोंमें भी विद्यमान रहते हैं॥ १०॥ | | विकाराः सर्व एवैते देहेन सह सङ्गताः।<br>पूर्ववैरानुयोगेन स्नेहयोगेन वै पुनः॥ ११ | पूर्वजन्मके किये हुए वैर तथा स्नेहके कारण ये समस्त विकार शरीरके साथ सदा ही संलग्न रहते हैं॥ ११॥ | | उत्पत्तिः सर्वजन्तूनां विना कर्म न विद्यते।<br>कर्मणा भ्रमते सूर्यः शशाङ्कः क्षयरोगवान्॥ १२ | समस्त जीवोंकी उत्पत्ति कर्मके बिना हो ही नहीं सकती है। कर्मसे ही सूर्य नियमित रूपसे परिभ्रमण करता है और चन्द्रमा क्षयरोगसे ग्रस्त रहता है॥ १२॥ | | कपाली च तथा रुद्रः कर्मणैव न संशयः।<br>अनादिनिधनं चैतत्कारणं कर्म विद्यते॥ १३ | अपने कर्मके प्रभावसे ही रुद्रको मुण्डोंकी माला धारण करनी पड़ती है; इसमें कोई सन्देह नहीं है। आदि-अन्तरहित यह कर्म ही जगत्का कारण है॥ १३॥ | | तेनेह शाश्वतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>नित्यानित्यविचारेऽत्र निमग्ना मुनयः सदा॥ १४<br><br>न जानन्ति किमेतद्वै नित्यं वानित्यमेव च।<br>मायायां विद्यमानायां जगन्नित्यं प्रतीयते॥ १५ | स्थावर-जंगमात्मक यह समग्र शाश्वत विश्व उसी कर्मके प्रभावसे नियन्त्रित है। सभी मुनिगण इस कर्ममय जगत्की नित्यता तथा अनित्यताके विचारमें सदा डूबे रहते हैं। फिर भी वे नहीं जान पाते कि यह जगत् नित्य है अथवा अनित्य। जबतक माया विद्यमान रहती है, तबतक यह जगत् नित्य प्रतीत होता है॥ १४-१५॥ | | कार्याभावः कथं वाच्यः कारणे सति सर्वथा।<br>माया नित्या कारणञ्च सर्वेषां सर्वदा किल॥ १६ | कारणकी सर्वथा सत्ता रहनेपर कार्यका अभाव कैसे कहा जा सकता है? माया नित्य है और वही सर्वदा सबका कारण है॥ १६॥ | | कर्मबीजं ततोऽनित्यं चिन्तनीयं सदा बुधैः।<br>भ्रमत्येव जगत्सर्वं राजन्कर्मनियन्त्रितम्॥ १७ | अतएव कर्मबीजकी अनित्यतापर बुद्धिमान् पुरुषोंको सदा चिन्तन करना चाहिये। हे राजन्! सम्पूर्ण जगत् कर्मके द्वारा नियन्त्रित होकर सदा परिवर्तित होता रहता है॥ १७॥ |