देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 507, कुल 889 में से
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| ४९८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वेषां सुखदौ देवौ प्रत्यक्षौ शशिभास्करौ।<br>न नश्यति तयोः पीडा क्वचित्तद्दैरिसम्भवा॥ ३१<br><br>भास्करस्य सुतो मन्दः क्षयी चन्द्रः कलङ्कवान्।<br>पश्य राजन् विधेः सूत्रं दुवारं महतामपि॥ ३२ | प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सूर्य तथा चन्द्रदेव सबको सुख प्रदान करते हैं, किंतु उनके शत्रु [राहु]-के द्वारा उन्हें होनेवाली पीड़ा दूर नहीं होती। सूर्यपुत्र शनैश्चर 'मन्द' और चन्द्रमा 'क्षयरोगी तथा कलंकी' कहे जाते हैं। हे राजन्! देखिये, बड़े-बड़े देवताओंके भी विषयमें विधिका विधान अटल है॥ ३१—३२॥ |
| वेदकर्ता जगत्स्रष्टा बुद्धिदस्तु चतुर्मुखः।<br>सोऽपि विक्लवतां प्राप्तो दृष्ट्वा पुत्रीं सरस्वतीम्॥ ३३ | ब्रह्माजी वेदकर्ता, जगत्की सृष्टि करनेवाले तथा सबको बुद्धि देनेवाले हैं, किंतु वे भी सरस्वतीको देखकर विकल हो गये॥ ३३॥ |
| शिवस्यापि मृता भार्या सती दग्ध्वा कलेवरम्।<br>सोऽभवद्दुःखसन्तप्तः कामार्तश्च जनार्तिहा॥ ३४<br><br>कामाग्निदग्धदेहस्तु कालिन्द्यां पतितः शिवः।<br>सापि श्यामजला जाता तन्निदाघवशाम्नृप॥ ३५ | जब शिवजीकी भार्या सती अपने शरीरको दग्ध करके मर गयी, तब लोगोंका दुःख दूर करनेवाले होते हुए भी वे शिवजी शोकसन्तप्त तथा पीड़ित हो गये। उस समय कामाग्निसे जलते हुए देहवाले शिवजी यमुनानदीमें कूद पड़े। तब हे राजन्! उनके तापके कारण यमुनाजीका जल श्यामवर्णका हो गया॥ ३४-३५॥ |
| कामार्तो रममाणस्तु नग्नः सोऽपि भृगोर्वनम्।<br>गतः प्राप्तोऽथ भृगुणा शप्तः कामातुरो भृशम्॥ ३६<br><br>पतत्वद्यैव ते लिङ्गं निर्लज्जेति भृशं किल।<br>पपौ चामृतवापीञ्च दानवैर्निर्मितां मुदे॥ ३७ | भृगुके वनमें जाकर जब वे शिवजी दिगम्बर होकर विहार करने लगे, तब भृगुमुनिने अतीव आतुर उन शिवजीको यह शाप दे दिया—हे निर्लज्ज ! तुम्हारा लिंग अभी कटकर गिर जाय। तब शान्तिके लिये शिवजीने दानवोंके द्वारा निर्मित बावलीका अमृत पिया॥ ३६-३७॥ |
| इन्द्रोऽपि च वृषो भूत्वा वाहनत्वं गतः क्षितौ।<br>आद्यस्य सर्वलोकस्य विष्णोरेव विवेकिनः॥ ३८<br><br>सर्वज्ञत्वं गतं कुत्र प्रभुशक्तिः कुतो गता।<br>यद्धेममृगविज्ञानं न ज्ञातं हरिणा किल॥ ३९ | बैल बनकर इन्द्रको भी धरातलपर [सूर्यवंशी राजा ककुत्स्थका] वाहन बनना पड़ा। समस्त लोकके आदिपुरुष और महान् विवेकशील भगवान् विष्णुकी सर्वज्ञता तथा प्रभुशक्ति उस समय कहाँ चली गयी थी, जब [रामावतारमें] वे स्वर्णमृग-सम्बन्धी उस विशेष रहस्यको बिलकुल नहीं जान सके !॥ ३८-३९॥ |
| राजन् मायाबलं पश्य रामो हि काममोहितः।<br>रामो विरहसन्तप्तो रुरोद भृशमातुरः॥ ४०<br><br>योऽपृच्छत्पादपान्मूढः क्व गता जनकात्मजा।<br>भक्षिता वा हृता केन रुदन्नुच्चतरं ततः॥ ४१ | हे राजन् ! मायाका बल तो देखिये कि भगवान् श्रीराम भी कामसे व्याकुल हुए। उन श्रीरामने सीताके वियोगसे संतप्त तथा व्याकुल होकर बहुत विलाप किया था। वे विह्वल होकर जोर-जोरसे रोते हुए वृक्षोंसे पूछते-फिरते थे कि सीता कहाँ चली गयी? उसे कोई [हिंसक जन्तु] खा गया या किसीने हर लिया ?॥ ४०-४१॥ |