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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० २ ]चतुर्थ स्कन्ध४०७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विच्छिन्नस्तु त्वया वंशो रक्षितो मुनिसत्तम।<br>समुत्पाद्य सुतानाशु गोलकाञ्छत्रुनाशनान्॥ ४५हे मुनिसत्तम! आपने वंशके समाप्त हो जानेपर शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ गोलक पुत्रोंको [नियोगद्वारा] उत्पन्न करके शीघ्र ही वंशकी रक्षा की थी॥ ४५॥
सोऽल्पेनैव तु कालेन विराटतनयासुतः।<br>तापसस्य गले सर्पं न्यस्तवान्कथमद्भुतम्॥ ४६कुछ ही समयके पश्चात् विराटपुत्री उत्तराके पुत्र महाराज परीक्षित्‌ने एक तपस्वीके गलेमें मृत सर्प डाल दिया। यह अद्भुत घटना कैसे घटित हो गयी?॥ ४६॥
न कोऽपि ब्राह्मणं द्वेष्टि क्षत्रियस्य कुलोद्भवः।<br>तापसं मौनसंयुक्तं पित्रा किं तत्कृतं मुने॥ ४७क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न कोई भी व्यक्ति ब्राह्मणसे द्वेष नहीं करता है। हे मुने! मेरे पिताने मौनव्रत धारण किये हुए उन तपस्वीके साथ ऐसा क्यों किया?॥ ४७॥
एतैरन्यैश्च सन्देहैर्र्विकलं मे मनोऽधुना।<br>स्थिरं कुरु पितः साधो सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ ४८इन तथा अन्य कई प्रकारकी शंकाओंसे मेरा मन इस समय आकुलित हो रहा है। हे तात! हे साधो! हे दयानिधे! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव [सन्देहोंको दूर करके] मेरे मनको शान्त कीजिये॥ ४८॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे जनमेजयप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥


अथ द्वितीयोऽध्यायः

व्यासजीका जनमेजयको कर्मकी प्रधानता समझाना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>एवं पृष्टः पुराणज्ञो व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>परीक्षितसुतं शान्तं ततो वै जनमेजयम्॥ १<br>उवाच संशयच्छेत्तृ वाक्यं वाक्यविशारदः।**सूतजी बोले—**हे मुनियो! ऐसा पूछे जानेपर पुराणवेत्ता, वाणीविशारद सत्यवती-पुत्र महर्षि व्यासने शान्त स्वभाववाले परीक्षित्-पुत्र जनमेजयसे उनके सन्देहोंको दूर करनेवाले वचन कहे— ॥ १ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>राजन् किमेतद्वक्तव्यं कर्मणां गहना गतिः॥ २<br><br>दुर्ज्ञेया किल देवानां मानवानां च का कथा।<br>यदा समुत्थितं चैतद् ब्रह्माण्डं त्रिगुणात्मकम्॥ ३<br><br>कर्मणैव समुत्पत्तिः सर्वेषां नात्र संशयः।<br>अनादिनिधना जीवाः कर्मबीजसमुद्भवाः॥ ४<br><br>नानायोनिषु जायन्ते म्रियन्ते च पुनः पुनः।<br>कर्मणा रहितो देहसंयोगो न कदाचन॥ ५**व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस विषयमें क्या कहा जाय। कर्मोंकी बड़ी गहन गति होती है। कर्मकी गति जाननेमें देवता भी समर्थ नहीं हैं, मानवोंकी क्या बात! जब इस त्रिगुणात्मक ब्रह्माण्डका आविर्भाव हुआ, उसी समयसे कर्मके द्वारा सभीकी उत्पत्ति होती आ रही है, इस विषयमें सन्देह नहीं है। आदि तथा अन्तसे रहित होते हुए भी समस्त जीव कर्मरूपी बीजसे उत्पन्न होते हैं। वे जीव नानाविध योनियोंमें बार-बार पैदा होते हैं और मरते हैं। कर्मसे रहित जीवका देह-संयोग कदापि सम्भव नहीं है॥ २–५॥
४०८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २

| शुभाशुभैस्तथा मिश्रैः कर्मभिर्वेष्टितं त्विदम्।<br>त्रिविधानि हि तान्याहुर्बुधास्तत्त्वविदश्च ये॥ ६<br><br>सञ्चितानि भविष्यन्ति प्रारब्धानि तथा पुनः।<br>वर्तमानानि देहेऽस्मिंस्त्रैविध्यं कर्मणां किल॥ ७ | शुभ, अशुभ तथा मिश्र—इन कर्मोंसे यह जगत् सदा व्याप्त रहता है। तत्त्वोंके ज्ञाता जो विद्वान् हैं; उन्होंने संचित, प्रारब्ध तथा वर्तमान—ये तीन प्रकारके कर्म बताये हैं। कर्मोंका त्रैविध्य इस शरीरमें अवश्य विद्यमान रहता है॥ ६-७॥ | | ब्रह्मादीनां च सर्वेषां तद्वशत्वं नराधिप।<br>सुखं दुःखं जरामृत्युहर्षशोकादयस्तथा॥ ८<br><br>कामक्रोधौ च लोभश्च सर्वे देहगता गुणाः।<br>दैवाधीनाश्च सर्वेषां प्रभवन्ति नराधिप॥ ९ | हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी उस कर्मके वशवर्ती होते हैं। सुख, दुःख, वृद्धावस्था, मृत्यु, हर्ष, शोक, काम, क्रोध, लोभ आदि—ये सभी देहगत गुण हैं। हे राजेन्द्र! ये दैवके अधीन होकर सभी जीवोंको प्राप्त होते हैं॥ ८-९॥ | | रागद्वेषादयो भावाः स्वर्गेऽपि प्रभवन्ति हि।<br>देवानां मानवानाञ्च तिरश्चां च तथा पुनः॥ १० | राग, द्वेष आदि भाव स्वर्गमें भी होते हैं और इस प्रकार ये भाव देवताओं, मनुष्यों तथा पशु-पक्षियोंमें भी विद्यमान रहते हैं॥ १०॥ | | विकाराः सर्व एवैते देहेन सह सङ्गताः।<br>पूर्ववैरानुयोगेन स्नेहयोगेन वै पुनः॥ ११ | पूर्वजन्मके किये हुए वैर तथा स्नेहके कारण ये समस्त विकार शरीरके साथ सदा ही संलग्न रहते हैं॥ ११॥ | | उत्पत्तिः सर्वजन्तूनां विना कर्म न विद्यते।<br>कर्मणा भ्रमते सूर्यः शशाङ्कः क्षयरोगवान्॥ १२ | समस्त जीवोंकी उत्पत्ति कर्मके बिना हो ही नहीं सकती है। कर्मसे ही सूर्य नियमित रूपसे परिभ्रमण करता है और चन्द्रमा क्षयरोगसे ग्रस्त रहता है॥ १२॥ | | कपाली च तथा रुद्रः कर्मणैव न संशयः।<br>अनादिनिधनं चैतत्कारणं कर्म विद्यते॥ १३ | अपने कर्मके प्रभावसे ही रुद्रको मुण्डोंकी माला धारण करनी पड़ती है; इसमें कोई सन्देह नहीं है। आदि-अन्तरहित यह कर्म ही जगत्का कारण है॥ १३॥ | | तेनेह शाश्वतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>नित्यानित्यविचारेऽत्र निमग्ना मुनयः सदा॥ १४<br><br>न जानन्ति किमेतद्वै नित्यं वानित्यमेव च।<br>मायायां विद्यमानायां जगन्नित्यं प्रतीयते॥ १५ | स्थावर-जंगमात्मक यह समग्र शाश्वत विश्व उसी कर्मके प्रभावसे नियन्त्रित है। सभी मुनिगण इस कर्ममय जगत्की नित्यता तथा अनित्यताके विचारमें सदा डूबे रहते हैं। फिर भी वे नहीं जान पाते कि यह जगत् नित्य है अथवा अनित्य। जबतक माया विद्यमान रहती है, तबतक यह जगत् नित्य प्रतीत होता है॥ १४-१५॥ | | कार्याभावः कथं वाच्यः कारणे सति सर्वथा।<br>माया नित्या कारणञ्च सर्वेषां सर्वदा किल॥ १६ | कारणकी सर्वथा सत्ता रहनेपर कार्यका अभाव कैसे कहा जा सकता है? माया नित्य है और वही सर्वदा सबका कारण है॥ १६॥ | | कर्मबीजं ततोऽनित्यं चिन्तनीयं सदा बुधैः।<br>भ्रमत्येव जगत्सर्वं राजन्कर्मनियन्त्रितम्॥ १७ | अतएव कर्मबीजकी अनित्यतापर बुद्धिमान् पुरुषोंको सदा चिन्तन करना चाहिये। हे राजन्! सम्पूर्ण जगत् कर्मके द्वारा नियन्त्रित होकर सदा परिवर्तित होता रहता है॥ १७॥ |

अ० २ ]चतुर्थ स्कन्ध४०९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नानायोनिषु राजेन्द्र नानाधर्ममयेषु च।<br>इच्छया च भवेज्जन्म विष्णोरमिततेजसः॥ १८<br><br>युगे युगेष्वनेकासु नीचयोनिषु तत्कथम्।<br>त्यक्त्वा वैकुण्ठसंवासं सुखभोगाननेकquery/शः॥ १९<br><br>विण्मूत्रमन्दिरे वासं संत्रस्तः कोऽभिवाञ्छति।<br>पुष्पावचयलीलां च जलकेलिं सुखासनम्॥ २०<br><br>त्यक्त्वा गर्भगृहे वासं कोऽभिवाञ्छति बुद्धिमान्।<br>तूलिकां मृदुसंयुक्तां दिव्यां शय्यां विनिर्मिताम्॥ २१<br><br>त्यक्त्वाधोमुखवासं च कोऽभिवाञ्छति पण्डितः।<br>गीतं नृत्यञ्च वाद्यञ्च नानाभावसमन्वितम्॥ २२<br><br>मुक्त्वा को नरके वासं मनसापि विचिन्तयेत्।<br>सिन्धुजाद्भुतभावानां रसं त्यक्त्वा सुदुस्त्यजम्॥ २३<br><br>विण्मूत्ररसपानञ्च क इच्छेन्मतिमान्नरः।<br>गर्भवासात्परो नास्ति नरको भुवनत्रये॥ २४<br><br>तद्भीताश्च प्रकुर्वन्ति मुनयो दुस्तरं तपः।<br>हित्वा भोगञ्च राज्यञ्च वने यान्ति मनस्विनः॥ २५<br><br>यद्भीतास्तु विमूढात्मा कस्तं सेवितुमिच्छति।<br>गर्भे तुदन्ति कृमयो जठराग्निस्तपत्यधः॥ २६<br><br>वपासंवेष्टनं क्रूरं किं सुखं तत्र भूपते।<br>वरं कारागृहे वासो बन्धनं निगडैर्वरम्॥ २७<br><br>अल्पमात्रं क्षणं नैव गर्भवासः क्वचिच्छुभः।<br>गर्भवासे महद्दुःखं दशमासनिवासने॥ २८हे राजेन्द्र ! यदि अमित तेजवाले भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे जन्म लेनेके लिये स्वतन्त्र होते तो वे नानाविध योनियोंमें, नानाविध धर्म-कर्मानुरूप युगोंमें तथा अनेक प्रकारकी निम्न योनियोंमें जन्म क्यों लेते ? अनेक प्रकारके सुखभोगों और वैकुण्ठपुरीका निवास छोड़कर मल-मूत्रवाले स्थान (उदर)-में भयभीत होकर भला कौन रहना चाहेगा ? फूल चुननेकी क्रीड़ा, जल-विहार तथा सुखदायक आसनका परित्यागकर कौन बुद्धिमान् गर्भगृहमें वास करना चाहेगा ? कोमल रूईसे निर्मित गद्दे तथा दिव्य शय्याको छोड़कर गर्भमें औंधे मुँह पड़े रहना भला कौन विद्वान् पुरुष पसन्द कर सकता है ? अनेक प्रकारके भावोंसे युक्त गीत, वाद्य तथा नृत्यका परित्याग करके गर्भरूपी नरकमें रहनेका मनमें विचारतक भला कौन कर सकता है ? ऐसा कौन बुद्धिमान् व्यक्ति होगा जो लक्ष्मीके अद्भुत भावोंके अत्यन्त कठिनाईसे त्याग करनेयोग्य रसको छोड़कर मल-मूत्रका रस पीनेकी इच्छा करेगा ? अतएव तीनों लोकोंमें गर्भवाससे बढ़कर नरकस्वरूप अन्य कोई स्थल नहीं है। गर्भवाससे भयभीत होकर मुनिलोग कठिन तपस्या करते हैं। बड़े-बड़े मनस्वी पुरुष जिस गर्भवाससे डरकर राज्य तथा सुखका परित्याग करके वनमें चले जाते हैं, ऐसा कौन मूर्ख होगा, जो उसके सेवनकी इच्छा करेगा? ॥ १८-२५ १/२ ॥<br><br>गर्भमें कीड़े काटते हैं और नीचेसे जठराग्नि तपाती रहती है। हे राजन्! उस समय शरीरमें अतिशय दुर्गन्धयुक्त मज्जा लगी रहती है; तो फिर वहाँ कौन-सा सुख है ? कारागारमें रहना और बेड़ियोंमें बँधे रहना अच्छा है, किंतु एक क्षणके अल्पांश कालतक भी गर्भमें रहना कदापि शुभ नहीं होता। गर्भवासमें जीवको अत्यधिक पीड़ा होती है; वहाँ दस महीनेतक रहना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अत्यन्त दारुण योनि-यन्त्रसे बाहर आनेमें महान् कष्ट प्राप्त होता है। बाल्यावस्थामें भी अज्ञानता तथा न बोल पानेके कारण बहुत कष्ट मिलता है। परतन्त्र तथा अत्यन्त भयभीत बालक भूख तथा प्यासकी पीड़ाके कारण अशक्त रहता है। भूखे बालकको रोता हुआ देखकर माता [रोनेका कारण जाननेके लिये]

| ४१० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

श्लोकअर्थ
तथा निःसरणे दुःखं योनियन्त्रेऽतिदारुणे।<br>बालभावे तदा दुःखं मूकाङ्गभावसंयुक्तम्॥ २९<br>क्षुत्तृष्णावेदनायुक्तः परतन्त्रोऽतिकातरः।<br>क्षुधिते रुदिते बाले माता चिन्तातुरा तदा॥ ३०<br>भेषजं पातुमिच्छन्ती ज्ञात्वा व्याधिव्यथां दृढाम्।<br>नानाविधानि दुःखानि बालभावे भवन्ति वै॥ ३१चिन्ताग्रस्त हो उठती है और पुनः किसी बड़े रोगजनित कष्टका अनुमान करके उसे दवा पिलानेकी इच्छा करने लगती है। इस प्रकार बाल्यावस्थामें अनेक प्रकारके कष्ट होते हैं, तब विवेकी पुरुष किस सुखको देखकर स्वयं जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं!॥ २६–३१ ½॥
किं सुखं विबुधा दृष्ट्वा जन्म वाञ्छन्ति चेच्छया।<br>संग्रामममरैः सार्धं सुखं त्यक्त्वा निरन्तरम्॥ ३२<br>कर्तुमिच्छेच्च को मूढः श्रमदं सुखनाशनम्।<br>सर्वथैव नृपश्रेष्ठ सर्वे ब्रह्मादयः सुराः॥ ३३<br>कृतकर्मविपाकेन प्राप्नुवन्ति सुखासुखे।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।<br>देहवद्भिर्नृभिर्देवैस्तिर्यग्भिश्च नृपोत्तम॥ ३४कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो देवताओंके साथ रहते हुए निरन्तर सुख-भोगका त्याग करके श्रमपूर्ण तथा सुखनाशक युद्ध करनेकी इच्छा रखेगा; हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मादि सभी देवता भी अपने किये कर्मोंके फलस्वरूप सुख-दुःख प्राप्त करते हैं। हे नृपोत्तम! सभी देहधारी जीव चाहे मनुष्य, देवता या पशु-पक्षी हों, अपने-अपने किये कर्मका शुभाशुभ फल पाते हैं॥ ३२–३४॥
तपसा दानयज्ञैश्च मानवश्चेन्द्रतां व्रजेत्।<br>क्षीणे पुण्येऽथ शक्रोऽपि पतत्येव न संशयः॥ ३५मनुष्य तप, यज्ञ तथा दानके द्वारा इन्द्रत्वको प्राप्त हो जाता है और पुण्य क्षीण होनेपर इन्द्र भी च्युत हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं॥ ३५॥
रामावतारयोगेन देवा वानरतां गताः।<br>तथा कृष्णसहायार्थं देवा यादवतां गताः॥ ३६रामावतारके समय देवता कर्मबन्धनके कारण वानर बने थे और कृष्णावतारमें भी कृष्णकी सहायताके लिये देवता यादव बने थे॥ ३६॥
एवं युगे युगे विष्णुरवताराननेकणः।<br>करोति धर्मरक्षार्थं ब्रह्मणा प्रेरितो भृशम्॥ ३७इस प्रकार प्रत्येक युगमें धर्मकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णु ब्रह्माजीसे अत्यन्त प्रेरित होकर अनेक अवतार धारण करते हैं॥ ३७॥
पुनः पुनर्हरेरेवं नानायोनिषु पार्थिव।<br>अवतारा भवन्त्यन्ये रथचक्रवदद्भुताः॥ ३८हे राजन्! इस प्रकार रथचक्रकी भाँति विविध प्रकारकी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अद्भुत अवतार बार-बार होते रहते हैं॥ ३८॥
दैत्यानां हननं कर्म कर्तव्यं हरिणा स्वयम्।<br>अंशांशेन पृथिव्यां वै कृत्वा जन्म महात्मना॥ ३९<br>तदहं संप्रवक्ष्यामि कृष्णजन्मकथां शुभाम्।<br>स एव भगवान्विष्णुरवतीर्णो यदोः कुले॥ ४०महात्मा भगवान् विष्णु अपने अंशांशसे पृथ्वीपर अवतार लेकर दैत्योंका वधरूपी कार्य सम्पन्न करते हैं। इसलिये अब मैं यहाँ श्रीकृष्णके जन्मकी पवित्र कथा कह रहा हूँ। वे साक्षात् भगवान् विष्णु ही यदुवंशमें अवतरित हुए थे॥ ३९-४०॥
कश्यपस्य मुनेरंशो वसुदेवः प्रतापवान्।<br>गोवृत्तिरभवद्राजन् पूर्वशापानुभावतः॥ ४१हे राजन्! कश्यपमुनिके अंशसे प्रतापी वसुदेवजी उत्पन्न हुए थे, जो पूर्वजन्मके शापवश इस जन्ममें गोपालनका काम करते थे॥ ४१॥
कश्यपस्य च द्वे पत्न्यौ शापादत्र महीपते।<br>अदितिः सुरसा चैवमासतुः पृथिवीपते॥ ४२हे महाराज! हे पृथ्वीपते! उन्हीं कश्यपमुनिकी दो पत्नियाँ—अदिति और सुरसाने भी शापवश पृथ्वीपर अवतार ग्रहण किया था। हे भरतश्रेष्ठ! उन
अ० २ ]चतुर्थ स्कन्ध४११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवकी रोहिणी चोभे भगिन्यौ भरतर्षभ।<br>वरुणेन महाच्छापो दत्तः कोपादिति श्रुतम्॥ ४३<br><br>राजोवाच<br>किं कृतं कश्यपेनागो येन शप्तो महर्षिः।<br>सभार्यः स कथं जातस्तद्वदस्व महामते॥ ४४दोनोंने देवकी और रोहिणी नामक बहनोंके रूपमें जन्म लिया था। मैंने यह सुना है कि क्रुद्ध होकर वरुणने उन्हें महान् शाप दिया था॥ ४२-४३॥<br><br>राजा बोले—हे महामते! महर्षि कश्यपने कौन-सा ऐसा अपराध किया था, जिसके कारण उन्हें स्त्रियोंसहित शाप मिला; इसे मुझे बताइये॥ ४४॥
कथञ्च भगवान्विष्णुस्तत्र जातोऽस्ति गोकुले।<br>वासी वैकुण्ठनिलये रमापतिरखण्डितः॥ ४५वैकुण्ठवासी, अविनाशी, रमापति भगवान् विष्णुको गोकुलमें जन्म क्यों लेना पड़ा?॥ ४५॥
निदेशात्कस्य भगवान्वर्तते प्रभुरव्ययः।<br>नारायणः सुरश्रेष्ठो युगादिः सर्वधारकः॥ ४६<br>स कथं सदनं त्यक्त्वा कर्मवानिव मानुषे।<br>करोति जननं कस्मादत्र मे संशयो महान्॥ ४७सबके स्वामी, अविनाशी, देवश्रेष्ठ, युगके आदि तथा सबको धारण करनेवाले साक्षात् भगवान् नारायण किसके आदेशसे व्यवहार करते हैं और वे अपने स्थानको छोड़कर मानव-योनिमें जन्म लेकर मनुष्योंकी भाँति सब काम क्यों करते हैं; इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है॥ ४६-४७॥
प्राप्य मानुषदेहं तु करोति च विडम्बनम्।<br>भावान्नानाविधांस्तत्र मानुषे दुष्टजन्मनि॥ ४८भगवान् विष्णु स्वयं मानव-शरीर धारण करके हीन मनुष्य-जन्ममें अनेकविध लीलाएँ दिखाते हुए प्रपंच क्यों करते हैं?॥ ४८॥
कामः क्रोधोऽमर्षशोकौ वैरं प्रीतिश्च कर्हिचित्।<br>सुखं दुःखं भयं नृणां दैन्यमार्जवमेव च॥ ४९<br>दुष्कृतं सुकृतं चैव वचनं हननं तथा।<br>पोषणं चलनं तापो विमर्शश्च विकत्थनम्॥ ५०<br>लोभो दम्भस्तथा मोहः कपटः शोचनं तथा।<br>एते चान्ये तथा भावा मानुष्ये सम्भवन्ति हि॥ ५१काम, क्रोध, अमर्ष, शोक, वैर, प्रेम, सुख, दुःख, भय, दीनता, सरलता, पाप, पुण्य, वचन, मारण, पोषण, चलन, ताप, विमर्श, आत्मश्लाघा, लोभ, दम्भ, मोह, कपट और चिन्ता—ये तथा अन्य भी नाना प्रकारके भाव मनुष्य-जन्ममें विद्यमान रहते हैं॥ ४९—५१॥
स कथं भगवान्विष्णुस्त्यक्त्वा सुखमनश्वरम्।<br>करोति मानुषं जन्म भावैस्तैस्तैरभिद्रुतम्॥ ५२<br>किं सुखं मानुषं प्राप्य भुवि जन्म मुनीश्वर।<br>किं निमित्तं हरिः साक्षाद् गर्भवासं करोति वै॥ ५३वे भगवान् विष्णु शाश्वत सुखका त्याग करके इन भावोंसे ग्रस्त मनुष्य-जन्म किसलिये धारण करते हैं? हे मुनीश्वर! इस पृथ्वीपर मानव-जन्म पाकर कौन-सा सुख मिल जाता है? वे साक्षात् भगवान् विष्णु किस कारणसे गर्भवास करते हैं?॥ ५२-५३॥
गर्भदुःखं जन्मदुःखं बालभावे तथा पुनः।<br>यौवने कामजं दुःखं गार्हस्थ्येऽतिमहत्तरम्॥ ५४गर्भवासमें दुःख, जन्मग्रहणमें दुःख, बाल्यावस्थामें दुःख, यौवनावस्थामें कामजनित दुःख एवं गार्हस्थ्य जीवनमें तो बहुत बड़ा दुःख होता है॥ ५४॥
दुःखान्येतान्यवाप्नोति मानुषे द्विजसत्तम।<br>कथं स भगवान्विष्णुरवतारान्युनः पुनः॥ ५५हे विप्रवर! ये अनेक कष्ट मानव-जीवनमें प्राप्त होते हैं, तो फिर वे भगवान् विष्णु अवतार क्यों लेते हैं?॥ ५५॥
प्राप्य रामावतारं हि हरिणा ब्रह्मयोनिना।<br>दुःखं महत्तरं प्राप्तं वनवासेऽतिदारुणे॥ ५६ब्रह्मयोनि भगवान् विष्णुको रामावतार ग्रहण करके अत्यन्त दारुण वनवासकालमें घोर कष्ट प्राप्त हुआ था। उन्हें सीता-वियोगसे उत्पन्न महान् दुःख प्राप्त हुआ
४१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
सीताविरहजं दुःखं संग्रामश्च पुनः पुनः।<br>कान्त्यागोऽप्यनेनैवमनुभूतो महात्मना ॥ ५७तथा अनेक बार राक्षसोंसे युद्ध करना पड़ा। अन्तमें महान् आत्मावाले इन श्रीरामको पत्नी-परित्यागकी असीम वेदना भी सहनी पड़ी ॥ ५६-५७ ॥
तथा कृष्णावतारेऽपि जन्म रक्षागृहे पुनः।<br>गोकुले गमनं चैव गवां चारणमित्युत ॥ ५८उसी प्रकार कृष्णावतारमें भी बन्दीगृहमें जन्म, गोकुल-गमन, गोचारण, कंसका वध और पुनः कष्टपूर्वक द्वारकाके लिये प्रस्थान—इन अनेकविध सांसारिक दुःखोंको भगवान् कृष्णने क्यों भोगा? ॥ ५८-५९ ॥
कंसस्य हननं कष्टाद् द्वारकागमनं पुनः।<br>नानासंसारदुःखानि भुक्तवान्भगवान् कथम् ॥ ५९
स्वेच्छया कः प्रतीक्षेत मुक्तो दुःखानि ज्ञानवान्।<br>संशयं छिन्धि सर्वज्ञ मम चित्तप्रशान्तये ॥ ६०ऐसा कौन ज्ञानी व्यक्ति होगा जो मुक्त होता हुआ भी स्वेच्छासे इन दुःखोंकी प्रतीक्षा करेगा? हे सर्वज्ञ! मेरे मनकी शान्तिके लिये सन्देहका निवारण कीजिये ॥ ६० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कर्मणो जन्मादिकारणत्वनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


अथ तृतीयोऽध्यायः

वसुदेव और देवकीके पूर्वजन्मकी कथा

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
कारणानि बहून्यत्राप्यवतारे हरेः किल।<br>सर्वेषां चैव देवानांमशावतरणेष्वपि ॥ १[हे राजन्!] भगवान् विष्णुके विभिन्न अवतार ग्रहण करने तथा इसी प्रकार सभी देवताओंके भी अंशावतार ग्रहण करनेके बहुतसे कारण हैं ॥ १ ॥
वसुदेवावतारस्य कारणं शृणु तत्त्वतः।<br>देवक्याश्चैव रोहिण्या अवतारस्य कारणम् ॥ २अब वसुदेव, देवकी तथा रोहिणीके अवतारोंका कारण यथार्थ रूपसे सुनिये ॥ २ ॥
एकदा कश्यपः श्रीमान्यज्ञार्थं धेनुमाहरत्।<br>याचितोऽयं बहुविधं न ददौ धेनुमुत्तमाम् ॥ ३एक बार महर्षि कश्यप यज्ञकार्यके लिये वरुणदेवकी गौ ले आये। [यज्ञ-कार्यकी समाप्तिके पश्चात्] वरुणदेवके बहुत याचना करनेपर भी उन्होंने वह उत्तम धेनु वापस नहीं दी ॥ ३ ॥
वरुणस्तु ततो गत्वा ब्रह्माणं जगतः प्रभुम्।<br>प्रणम्योवाच दीनात्मा स्वदुःखं विनयान्वितः ॥ ४तत्पश्चात् उदास मनवाले वरुणदेवने जगत्के स्वामी ब्रह्माके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक उनसे अपना दुःख कहा ॥ ४ ॥
किं करोमि महाभाग मत्तोऽसौ न ददाति गाम्।<br>शापो मया विसृष्टोऽस्मै गोपालो भव मानुषे ॥ ५हे महाभाग! मैं क्या करूँ? वह अभिमानी कश्यप मेरी गाय नहीं लौटा रहा है। अतएव मैंने उसे शाप दे दिया कि मानवयोनिमें जन्म लेकर तुम गोपालक हो जाओ और तुम्हारी दोनों भार्याएँ भी मानवयोनिमें उत्पन्न होकर अत्यधिक दुःखी रहें। मेरी गायके बछड़े मातासे वियुक्त होकर अति दुःखित हैं और रो रहे हैं, अतएव पृथ्वीलोकमें जन्म लेनेपर यह अदिति भी मृतवत्सा होगी। इसे कारागारमें रहना पड़ेगा, उससे भी उसे महान् कष्ट भोगना होगा ॥ ५–७ ॥
भार्ये द्वे अपि तत्रैव भवेतां चातिदुःखिते।<br>यतो वत्सा रुदन्त्यत्र मातृहीनाः सुदुःखिताः ॥ ६
मृतवत्सादितिस्तस्माद्भविष्यति धरातले।<br>कारागारनिवासा च तेनापि बहुदुःखिता ॥ ७
अ० ३ ]चतुर्थ स्कन्ध४१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य यादोनाथस्य पद्मभूः।<br>समाहूय मुनिं तत्र तमुवाच प्रजापतिः॥ ८<br><br>कस्मात्त्वया महाभाग लोकपालस्य धेनवः।<br>हृताः पुनर्न दत्ताश्च किमन्यायं करोषि च॥ ९व्यासजी बोले— जल-जन्तुओंके स्वामी वरुणका यह वचन सुनकर प्रजापति ब्रह्माने मुनि कश्यपको वहाँ बुलाकर उनसे कहा—हे महाभाग! आपने लोकपाल वरुणकी गायोंका हरण क्यों किया; और फिर आपने उन्हें लौटाया भी नहीं। आप ऐसा अन्याय क्यों कर रहे हैं?॥ ८-९॥
जानन् न्यायं महाभाग परवित्तापहारणम्।<br>कृतवान्कथमन्यायं सर्वज्ञोऽसि महामते॥ १०हे महाभाग! न्यायको जानते हुए भी आपने दूसरेके धनका हरण किया। हे महामते! आप तो सर्वज्ञ हैं; तो फिर आपने यह अन्याय क्यों किया?॥ १०॥
अहो लोभस्य महिमा महतोऽपि न मुञ्चति।<br>लोभं नरकदं नूनं पापाकरमसम्मतम्॥ ११अहो! लोभकी ऐसी महिमा है कि वह महान्-से-महान् लोगोंको भी नहीं छोड़ता है। लोभ तो निश्चय ही पापोंकी खान, नरककी प्राप्ति करानेवाला और सर्वथा अनुचित है॥ ११॥
कश्यपोऽपि न तं त्यक्तुं समर्थः किं करोम्यहम्।<br>सर्वदैवाधिकस्तस्माल्लोभो वै कलितो मया॥ १२महर्षि कश्यप भी उस लोभका परित्याग कर सकनेमें समर्थ नहीं हुए तो मैं क्या कर सकता हूँ। अन्ततः मैंने यही निष्कर्ष निकाला कि लोभ सदासे सबसे प्रबल है॥ १२॥
धन्यास्ते मुनयः शान्ता जितो यैर्लोभ एव च।<br>वैखानसैः शमपरैः प्रतिग्रहपराङ्मुखैः॥ १३शान्त स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, प्रतिग्रहसे पराङ्मुख तथा वानप्रस्थ-आश्रम स्वीकार किये हुए वे मुनिलोग धन्य हैं, जिन्होंने लोभपर विजय प्राप्त कर ली है॥ १३॥
संसारे बलवाञ्छत्रुर्लोभोऽमेध्योऽवरः सदा।<br>कश्यपोऽपि दुराचारः कृतस्नेहो दुरात्मना॥ १४संसारमें लोभसे बढ़कर अपवित्र तथा निन्दित अन्य कोई चीज नहीं है; यह सबसे बलवान् शत्रु है। महर्षि कश्यप भी इस नीच लोभसे स्नेह करनेके कारण दुराचारमें लिप्त हो गये॥ १४॥
ब्रह्मापि तं शशापाथ कश्यपं मुनिसत्तमम्।<br>मर्यादारक्षणार्थं हि पौत्रं परमवल्लभम्॥ १५<br><br>अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले।<br>भार्याभ्यां संयुतस्तत्र गोपालत्वं करिष्यसि॥ १६अतएव मर्यादाकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने भी अपने परमप्रिय पौत्र मुनिश्रेष्ठ कश्यपको शाप दे दिया कि तुम अपने अंशसे पृथ्वीपर यदुवंशमें जन्म लेकर वहाँ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ गोपालनका कार्य करोगे॥ १५-१६॥
व्यास उवाच<br>एवं शप्तः कश्यपोऽसौ वरुणेन च ब्रह्मणा।<br>अंशावतरणार्थाय भूभारहरणाय च॥ १७व्यासजी बोले— इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वीका बोझ उतारनेके लिये वरुणदेव तथा ब्रह्माजीने उन महर्षि कश्यपको शाप दे दिया था॥ १७॥
तथा दित्यादितिः शप्ता शोकसन्तप्तया भृशम्।<br>जाता जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै॥ १८उधर कश्यपकी भार्या दितिने भी अत्यधिक शोकसन्तप्त होकर अदितिको शाप दे दिया कि क्रमसे तुम्हारे सातों पुत्र उत्पन्न होते ही मृत्युको प्राप्त हो जायँ॥ १८॥

| ४१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |

| जनमेजय उवाच<br>कस्मादित्या च भगिनी शप्तेन्द्रजननी मुने।<br>कारणं वद शापे च शोकस्तु मुनिसत्तम॥ १९ | जनमेजय बोले— हे मुने! दितिके द्वारा उसकी अपनी बहन तथा इन्द्रकी माता अदिति क्यों शापित की गयी? हे मुनिवर! आप दितिके शोक तथा उसके द्वारा प्रदत्त शापका कारण मुझे बताइये॥ १९॥ | | सूत उवाच<br>पारीक्षितेन पृष्टस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>राजानं प्रत्युवाचेदं कारणं सुसमाहितः॥ २० | सूतजी बोले— परीक्षित्-पुत्र राजा जनमेजयके पूछनेपर सत्यवती-पुत्र व्यासजी पूर्ण सावधान होकर राजाको शापका कारण बतलाने लगे॥ २०॥ | | व्यास उवाच<br>राजन् दक्षसुते द्वे तु दितिश्चादितिरुत्तमे।<br>कश्यपस्य प्रिये भार्ये बभूवतुरुरुक्रमे॥ २१ | व्यासजी बोले— हे राजन्! दक्षप्रजापतिकी दिति और अदिति नामक दो सुन्दर कन्याएँ थीं। दोनों ही कश्यपमुनिकी प्रिय तथा गौरवशालिनी पत्नियाँ बनीं॥ २१॥ | | अदित्यां मधवा पुत्रो यदाभूदतिवीर्यवान्।<br>तदा तु तादृशं पुत्रं चकमे दितिरोजसा॥ २२ | जब अदितिके अत्यन्त तेजस्वी पुत्र इन्द्र हुए, तब वैसे ही ओजस्वी पुत्रके लिये दितिके भी मनमें इच्छा जाग्रत् हुई॥ २२॥ | | पतिमाहासितापाङ्गी पुत्रं मे देहि मानद।<br>इन्द्रतुल्यबलं वीरं धर्मिष्ठं वीर्यवत्तमम्॥ २३ | उस समय सुन्दरी दितिने कश्यपजीसे प्रार्थना की—हे मानद! इन्द्रके ही समान बलशाली, वीर, धर्मात्मा तथा परम शक्तिसम्पन्न पुत्र मुझे भी देनेकी कृपा करें॥ २३॥ | | तामुवाच मुनिः कान्ते स्वस्था भव मयोदिते।<br>व्रतान्ते भविता तुभ्यं शतक्रतुसमः सुतः॥ २४ | तब मुनि कश्यपने उनसे कहा—प्रिये! धैर्य धारण करो, मेरे द्वारा बताये गये व्रतको पूर्ण करनेके अनन्तर इन्द्रके समान पुत्र तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा॥ २४॥ | | सा तथेति प्रतिश्रुत्य चकार व्रतमुत्तमम्।<br>निषिक्तं मुनिना गर्भं बिभ्राणा सुमनोहरम्॥ २५ | कश्यपमुनिकी बात स्वीकार करके दिति उस उत्तम व्रतके पालनमें तत्पर हो गयी। उनके ओजसे सुन्दर गर्भ धारण करती हुई वह सुन्दरी दिति | | भूमौ चकार शयनं पयोव्रतपरायणा।<br>पवित्रा धारणाद्युक्ता बभूव वरवर्णिनी॥ २६ | पयोव्रतमें स्थित रहकर भूमिपर सोती थी और पवित्रताका सदा ध्यान रखती थी। इस प्रकार क्रमशः | | एवं जातः सुसम्पूर्णो यदा गर्भोऽतिवीर्यवान्।<br>शुभ्रांशुमतिदीप्ताङ्गीं दितिं दृष्ट्वा तु दुःखिता॥ २७ | जब वह महान् तेजस्वी गर्भ पूर्ण हो गया, तब शुभ्र ज्योतियुक्त तथा दीप्तिमान् अंगोंवाली दितिको देखकर अदिति दुःखित हुई॥ २५–२७॥ | | मधवत्सदृशः पुत्रो भविष्यति महाबलः।<br>दित्यास्तदा मम सुतस्तेजोहीनो भवेत्किल॥ २८ | [उसने अपने मनमें सोचा—] यदि दितिके गर्भसे इन्द्रतुल्य महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तो निश्चय ही मेरा पुत्र निस्तेज हो जायगा॥ २८॥ | | इति चिन्तापरा पुत्रमिन्द्रं चोवाच मानिनी।<br>शत्रुस्तेऽद्य समुत्पन्नो दितिगर्भेऽतिवीर्यवान्॥ २९ | इस प्रकार चिन्ता करती हुई मानिनी अदितिने अपने पुत्र इन्द्रसे कहा—प्रिय पुत्र! इस समय दितिके गर्भमें तुम्हारा अत्यन्त पराक्रमशाली शत्रु विद्यमान है। | | उपायं कुरु नाशाय शत्रोरद्य विचिन्त्य च।<br>उत्पत्तिरेव हन्तव्या दित्या गर्भस्य शोभन॥ ३० | हे शोभन! तुम सम्यक् विचार करके उस शत्रुके नाशका प्रयत्न करो, जिससे दितिकी गर्भोत्पत्ति ही विनष्ट हो जाय॥ २९–३०॥ |

अ० ३ ]चतुर्थ स्कन्ध४१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं सपत्नीभावमास्थिताम्।<br>दुनोति हृदये चिन्ता सुखमर्मविनाशिनी ॥ ३१मुझसे सपत्नीभाव रखनेवाली उस सुन्दरी दितिको देखकर सुखका नाश कर देनेवाली चिन्ता मेरे मनको सताने लगती है॥ ३१॥
राजयक्ष्मेव संवृद्धो नष्टो नैव भवेद्रिपुः।<br>तस्मादङ्कुरितं हन्याद् बुद्धिमानहितं किल॥ ३२जब शत्रु बढ़ जाता है तब राजयक्ष्मा रोगकी भाँति वह नष्ट नहीं हो पाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यका कर्तव्य है कि वह ऐसे शत्रुको अंकुरित होते ही नष्ट कर डाले॥ ३२॥
लोहशङ्कुरिव क्षिप्तो गर्भो वै हृदये मम।<br>येन केनाप्युपायेन पातयाद्य शतक्रतो ॥ ३३<br><br>सामदानबलेनापि हिंसनीयस्त्वया सुतः।<br>दित्या गर्भो महाभाग मम चेदिच्छसि प्रियम्॥ ३४हे देवेन्द्र! दितिका वह गर्भ मेरे हृदयमें लोहेकी कीलके समान चुभ रहा है, अतः जिस किसी भी उपायसे तुम उसे नष्ट कर दो। हे महाभाग! यदि तुम मेरा हित करना चाहते हो तो साम, दान आदिके बलसे दितिके गर्भस्थ शिशुका संहार कर डालो॥ ३३-३४॥
व्यास उवाच<br>श्रुत्वा मातृवचः शक्रो विचिन्त्य मनसा ततः।<br>जगामापरमातुः स समीपममराधिपः॥ ३५<br><br>ववन्दे विनयात्पादौ दित्याः पापमतिर्नृप।<br>प्रोवाच विनयेनासौ मधुरं विषगर्भितम्॥ ३६**व्यासजी बोले—**हे राजन्! तब अपनी माताकी वाणी सुनकर देवराज इन्द्र मन-ही-मन उपाय सोचकर अपनी विमाता दितिके पास गये। उस पापबुद्धि इन्द्रने विनयपूर्वक दितिके चरणोंमें प्रणाम किया और ऊपरसे मधुर किंतु भीतरसे विषभरी वाणीमें विनम्रतापूर्वक उससे कहा—॥ ३५-३६॥
इन्द्र उवाच<br>मातस्त्वं व्रतयुक्तासि क्षीणदेहातिदुर्बला।<br>सेवार्थमिह सम्प्राप्तः किं कर्तव्यं वदस्व मे॥ ३७<br><br>पादसंवाहनं तेऽहं करिष्यामि पतिव्रते।<br>गुरुशुश्रूषणात्पुण्यं लभते गतिमक्षयाम् ॥ ३८**इन्द्र बोले—**हे माता! आप व्रतपरायण हैं, और अत्यन्त दुर्बल तथा कृशकाय हो गयी हैं। अतः मैं आपकी सेवा करनेके लिये आया हूँ। मुझे बताइये, मैं क्या करूँ ? हे पतिव्रते! मैं आपके चरण दबाऊँगा; क्योंकि बड़ोंकी सेवासे मनुष्य पुण्य तथा अक्षय गति प्राप्त कर लेता है॥ ३७-३८॥
न मे किमपि भेदोऽस्ति तथादित्या शपे किल।<br>इत्युक्त्वा चरणौ स्पृष्ट्वा संवाहनपरोऽभवत् ॥ ३९मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि मेरे लिये माता अदिति तथा आपमें कुछ भी भेद नहीं है। ऐसा कहकर इन्द्र उनके दोनों चरण पकड़कर दबाने लगे॥ ३९॥
संवाहनसुखं प्राप्य निद्रामाप सुलोचना।<br>श्रान्ता व्रतकृशा सुप्ता विश्वस्ता परमा सती ॥ ४०पादसंवाहनका सुख पाकर सुन्दर नेत्रोंवाली उस दितिको नींद आने लगी। वह परम सती दिति थकी हुई थी, व्रतके कारण दुर्बल हो गयी थी और उसे इन्द्रपर विश्वास था, अतः वह सो गयी॥ ४०॥
तां निद्रावशमापन्नां विलोक्य प्राविशत्तनुम्।<br>रूपं कृत्वातिसूक्ष्मञ्च शस्त्रपाणिः समाहितः॥ ४१दितिको नींदके वशीभूत देखकर इन्द्र अपना अत्यन्त सूक्ष्म रूप बनाकर हाथमें शस्त्र लेकर बड़ी सावधानीके साथ दितिके शरीरमें प्रवेश कर गये॥ ४१॥

| ४१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उदरं प्रविवेशाशु तस्या योगबलेन वै।<br>गर्भं चकर्त वज्रेण सप्तधा पविनायकः॥ ४२इस प्रकार योगबलद्वारा दितिके उदरमें शीघ्र ही प्रविष्ट होकर इन्द्रने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर डाले॥ ४२॥
रुरोद च तदा बालो वज्रेणाभिहतस्तथा।<br>मा रुदेति शनैर्वाक्यमुवाच मघवानमुम्॥ ४३उस समय वज्राघातसे दुःखित हो गर्भस्थ शिशु रुदन करने लगा। तब धीरेसे इन्द्रने उससे 'मा रुद' 'मत रोओ'—ऐसा कहा॥ ४३॥
शकलानि पुनः सप्त सप्तधा कर्तितानि च।<br>तदा चैकोनपञ्चाशन्मरुतश्चाभवन्नृप॥ ४४तत्पश्चात् इन्द्रने पुनः उन सातों टुकड़ोंके सात-सात खण्ड कर डाले। हे राजन्! वे ही टुकड़े उनचास मरुद्गणके रूपमें प्रकट हो गये॥ ४४॥
तदा प्रबुद्धा सुदती ज्ञात्वा गर्भं तथाकृतम्।<br>इन्द्रेण छलरूपेण चुकोप भृशदुःखिता॥ ४५उस छली इन्द्रद्वारा अपने गर्भको वैसा (विकृत) किया गया जानकर सुन्दर दाँतोंवाली वह दिति जाग गयी और अत्यन्त दुःखी होकर क्रोध करने लगी॥ ४५॥
भगिनीकृतं तु सा बुद्ध्वा शशाप कुपिता तदा।<br>अदितिं मघवन्तञ्च सत्यव्रतपरायणा॥ ४६<br>यथा मे कर्तितो गर्भस्तव पुत्रेण छद्मना।<br>तथा तन्नाशमायातु राज्यं त्रिभुवनस्य तु॥ ४७<br>यथा गुप्तेन पापेन मम गर्भो निपातितः।<br>अदित्या पापचारिण्या यथा मे घातितः सुतः॥ ४८<br>तस्याः पुत्रास्तु नश्यन्तु जाता जाताः पुनः पुनः।<br>कारागारे वसत्वेषा पुत्रशोकातुरा भृशम्॥ ४९<br>अन्यजन्मनि चाप्येव मृतापत्या भविष्यति।यह सब बहन अदितिद्वारा किया गया है—ऐसा जानकर सत्यव्रतपरायण दितिने कुपित होकर अदिति और इन्द्र दोनोंको शाप दे दिया कि जिस प्रकार तुम्हारे पुत्र इन्द्रने छलपूर्वक मेरा गर्भ छिन्न-भिन्न कर डाला है, उसी प्रकार उसका त्रिभुवनका राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाय। जिस प्रकार पापिनी अदितिने गुप्त पापके द्वारा मेरा गर्भ गिराया है और मेरे गर्भको नष्ट करवा डाला है, उसी प्रकार उसके पुत्र भी क्रमशः उत्पन्न होते ही नष्ट हो जायेंगे और वह पुत्र-शोकसे अत्यन्त चिन्तित होकर कारागारमें रहेगी। अन्य जन्ममें भी इसकी सन्तानें मर जाया करेंगी॥ ४६—४९ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्युत्सृष्टं तदा श्रुत्वा शापं मरीचिनन्दनः॥ ५०<br>उवाच प्रणयोपेतो वचनं शमयन्निव।<br>मा कोपं कुरु कल्याणि पुत्रास्ते बलवत्तराः॥ ५१<br>भविष्यन्ति सुराः सर्वे मरुतो मघवत्सखाः।<br>शापोऽयं तव वामोरु त्वष्टाविंशेऽथ द्वापरे॥ ५२<br>अंशेन मानुषं जन्म प्राप्य भोक्ष्यति भामिनी।<br>वरुणेनापि दत्तोऽस्ति शापः सन्तापितेन च॥ ५३<br>उभयोः शापयोगेन मानुषीयं भविष्यति।व्यासजी बोले—इस प्रकार मरीचिपुत्र कश्यपने दितिप्रदत्त शापको सुनकर उसे सान्त्वना देते हुए प्रेमपूर्वक यह वचन कहा—हे कल्याणि! तुम क्रोध मत करो, तुम्हारे पुत्र बड़े बलवान् होंगे। वे सब उनचास मरुद् देवता होंगे, जो इन्द्रके मित्र बनेंगे। हे सुन्दरि! अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें तुम्हारा शाप सफल होगा। उस समय अदिति मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर अपने किये कर्मका फल भोगेगी। इसी प्रकार दुःखित वरुणने भी उसे शाप दिया है। इन दोनों शापोंके संयोगसे यह अदिति मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगी॥ ५०—५३ १/२॥
व्यास उवाच<br>पतिनाश्वासिता देवी सन्तुष्टा साभवत्तदा॥ ५४व्यासजी बोले—इस प्रकार पति कश्यपके आश्वासन देनेपर दिति सन्तुष्ट हो गयी और वह

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे

अ० ४ ]चतुर्थ स्कन्ध४१७

| नोवाच विप्रियं किञ्चित्ततः सा वरवर्णिनी।<br>इति ते कथितं राजन् पूर्वशापस्य कारणम्॥ ५५<br>अदितिर्देवकी जाता स्वांशेन नृपसत्तम॥ ५६ | पुनः कोई अप्रिय वाणी नहीं बोली। हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपको अदितिके पूर्व शापका कारण बताया। हे नृपश्रेष्ठ! वही अदिति अपने अंशसे देवकीके रूपमें उत्पन्न हुई॥ ५४—५६॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
दित्या अदित्यै शापदानं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
~~ ⚬ ~~

अथ चतुर्थोऽध्यायः

व्यासजीद्वारा जनमेजयको मायाकी प्रबलता समझाना

राजोवाचराजा बोले—
विस्मितोऽस्मि महाभाग श्रुत्वाख्यानं महामते।<br>संसारोऽयं पापरूपः कथं मुच्येत बन्धनात्॥ १हे महाभाग! इस आख्यानको सुनकर मैं बड़े आश्चर्यमें पड़ गया हूँ। हे महामते! यह संसार पापका मूर्तरूप है। इसके बन्धनसे मनुष्य किस प्रकार मुक्त हो सकता है?॥ १॥
कश्यपस्यापि दायादस्त्रिलोकीविभवे सति।<br>कृतवानीदृशं कर्म को न कुर्याज्जुगुप्सितम्॥ २जब तीनों लोकोंका वैभव पास रखते हुए भी कश्यपमुनिकी संतान इन्द्रने ऐसा पापकर्म कर डाला, तब कौन मनुष्य पाप नहीं कर सकता?॥ २॥
गर्भे प्रविश्य बालस्य हननं दारुणं किल।<br>सेवामिषेण मातुश्च कृत्वा शपथमद्भुतम्॥ ३अद्भुत शपथ लेकर सेवाके बहाने माताके गर्भमें प्रविष्ट होकर बालककी हत्या करना तो बड़ा भयानक पाप है!॥ ३॥
शास्ता धर्मस्य गोप्ता च त्रिलोक्याः पतिरप्युत।<br>कृतवानीदृशं कर्म को न कुर्यादसाम्प्रतम्॥ ४सबके शासक, धर्मके रक्षक और तीनों लोकोंके स्वामी इन्द्रने जब ऐसा निन्दित कर्म कर डाला, तब फिर दूसरा कौन नहीं करेगा?॥ ४॥
पितामहा मे संग्रामे कुरुक्षेत्रेऽतिदारुणम्।<br>कृतवन्तस्तथाश्चर्यं दुष्टं कर्म जगद्गुरो॥ ५<br><br>भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णो धर्मांशोऽपि युधिष्ठिरः।<br>सर्वे विरुद्धधर्मेण वासुदेवेन नोदिताः॥ ६हे जगद्गुरो! मेरे पितामह लोगोंने भी कुरुक्षेत्रके संग्राममें ऐसा ही विस्मयकारी दारुण और निन्दित कर्म किया था। भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा धर्मके अंशरूप युधिष्ठिर—इन सभीने भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे धर्मविरुद्ध कर्म किया था॥ ५-६॥
असारतां विजानन्तः संसारस्य सुमेधसः।<br>देवांशाश्च कथं चक्रुर्निन्दितं धर्मतत्पराः॥ ७संसारकी असारता जानते हुए भी उन प्रतिभाशाली तथा देवांशासे उत्पन्न धर्मपरायण पाण्डवोंने भी ऐसा गर्हित कर्म क्यों किया?॥ ७॥
कास्था धर्मस्य विप्रेन्द्र प्रमाणं किं विनिश्चितम्।<br>चलचित्तोऽस्मि सञ्जातः श्रुत्वा चैतत्कथानकम्॥ ८हे द्विजेन्द्र! यदि ऐसी बात है तो धर्मपर किसकी आस्था होगी और धर्मके विषयमें सैद्धान्तिक प्रमाण ही क्या रह जायगा? यह वृत्तान्त सुनकर तो मेरा मन चंचल हो उठा है॥ ८॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—14 A

४१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आप्तवाक्यं प्रमाणं चेदाप्तः कः परदेहवान्।<br>पुरुषो विषयासक्तो रागी भवति सर्वथा॥ ९<br>रागो द्वेषो भवेन्नूनमर्थनाशादसंशयम्।<br>द्वेषादसत्यवचनं वक्तव्यं स्वार्थसिद्धये॥ १०यदि आप्त वचनको प्रमाण मानें, तो फिर कौन पुरुष आप्त है? विषयासक्त मनुष्यमें राग आ ही जाता है और अपना स्वार्थ भंग होनेपर उसमें निःसन्देह राग-द्वेषकी बहुलता हो जाती है। द्वेषके कारण अपनी स्वार्थसिद्धिके लिये असत्य भाषण करना पड़ता है॥ ९-१०॥
जरासन्धविघातार्थं हरिणा सत्त्वमूर्तिना।<br>छलेन रचितं रूपं ब्राह्मणस्य विजानता॥ ११<br>तदाप्तः कः प्रमाणं किं सत्त्वमूर्तिरपीदृशः।<br>अर्जुनोऽपि तथैवात्र कार्ये यज्ञविनिर्मिते॥ १२परम ज्ञानी और सत्त्वगुणके मूर्तस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने भी जरासन्धके वधके लिये छलसे ब्राह्मणका वेष धारण किया था। जब सत्त्वमूर्ति भी इस प्रकारके होते हैं, तब किस आप्त पुरुषको प्रमाण माना जाय ? उसी प्रकार [राजसूय] यज्ञके अवसरपर अर्जुनने भी वैसा ही कर्म किया था॥ ११-१२॥
कीदृशोऽयं कृतो यज्ञः किमर्थं शमवर्जितः।<br>परलोकपदार्थं वा यशसे वान्यथा किल॥ १३जिस यज्ञमें अशान्तिका वातावरण रहा, उस यज्ञको किस श्रेणीका यज्ञ कहा जाय ? वह यज्ञ परलोकमें परमपदकी प्राप्तिके लिये किया गया था अथवा सुयश पानेके लिये किया गया था या अन्य किसी कार्यकी सिद्धिके लिये किया गया था ?॥ १३॥
धर्मस्य प्रथमः पादः सत्यमेतच्छ्रुतेर्वचः।<br>द्वितीयस्तु तथा शौचं दया पादस्तृतीयकः॥ १४<br>दानं पादश्चतुर्थश्च पुराणज्ञा वदन्ति वै।<br>तैर्विहीनः कथं धर्मस्तिष्ठेदिह सुसम्मतः॥ १५श्रुतिका यह वचन है कि धर्मका प्रथम चरण सत्य, दूसरा चरण पवित्रता, तीसरा चरण दया तथा चतुर्थ चरण दान है। पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं। इन चारोंके बिना परम आदृत धर्म कैसे टिक सकता है ?॥ १४-१५॥
धर्महीनं कृतं कर्म कथं तत्फलदं भवेत्।<br>धर्मे स्थिरा मतिः क्वापि न कस्यापि प्रतीयते॥ १६तब मेरे पूर्वजोंके द्वारा किया गया वह धर्मविहीन यज्ञ-कर्म [उत्तम] फल देनेवाला कैसे हो सकता था ? इससे तो यही प्रतीत होता है कि उस समय किसीका भी कहीं भी धर्ममें अटल विश्वास नहीं था॥ १६॥
छलार्थञ्च यदा विष्णुर्वामनोऽभूज्जगत्प्रभुः।<br>येन वामनरूपेण वञ्चितोऽसौ बलिर्नृपः॥ १७जगत्प्रभु भगवान् विष्णुने भी छलनेहेतु वामनका रूप धारण किया था, जिन्होंने वामनरूपसे राजा बलिको ठग लिया था॥ १७॥
विहर्ता शतयज्ञस्य वेदाज्ञापरिपालकः।<br>धर्मिष्ठो दानशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ १८<br>स्थानात्प्रभ्रंशितोऽकस्माद्विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>जितं केन तयोः कृष्ण बलिना वामनेन वा॥ १९<br>छलकर्मविदा चायं सन्देहोऽत्र महान्मम।<br>वञ्चयित्वा वञ्चितेन सत्यं वद द्विजोत्तम॥ २०<br>पुराणकर्ता त्वमसि धर्मज्ञश्च महामतिः।महाराज बलि सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, वेदोंकी आज्ञाका पालन करनेवाले, धर्मात्मा, दानी, सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय थे। ऐसे महापुरुषको परम प्रभावशाली भगवान् विष्णुने अकस्मात् पदच्युत कर दिया। अतः हे कृष्णद्वैपायन ! उन दोनोंमें कौन जीता ? वंचना करके छलकर्ममें निपुण भगवान् वामनकी विजय हुई या छले गये राजा बलिकी; इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। हे द्विजश्रेष्ठ ! मुझे सत्य बात बताइये; क्योंकि आप पुराणोंके रचयिता, धर्मज्ञ तथा महान् बुद्धिसम्पन्न हैं॥ १८-२० १/२॥

1897 श्रीमद्देवी...महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 14 B

अ० ४ ] चतुर्थ स्कन्ध ४१९

अ० ४ ] चतुर्थ स्कन्ध ४१९


व्यास उवाच
जितं वै बलिना राजन् दत्ता येन च मेदिनी ॥ २१<br><br>त्रिविक्रमोऽपि नाम्ना यः प्रथितो वामनोऽभवत् ।<br>छलनार्थमिदं राजन्वामनत्वं नराधिप ॥ २२<br><br>सम्प्राप्तं हरिणा भूयो द्वारपालत्वमेव च ।<br>सत्यादन्यतरन्नास्ति मूलं धर्मस्य पार्थिव ॥ २३व्यासजी बोले— हे राजन्! उस राजा बलिकी ही विजय हुई, जिसने समस्त भूमण्डलका दान कर दिया था। हे राजन्! जो त्रिविक्रम नामसे विख्यात थे, वे भगवान् विष्णु वामन बने। हे नरेन्द्र! उन्होंने छल करनेके लिये यह वामनरूप धारण किया था और इसी छलके परिणामस्वरूप उन श्रीहरिको राजा बलिका द्वारपाल बनना पड़ा। अतः हे राजन्! सत्यसे बढ़कर धर्मका मूल और कुछ नहीं है॥ २१—२३॥
दुःसाध्यं देहिनां राजन्सत्यं सर्वात्मना किल ।<br>माया बलवती भूप त्रिगुणा बहुरूपिणी ॥ २४<br><br>ययेदं निर्मितं विश्वं गुणैः शबलितं त्रिभिः ।<br>तस्माच्छलवता सत्यं कुतोऽविद्धं भवेन्नृप ॥ २५हे राजन्! सम्यक् प्रकारसे सत्यका पालन करना प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है। अनेक रूप धारण करनेवाली त्रिगुणात्मिका माया बड़ी बलवती है, जिसने तीनों गुणोंसे सम्मिश्रित इस विश्वकी रचना की है। अतः हे राजन्! छल-कपट करनेवालेसे बिना प्रभावित हुए यह सत्य कैसे रह सकता है?॥ २४-२५॥
मिश्रेण जनिता चैव स्थितिरेशा सनातनी ।<br>वैखानसाश्च मुनयो निःसङ्गा निष्प्रतिग्रहाः ॥ २६<br><br>सत्ययुक्ता भवन्त्यत्र वीतरागा गतस्पृहाः ।<br>दृष्टान्तदर्शनार्थाय निर्मितास्ते च तादृशाः ॥ २७सत्त्व, रज और तम—इन्हीं तीनों गुणोंके मेलसे संसारका प्रादुर्भाव हुआ, यही सृष्टिका सनातन नियम है। केवल अनासक्त, प्रतिग्रहशून्य, रागरहित और तृष्णाविहीन वानप्रस्थ तथा मुनिजन अवश्य सत्यपरायण होते हैं, किंतु वैसे लोग केवल दृष्टान्त दिखानेके लिये ही बनाये गये हैं॥ २६-२७॥
अन्यत्सर्वं शबलितं गुणैरेभिस्त्रिभिर्नृप ।<br>नैकं वाक्यं पुराणेषु वेदेषु नृपसत्तम ॥ २८<br><br>धर्मशास्त्रेषु चाङ्गेषु सगुणै रचितेष्विह ।<br>सगुणः सगुणं कुर्यान्निर्गुणो न करोति वै ॥ २९<br><br>गुणास्ते मिश्रिताः सर्वे न पृथग्भावसङ्गताः ।<br>निर्व्यलीके स्थिरे धर्मे मतिः कस्यापि न स्थिरा ॥ ३०हे राजन्! उनके अतिरिक्त सब कुछ सत्त्व, रज एवं तम—इन तीनों गुणोंसे ओत-प्रोत है। हे नृपश्रेष्ठ! पुराणों, वेदों, धर्मशास्त्रों, वेदांगों और सगुण प्राणियोंद्वारा रचित ग्रन्थोंमें भी कहीं एकवाक्यता नहीं मिलती; सगुण प्राणी ही सगुण कार्य करता है, निर्गुणसे सगुण कार्य नहीं हो सकता; क्योंकि वे सभी गुण मिश्रित हैं, वे पृथक्-पृथक् नहीं रहते। इसी कारण किसीकी भी बुद्धि सत्य तथा सनातनधर्ममें टिक नहीं पाती॥ २८—३०॥
भवोद्भवे महाराज मायया मोहितस्य वै ।<br>इन्द्रियाणि प्रमाथीनि तदासक्तं मनस्तथा ॥ ३१<br><br>करोति विविधान्भावान्गुणैस्तैः प्रेरितो भृशम् ।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनः स्थिरजङ्गमाः ॥ ३२<br><br>सर्वे मायावशा राजन् सानुक्रीडति तैरिह ।<br>सर्वान्वै मोहयत्येषा विकुर्वत्यनिशं जगत् ॥ ३३हे महाराज! संसारकी सृष्टिके समय मायासे मोहित मनुष्यकी इन्द्रियाँ अत्यन्त चंचल हो जाती हैं और उनमें आसक्त मन उन गुणोंसे प्रेरित होकर विविध प्रकारके भाव प्रकट करने लगता है। हे राजन्! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त स्थावर-जंगम सभी प्राणी मायाके वशीभूत रहते हैं और वह माया उनके साथ क्रीडा करती रहती है। यह माया सभीको मोहमें डाल देती है और जगत्में निरन्तर विकार उत्पन्न किया करती है॥ ३१—३३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—14 C

४२०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४ ]

| असत्यो जायते राजन्कार्यावान्प्रथमं नरः।<br>इन्द्रियार्थांश्चिन्तयानो न प्राप्नोति यदा नरः॥ ३४<br><br>तदर्थं छलमादत्ते छलात्पापे प्रवर्तते।<br>कामः क्रोधश्च लोभश्च वैरिणो बलवत्तराः॥ ३५<br><br>कृताकृतं न जानन्ति प्राणिनस्तद्वशं गताः।<br>विभवे सत्यहङ्कारः प्रबलः प्रभवत्यपि॥ ३६<br><br>अहङ्काराद्भवन्मोहो मोहान्मरणमेव च।<br>सङ्कल्पा बहवस्तत्र विकल्पाः प्रभवन्ति च॥ ३७<br><br>ईर्ष्यासूया तथा द्वेषः प्रादुर्भवति चेतसि।<br>आशा तृष्णा तथा दैन्यं दम्भोऽधर्ममतिस्तथा॥ ३८<br><br>प्राणिनां प्रभवन्त्येते भावा मोहसमुद्भवाः।<br>यज्ञदानानि तीर्थानि व्रतानि नियमास्तथा॥ ३९<br><br>अहङ्काराभिभूतस्तु करोति पुरुषोऽन्वहम्।<br>अहंभावकृतं सर्वं प्रभवेद्वै न शौचवत्॥ ४०<br><br>रागलोभात्कृतं कर्म सर्वाङ्गं शुद्धिवर्जितम्।<br>प्रथमं द्रव्यशुद्धिश्च द्रष्टव्या विबुधैः किल॥ ४१ | हे राजन्! सर्वप्रथम अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य असत्यका सहारा लेता है। उस समय इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करते हुए जब मनुष्य अपना अभीष्ट नहीं पाता, तो वह उसके लिये छल करने लगता है। इस प्रकार छलके कारण वह पापमें प्रवृत्त हो जाता है। काम, क्रोध और लोभ मनुष्योंके सबसे बड़े शत्रु हैं। इनके वशमें होनेके कारण प्राणी कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं जान पाते। ऐश्वर्य बढ़ जानेपर अहंकार और भी बढ़ जाता है। अहंकारसे मोह उत्पन्न होता है और मोहसे विनाश हो जाता है। मोहके कारण मनुष्यके मनमें अनेक प्रकारके संकल्प-विकल्प होने लगते हैं। उस समय मनमें ईर्ष्या, असूया तथा द्वेष उत्पन्न हो जाते हैं। प्राणियोंके हृदयमें आशा, तृष्णा, दीनता, दम्भ और अधार्मिक बुद्धि—ये सब उत्पन्न हो जाते हैं। ये भावनाएँ प्राणियोंमें मोहसे ही उत्पन्न होती हैं। यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत और नियम जो कुछ भी सत्कर्म हैं, उन्हें भी मनुष्य अहंकारके ही वशीभूत होकर निरन्तर करता है, उनका अहंभावसे किया गया सारा कार्य वैसा नहीं होता, जैसा कि शुद्ध अन्तःकरणसे किया जाता है। आसक्ति एवं लोभसे किया हुआ कोई भी कर्म सर्वथा अशुद्ध होता है॥ ३४-४० १/२ ॥ | | अद्रोहेणार्जितं द्रव्यं प्रशस्तं धर्मकर्मणि।<br>द्रोहार्जितेन द्रव्येण यत्करोति शुभं नरः॥ ४२<br><br>विपरीतं भवेत्तत्तु फलकाले नृपोत्तम।<br>मनोऽतिनिर्मलं यस्य स सम्यक्फलभाग्भवेत्॥ ४३<br><br>तस्मिन्विकारयुक्ते तु न यथार्थफलं लभेत्।<br>कर्तारः कर्मणां सर्वे आचार्यऋत्विजादयः॥ ४४ | बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे सर्वप्रथम द्रव्य-शुद्धिपर विचार कर लें। द्रोहरहित कर्म करके अर्जित किया हुआ धन धर्मकार्यमें प्रशस्त माना गया है। हे नृपश्रेष्ठ! द्रोहपूर्वक उपार्जित किये हुए द्रव्यके द्वारा मनुष्य जो उत्तम कार्य करता है, समय आनेपर उसका विपरीत फल प्राप्त होता है। जिसका मन परम पवित्र है, वही पूर्ण फलका अधिकारी होता है और मनके विकारपूर्ण रहनेपर उसे यथार्थ फल नहीं मिलता॥ ४१-४३ १/२ ॥ | | स्युस्ते विशुद्धमनसस्तदा पूर्णं भवेत्फलम्।<br>देशकालक्रियाद्रव्यकर्तॄणां शुद्धता यदि॥ ४५<br><br>मन्त्राणां च तदा पूर्णं कर्मणां फलमश्नुते।<br>शत्रूणां नाशमुद्दिश्य स्ववृद्धिं परमां तथा॥ ४६ | जब कर्म करानेवाले ऋत्विक्, आचार्य आदि लोगोंका चित्त शुद्ध रहता है, तभी पूर्ण फल प्राप्त होता है। यदि देश, काल, क्रिया, द्रव्य, कर्ता और मन्त्र—इन सबकी शुद्धता रहती है, तभी कर्मोंका पूरा फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य शत्रुनाश तथा अपनी अभिवृद्धिके उद्देश्यसे पुण्यकर्म करता है तो उसे भी वैसा ही |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—14 D

अ० ५ ]चतुर्थ स्कन्ध४२१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
करोति सुकृतं तद्वद्विपरीतं भवेत्किल ।<br>स्वार्थासक्तः पुमान्नित्यं न जानाति शुभाशुभम् ॥ ४७<br>दैवाधीनः सदा कुर्यात्पापमेव न सत्कृतम् ।<br>प्राजापत्याः सुराः सर्वे ह्यसुराश्च तदुद्भवाः ॥ ४८<br>सर्वे ते स्वार्थनिरताः परस्परविरोधिनः ।<br>सत्त्वोद्भवाः सुराः सर्वेऽप्युक्ता वेदेषु मानुषाः ॥ ४९<br>रजोद्भवास्तामसास्तु तिर्यञ्चः परिकीर्तिताः ।<br>सत्त्वोद्भवानां तैर्वैरं परस्परमनारतम् ॥ ५०<br>तिरश्चामत्र किं चित्रं जातिवैरसमुद्भवे ।<br>सदा द्रोहपरा देवास्तपोविघ्नकरास्तथा ॥ ५१<br>असन्तुष्टा द्वेषपराः परस्परविरोधिनः ।<br>अहङ्कारसमुद्भूतः संसारोऽयं यतो नृप ॥ ५२<br>रागद्वेषविहीनस्तु स कथं जायते नृप ॥ ५३विपरीत फल मिलता है। स्वार्थमें लिप्त मनुष्य शुभाशुभका ज्ञान नहीं रख पाता और दैवाधीन होकर सदा पाप ही किया करता है, पुण्य नहीं ॥ ४४—४७½ ॥<br>प्रजापति ब्रह्मासे ही देवता उत्पन्न हुए हैं और उन्हींसे असुरोंकी भी उत्पत्ति हुई है। वे सब-के-सब स्वार्थमें लिप्त होकर एक-दूसरेके विरुद्ध काम करते हैं। वेदोंमें कहा गया है कि सत्त्वगुणसे सभी देवता, रजोगुणसे मनुष्य तथा तमोगुणसे पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनिके जीव उत्पन्न होते हैं। अतएव जब सत्त्वगुणसे उत्पन्न देवताओंमें भी निरन्तर आपसमें वैरभाव रहता है तब पशु-पक्षियोंमें परस्पर जातिवैर उत्पन्न होनेमें क्या आश्चर्य ! देवता भी सदैव द्रोहमें तत्पर रहते हैं और तपस्यामें विघ्न डाला करते हैं। हे नृप ! वे सदा असन्तुष्ट रहते हुए द्वेषपरायण होकर आपसमें विरोधभाव रखते हैं। अतः हे राजन् ! जब यह संसार ही अहंकारसे उत्पन्न हुआ है, तब वह राग-द्वेषसे हीन हो ही कैसे सकता है ? ॥ ४८—५३ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
अधमजगतः स्थितिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
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अथ पञ्चमोऽध्यायः

नर-नारायणकी तपस्यासे चिन्तित होकर इन्द्रका उनके पास जाना और मोहिनी माया प्रकट करना तथा उससे भी अप्रभावित रहनेपर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंको भेजना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>अथ किं बहुनोक्तेन संसारेऽस्मिन्नृपोत्तम ।<br>धर्मात्माद्रोहबुद्धिस्तु कश्चिद्भवति कर्हिचित् ॥ १<br>रागद्वेषावृतं विश्वं सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।<br>आद्ये युगेऽपि राजेन्द्र किमद्य कलिदूषिते ॥ २व्यासजी बोले—हे नृपोत्तम! अब अधिक कहनेसे क्या लाभ? इस संसारमें कहीं बिरला ही ऐसा कोई धर्मात्मा पुरुष होगा जो द्रोहभावसे रहित हो। यह चर-अचर सम्पूर्ण संसार राग-द्वेषसे ओत-प्रोत है। हे राजेन्द्र! सत्ययुगमें भी यह संसार ऐसा ही था, तब कलिसे दूषित इसके विषयमें क्या कहा जाय? ॥ १-२ ॥
देवाः सेर्ष्याश्च सद्रोहाश्छलकर्मरताः सदा ।<br>मानुषाणां तिरश्चां च का वार्ता नृप गण्यते ॥ ३<br>द्रोहपरे द्रोहपरो भवेदिति समानता ।<br>अद्रोहिणि तथा शान्ते विद्वेषः खलता स्मृता ॥ ४हे राजन्! जब देवता भी सदा ईर्ष्यायुक्त, द्रोहसे भरे हुए और छल-परायण रहते हैं, तब मनुष्य तथा पशु-पक्षियोंकी बात ही क्या है? यदि कोई मनुष्य द्रोह करनेवालेके प्रति द्रोहभाव रखे तो यह समानताकी बात है, किंतु द्रोह न करनेवाले तथा शान्त स्वभाववालेके प्रति विद्वेष रखनेको नीचता कहा गया है ॥ ३-४ ॥

४२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५

संस्कृतहिन्दी
यः कश्चित्तापसः शान्तो जपध्यानपरायणः।<br>भवेत्तस्य जपे विघ्नकर्ता वै मघवा परम्॥ ५यदि कोई तपस्वी शान्त होकर जप-ध्यानमें लीन हो जाता है तो इन्द्र उसके जपमें विघ्न डालनेहेतु तत्पर हो जाते हैं॥ ५॥
सतां सत्ययुगं साक्षात्सर्वदैवासतां कलिः।<br>मध्यमो मध्यमानां तु क्रियायोगौ युगे स्मृतौ॥ ६सज्जन पुरुषोंके लिये हर समय सत्ययुग दिखलायी पड़ता है और दुष्ट लोगोंके लिये सर्वदा कलियुग ही रहता है। जिस युगमें क्रिया तथा योग व्यवस्थित रहते हैं, वे द्वापर तथा त्रेतारूप मध्यम युग मध्यम कोटिके लोगोंके लिये कहे गये हैं॥ ६॥
कश्चित्कदाचिद्भवति सत्यधर्मानुवर्तकः।<br>अन्यथान्ययुगानां वै सर्वे धर्मपरायणाः॥ ७<br>वासना कारणं राजन् सर्वत्र धर्मसंस्थितौ।<br>तस्यां वै मलिनायां तु धर्मोऽपि मलिनो भवेत्॥ ८<br>मलिना वासना सत्यं विनाशायेति सर्वथा।अतः किसी समय भी कोई सत्यधर्मा हो सकता है अथवा सभी युगोंमें जो चाहे धर्मपरायण हो सकता है। हे राजन्! सर्वत्र धर्मकी स्थितिमें वासना ही प्रधान कारण मानी गयी है। उसमें मलिनता आ जानेपर धर्म भी मलिन हो जाता है। मलिन वासना विनाशके लिये होती है; यह सर्वथा सत्य है॥ ७-८ १/२॥
ब्रह्मणो हृदयाज्जातः पुत्रो धर्म इति स्मृतः॥ ९<br>ब्राह्मणः सत्यसम्पन्नो वेदधर्मरतः सदा।<br>दक्षस्य दुहितारो हि वृता दश महात्मना॥ १०<br>विवाहविधिना सम्यङ् मुनिना गृहधर्मिणा।<br>तास्वजीजनयत्पुत्रान्धर्मः सत्यवतां वरः॥ ११<br>हरिं कृष्णं नरं चैव तथा नारायणं नृप।<br>योगाभ्यासरतो नित्यं हरिः कृष्णो बभूव ह॥ १२<br>नरनारायणौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम्।<br>प्रालेयाद्रिं समागत्य तीर्थे बदरिकाश्रमे॥ १३ब्रह्माजीके हृदयसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो धर्म—इस नामसे कहा गया। वह ब्राह्मण सत्यसम्पन्न और वैदिक धर्ममें सदा संलग्न रहनेवाला था। उस गृहस्थधर्मी महात्मा मुनिने पाणिग्रहणकी विधिसे दक्षप्रजापतिकी दस कन्याओंका सम्यक् रूपसे वरण किया। सत्यव्रतियोंमें श्रेष्ठ उस धर्मने उनसे 'हरि', 'कृष्ण', 'नर' और 'नारायण' नामक चार पुत्र उत्पन्न किये। हे राजन्! उनमें 'हरि' और 'कृष्ण' ये दोनों योगाभ्यास करने लगे तथा नर और नारायण ये दोनों हिमालयपर्वतके शिखरपर जाकर 'बदरिकाश्रम' तीर्थमें कठिन तपस्या करने लगे॥ ९—१३॥
तपस्विषु धुरीणौ तौ पुराणौ मुनिसत्तमौ।<br>गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे॥ १४<br>हरेरंशौ स्थितौ तत्र नरनारायणावृषी।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु चक्राते तप उत्तमम्॥ १५<br>तापितं च जगत्सर्वं तपसा सचराचरम्।<br>नरनारायणाभ्यां च शक्रः क्षोभं तदा ययौ॥ १६वे प्राचीन मुनिश्रेष्ठ नर और नारायण तपस्वियोंमें सबसे प्रधान थे। गंगाके विस्तृत तटपर रहकर ब्रह्मचिन्तन करते हुए भगवान् विष्णुके अंशावतार नर-नारायणने वहाँ पूरे एक हजार वर्षोंतक कठोर तप किया। उनके तपसे चराचरसहित सम्पूर्ण संसार सन्तप्त हो गया। इससे इन्द्रके मनमें नर-नारायणके प्रति क्षोभ उत्पन्न हो गया॥ १४—१६॥
चिन्ताविष्टः सहस्राक्षो मनसा समकल्पयत्।<br>किं कर्तव्यं धर्मपुत्रौ तापसौ ध्यानसंयुतौ॥ १७<br>सिद्धार्थौ सुभृशं श्रेष्ठमासनं मे ग्रहीष्यतः।<br>विघ्नः कथं प्रकर्तव्यस्तपो येन भवेन्न हि॥ १८तब चिन्तित होकर इन्द्रने अपने मनमें सोचा—अब मुझे क्या करना चाहिये? ये धर्मपुत्र नर-नारायण तपस्वी तथा ध्यानपरायण हैं। ये पूर्णरूपसे सिद्ध होकर मेरा श्रेष्ठ आसन ग्रहण कर लेंगे, अतः किस प्रकार विघ्न उत्पन्न करूँ, जिससे तप न कर सकें॥ १७-१८॥

| अ० ५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२३ | | :--- | :--- |

| उत्पाद्य कामं क्रोधञ्च लोभं वाप्यतिदारुणम्।<br>इत्युद्दिश्य सहस्राक्षः समारुह्य गजोत्तमम्॥ १९<br><br>विघ्नकामस्तु तरसा जगाम गन्धमादनम्।<br>गत्वा तत्राश्रमे पुण्ये तावपश्यच्छतक्रतुः॥ २० | अब इनके मनमें काम, क्रोध अथवा अत्यन्त भीषण लोभ उत्पन्न करके तपमें विघ्न करना चाहिये। यह विचारकर इन्द्र अपने उत्तम ऐरावत हाथीपर सवार होकर उनके तपमें विघ्न डालनेकी इच्छासे गन्धमादनपर्वतपर शीघ्रतापूर्वक जा पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने उस पवित्र आश्रममें तप करते हुए नर-नारायणको देखा॥ १९-२०॥ | | तपसा दीप्तदेहौ तु भास्कराविव चोदितौ।<br>ब्रह्मविष्णू किमेतौ वै प्रकटौ वा विभावसू॥ २१<br><br>धर्मपुत्रावृषी एतौ तपसा किं करिष्यतः।<br>इति सञ्चिन्त्य तौ दृष्ट्वा तदोवाच शचीपतिः॥ २२<br><br>किं वा कार्यं महाभागौ ब्रूतं धर्मसुतौ किल।<br>ददामि वां वरं श्रेष्ठं दातुं यातोऽस्म्यहमृषी॥ २३<br><br>अदेयमपि दास्यामि तुष्टोऽस्मि तपसा किल। | उस समय तपके प्रभावसे दीप्त शरीरवाले वे दोनों ऋषि उगे हुए सूर्यकी भाँति प्रतीत हो रहे थे। [इन्द्रने सोचा—] क्या ये ब्रह्मा और विष्णु प्रकट हुए हैं अथवा दो सूर्य उदित हो गये हैं? धर्मके ये दोनों पुत्र अपने तपद्वारा न जाने क्या कर देंगे? ऐसा विचार करके शचीपति इन्द्रने नर-नारायणकी ओर देखकर उनसे कहा—हे महाभाग धर्मनन्दन! आपलोगोंका क्या कार्य है, बताइये। मैं श्रेष्ठ वर अभी प्रदान करता हूँ। हे ऋषियो! मैं वर देनेके लिये ही आया हूँ। वर अदेय हो तो भी मैं दूँगा; क्योंकि मैं आप लोगोंकी तपस्यासे परम प्रसन्न हूँ॥ २१—२३ १/२ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं पुनः पुनः शक्रस्तावुवाच पुरः स्थितः॥ २४<br><br>नोचतुस्तावृषी ध्यानसंस्थितौ दृढचेतसौ।<br>ततो वै मोहिनीं मायां चकार भयदां वृषः॥ २५<br><br>वृकान्सिंहांश्च व्याघ्रांश्च समुत्पाद्याबिभीषयत्।<br>वर्षं वातं तथा वह्निं समुत्पाद्य पुनः पुनः॥ २६<br><br>भीषयामास तौ शक्रो मायां कृत्वा विमोहिनीम्।<br>भयतोऽपि वशं नीतौ न तौ धर्मसुतौ मुनी॥ २७<br><br>नरनारायणौ दृष्ट्वा शक्रः स्वभवनं गतः।<br>वरदाने प्रलुब्धौ न न भीतौ वह्निवायुतः॥ २८<br><br>व्याघ्रसिंहादिभिः क्रान्तौ चलितौ नाश्रमात्स्वकात्।<br>न तयोर्ध्यानभङ्गं वै कर्तुं कोऽपि क्षमोऽभवत्॥ २९ | व्यासजी बोले— इस प्रकार उनके सामने खड़े होकर इन्द्रने बार-बार उनसे [वरदान माँगनेको] कहा, किंतु ध्यानमग्न तथा दृढ़चित्त वे दोनों ऋषि नहीं बोले। तब इन्द्रने अपनी भयदायिनी मोहिनी माया प्रकट की। उन्होंने भेड़िये, सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओंको उत्पन्न करके उन्हें भयभीत किया। इसी प्रकार वर्षा, वायु तथा अग्नि उत्पन्न करके इन्द्रने अपनी मोहिनी माया रचकर उन दोनोंको भयभीत करनेकी चेष्टा की किंतु धर्मपुत्र वे दोनों मुनि इस भयसे भी वशमें नहीं किये जा सके। ऐसे उन नर-नारायणको देखकर इन्द्र अपने भवन चले गये। वे नर-नारायण वरदानके लोभमें नहीं आये और अग्नि तथा वायुसे भयभीत नहीं हुए। व्याघ्र, सिंह आदिके आक्रमण करनेपर भी वे दोनों अपने आसनसे हिलेतक नहीं। उन दोनोंके ध्यानको भंग करनेमें उस समय कोई भी समर्थ नहीं हो सका॥ २४—२९॥ | | इन्द्रोऽपि सदनं गत्वा चिन्तयामास दुःखितः।<br>चलितौ भयलोभाभ्यां नेमौ मुनिवरोत्तमौ॥ ३० | इन्द्र भी अपने घर पहुँचकर दुःखित होकर विचार करने लगे कि मुनिवरोंमें उत्तम ये दोनों ऋषि भय तथा लोभसे विचलित नहीं हुए। वे तो महाविद्या, |

४२४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७

| चिन्तयन्तौ महाविद्यामादिशक्तिं सनातनीम्।<br>ईश्वरीं सर्वलोकानां परां प्रकृतिमद्भुताम्॥ ३१<br><br>ध्यायतां कः क्षमो लोके बहुमायाविद्वप्युत।<br>यन्मूलाः सकला माया देवासुरकृताः किल॥ ३२<br><br>ते कथं बाधितुं शक्ता ध्यायन्ति गतकल्मषाः।<br>वाग्बीजं कामबीजञ्च मायाबीजं तथैव च॥ ३३<br><br>चित्ते यस्य भवेत्तं तु बाधितुं कोऽपि न क्षमः।<br>मायया मोहितः शक्रो भूयस्तस्य प्रतिक्रियाम्॥ ३४ | आदिशक्ति, सनातनी, सब लोकोंकी स्वामिनी और अद्भुत परा-प्रकृतिका ध्यान कर रहे थे। देवताओं तथा असुरोंके द्वारा रची गयी सारी माया जिन भगवतीसे ही उत्पन्न होती है, उनका ध्यान करनेवालेको विचलित करनेमें कौन समर्थ है, चाहे वह कितना ही बड़ा मायाविज्ञ क्यों न हो? जो लोग कल्मषरहित होकर भगवतीका ध्यान करते हैं, वे भला कैसे विचलित किये जा सकते हैं? देवीका वाग्बीज, कामबीज और मायाबीज—यह जिसके हृदयमें विद्यमान है, उसे विचलित करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है॥ ३०—३३ १/२॥ | | कर्तुं कामवसन्तौ तु समाहूयाब्रवीद्वचः।<br>मनोभव वसन्तेन रत्या युक्तो व्रजाधुना॥ ३५<br><br>अप्सरोभिः समायुक्तस्तरसा गन्धमादनम्।<br>नरनारायणौ तत्र पुराणावृषिसत्तमौ॥ ३६<br><br>कुरुतस्तप एकान्ते स्थितौ बदरिकाश्रमे।<br>गत्वा तत्र समीपे तु तयोर्मन्मथ मार्गणैः॥ ३७<br><br>चित्तं कामातुरं कार्यं कुरु कार्यं ममाधुना।<br>मोहयित्वोच्चाटयित्वा विशिखैस्ताडयाशु च॥ ३८ | अब मायासे मोहित इन्द्रने पुनः उनका प्रतीकार करनेहेतु कामदेव तथा वसन्तको बुलाकर यह वचन कहा—हे कामदेव! तुम वसन्त और रतिको लेकर अनेक अप्सराओंके साथ उस गन्धमादनपर्वतपर अभी शीघ्रतापूर्वक जाओ। वहाँ 'नर-नारायण' नामक दो प्राचीन श्रेष्ठ ऋषि बदरिकाश्रमके एकान्त स्थानमें स्थित होकर तपस्या कर रहे हैं। हे मन्मथ! उनके पास जाकर तुम अपने बाणोंसे उनके चित्तको कामासक्त कर दो। उनका मोहन तथा उच्चाटन करके तुम अपने बाणोंसे उन्हें शीघ्र आहत कर डालो; मेरा यह कार्य अभी सिद्ध करो॥ ३४—३८॥ | | वशीकुरु महाभाग मुनी धर्मसुतावपि।<br>को ह्यस्मिन् सर्वसंसारे देवो दैत्योऽथ मानवः॥ ३९<br><br>यस्ते बाणवशं प्राप्तो न याति भृशताडितः।<br>ब्रह्माहं गिरिजानाथश्चन्द्रो वह्निर्विमोहितः॥ ४०<br><br>गणना कानयोः काम त्वद्बाणानां पराक्रमे। | इस प्रकार हे महाभाग! धर्मके पुत्र उन दोनों मुनियोंको वशीभूत कर लो। इस सम्पूर्ण संसारमें देवता, दैत्य या मनुष्य कौन ऐसा है, जो तुम्हारे बाणके वशीभूत होकर अत्यन्त कामासक्त न हो जाय? हे कामदेव! जब ब्रह्मा, मैं (इन्द्र), शिव, चन्द्रमा या अग्नि भी मोहित हो जाते हैं तब तुम्हारे बाणोंके पराक्रमके सामने उन दोनोंकी क्या गणना है?॥ ३९-४० १/२॥ | | वाराङ्गनागणोऽयं ते सहायार्थं मयेरितः॥ ४१<br><br>आगमिष्यति तत्रैव रम्भादीनां मनोरमः।<br>एका तिलोत्तमा रम्भा कार्यं साधयितुं क्षमा॥ ४२<br><br>त्वमेवैकः क्षमः कामं मिलितैः कस्तु संशयः।<br>कुरु कार्यं महाभाग ददामि तव वाञ्छितम्॥ ४३ | तुम्हारी सहायताके लिये मेरे द्वारा यह रम्भा आदि अप्सराओंका समूह भेजा जा रहा है, जो वहाँ पहुँच जायगा। अकेली तिलोत्तमा या रम्भा ही इस कार्यको करनेमें समर्थ है अथवा तुम अकेले भी इसे करनेमें समर्थ हो, तब सभी सम्मिलित रूपसे कार्य सिद्ध कर लेंगे; इसमें सन्देहकी बात ही क्या? हे महाभाग! तुम मेरे इस कार्यको सम्पन्न करो, मैं तुम्हें वांछित वस्तु प्रदान करूँगा॥ ४१—४३॥ |

अ० ६ ] चतुर्थ स्कन्ध ४२५

अ० ६ ] चतुर्थ स्कन्ध ४२५


Sanskrit ShlokaHindi Translation
प्रलोभितौ मयात्यर्थं वरदानैस्तपस्विनौ।<br>स्थानान्न चलितौ शान्तौ वृथायं मे गतः श्रमः ॥ ४४<br><br>तथा वै मायया कृत्वा भीषितौ तापसौ भृशम्।<br>तथापि नोत्थितौ स्थानाद्देहरक्षापरौ न तौ ॥ ४५मैंने उन दोनों तपस्वियोंको वरदानोंके द्वारा बहुत प्रलोभन दिया, किंतु वे अपने स्थानसे विचलित नहीं हुए, बल्कि शान्त बैठे रहे। मेरा यह परिश्रम व्यर्थ चला गया। मैंने माया रचकर उन तपस्वियोंको बहुत डराया, फिर भी वे अपने आसनसे नहीं उठे। वे दोनों शरीररक्षाके लिये जरा भी चिन्तित नहीं हैं ॥ ४४-४५ ॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा शक्रं प्राह मनोभवः।<br>वासवाद्य करिष्यामि कार्यं ते मनसेप्सितम् ॥ ४६<br><br>यदि विष्णुं महेशं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम्।<br>ध्यायन्तौ तौ तदास्माकं भवितारौ वशौ मुनी ॥ ४७<br><br>देवीभक्तं वशीकर्तुं नाहं शक्तः कथञ्चन।<br>कामराजं महाबीजं चिन्तयन्तं मनस्यलम् ॥ ४८<br><br>तां देवीं चेन्महाशक्तिं संश्रितौ भक्तिभावतः।<br>न तदा मम बाणानां गोचरौ तापसौ किल ॥ ४९व्यासजी बोले—इन्द्रका यह वचन सुनकर कामदेवने उनसे कहा—हे इन्द्र! मैं अभी आपका मनोवांछित कार्य करूँगा। यदि वे दोनों मुनि विष्णु, शिव, ब्रह्मा अथवा सूर्य किसीका ध्यान करते होंगे, तो वे हमारे वशमें हो जायेंगे। मैं केवल कामराज महाबीज 'क्लीं' का अपने मनमें चिन्तन करनेवाले देवीभक्तको वशमें करनेमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हूँ। यदि वे भक्ति-भावसे महाशक्तिस्वरूपा देवीकी उपासनामें लगे होंगे, तो मेरे बाणोंका प्रभाव उन तपस्वियोंपर नहीं पड़ेगा ॥ ४६–४९ ॥
इन्द्र उवाच<br>गच्छ त्वं च महाभाग सर्वैस्तत्र समुद्यतैः।<br>कार्यं ममातिदुःसाध्यं कर्ता हितमनुत्तमम् ॥ ५०इन्द्र बोले—हे महाभाग! जानेके लिये उद्यत इन सभीके साथ तुम वहाँ जाओ। यद्यपि मेरा यह कार्य अत्यन्त दुःसाध्य है, फिर भी तुम इस हितकर तथा उत्तम कार्यको पूर्ण कर ही लोगे ॥ ५० ॥
व्यास उवाच<br>इति तेन समादिष्टा ययुः सर्वे समुद्यताः।<br>यत्र तौ धर्मपुत्रौ द्वौ तेपाते दुष्करं तपः ॥ ५१व्यासजी बोले—इस प्रकार इन्द्रका आदेश पाकर वे लोग पूरी तैयारीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ वे धर्मपुत्र नर-नारायण कठोर तपस्या कर रहे थे ॥ ५१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
नरनारायणकथावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


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अथ षष्ठोऽध्यायः

कामदेवद्वारा नर-नारायणके समीप वसन्त ऋतुकी सृष्टि, नारायणद्वारा उर्वशीकी उत्पत्ति, अप्सराओं Child / द्वारा नारायणसे स्वयंको अंगीकार करनेकी प्रार्थना

Sanskrit ShlokaHindi Translation
व्यास उवाच<br>प्रथमं तत्र सम्प्राप्तो वसन्तः पर्वतोत्तमे।<br>पुष्पिताः पादपाः सर्वे द्विरेफालिविराजिताः ॥ १<br><br>आम्राश्च बकुला रम्यास्तिलकाः किंशुकाः शुभाः।<br>सालास्तालास्तमालाश्च मधूकाः पुष्पिता बभुः ॥ २व्यासजी बोले—सर्वप्रथम उस पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर वसन्त पहुँचा। उस पर्वतपर स्थित सभी वृक्ष पुष्पित हो गये और उनपर भ्रमरोंके समूह मँडराने लगे ॥ १ ॥<br><br>आम, मौलसिरी, रम्य, तिलक, सुन्दर किंशुक, साल, ताल, तमाल तथा महुए—ये सब-के-सब फूलोंसे सुशोभित हो गये ॥ २ ॥

| ४२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बभूवुः कोकिलालापा वृक्षाग्रेषु मनोहराः।<br>वल्ल्योऽपि पुष्पिताः सर्वा आलिङ्गिर्नगोत्तमान्॥ ३वृक्षोंकी डालियोंपर कोयलोंकी मनोहारिणी कूक आरम्भ हो गयी। पुष्पोंसे लदी हुई सभी लताएँ ऊँचे पर्वतोंपर चढ़ने लगीं॥ ३॥
प्राणिनः स्वासु भार्यासु प्रेमयुक्ताः स्मरातुराः।<br>बभूवुश्चातिमत्ताश्च क्रीडासक्ताः परस्परम्॥ ४सभी प्राणी अपनी-अपनी भार्याओंमें प्रेमासक्त हो गये तथा मत्त होकर परस्पर क्रीड़ा करने लगे॥ ४॥
ववुर्मन्दाः सुगन्धाश्च सुस्पर्शा दक्षिणानिलाः।<br>इन्द्रियाणि प्रमाथीनि मुनीनामपि चाभवन्॥ ५मन्द, सुगन्धयुक्त तथा सुखद स्पर्शवाली दक्षिणी हवाएँ चलने लगीं। उस समय मुनियोंकी भी वृत्तियाँ अतीव चंचल हो उठीं॥ ५॥
रतियुक्तस्ततः कामः पूरयन्पञ्चमार्गणाम्।<br>चकार त्वरितस्तत्र वासं बदरिकाश्रमे॥ ६तत्पश्चात् अपनी भार्या रतिके साथ कामदेव भी अपने पंचबाणोंको छोड़ता हुआ तत्काल बदरिकाश्रम पहुँचकर वहाँ रहने लगा॥ ६॥
रम्भा तिलोत्तमाद्याश्च गत्वा तत्र वराश्रमे।<br>गानं चक्रुः सुगीतज्ञाः स्वरतानसमन्वितम्॥ ७संगीतकलामें अत्यन्त प्रवीण रम्भा और तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ भी उस रमणीक बदरिकाश्रममें पहुँचकर स्वर तथा तानमें आबद्ध गीत गाने लगीं॥ ७॥
तच्छ्रुत्वा मधुरोद्गीतं कोकिलानाञ्च कूजितम्।<br>भ्रमरालिविरावञ्च प्रबुद्धौ तौ मुनीश्वरौ॥ ८उस मधुर गायन, कोयलोंकी कूक तथा भ्रमर-समूहोंका गुंजार सुनकर उन दोनों मुनिवरोंका ध्यान भंग हो गया॥ ८॥
ऋतुराजमकाले तु दृष्ट्वा तौ पुष्पितं वनम्।<br>जातौ चिन्तापरौ तत्र नरनारायणावृषी॥ ९<br><br>किमद्य शिशिरापायः संवृतः समयं विना।<br>प्राणिनो विह्वलाः सर्वे लक्ष्यन्तेऽतिस्मरातुराः॥ १०<br><br>कालधर्मविपर्यायः कथमद्य दुरासदः।<br>नरं नारायणः प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ ११असमयमें ही वसन्तका आगमन तथा सम्पूर्ण वनको पुष्पोंसे सुशोभित देखकर वे दोनों नर तथा नारायणऋषि चिन्तित हो उठे [वे सोचने लगे कि] क्या आज समय पूरा हुए बिना ही शिशिर ऋतु बीत गयी? इस समय तो समस्त प्राणी कामसे पीड़ित होनेके कारण अत्यन्त विह्वल दिखायी पड़ रहे हैं। कालके स्वभाव तथा नियममें यह अद्भुत परिवर्तन आज कैसे हो गया? विस्मयके कारण विस्फारित नेत्रोंवाले मुनि नारायण नरसे कहने लगे॥ ९-११॥
नारायण उवाच<br>पश्य भ्रातरिमे वृक्षाः पुष्पिताः प्रतिभान्ति वै।<br>कोकिलालापसङ्घुष्टा भ्रमरालिProcess: भ्रमरालिविराजिताः॥ १२नारायण बोले— हे भाई! देखो, ये सभी वृक्ष पुष्पोंसे लदे हुए सुशोभित हो रहे हैं। इन वृक्षोंपर कोयलोंकी मधुर ध्वनि हो रही है तथा भ्रमरोंकी पंक्तियाँ विराजमान हैं॥ १२॥
शिशिरं भीममातङ्गं दारयन्स्वखरैर्नखैः।<br>वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने॥ १३हे मुने! यह वसन्तरूपी सिंह अपने पलाशपुष्परूपी तीखे नाखूनोंसे शिशिररूपी भयानक हाथीको विदीर्ण करता हुआ यहाँ आ पहुँचा है॥ १३॥
रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका।<br>नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना॥ १४हे देवर्षे! लाल अशोक जिसके हाथ हैं, किंशुकके पुष्प जिसके पैर हैं, नील अशोक जिसके केश हैं, विकसित श्याम कमल जिसका मुख है,