देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 508, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० २० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४९९ | | :--- | :--- | | लक्ष्मणाहं मरिष्यामि कान्ताविरहदुःखितः।<br>त्वं चापि मम दुःखेन मरिष्यसि वनेऽनुज॥ ४२<br><br>आवयोर्मरणं ज्ञात्वा माता मम मरिष्यति।<br>शत्रुघ्नोऽप्यतिदुःखार्तः कथं जीवितुमर्हति॥ ४३<br><br>सुमित्रा जीवितं जह्यात्पुत्रव्यसनकर्शिता।<br>पूर्णकामाथ कैकेयी भवेत्पुत्रसमन्विता॥ ४४ | हे लक्ष्मण! मैं तो अपनी भार्याके वियोगसे दुःखित होकर मर जाऊँगा और हे अनुज! मेरे दुःखसे तुम भी इस वनमें मर जाओगे। इस प्रकार हम दोनोंकी मृत्यु जान करके मेरी माता कौसल्या मर जायँगी। शत्रुघ्न भी इस महान् दुःखसे पीड़ित होकर कैसे जीवित रह पायेगा? तब पुत्रमरणसे व्यथित होकर माता सुमित्रा भी अपने प्राण त्याग देंगी, किंतु अपने पुत्र भरतके साथ कैकेयीकी कामना अवश्य पूर्ण हो जायगी॥ ४२-४४॥ | | हा सीते क्व गतासि त्वं मां विहाय स्मरातुरा।<br>एह्येहि मृगशावाक्षि मां जीवय कृशोदरि॥ ४५<br><br>किं करोमि क्व गच्छामि त्वदधीनञ्च जीवितम्।<br>समाश्वासय दीनं मां प्रियं जनकनन्दिनि॥ ४६ | हा सीते! मुझे पीड़ित छोड़कर तुम कहाँ चली गयी हो? हे मृगलोचने! आओ, आओ। हे कृशोदरि! मुझे जीवन प्रदान करो। हे जनकनन्दिनि! मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? मेरा जीवन तो तुम्हारे अधीन है। अपने प्रिय मुझ दुःखितको सान्त्वना प्रदान करो॥ ४५-४६॥ | | एवं विलपता तेन रामेणामिततेजसा।<br>वने वने च भ्रमता नेक्षिता जनकात्मजा॥ ४७<br><br>शरण्यः सर्वलोकानां रामः कमललोचनः।<br>शरणं वानराणां स गतो मायाविमोहितः॥ ४८<br><br>सहायान्वानरान्कृत्वा बबन्ध वरुणालयम्।<br>जघान रावणं वीरं कुम्भकर्णं महोदरम्॥ ४९ | इस प्रकार विलाप करते हुए तथा वन-वन भटकते हुए वे अमित तेजस्वी राम जनकपुत्री सीताको नहीं खोज पाये। तत्पश्चात् समस्त लोकोंको शरण देनेवाले वे कमलनयन श्रीराम मायासे मोहित होकर वानरोंकी शरणमें गये। उन वानरोंको सहायक बनाकर उन्होंने समुद्रपर सेतु बाँधा और पराक्रमी रावण, कुम्भकर्ण तथा महोदरका संहार किया॥ ४७-४९॥ | | आनीय च ततः सीतां रामो दिव्यमकारयत्।<br>सर्वज्ञोऽपि हृतां मत्वा रावणेन दुरात्मना॥ ५० | तदनन्तर दुष्टात्मा रावणके द्वारा सीताको हरी गयी समझकर सर्वज्ञ होते हुए भी श्रीरामने उन्हें लाकर उनकी अग्निपरीक्षा करायी॥ ५०॥ | | किं ब्रवीमि महाराज योगमायाबलं महत्।<br>यया विश्वमिदं सर्वं भ्रामितं भ्रमते किल॥ ५१ | हे महाराज! योगमायाकी महिमा बहुत बड़ी है। मैं उन योगमायाके विषयमें क्या कहूँ, जिनके द्वारा नचाया हुआ यह सम्पूर्ण विश्व निरन्तर चक्कर काट रहा है॥ ५१॥ | | एवं नानावतारेऽत्र विष्णुः शापवशं गतः।<br>करोति विविधाश्चेष्टा दैवाधीनः सदैव हि॥ ५२ | इस प्रकार शापके वशीभूत होकर भगवान् विष्णु इस लोकमें [धारण किये गये] अनेक अवतारोंमें दैवके अधीन होकर नाना प्रकारकी लीलाएँ करते हैं॥ ५२॥ | | तवाहं कथयिष्यामि कृष्णस्यापि विचेष्टितम्।<br>प्रभवं मानुषे लोके देवकार्यार्थसिद्धये॥ ५३ | अब मैं आपसे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य-लोकमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतार तथा उनकी लीलाका वर्णन करूँगा॥ ५३॥ |