भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| अ० २० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४९९ | | :--- | :--- | | लक्ष्मणाहं मरिष्यामि कान्ताविरहदुःखितः।<br>त्वं चापि मम दुःखेन मरिष्यसि वनेऽनुज॥ ४२<br><br>आवयोर्मरणं ज्ञात्वा माता मम मरिष्यति।<br>शत्रुघ्नोऽप्यतिदुःखार्तः कथं जीवितुमर्हति॥ ४३<br><br>सुमित्रा जीवितं जह्यात्पुत्रव्यसनकर्शिता।<br>पूर्णकामाथ कैकेयी भवेत्पुत्रसमन्विता॥ ४४ | हे लक्ष्मण! मैं तो अपनी भार्याके वियोगसे दुःखित होकर मर जाऊँगा और हे अनुज! मेरे दुःखसे तुम भी इस वनमें मर जाओगे। इस प्रकार हम दोनोंकी मृत्यु जान करके मेरी माता कौसल्या मर जायँगी। शत्रुघ्न भी इस महान् दुःखसे पीड़ित होकर कैसे जीवित रह पायेगा? तब पुत्रमरणसे व्यथित होकर माता सुमित्रा भी अपने प्राण त्याग देंगी, किंतु अपने पुत्र भरतके साथ कैकेयीकी कामना अवश्य पूर्ण हो जायगी॥ ४२-४४॥ | | हा सीते क्व गतासि त्वं मां विहाय स्मरातुरा।<br>एह्येहि मृगशावाक्षि मां जीवय कृशोदरि॥ ४५<br><br>किं करोमि क्व गच्छामि त्वदधीनञ्च जीवितम्।<br>समाश्वासय दीनं मां प्रियं जनकनन्दिनि॥ ४६ | हा सीते! मुझे पीड़ित छोड़कर तुम कहाँ चली गयी हो? हे मृगलोचने! आओ, आओ। हे कृशोदरि! मुझे जीवन प्रदान करो। हे जनकनन्दिनि! मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? मेरा जीवन तो तुम्हारे अधीन है। अपने प्रिय मुझ दुःखितको सान्त्वना प्रदान करो॥ ४५-४६॥ | | एवं विलपता तेन रामेणामिततेजसा।<br>वने वने च भ्रमता नेक्षिता जनकात्मजा॥ ४७<br><br>शरण्यः सर्वलोकानां रामः कमललोचनः।<br>शरणं वानराणां स गतो मायाविमोहितः॥ ४८<br><br>सहायान्वानरान्कृत्वा बबन्ध वरुणालयम्।<br>जघान रावणं वीरं कुम्भकर्णं महोदरम्॥ ४९ | इस प्रकार विलाप करते हुए तथा वन-वन भटकते हुए वे अमित तेजस्वी राम जनकपुत्री सीताको नहीं खोज पाये। तत्पश्चात् समस्त लोकोंको शरण देनेवाले वे कमलनयन श्रीराम मायासे मोहित होकर वानरोंकी शरणमें गये। उन वानरोंको सहायक बनाकर उन्होंने समुद्रपर सेतु बाँधा और पराक्रमी रावण, कुम्भकर्ण तथा महोदरका संहार किया॥ ४७-४९॥ | | आनीय च ततः सीतां रामो दिव्यमकारयत्।<br>सर्वज्ञोऽपि हृतां मत्वा रावणेन दुरात्मना॥ ५० | तदनन्तर दुष्टात्मा रावणके द्वारा सीताको हरी गयी समझकर सर्वज्ञ होते हुए भी श्रीरामने उन्हें लाकर उनकी अग्निपरीक्षा करायी॥ ५०॥ | | किं ब्रवीमि महाराज योगमायाबलं महत्।<br>यया विश्वमिदं सर्वं भ्रामितं भ्रमते किल॥ ५१ | हे महाराज! योगमायाकी महिमा बहुत बड़ी है। मैं उन योगमायाके विषयमें क्या कहूँ, जिनके द्वारा नचाया हुआ यह सम्पूर्ण विश्व निरन्तर चक्कर काट रहा है॥ ५१॥ | | एवं नानावतारेऽत्र विष्णुः शापवशं गतः।<br>करोति विविधाश्चेष्टा दैवाधीनः सदैव हि॥ ५२ | इस प्रकार शापके वशीभूत होकर भगवान् विष्णु इस लोकमें [धारण किये गये] अनेक अवतारोंमें दैवके अधीन होकर नाना प्रकारकी लीलाएँ करते हैं॥ ५२॥ | | तवाहं कथयिष्यामि कृष्णस्यापि विचेष्टितम्।<br>प्रभवं मानुषे लोके देवकार्यार्थसिद्धये॥ ५३ | अब मैं आपसे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य-लोकमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतार तथा उनकी लीलाका वर्णन करूँगा॥ ५३॥ |

५००श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कालिन्दीपुलिने रम्ये ह्यासीन्मधुवनं पुरा।<br>लवणो मधुपुत्रस्तु तत्रासीद्दानवो बली॥ ५४प्राचीन समयकी बात है—यमुनाके मनोहर तटपर मधुवन नामक एक वन था। वहाँ लवणासुर नामवाला एक बलवान् दानव रहता था, जो मधुका पुत्र था॥ ५४॥
द्विजानां दुःखदः पापो वरदानेन गर्वितः।<br>निहतोऽसौ महाभाग लक्ष्मणस्यानुजेन वै॥ ५५वरप्राप्तिके कारण अभिमानमें चूर वह पापी दैत्य ब्राह्मणोंको दुःख देता था। हे महाभाग! लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने संग्राममें उसका वध कर दिया। उस मदोन्मत्तको मारकर उन्होंने मथुरा नामक परम सुन्दर नगरी बसायी॥ ५५-५६॥
शत्रुघ्नेनाथ संग्रामे तं निहत्य मदोत्कटम्।<br>वासिता मथुरा नाम पुरी परमशोभना॥ ५६
स तत्र पुष्कराक्षौ द्वौ पुत्रौ शत्रुनिषूदनः।<br>निवेश्य राज्ये मतिमान्काले प्राप्ते दिवं गतः॥ ५७कमलके समान नेत्रोंवाले अपने दो पुत्रोंको राज्यकार्यमें नियुक्त करके वे बुद्धिमान् शत्रुघ्न समय आ जानेपर स्वर्ग चले गये॥ ५७॥
सूर्यवंशक्षये तां तु यादवाः प्रतिपेदिरे।<br>मथुरां मुक्तिदां राजन् ययातितनयः पुरा॥ ५८सूर्यवंशके नष्ट हो जानेपर उस मुक्तिदायिनी मथुराको यादवोंने अधिकारमें कर लिया। हे राजन्! पूर्वकालमें राजा ययातिका शूरसेन नामक एक पराक्रमी पुत्र था, जो वहाँका राजा हुआ। हे राजन्! उसने मथुरा और शूरसेन दोनों ही राज्योंके विषयोंका भोग किया॥ ५८—५९॥
शूरसेनाभिधः शूरस्तत्राभून्मेदिनीपतिः।<br>माथुराञ्छूरसेनांश्च बुभुजे विषयान्नृप॥ ५९
तत्रोत्पन्नः कश्यपांशः शापाच्च वरुणस्य वै।<br>वसुदेवोऽतिविख्यातः शूरसेनसुतस्तदा॥ ६०वहाँपर वरुणदेवके शापवश महर्षि कश्यपके अंशस्वरूप परम यशस्वी वसुदेवजी शूरसेनके पुत्र होकर उत्पन्न हुए। पिताके मर जानेपर वे वसुदेवजी वैश्यवृत्तिमें संलग्न होकर जीवन-यापन करने लगे। उस समय वहाँके राजा उग्रसेन थे और उनका कंस नामक एक प्रतापी पुत्र था॥ ६०-६१॥
वैश्यवृत्तिरतः सोऽभून्मृते पितरि माधवः।<br>उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान्॥ ६१
अदितिर्देवकी जाता देवकस्य सुता तदा।<br>शापाद्वै वरुणस्याथ कश्यपानुगता किल॥ ६२वरुणदेवके ही शापके कारण कश्यपकी अनुगामिनी अदिति भी राजा देवककी पुत्री देवकीके रूपमें उत्पन्न हुईं। महात्मा देवकने उस देवकीको वसुदेवको सौंप दिया। विवाह सम्पन्न हो जानेके पश्चात् वहाँ आकाशवाणी हुई—हे महाभाग कंस! इस देवकीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला आठवाँ ऐश्वर्यशाली पुत्र तुम्हारा संहारक होगा॥ ६२—६४॥
दत्ता सा वसुदेवाय देवकेन महात्मना।<br>विवाहे रचिते तत्र वागभूद् गगने तदा॥ ६३
कंस कंस महाभाग देवकीगर्भसम्भवः।<br>अष्टमस्तु सुतः श्रीमांस्तव हन्ता भविष्यति॥ ६४
तच्छ्रुत्वा वचनं कंसो विस्मितोऽभून्महाबलः।<br>देववाचं तु तां मत्वा सत्यां चिन्तामवाप सः॥ ६५उस आकाशवाणीको सुनकर महाबली कंस आश्चर्यचकित हो गया। उस आकाशवाणीको सत्य मानकर वह चिन्तामें पड़ गया। ‘अब मैं क्या करूँ’ ऐसा भलीभाँति सोच-विचारकर उसने यह निश्चय किया कि यदि मैं देवकीको इसी समय शीघ्र मार डालूँ तो मेरी मृत्यु नहीं होगी। मृत्युका भय उत्पन्न करनेवाले
किं करोमीति सञ्चिन्त्य विमर्शमकरोत्तदा।<br>निहत्यैनां न मे मृत्युर्भवेदद्यैव सत्वरम्॥ ६६

| अ० २० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५०१ | | :--- | :--- |

| उपायो नान्यथा चास्मिन्कार्ये मृत्युभयावहे।<br>इयं पितृष्वसा पूज्या कथं हन्मीत्यचिन्तयत्॥ ६७ | इस विषम अवसरपर दूसरा कोई उपाय नहीं है, किंतु यह मेरी पूज्य चचेरी बहन है। अतः इसकी हत्या कैसे करूँ, वह ऐसा सोचने लगा॥ ६५-६७॥ | | पुनर्विचारयामास मरणं मेऽस्त्यहो स्वसा।<br>पापेनापि प्रकर्तव्या देहरक्षा विपश्चिता॥ ६८<br><br>प्रायश्चित्तेन पापस्य शुद्धिर्भवति सर्वदा।<br>प्राणरक्षा प्रकर्तव्या बुधैरप्येनसा तथा॥ ६९ | उसने पुनः सोचा—अरे! यही बहन तो मेरी मृत्युस्वरूपा है। बुद्धिमान् मनुष्यको पापकर्मसे भी अपने शरीरकी रक्षा कर लेनी चाहिये। बादमें प्रायश्चित्त कर लेनेसे उस पापकी शुद्धि हो जाती है। अतः चतुर लोगोंको चाहिये कि पापकर्मसे भी अपने प्राणकी रक्षा कर लें॥ ६८-६९॥ | | विचिन्त्य मनसा कंसः खड्गमादाय सत्वरः।<br>जग्राह तां वरारोहां केशेष्वाकृष्य पापकृत्॥ ७०<br><br>कोशात्खड्गमुपाकृष्य हन्तुकामो दुराशयः।<br>पश्यतां सर्वलोकानां नवोढां तां चकर्ष ह॥ ७१ | मनमें ऐसा सोचकर पापी कंसने बाल खींचकर उस सुन्दरी देवकीको तुरंत पकड़ लिया। तत्पश्चात् म्यानसे तलवार निकालकर उसे मारनेकी इच्छासे बुरे विचारोंवाला कंस सभी लोगोंके सामने ही उस नवविवाहिता देवकीको अपनी ओर खींचने लगा॥ ७०-७१॥ | | हन्यमानाञ्च तां दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत्।<br>वसुदेवानुगा वीरा युद्धायोद्यतकार्मुकाः॥ ७२<br><br>मुञ्च मुञ्चेति प्रोचुस्तं ते तदाद्भुतसाहसाः।<br>कृपया मोचयामासुर्देवकीं देवमातरम्॥ ७३ | उसे मारी जाती देखकर लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया। वसुदेवजीके वीर साथीगण धनुष लेकर युद्धके लिये तैयार हो गये। अद्भुत साहसवाले वे सब कंससे कहने लगे—कृपा करके इसे छोड़ दो, छोड़ दो। वे देवमाता देवकीको कंससे छुड़ाने लगे॥ ७२-७३॥ | | तद्युद्धमभवद् घोरं वीराणाञ्च परस्परम्।<br>वसुदेवसहायानां कंसेन च महात्मना॥ ७४<br><br>वर्तमाने तथा युद्धे दारुणे लोमहर्षणे।<br>कंसं निवारयामासुर्वृद्धा ये यदुसत्तमाः॥ ७५ | तब शक्तिशाली कंसके साथ वसुदेवजीके पराक्रमी सहायकोंका घोर युद्ध होने लगा। उस भीषण लोमहर्षक युद्धके निरन्तर होते रहनेपर जो श्रेष्ठ तथा वृद्ध यदुगण थे, उन्होंने कंसको युद्ध करनेसे रोक दिया॥ ७४-७५॥ | | पितृष्वसेयं ते वीर पूजनीया च बालिशा।<br>न हन्तव्या त्वया वीर विवाहोत्सवसङ्गमे॥ ७६<br><br>स्त्रीहत्या दुःसहा वीर कीर्तिघ्नी पापकृत्तमा।<br>भूतभाषितमात्रेण न कर्तव्या विजानता॥ ७७ | [उन्होंने कंससे कहा—] हे वीर! यह तुम्हारी पूजनीय चचेरी बहन है। इस विवाहोत्सवके शुभ अवसरपर तुम्हें इस अबोध देवकीकी हत्या नहीं करनी चाहिये। हे वीर! स्त्रीहत्या दुःसह कार्य है; यह यशका नाश करनेवाली है और इससे घोर पाप लगता है। केवल आकाशवाणी सुनकर तुम-जैसे बुद्धिमान्‌को बिना सोचे-समझे यह हत्या नहीं करनी चाहिये॥ ७६-७७॥ | | अन्तर्हितेन केनापि शत्रुणा तव चास्य वा।<br>उदितेति कुतो न स्याद्वागनर्थकरी विभो॥ ७८<br><br>यशसस्ते विघाताय वसुदेवगृहस्य च।<br>अरिणा रचिता वाणी गुणमायाविदा नृप॥ ७९ | हे विभो! हो-न-हो तुम्हारे या इन वसुदेवके किसी गुप्त शत्रुने यह अनर्थकारी वाणी बोल दी हो। हे राजन्! तुम्हारा यश और वसुदेवका गार्हस्थ्य नष्ट करनेके लिये किसी मायावी शत्रुने यह कृत्रिम वाणी घोषित कर दी हो॥ ७८-७९॥ |

५०२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०

| बिभेषि वीरस्त्वं भूत्वा भूतभाषितभाषया।<br>यशोमूलविघातार्थमुपायस्त्वरिणा कृतः॥ ८० | तुम वीर होकर भी आकाशवाणीसे डर रहे हो तुम्हारे यशरूपी वृक्षको उखाड़ फेंकनेके लिये तुम्हारे किसी शत्रुने ही यह चाल चली है॥ ८०॥ | | पितृष्वसा न हन्तव्या विवाहसमये पुनः।<br>भवितव्यं महाराज भवेच्च कथमन्यथा॥ ८१ | जो कुछ भी हो, विवाहके इस अवसरपर तुम्हें बहनकी हत्या तो करनी ही नहीं चाहिये। हे महाराज! होनहार तो होगी ही, उसे कोई कैसे टाल सकता है?॥ ८१॥ | | एवं तैर्बोध्यमानोऽसौ निवृत्तो नाभवद्यदा।<br>तदा तं वसुदेवोऽपि नीतिज्ञः प्रत्यभाषत॥ ८२<br><br>कंस सत्यं ब्रवीम्यद्य सत्याधारं जगत्त्रयम्।<br>दास्यामि देवकीपुत्रानुत्पन्नांस्तव सर्वशः॥ ८३<br><br>जातं जातं सुतं तुभ्यं न दास्यामि यदि प्रभो।<br>कुम्भीपाके तदा घोरे पतन्तु मम पूर्वजाः॥ ८४ | इस प्रकार उन वृद्ध यादवोंके समझानेपर भी जब वह कंस पापकर्मसे विरत नहीं हुआ, तब नीतिज्ञ वसुदेवजीने उससे कहा—हे कंस! तीनों लोक सत्यपर टिके हुए हैं, अतः मैं इस समय तुमसे सत्य बोल रहा हूँ। उत्पन्न होते ही देवकीके सभी पुत्रोंको लाकर मैं आपको दे दूँगा। हे विभो! यदि क्रमसे उत्पन्न होते हुए ही प्रत्येक पुत्र आपको न दे दूँ तो मेरे पूर्वज भयंकर कुम्भीपाक नरकमें गिर पड़ें॥ ८२–८४॥ | | श्रुत्वाथ वचनं सत्यं पौरवा ये पुरःस्थिताः।<br>ऊचुस्ते त्वरिताः कंसं साधु साधु पुनः पुनः॥ ८५<br><br>न मिथ्या भाषते क्वापि वसुदेवो महामनाः।<br>केशं मुञ्च महाभाग स्त्रीहत्या पातकं तथा॥ ८६ | वसुदेवजीका यह सत्य वचन सुनकर वहाँ जो नागरिक सामने खड़े थे, वे कंससे तुरंत बोल उठे—'बहुत ठीक, बहुत ठीक। महात्मा वसुदेव कभी भी झूठ नहीं बोलते। हे महाभाग! अब इस देवकीके केश छोड़ दीजिये; क्योंकि स्त्रीहत्या पाप है'॥ ८५-८६॥ | | व्यास उवाच<br>एवं प्रबोधितः कंसो यदुवृद्धैर्महात्मभिः।<br>क्रोधं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सत्यवाक्यानुमोदितः॥ ८७ | व्यासजी बोले—उन महात्मा वृद्ध यादवोंके इस प्रकार समझानेपर कंसने क्रोध त्यागकर वसुदेवजीके सत्य वचनपर विश्वास कर लिया॥ ८७॥ | | ततो दुन्दुभयो नेदुर्वादित्राणि च सस्वनुः।<br>जयशब्दस्तु सर्वेषामुतपन्नस्तत्र संसदि॥ ८८ | तब दुन्दुभियाँ तथा अन्य बाजे ऊँचे स्वरमें बजने लगे और उस सभामें उपस्थित सभी लोगोंके मुखसे जय-जयकारकी ध्वनि होने लगी॥ ८८॥ | | प्रसाद्य कंसं प्रतिमोच्य देवकीं<br>महाशशाः शूरसुतस्तदानीम्।<br>जगाम गेहं स्वजनानुवृत्तो<br>नवोढया वीतभयस्तरस्वी॥ ८९ | इस प्रकार उस समय महायशस्वी वसुदेवजी कंसको प्रसन्न करके उससे देवकीको छुड़ाकर उस नवविवाहिताके साथ अपने इष्टजनोंसहित निर्भय होकर शीघ्रतापूर्वक घर चले गये॥ ८९॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥

अ० २१] चतुर्थ स्कन्ध ५०३

अ० २१] चतुर्थ स्कन्ध ५०३

अथैकविंशोऽध्यायः

देवकीके प्रथम पुत्रका जन्म, वसुदेवद्वारा प्रतिज्ञानुसार उसे कंसको अर्पित करना और कंसद्वारा उस नवजात शिशुका वध

संस्कृत मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>अथ काले तु सम्प्राप्ते देवकी देवरूपिणी।<br>गर्भं दधार विधिवद्वसुदेवेन सङ्गता॥ १व्यासजी बोले—हे राजन्! इसके बाद समय आनेपर देवस्वरूपिणी देवकीने वसुदेवके संयोगसे विधिवत् गर्भ धारण किया॥ १॥
पूर्णेऽथ दशमे मासे सुषुवे सुतमुत्तमम्।<br>रूपावयवसम्पन्नं देवकी प्रथमं यदा॥ २<br><br>तदाह वसुदेवस्तां सत्यवाक्यानुमोदितः।<br>भावित्वाच्च महाभागो देवकीं देवमातरम्॥ ३दसवाँ माह पूर्ण होनेपर जब देवकीने अत्यन्त रूपसम्पन्न तथा सुडौल अंगोंवाले अत्युत्तम प्रथम पुत्रको जन्म दिया तब सत्यप्रतिज्ञासे बँधे हुए महाभाग वसुदेवने होनहारसे विवश होकर देवमाता देवकीसे कहा—॥ २-३॥
वरोरु समयं मे त्वं जानासि स्वसुतार्पणे।<br>मोचिता त्वं महाभागे शपथेन मया तदा॥ ४<br><br>इमं पुत्रं सुकेशान्ते दास्यामि भ्रातृसूनवे।<br>(खले कंसे विनाशार्थं दैवे किं वा करिष्यसि।)<br>विचित्रकर्मणां पाको दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः॥ ५<br><br>सर्वेषां किल जीवानां कालपाशानुवर्तिनाम्।<br>भोक्तव्यं स्वकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम्॥ ६<br><br>प्रारब्धं सर्वथैवात्र जीवस्य विधिनिर्मितम्।हे सुन्दरि! अपने सभी पुत्र कंसको अर्पित कर देनेकी मेरी प्रतिज्ञाको तुम भलीभाँति जानती हो। हे महाभागे! उस समय इसी प्रतिज्ञाके द्वारा मैंने तुम्हें कंससे मुक्त कराया था। अतएव हे सुन्दर केशोंवाली! मैं यह पुत्र तुम्हारे चचेरे भाई कंसको अर्पित कर दे रहा हूँ। (जब दुष्ट कंस अथवा प्रारब्ध विनाशके लिये उद्यत ही है तो तुम कर ही क्या सकोगी?) अद्भुत कर्मोंका परिणाम आत्मज्ञानसे रहित प्राणियोंके लिये दुर्ज्ञेय होता है। कालके पाशमें बँधे हुए समस्त जीवोंको अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मोंका फल निश्चितरूपसे भोगना ही पड़ता है। प्रत्येक जीवका प्रारब्ध निश्चित-रूपसे विधिके द्वारा ही निर्मित है॥ ४—६ ½ ॥
देवक्युवाच<br>स्वामिन् पूर्वं कृतं कर्म भोक्तव्यं सर्वथा नृभिः॥ ७<br><br>तीर्थैस्तपोभिर्दानैर्वा किं न याति क्षयं हि तत्।<br>लिखितो धर्मशास्त्रेषु प्रायश्चित्तविधिर्नृप॥ ८<br><br>पूर्वार्जितानां पापानां विनाशाय महात्मभिः।देवकी बोली—हे स्वामिन्! मनुष्योंको अपने पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है; किंतु क्या तीर्थाटन, तपश्चरण एवं दानादिसे वह कर्म-फल नष्ट नहीं हो सकता? हे महाराज! पूर्व अर्जित पापोंके विनाशके लिये महात्माओंने धर्मशास्त्रोंमें तो नानाविध प्रायश्चित्तके विधानका उल्लेख किया है॥ ७—८ ½ ॥
ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः॥ ९<br><br>द्वादशाब्दव्रते चीर्णे शुद्धिं याति यतस्ततः।<br>मन्वादिभिर्यथोद्दिष्टं प्रायश्चित्तं विधानतः॥ १०ब्रह्महत्या करनेवाला, स्वर्णका हरण करनेवाला, सुरापान करनेवाला तथा गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला महापापी भी बारह वर्षतक व्रतका अनुष्ठान कर लेनेपर शुद्ध हो जाता है। हे अनघ! उसी प्रकार मनु आदिके द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्तका विधानपूर्वक

| ५०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ | | :--- | :--- |

| तथा कृत्वा नरः पापान्मुच्यते वा न वानघ।<br>विगीतवचनास्ते किं मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ११<br><br>याज्ञवल्क्यादयः सर्वे धर्मशास्त्रप्रवर्तकाः।<br>भवितव्यं भवत्येव यद्येवं निश्चयः प्रभो ॥ १२<br><br>आयुर्वेदः स मिथ्यैव मन्त्रवादास्तथाखिलाः।<br>उद्यमस्तु वृथा सर्वमेवं चेद्दैवनिर्मितम् ॥ १३ | अनुष्ठान करके मनुष्य क्या पापसे मुक्त नहीं हो जाता है? [यदि प्रायश्चित्त-विधानके द्वारा पापसे मुक्ति नहीं मिलती है तो] क्या याज्ञवल्क्य आदि धर्मशास्त्रप्रणेता तत्त्वदर्शी मुनियोंके वचन निरर्थक हो जायँगे? हे स्वामिन्! होनी होकर ही रहती है—यदि यह निश्चित है तब तो सभी आयुर्वेद एवं सभी मन्त्रशास्त्र झूठे सिद्ध हो जायँगे और इस प्रकार भाग्यलेखके समक्ष सभी उद्यम अर्थहीन हो जायँगे॥ ९—१३॥ | | भवितव्यं भवत्येव प्रवृत्तिस्तु निरर्थिका।<br>अग्निष्टोमादिकं व्यर्थं नियतं स्वर्गसाधनम् ॥ १४<br><br>यदा तदा प्रमाणं हि वृथैव परिभाषितम्।<br>वितथे तत्प्रमाणे तु धर्मोच्छेदः कुतो न हि ॥ १५ | ‘जो होना है, वह अवश्य घटित होता है’ यदि [यही सत्य है] तो सत्कर्मोंकी ओर प्रवृत्त होना व्यर्थ हो जायगा और अग्निष्टोम आदि स्वर्गप्राप्तिके शास्त्र-सम्मत साधन भी निरर्थक हो जायँगे। जब वेद-शास्त्रादिके उपदेश ही व्यर्थ हो गये, तब उन प्रमाणोंके झूठा हो जानेपर क्या धर्मका समूल नाश नहीं हो जायगा?॥ १४-१५॥ | | उद्यमे च कृते सिद्धिः प्रत्यक्षेणैव साध्यते।<br>तस्मादत्र प्रकर्तव्यः प्रपञ्चश्चित्तकल्पितः ॥ १६<br><br>यथायं बालकः क्षेमं प्राप्नोति मम पुत्रकः।<br>मिथ्या यदि प्रकर्तव्यं वचनं शुभमिच्छता ॥ १७<br><br>न तत्र दूषणं किञ्चित्प्रवदन्ति मनीषिणः। | उद्यम करनेपर सिद्धिकी प्रत्यक्ष प्राप्ति हो जाती है। अतएव अपने मनमें भलीभाँति सोच करके कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मेरा यह बालक पुत्र बच जाय। किसीके कल्याणकी इच्छासे यदि झूठ बोल दिया जाय तो इसमें किसी प्रकारका दोष नहीं होता है—ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं॥ १६-१७ ½ ॥ | | वसुदेव उवाच<br>निशामय महाभागे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ १८<br><br>उद्यमः खलु कर्तव्यः फलं दैववशानुगम्।<br>त्रिविधानीह कर्माणि संसारेऽत्र पुराविदः ॥ १९<br><br>प्रवदन्तीह जीवानां पुराणेष्ववागमेषु च।<br>सञ्चितानि च जीर्णानि प्रारब्धानि सुमध्यमे ॥ २०<br><br>वर्तमानानि वामोरु त्रिविधानीह देहिनाम्।<br>शुभाशुभानि कर्माणि बीजभूतानि यानि च ॥ २१ | वसुदेव बोले—हे महाभागे! सुनो, मैं तुमसे यह सत्य कह रहा हूँ। मनुष्यको उद्यम करना चाहिये, उसका फल दैवके अधीन रहता है। प्राचीन तत्त्ववेत्ताओंने इस संसारमें प्राणियोंके तीन प्रकारके कर्म पुराणों तथा शास्त्रोंमें बताये हैं। हे सुमध्यमे! संचित, प्रारब्ध और वर्तमान—ये तीन प्रकारके कर्म देहधारियोंके होते हैं। हे सुजघने! प्राणियोंद्वारा सम्पादित जो भी शुभाशुभ कर्म होते हैं, वे बीजका रूप धारण कर लेते हैं और अनेक जन्मोंके उपार्जित वे कर्म समय पाकर फल देनेके लिये उपस्थित हो जाते हैं॥ १८—२१ ½ ॥ | | बहुजन्मसमुत्थानि काले तिष्ठन्ति सर्वथा।<br>पूर्वदेहं परित्यज्य जीवः कर्मवशानुगः ॥ २२<br><br>स्वर्गं वा नरकं वापि प्राप्नोति स्वकृतेन वै।<br>दिव्यं देहञ्च सम्प्राप्य यातनादेहमर्थजम् ॥ २३<br>भुनक्ति विविधान् भोगान्स्वर्गे वा नरकेऽथवा। | जीव अपना पूर्व शरीर छोड़कर अपने द्वारा किये गये कर्मोंके अधीन होकर स्वर्ग अथवा नरकमें जाता है। सुकर्म करनेवाला जीव दिव्य शरीर प्राप्त करके स्वर्गमें नानाविध सुखोंका उपभोग करता है तथा दुष्कर्म करनेवाला विषयभोगजन्य यातना देह प्राप्त करके नरकमें अनेक प्रकारके कष्ट भोगता है॥ २२-२३ ½ ॥ |

अ० २१ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०५

अ० २१ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०५


भोगान्ते च यदोत्पत्तेः समयस्तस्य जायते ॥ २४ <br><br> लिङ्गदेहेन सहितं जायते जीवसंज्ञितम्। <br> तदैव सञ्चितेभ्यश्च कर्मभ्यः कर्मभिः पुनः ॥ २५ <br><br> योजयत्येव तं कालं कर्माणि प्राक्कृतानि च। <br> देहेनानेन भाव्यानि शुभानि चाशुभानि च ॥ २६ <br><br> प्रारब्धानि च जीवेन भोक्तव्यानि सुलोचने। <br> प्रायश्चित्तेन नश्यन्ति वर्तमानानि भामिनि ॥ २७ <br><br> सञ्चितानि तथैवाशु यथार्थं विहितेन च। <br> प्रारब्धकर्मणां भोगात्संक्षयो नान्यथा भवेत् ॥ २८इस प्रकार भोग पूर्ण हो जानेपर जब पुनः उसके जन्मका समय आता है, तब लिंगदेहके साथ संयोग होनेपर उसकी 'जीव' संज्ञा हो जाती है। उसी समय जीवका संचित कर्मोंसे सम्बन्ध हो जाता है और पुनः लिंगदेहके आविर्भावके समय परमात्मा उन कर्मोंके साथ जीवको जोड़ देते हैं। हे सुलोचने! इसी शरीरके द्वारा जीवको संचित, वर्तमान और प्रारब्ध—इन तीन प्रकारके शुभ अथवा अशुभ कर्म भोगने पड़ते हैं। हे भामिनि! केवल वर्तमान कर्म ही प्रायश्चित्त आदिके द्वारा नष्ट किये जा सकते हैं। इसी प्रकार समुचित शास्त्रोक्त उपायोंद्वारा संचित कर्मोंको भी विनष्ट किया जा सकता है, किंतु प्रारब्ध कर्मोंका क्षय तो भोगसे ही सम्भव है, अन्यथा नहीं॥ २४—२८॥
तेनायं ते कुमारो वै देयः कंसाय सर्वथा। <br> न मिथ्या वचनं मेऽस्ति लोकनिन्दाभिदूषितम् ॥ २९अतएव मुझे तुम्हारे इस पुत्रको हर प्रकारसे कंसको अर्पित कर ही देना चाहिये। ऐसा करनेसे मेरा वचन भी मिथ्या नहीं होगा और लोकनिन्दाका दोष भी मुझे नहीं लगेगा॥ २९॥
अनित्येऽस्मिंस्तु संसारे धर्मसारे महात्मनाम्। <br> दैवाधीनं हि सर्वेषां मरणं जननं तथा ॥ ३० <br><br> तस्माच्छोको न कर्तव्यो देहिना हि निरर्थकः। <br> सत्यं यस्य गतं कान्ते वृथा तस्यैव जीवितम् ॥ ३१इस अनित्य संसारमें महापुरुषोंके लिये धर्म ही एकमात्र सार-तत्त्व है। इस लोकमें प्राणियोंका जन्म तथा मरण दैवके अधीन है। अतएव हे प्रिये! प्राणियोंको व्यर्थ शोक नहीं करना चाहिये। इस संसारमें जिसने सत्य छोड़ दिया उसका जीवन निरर्थक ही है॥ ३०-३१॥
इहलोको गतो यस्मात्परलोकः कुतस्ततः। <br> अतो देहि सुतं सुभ्रु कंसाय प्रददाम्यहम् ॥ ३२जिसका यह लोक बिगड़ गया, उसके लिये परलोक कहाँ? अतः हे सुन्दर भौंहोंवाली! यह बालक मुझे दे दो और मैं इसे कंसको सौंप दूँ॥ ३२॥
सत्यसंस्तरणाद्देवि शुभमग्रे भविष्यति। <br> कर्तव्यं सुकृतं पुम्भिः सुखे दुःखे सति प्रिये ॥ ३३ <br><br> (सत्यसंरक्षणाद्देवि शुभमेव भविष्यति)हे देवि! सत्य-पथका अनुगमन करनेसे आगे कल्याण होगा। हे प्रिये! सुख अथवा दुःख—किसी भी परिस्थितिमें मनुष्योंको सत्कर्म ही करना चाहिये। <br> (हे देवि! सत्यकी भलीभाँति रक्षा करनेसे कल्याण ही होगा)॥ ३३॥
व्यास उवाच <br> इत्युक्तवति कान्ते सा देवकी शोकसंयुता। <br> ददौ पुत्रं प्रसूतं च वेपमाना मनस्विनी ॥ ३४व्यासजी बोले— अपने प्रिय पतिके ऐसा कहनेपर शोक-सन्तप्त तथा काँपती हुई मनस्विनी देवकीने वह नवजात शिशु वसुदेवको दे दिया॥ ३४॥
वसुदेवोऽपि धर्मात्मा आदाय स्वसुतं शिशुम्। <br> जगाम कंससदनं मार्गे लोकैरभिष्टुतः ॥ ३५धर्मात्मा वसुदेव भी अपने पुत्र उस अबोध शिशुको लेकर कंसके महलकी ओर चल पड़े। मार्गमें लोग उनकी प्रशंसा कर रहे थे॥ ३५॥
५०६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लोका ऊचुः<br>पश्यन्तु वसुदेवं भो लोका एवं मनस्विनम्।<br>स्ववाक्यमनुरुध्यैव बालमादाय यात्यसौ॥ ३६<br><br>मृत्युवे दातुकामोऽद्य सत्यवागनसूयकः।<br>सफलं जीवितं चास्य धर्मं पश्यन्तु चाद्भुतम्॥ ३७<br><br>यः पुत्रं याति कंसाय दातुं कालात्मनेऽपि हि।<br>व्यास उवाच<br>इति संस्तूयमानस्तु प्राप्तः कंसालयं नृप॥ ३८<br><br>ददावस्मै कुमारं तं जातमात्रममानुषम्।<br>कंसोऽपि विस्मयं प्राप्तो दृष्ट्वा धैर्यं महात्मनः॥ ३९लोगोंने कहा— हे नागरिको! इस मनस्वी वसुदेवको देखो; इस अबोध बालकको लेकर ये द्वेषरहित एवं सत्यवादी वसुदेव अपने वचनकी रक्षाके लिये आज इसे मृत्युको समर्पित करने जा रहे हैं। इनका जीवन सफल हो गया है। इनके इस अद्भुत धर्मपालनको देखो, जो साक्षात् कालरूप कंसको अपना पुत्र देनेके लिये जा रहे हैं॥ ३६-३७ १/२॥<br><br>व्यासजी बोले— हे राजन्! इस प्रकार लोगोंद्वारा प्रशंसित होते हुए वे वसुदेव कंसके महलमें पहुँच गये और उस दिव्य नवजात शिशुको कंसको अर्पित कर दिया। महात्मा वसुदेवके इस धैर्यको देखकर कंस भी विस्मित हो गया॥ ३८-३९॥
गृहीत्वा बालकं प्राह स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>धन्यस्त्वं शूरपुत्राद्य ज्ञातः पुत्रसमर्पणात्॥ ४०उस बालकको अपने हाथोंमें लेकर कंसने मुसकराते हुए यह वचन कहा—हे शूरसेनतनय! आप धन्य हैं; आज आपके इस पुत्र-समर्पणके कृत्यसे मैंने आपका महत्त्व जान लिया॥ ४०॥
मम मृत्युर्न चायं वै गिरा प्रोक्तस्तु चाष्टमः।<br>न हन्तव्यो मया कामं बालोऽयं यातु ते गृहम्॥ ४१यह बालक मेरी मृत्युका कारण नहीं है; क्योंकि आकाशवाणीके द्वारा देवकीका आठवाँ पुत्र मेरी मृत्युका कारण बताया गया है। अतएव मैं इस बालकका वध नहीं करूँगा, आप इसे अपने घर ले जाइये॥ ४१॥
अष्टमस्तु प्रदातव्यस्त्वया पुत्रो महामते।<br>इत्युक्त्वा वसुदेवाय ददावाशु खलः शिशुम्॥ ४२हे महामते! आप मुझे देवकीका आठवाँ पुत्र दे दीजियेगा। ऐसा कहकर उस दुष्ट कंसने तुरंत वह शिशु वसुदेवको वापस दे दिया॥ ४२॥
गच्छत्वयं गृहे बालः क्षेमं व्याहृतवान्नृपः।<br>तमादाय तदा शौरिर्जगाम स्वगृहं मुदा॥ ४३राजा कंसने कहा कि यह बालक अपने घर जाय और सकुशल रहे। तत्पश्चात् उस बालकको लेकर शूरसेन-पुत्र वसुदेव प्रसन्नतापूर्वक अपने घरकी ओर चल पड़े॥ ४३॥
कंसोऽपि सचिवानाह वृथा किं घातये शिशुम्।<br>अष्टमाद्देवकीपुत्रान्मम मृत्युरुदाहृतः॥ ४४<br><br>अतः किं प्रथमं बालं हत्वा पापं करोम्यहम्।<br>साधु साध्विति तेऽप्युक्त्वा संस्थिता मन्त्रिसत्तमाः॥ ४५<br><br>विसर्जितास्तु कंसेन जग्मुस्ते स्वगृहान्प्रति।<br>गतेषु तेषु सम्प्राप्तो नारदो मुनिसत्तमः॥ ४६इसके बाद कंसने भी अपने मन्त्रियोंसे कहा कि मैं इस शिशुकी व्यर्थ ही हत्या क्यों करता; क्योंकि मेरी मृत्यु तो देवकीके आठवें पुत्रसे कही गयी है, अतः देवकीके प्रथम शिशुका वध करके मैं पाप क्यों करूँ? तब वहाँ विद्यमान श्रेष्ठ मन्त्रिगण ‘साधु, साधु’—ऐसा कहकर और कंससे आज्ञा पाकर अपने-अपने घर चले गये। उनके चले जानेपर मुनिश्रेष्ठ नारदजी वहाँ आ गये॥ ४४—४६॥

अ० २२ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०७

अ० २२ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०७


| अभ्युत्थानार्घ्यपाद्यादि चकारोग्रसुतस्तदा।<br>पप्रच्छ कुशलं राजा तत्रागमनकारणम्॥ ४७ | उस समय उग्रसेन-पुत्र कंसने श्रद्धापूर्वक उठकर विधिवत् अर्घ्य, पाद्य आदि अर्पण किया और पुनः कुशल-क्षेम तथा उनके आगमनका कारण पूछा॥ ४७॥ | | नारदस्तं तदोवाच स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>कंस कंस महाभाग गतोऽहं हेमपर्वतम्॥ ४८<br><br>तत्र ब्रह्मादयो देवा मन्त्रं चक्रुः समाहिताः।<br>देवक्यां वसुदेवस्य भार्यायां सुरसत्तमः॥ ४९<br><br>वधार्थं तव विष्णुश्च जन्म चात्र करिष्यति।<br>तत्कथं न हतः पुत्रस्त्वया नीतिं विजानता॥ ५० | तब नारदजीने मुसकराकर कंससे यह वचन कहा—हे कंस! हे महाभाग! मैं सुमेरुपर्वतपर गया था। वहाँ ब्रह्मा आदि देवगण एकत्र होकर आपसमें मन्त्रणा कर रहे थे कि वसुदेवकी पत्नी देवकीके गर्भसे सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णु आपके संहारके उद्देश्यसे अवतार लेंगे; तो फिर नीतिका ज्ञान रखते हुए भी आपने उस शिशुका वध क्यों नहीं किया?॥ ४८-५०॥ | | कंस उवाच<br>अष्टमं च हनिष्येऽहं मृत्युं मे देवभाषितम्। | कंस बोला—आकाशवाणीके द्वारा बताये गये अपने मृत्यु-रूप [देवकीके] आठवें पुत्रका मैं वध करूँगा॥ ५० १/२॥ | | नारद उवाच<br>न जानासि नृपश्रेष्ठ राजनीतिं शुभाशुभाम्॥ ५१<br><br>मायाबलं च देवानां न त्वं वेत्सि वदामि किम्।<br>रिपुरल्पोऽपि शूरेण नोपेक्ष्यः शुभमिच्छता॥ ५२ | नारदजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! आप शुभ तथा अशुभ राजनीतिको नहीं जानते हैं और देवताओंकी माया-शक्ति भी नहीं जानते हैं। अब मैं क्या बताऊँ? अपना कल्याण चाहनेवाले वीरको छोटे-से-छोटे शत्रु की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये॥ ५१-५२॥ | | सम्मेलनक्रियायां तु सर्वे ते ह्यष्टमाः स्मृताः।<br>मूर्खस्त्वमरिसन्त्यागः कृतोऽयं जानता त्वया॥ ५३ | [गणितशास्त्रकी] सम्मेलन-क्रियाके आधारपर तो सभी पुत्र आठवें कहे जा सकते हैं। आप मूर्ख हैं; क्योंकि ऐसा जानते हुए भी आपने शत्रुको छोड़ दिया है॥ ५३॥ | | इत्युक्त्वाशु गतः श्रीमान्नारदो देवदर्शनः।<br>गतेऽथ नारदे कंसः समाहूयाथ बालकम्।<br>पाषाणे पोथयामास सुखं प्राप च मन्दधीः॥ ५४ | ऐसा कहकर श्रीमान् देवदर्शन नारद वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चले गये। नारदके चले जानेपर कंसने उस बालकको मँगवाकर उसे पत्थरपर पटक दिया और उस मन्दबुद्धि कंसको महान् सुख प्राप्त हुआ॥ ५४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां कंसेन देवकीप्रथमपुत्रवधवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥


अथ द्वाविंशोऽध्यायः

देवकीके छः पुत्रोंके पूर्वजन्मकी कथा, सातवें पुत्रके रूपमें भगवान् संकर्षणका अवतार, देवताओं तथा दानवोंके अंशावतारोंका वर्णन

| जनमेजय उवाच<br>किं कृतं पातकं तेन बालकेन पितामह।<br>यज्जातमात्रो निहतस्तथा तेन दुरात्मना॥ १ | जनमेजय बोले—हे पितामह! उस बालकने ऐसा कौन-सा पापकर्म किया था, जिससे जन्म लेते ही उसको दुष्टात्मा कंसने मार डाला?॥ १॥ |

| ५०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारदोऽपि मुनिश्रेष्ठो ज्ञानवान्धर्मतत्परः।<br>कथमेवंविधं पापं कृतवान्ब्रह्मवित्तमः॥ २<br><br>कर्ता कारयिता पापे तुल्यपापौ स्मृतौ बुधैः।<br>स कथं प्रेरयामास मुनिः कंसं खलं तदा॥ ३महान् ज्ञानी, धर्मपरायण तथा ब्रह्मवेत्ता होते हुए भी मुनिश्रेष्ठ नारदने इस प्रकारका पाप क्यों किया? विद्वज्जनोंने पाप करने तथा करानेवाले—इन दोनोंको समान पापी बताया है; तो फिर उन देवर्षि नारदने इस पापकर्मके लिये दुष्ट कंसको प्रेरित क्यों किया?॥ २-३॥
संशयोऽयं महाम्मेऽत्र ब्रूहि सर्वं सविस्तरम्।<br>येन कर्मविपाकेन बालको निधनं गतः॥ ४इस विषयमें मुझे यह महान् सन्देह हो गया है। जिस कर्मफलसे वह बालक मारा गया, उसके बारेमें मुझे सब कुछ विस्तारपूर्वक बताइये॥ ४॥
व्यास उवाच<br>नारदः कौतुकप्रेक्षी सर्वदा कलहप्रियः।<br>देवकार्यार्थमागत्य सर्वमेतच्चकार ह॥ ५व्यासजी बोले— देवर्षि नारदको कौतुक करना तथा कलह करा देना अत्यन्त प्रिय है। अतः देवताओंका कार्य साधनेके लिये ही उन्होंने उपस्थित होकर यह सब किया था॥ ५॥
न मिथ्याभाषणे बुद्धिर्मुनेस्तस्य कदाचन।<br>सत्यवक्ता सुराणां स कर्तव्ये निरतः शुचिः॥ ६उन मुनि नारदकी बुद्धि झूठ बोलनेमें कभी भी प्रवृत्त नहीं हो सकती। सत्यवादी तथा पवित्र हृदयवाले वे सदा देवताओंका कार्य सिद्ध करनेमें तत्पर रहते हैं॥ ६॥
एवं षड् बालकास्तेन जाता जाता निपातिताः।<br>षड् गर्भाः शापयोगेन सम्भूय मरणं गताः॥ ७इस प्रकार कंसने देवकीके छः पुत्रोंको बारी-बारीसे जन्म लेते ही मार डाला। पूर्वजन्ममें प्राप्त शापके कारण वे छः बालक जन्म लेते ही मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ७॥
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तेषां शापस्य कारणम्।<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पुत्रा मरीचेः षण्महाबलाः॥ ८<br><br>ऊर्णायां चैव भार्यायामासन्धर्मविचक्षणाः।<br>ब्रह्माणं जहसुर्वीक्ष्य सुतां यभितुमुद्यतम्॥ ९हे राजन्! सुनिये, अब मैं उनके शापका कारण बताऊँगा। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें मरीचिकी भार्या ऊर्णाके गर्भसे छः अत्यन्त बलशाली पुत्र उत्पन्न हुए; ये धर्मशास्त्रमें पूर्णरूपसे निष्णात थे॥ ८ १/२॥<br>एक बार ब्रह्माजीको अपनी पुत्री सरस्वतीके साथ समागमके लिये उद्यत देखकर वे हँस पड़े थे।
शशाप तांस्तदा ब्रह्मा दैत्ययोनिं विशन्त्वधः।<br>कालनेमिसुता जातास्ते षड्गर्भा विशाम्पते॥ १०तब ब्रह्माजीने उन्हें शाप दे दिया कि तुमलोगोंका पतन हो जाय और तुम सब दैत्ययोनिमें जन्म लो। हे महाराज! इस प्रकार वे छहों पुत्र कालनेमिके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए॥ ९-१०॥
अवतारे परे ते तु हिरण्यकशिपोः सुताः।<br>जातास्ते ज्ञानसंयुक्ताः पूर्वशापभयान्नृप॥ ११<br><br>तस्मिञ्जन्मनि शान्ताश्च तपश्चक्रुः समाहिताः।<br>तेषां प्रीतोऽभवद् ब्रह्मा षड्गर्भाणां वरन्ददौ॥ १२हे राजन्! अगले जन्ममें वे हिरण्यकशिपुके पुत्र हुए। उनका पूर्वज्ञान अभी बना हुआ था। अतः वे सब पूर्वशापसे भयभीत होकर उस जन्ममें समाहितचित्त हो शान्तभावसे तप करने लगे। इससे ब्रह्माजीने अत्यधिक प्रसन्न होकर उन छहोंको वरदान दे दिया॥ ११-१२॥

| अ० २२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५०९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मोवाच<br>शप्ता यूयं मया पूर्वं क्रोधयुक्तेन पुत्रकाः।<br>तुष्टोऽस्मि वो महाभागा ब्रुवन्तु वाञ्छितं वरम्॥ १३**ब्रह्माजी बोले—**हे महाभाग पुत्रो! मैंने क्रोधमें आकर उस समय तुम लोगोंको शाप दे दिया था। मैं तुम सभीपर परम प्रसन्न हूँ; अतएव अपना अभिलषित वर माँगो॥ १३॥
व्यास उवाच<br>ते तु श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मणः प्रीतमानसाः।<br>ब्रह्माणमब्रुवन्कामं सर्वे कार्यार्थतत्पराः॥ १४**व्यासजी बोले—**उन ब्रह्माका वचन सुनकर उनके मनमें अत्यधिक प्रसन्नता हुई। अपना कार्य सिद्ध करनेमें तत्पर उन सबने ब्रह्माजीसे वर माँग लिया॥ १४॥
गर्भा ऊचुः<br>पितामहाद्य तुष्टोऽसि देहि नो वाञ्छितं वरम्।<br>अवध्या दैवतैः सर्वैर्मानवैश्च महोरगैः॥ १५<br>गन्धर्वसिद्धपतिभिर्वधो माभूतित्यितामह।**बालक बोले—**हे पितामह! यदि आज आप हमपर प्रसन्न हैं तो हमें मनोवांछित वरदान दीजिये। हमलोगोंको सभी देवता, मानव और महानाग न मार सकें। हे पितामह! यहाँतक कि गन्धर्व तथा बड़े-से-बड़े सिद्ध पुरुषोंसे भी हमारा वध न हो सके॥ १५ ½॥
व्यास उवाच<br>तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वमेतद्भविष्यति॥ १६<br>गच्छन्तु वो महाभागाः सत्यमेव न संशयः।<br>दत्त्वा वरं गतो ब्रह्मा मुदितास्ते तदाभवन्॥ १७**व्यासजी बोले—**तब ब्रह्माजीने उनसे कहा कि यह सब पूर्ण होगा। हे महाभाग्यशाली बालको! अब तुमलोग जाओ। यह सत्य होकर रहेगा; इसमें सन्देह नहीं है। जब ब्रह्माजी वरदान देकर चले गये, तब वे सब परम प्रसन्न हुए॥ १६-१७॥
हिरण्यकशिपुः क्रुद्धस्तानुवाच कुरूद्वह।<br>यस्माद्विहाय मां पुत्रास्तोषितो वै पितामहः॥ १८<br>वरेण प्रार्थितोऽत्यर्थं बलवन्तो यतोऽभवन्।<br>युष्माभिर्हापितः स्नेहस्ततो युष्मांस्त्यजाम्यहम्॥ १९हे कुरुश्रेष्ठ! [वरदानकी बात जानकर] हिरण्यकशिपु कुपित होकर उनसे बोला—हे पुत्रो! तुमलोगोंने मेरी उपेक्षा करके अपनी तपस्यासे ब्रह्माको प्रसन्न किया है। उनसे प्रार्थना करके वरदान पाकर तुमलोग अत्यधिक बलशाली हो गये हो। तुम सभीने अपने पिताके स्नेहको अपमानित किया है; अतएव मैं तुमलोगोंका परित्याग करता हूँ॥ १८-१९॥
यूयं व्रजन्तु पाताले षड्गर्भा विश्रुता भुवि।<br>पाताले निद्रयाविष्टास्तिष्ठन्तु बहुवत्सरान्॥ २०<br>ततस्तु देवकीगर्भे वर्षे वर्षे पुनः पुनः।<br>पिता वः कालनेमिस्तु तत्र कंसो भविष्यति॥ २१<br>स एव जातमात्रान्वो वधिष्यति सुदारुणः।अब तुमलोग पाताललोक चले जाओ। इस पृथ्वीपर तुमलोग ‘षड्गर्भ’ नामसे विख्यात होओगे। पाताललोकमें तुमलोग बहुत वर्षोंतक निद्राके वशीभूत रहोगे। तत्पश्चात् तुमलोग क्रमसे प्रतिवर्ष देवकीके गर्भसे उत्पन्न होते रहोगे और पूर्वजन्मका तुम्हारा पिता कालनेमि उस समय कंस नामसे उत्पन्न होगा। वह अत्यन्त क्रूर कंस तुमलोगोंको उत्पन्न होते ही मार डालेगा॥ २०-२१ ½॥
व्यास उवाच<br>एवं शप्तांस्तदा तेन गर्भे जातान्युन्ः पुनः॥ २२<br>जघान देवकीपुत्रान्षड्गर्भाञ्छापनोदितः।<br>शेषांशः सप्तमस्तत्र देवकीगर्भसंस्थितः॥ २३**व्यासजी बोले—**इस प्रकार हिरण्यकशिपुसे शापित होकर वे क्रमसे एक-एक करके देवकीके गर्भमें आते गये और कंस पूर्वशापसे प्रेरित होकर उन षड्गर्भरूप देवकीके पुत्रोंका वध करता गया। इसके बाद शेषनागके अंशावतार बलभद्रजी देवकीके सातवें गर्भमें आये॥ २२-२३॥

५१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२

५१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२

विस्रंसितश्च गर्भोऽसौ योगेन योगमायया।<br>नीतश्च रोहिणीगर्भे कृत्वा संकर्षणं बलात् ॥ २४तत्पश्चात् योगमायाने अपने योगबलसे उस गर्भको च्युत कर दिया और हठात् खींचकर उसे रोहिणीके गर्भमें स्थापित कर दिया॥ २४॥
पतितः पञ्चमे मासि लोकख्यातिं गतस्तदा।<br>कंसोऽपि ज्ञातवांस्तत्र देवकीगर्भपातनम् ॥ २५इसी बीच लोगोंको यह बात मालूम हो गयी कि पाँचवें महीनेमें ही देवकीका गर्भस्राव हो गया। कंस भी देवकीके गर्भपातका समाचार जान गया। अपने लिये यह सुखप्रद समाचार सुनकर वह दुरात्मा कंस बहुत प्रसन्न हुआ॥ २५ १/२ ॥
मुदं प्राप स दुष्टात्मा श्रुत्वा वार्तां सुखावहाम्।<br>अष्टमे देवकीगर्भे भगवान्सात्वतां पतिः ॥ २६<br><br>उवास देवकार्यार्थं भारावतरणाय च।उधर देवताओंके कार्यको सिद्ध करने तथा पृथ्वीका भार उतारनेके लिये जगत्पति भगवान् विष्णु देवकीके आठवें गर्भमें विराजमान हो गये॥ २६ १/२ ॥
राजोवाच<br>वसुदेवः कश्यपांशः शेषांशश्च तदाभवत् ॥ २७<br><br>हरेरंशस्तथा प्रोक्तो भवता मुनिसत्तम।<br>अन्ये च येऽंशा देवानां तत्र जातास्तु तान्वद ॥ २८<br><br>भारावतरणार्थं वै क्षितेः प्रार्थनयानघ।राजा बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! आपने यह बता दिया कि वसुदेवजी महर्षि कश्यपके अंशावतार थे और उनके यहाँ शेषनाग तथा भगवान् विष्णु अपने-अपने अंशोंसे उत्पन्न हुए। हे अनघ! देवताओंके अन्य जो-जो अंशावतार पृथ्वीकी प्रार्थनापर उसका भार उतारनेके लिये हुए हैं, उन्हें भी बताइये॥ २७-२८ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>सुराणामसुराणां च ये येऽंशा भुवि विश्रुताः ॥ २९<br><br>तानहं सम्प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण शृणुष्व तान्।<br>वसुदेवः कश्यपांशो देवकी च तथादितिः ॥ ३०व्यासजी बोले—हे राजन्! देवताओं तथा असुरोंके जो-जो अंश लोकमें विख्यात हुए हैं, उनके विषयमें मैं संक्षिप्तरूपमें बता रहा हूँ; आप उन्हें सुनिये—वसुदेव कश्यपके अंशसे तथा देवकी अदितिके अंशसे उत्पन्न थीं॥ २९-३०॥
बलदेवस्त्वनन्तांशो वर्तमानेषु तेषु च।<br>योऽसौ धर्मसुतः श्रीमान्नारायण इति श्रुतः ॥ ३१<br><br>तस्यांशो वासुदेवस्तु विद्यमाने मुनौ तदा।<br>नरस्तस्यानुजो यस्तु तस्यांशोऽर्जुन एव च॥ ३२बलदेवजी शेषनागके अंश थे। इन सभीके अवतरित हो जानेपर जिन धर्मपुत्र श्रीमान् नारायणके विषयमें कहा जा चुका है, उन्हींके अंशसे ही साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने अवतार लिया। मुनिवर नारायणके श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हो जानेपर उनके नर नामक जो छोटे भाई हैं, उनके अंशस्वरूप अर्जुनका प्राकट्य हुआ॥ ३१-३२॥
युधिष्ठिरस्तु धर्मांशो वाय्वंशो भीम इत्युत।<br>अश्विन्योंशौ ततः प्रोक्तौ माद्रीपुत्रौ महाबलौ॥ ३३महाराज युधिष्ठिर धर्मके अंश, भीमसेन पवनदेवके अंश तथा माद्रीके दोनों महाबली पुत्र नकुल एवं सहदेव दोनों अश्विनीकुमारोंके अंश कहे गये हैं॥ ३३॥
सूर्यांशः कर्ण आख्यातो धर्मांशो विदुरः स्मृतः।<br>द्रोणो बृहस्पतेरंशस्तत्सुतस्तु शिवांशजः ॥ ३४कर्ण सूर्यके अंशसे प्रकट हुए और विदुरको धर्मका अंश बताया गया है। द्रोणाचार्य बृहस्पतिके अंशसे तथा उनका पुत्र अश्वत्थामा शिवके अंशसे उत्पन्न थे॥ ३४॥
अ० २२ ]चतुर्थ स्कन्ध५११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
समुद्रः शन्तनुः प्रोक्तो गङ्गा भार्या मता बुधैः ।<br>देवकस्तु समाख्यातो गन्धर्वपतिरागमे ॥ ३५विद्वानोंका मानना है कि समुद्रके अंशसे महाराज शन्तनु तथा गंगाके अंशसे उनकी भार्या उत्पन्न हुई थीं। पुराणप्रसिद्ध गन्धर्वराजके अंशसे महाराज देवक उत्पन्न हुए थे ॥ ३५ ॥
वसुर्भीष्मो विराटस्तु मरुद्गण इति स्मृतः ।<br>अरिष्टस्य सुतो हंसो धृतराष्ट्रः प्रकीर्तितः ॥ ३६भीष्मपितामहको वसुका तथा राजा विराटको मरुद्-गणोंका अंशावतार बताया गया है। महाराज धृतराष्ट्र अरिष्टनेमिके पुत्र हंसके अंशसे उत्पन्न कहे गये हैं ॥ ३६ ॥
मरुद्गणः कृपः प्रोक्तः कृतवर्मा तथापरः ।<br>दुर्योधनः कलेरंशः शकुनिं विद्धि द्वापरम् ॥ ३७कृपाचार्यको किसी एक मरुद्गणका अंश तथा कृतवर्माको किसी दूसरे मरुद्गणका अंश बताया गया है। [हे राजन्!] दुर्योधनको कलिका अंश तथा शकुनिको द्वापरका अंश समझिये ॥ ३७ ॥
सोमपुत्रः सुवर्चाह्व्यः सोमप्ररुरुदाहृतः ।<br>पावकांशो धृष्टद्युम्नः शिखण्डी राक्षसस्तथा ॥ ३८प्रसिद्ध सोमनन्दन सुवर्चा पृथ्वीपर सोमप्ररु नामसे विख्यात हुए। धृष्टद्युम्न अग्नि तथा शिखण्डी राक्षसके अंशसे उत्पन्न हुए ॥ ३८ ॥
सनत्कुमारस्यांशस्तु प्रद्युम्नः परिकीर्तितः ।<br>द्रुपदो वरुणस्यांशो द्रौपदी च रमांशाजा ॥ ३९प्रद्युम्न सनत्कुमारके अंश कहे गये हैं। द्रुपद वरुणके अंश थे तथा द्रौपदी साक्षात् लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थीं ॥ ३९ ॥
द्रौपदीतनयाः पञ्च विश्वेदेवांशजाः स्मृताः ।<br>कुन्तिः सिद्धिर्धृतिर्माद्री मतिर्गान्धारराजजा ॥ ४०द्रौपदीके पाँचों पुत्र विश्वेदेवके अंशसे उत्पन्न माने गये हैं। कुन्ती सिद्धिके अंशसे, माद्री धृतिके अंशसे तथा गान्धारी मतिके अंशसे उत्पन्न हुई थीं ॥ ४० ॥
कृष्णपत्न्यस्तथा सर्वा देववाराङ्गनाः स्मृताः ।<br>राजानश्च तथा सर्वे असुराः शक्रनोदिताः ॥ ४१भगवान् कृष्णकी सभी पत्नियाँ देवताओंकी रमणियोंके अंशसे उत्पन्न कही गयी हैं। इन्द्रके द्वारा भेजे हुए सब दैत्य धरातलपर आकर दुराचारी नरेश बने थे ॥ ४१ ॥
हिरण्यकशिपोरांशः शिशुपाल उदाहृतः ।<br>विप्रचित्तिर्जरासन्धः शल्यः प्रह्लाद इत्यपि ॥ ४२शिशुपालको हिरण्यकशिपुका अंश कहा गया है। जरासन्ध विप्रचित्तिका तथा शल्य प्रह्लादका अंशावतार था ॥ ४२ ॥
कालनेमिस्तथा कंसः केशी हयशिरास्तथा ।<br>अरिष्टो बलिपुत्रस्तु ककुद्मी गोकुले हतः ॥ ४३कालनेमि कंस हुआ तथा हयशिराको केशीका जन्म प्राप्त हुआ। बलिपुत्र ककुद्मी अरिष्टासुर बना, जो गोकुलमें मारा गया ॥ ४३ ॥
अनुह्लादो धृष्टकेतुर्भगदत्तोऽथ बाष्कलः ।<br>लम्बः प्रलम्बः सञ्जातः खरोऽसौ धेनुकोऽभवत् ॥ ४४अनुह्लाद धृष्टकेतु बना और बाष्कल भगदत्तके रूपमें उत्पन्न हुआ। लम्बने प्रलम्बासुरके रूपमें जन्म लिया तथा खर धेनुकासुर हुआ ॥ ४४ ॥
वाराहश्च किशोरश्च दैत्यौ परमदारुणौ ।<br>मल्लौ तावेव सञ्जातौ ख्यातौ चाणूरमुष्टिकौ ॥ ४५अत्यन्त भयंकर वाराह और किशोर नामक दोनों दैत्य चाणूर और मुष्टिक नामक पहलवानोंके रूपमें प्रख्यात हुए ॥ ४५ ॥
५१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २३

| दितिपुत्रस्तथारिष्टो गजः कुवलयाभिधः।<br>बलिपुत्री बकी ख्याता बकस्तदनुजः स्मृतः॥ ४६ | दितिका पुत्र अरिष्टासुर कुवलयापीड नामक हाथी हुआ। बलिकी पुत्री पूतना (बकी) राक्षसी बनी और उसका छोटा भाई बकासुर कहलाया॥ ४६॥ | | यमो रुद्रस्तथा कामः क्रोधश्चैव चतुर्थकः।<br>तेषामंशैस्तु सञ्जातो द्रोणपुत्रो महाबलः॥ ४७ | द्रोणपुत्र महाबली अश्वत्थामा यम, रुद्र, काम और क्रोध—इन चारोंके अंशसे उत्पन्न हुआ था॥ ४७॥ | | अंशावतरणे पूर्वं दैतेया राक्षसास्तथा।<br>जाताः सर्वे सुरांशास्ते क्षितिभारावतारणे॥ ४८ | पूर्वकालमें अंशावतारके समय जो दैत्य तथा राक्षस उत्पन्न हुए थे, पृथ्वीपरसे उनका भार उतारनेके लिये सभी देवता अपने-अपने अंशसे उत्पन्न हुए॥ ४८॥ | | एतेषां कथितं राजन्नंशावतरणं नृप।<br>सुराणां चासुराणां च पुराणेषु प्रकीर्तितम्॥ ४९ | हे राजन्! पुराणोंमें इन देवताओं तथा असुरोंके अंशावतारोंका जो वर्णन किया गया है, वह सब मैंने आपसे कह दिया॥ ४९॥ | | यदा ब्रह्मादयो देवाः प्रार्थनार्थं हरिं गताः।<br>हरिणा च तदा दत्तौ केशौ खलु सितासितौ॥ ५० | जब ब्रह्मा आदि देवता प्रार्थना करनेके लिये भगवान् विष्णुके पास गये थे तब विष्णुजीने उन्हें श्वेत तथा श्याम वर्णवाले दो केश प्रदान किये थे॥ ५०॥ | | श्यामवर्णस्ततः कृष्णः श्वेतः सङ्कर्षणस्तथा।<br>भारावतारणार्थं तौ जातौ देवांशसम्भवौ॥ ५१ | तदनन्तर पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवान् कृष्ण श्यामवर्ण विष्णुका अंश लेकर तथा बलरामजी श्वेतवर्ण शेषनागका अंश लेकर अवतरित हुए॥ ५१॥ | | अंशावतरणं चैतच्छृणोति भक्तिभावतः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो मोदते स्वजनैर्वृतः॥ ५२ | जो प्राणी भक्ति-भावनासे इस अंशावतारकी कथाका श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर अपने बन्धु-बान्धवोंके सहित आनन्दित रहता है॥ ५२॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवदानवानामंशावतरणवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥


अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

कंसके कारागारमें भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, वसुदेवजीका उन्हें गोकुल पहुँचाना और वहाँसे योगमायास्वरूपा कन्याको लेकर आना, कंसद्वारा कन्याके वधका प्रयास, योगमायाद्वारा आकाशवाणी करनेपर कंसका अपने सेवकोंद्वारा नवजात शिशुओंका वध कराना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
हतेषु षट्सु पुत्रेषु देवक्या औग्रसेनिना।<br>सप्तमे पतिते गर्भे वचनान्नारदस्य च॥ १<br><br>अष्टमस्य च गर्भस्य रक्षणार्थमतन्द्रितः।<br>प्रयत्नमकरोद्राजा मरणं स्वं विचिन्तयन्॥ २[हे राजन्!] उग्रसेनपुत्र कंसके द्वारा देवकीके छहः पुत्रोंका वध कर दिये जानेपर तथा सातवाँ गर्भ गिर जानेके पश्चात् वह राजा कंस नारदजीके कथनानुसार अपनी मृत्युके सम्बन्धमें भलीभाँति विचार करते हुए सावधानीपूर्वक आठवें गर्भको [गिरनेसे] बचानेका प्रयत्न करने लगा॥ १-२॥
अ० २३ ]चतुर्थ स्कन्ध५१३
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
समये देवकीगर्भे प्रवेशमकरोद्धरिः ।<br>अंशेन वसुदेवे तु समागत्य यथाक्रमम् ॥ ३उचित समय आनेपर भगवान् श्रीहरि अपने अंशके साथ वसुदेवमें प्रविष्ट होकर देवकीके गर्भमें विराजमान हो गये ॥ ३ ॥
तदेयं योगमाया च यशोदायां यथेच्छया ।<br>प्रवेशमकरोद्देवी देवकार्यार्थसिद्धये ॥ ४उसी समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे भगवती योगमायाने अपनी इच्छासे यशोदाके गर्भमें प्रवेश किया ॥ ४ ॥
रोहिण्यास्तनयो रामो गोकुले समजायत ।<br>यतः कंसभयोद्विग्ना संस्थिता सा च कामिनी ॥ ५कंसके भयसे उद्विग्न होकर गोकुलमें कालक्षेप कर रही वसुदेव-भार्या रोहिणीके गर्भसे पुत्ररूपमें बलरामजी प्रकट हो चुके थे ॥ ५ ॥
कारागारे ततः कंसो देवकीं देवसंस्तुताम् ।<br>स्थापयामास रक्षार्थं सेवकान्समकल्पयत् ॥ ६तदनन्तर कंसने देववन्दिता देवकीको कारागारमें बन्द कर दिया और उनकी रखवालीके लिये बहुतसे सेवक नियुक्त कर दिये ॥ ६ ॥
वसुदेवस्तु कामिन्याः प्रेमतन्तुनियन्त्रितः ।<br>पुत्रोत्पत्तिं च सञ्चिन्त्य प्रविष्टः सह भार्यया ॥ ७अपनी पत्नी देवकीके पुत्र-प्रसवकी बातको ध्यानमें रखते हुए तथा उनके प्रेमपाशमें आबद्ध रहनेके कारण वसुदेवजी भी उनके साथ कारागारमें ही रहने लगे ॥ ७ ॥
देवकीगर्भगो विष्णुर्देवकार्यार्थसिद्धये ।<br>संस्तुतोऽमरसङ्घैश्च व्यवर्धत यथाक्रमम् ॥ ८देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये देवकीके गर्भमें विराजमान भगवान् विष्णु देवसमुदायद्वारा स्तूयमान होते हुए धीरे-धीरे वृद्धिको प्राप्त होने लगे ॥ ८ ॥
सञ्जाते दशमे तत्र मासेऽथ श्रावणे शुभे ।<br>प्राजापत्यर्क्षसंयुक्ते कृष्णपक्षेऽष्टमीदिने ॥ ९<br>कंसस्तु दानवान्सर्वानुवाच भयविह्वलः ।<br>रक्षणीया भवद्भिश्च देवकी गर्भमन्दिरे ॥ १०श्रावणमासमें दसवाँ महीना पूर्ण हो जानेपर (भाद्रपद-मासके) कृष्णपक्षमें रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ अष्टमी तिथिके उपस्थित होनेपर भयसे व्याकुल कंसने सभी दानवोंसे कहा कि आपलोग इस समय गर्भकक्षमें विद्यमान देवकीकी रखवाली करें ॥ ९-१० ॥
अष्टमो देवकीगर्भः शत्रुर्मे प्रभविष्यति ।<br>रक्षणीयः प्रयत्नेन मृत्युरूपः स बालकः ॥ ११देवकीके आठवें गर्भसे उत्पन्न बालक मेरा शत्रु होगा। अतएव आपलोगोंको मेरे कालरूप उस बालककी यत्नपूर्वक रखवाली करनी चाहिये ॥ ११ ॥
हत्वैनं बालकं दैत्याः सुखं स्वप्स्यामि मन्दिरे ।<br>निवृत्तिवर्जिते दुःखे नाशिते चाष्टमे सुते ॥ १२हे दैत्यो ! इस समय मैं अत्यन्त उद्वेगकारी तथा दुःखदायी आठवें गर्भसे उत्पन्न होनेवाले इस बालकका वध कर लेनेके बाद ही अपने महलमें सुखपूर्वक सो सकूँगा ॥ १२ ॥
खड्गप्रासधराः सर्वे तिष्ठन्तु धृतकार्मुकाः ।<br>निद्रातन्द्राविहीनाश्च सर्वत्र निहितेक्षणाः ॥ १३आप सभी लोग अपने हाथोंमें तलवार, भाला और धनुष धारण करके निद्रा तथा आलस्यसे रहित होकर चारों ओर दृष्टि रखियेगा ॥ १३ ॥
व्यास उवाच<br>इत्यादिश्यासुरगणान् कृशोऽतिभयविह्वलः ।<br>मन्दिरं स्वं जगामाशु न लेभे दानवः सुखम् ॥ १४**व्यासजी बोले—**उन दैत्योंको यह आज्ञा देकर भयाकुल तथा [चिन्ताके कारण] अति दुर्बल दानव कंस तत्काल अपने महलमें चला गया, किंतु वहाँ भी वह सुखकी नींद नहीं सो पा रहा था ॥ १४ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 A

५१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

५१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

| निशीथे देवकी तत्र वसुदेवमुवाच ह।<br>किं करोमि महाराज प्रसवावसरो मम॥ १५<br><br>बहवो रक्षपालाश्च तिष्ठन्त्यत्र भयानकाः।<br>नन्दपत्न्या मया सार्धं कृतोऽस्ति समयः पुरा॥ १६<br><br>प्रेषितव्यस्त्वया पुत्रो मन्दिरे मम मानिनि।<br>पालयिष्याम्यहं तत्र तवातिमनसा किल॥ १७<br><br>अपत्यं ते प्रदास्यामि कंसस्य प्रत्ययाय वै।<br>किं कर्तव्यं प्रभो चात्र विषमे समुपस्थिते॥ १८<br><br>व्यत्ययः सन्ततेः शौरे कथं कर्तुं क्षमो भवेः।<br>दूरे तिष्ठस्व कान्ताद्य लज्जा मेऽतिदुरत्यया॥ १९<br><br>परावृत्य मुखं स्वामिन्नन्यथा किं करोम्यहम्।<br>इत्युक्त्वा तं महाभागं देवकी देवसम्मतम्॥ २० | तत्पश्चात् मध्यरात्रिमें देवकीने वसुदेवजीसे कहा—महाराज! मेरे प्रसवका समय आ गया है, अब मैं क्या करूँ ? ॥ १५ ॥<br><br>यहाँपर बहुतसे भयंकर रक्षक नियुक्त हैं। यहाँ आनेके पूर्व नन्दकी पत्नी यशोदासे मेरी यह बात निश्चित हुई थी। [उन्होंने कहा था—] ‘हे मानिनि ! तुम अपने पुत्रको मेरे घर भेज देना, मैं मन लगाकर तुम्हारे पुत्रका पालन-पोषण करूँगी। कंसको विश्वास दिलानेके लिये मैं तुम्हें इसके बदले अपनी सन्तान दे दूँगी।' अतः हे प्रभो ! इस विषम परिस्थितिमें अब हमें क्या करना चाहिये ? हे शूरतनय ! आप इन दोनों सन्तानोंकी अदला-बदली करनेमें कैसे समर्थ हो सकेंगे? हे कान्त ! आप अपना मुख फेरकर मुझसे दूर होकर बैठिये; क्योंकि दुस्तर लज्जाके कारण मैं संकोचमें पड़ रही हूँ। हे स्वामिन् ! इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ विशेष कर ही क्या सकती हूँ॥ १६—१९ १/२ ॥ | | बालकं सुषुवे तत्र निशीथे परमाद्भुतम्।<br>तं दृष्ट्वा विस्मयं प्राप देवकी बालकं शुभम् ॥ २१ | देवतुल्य महाभाग वसुदेवसे ऐसा कहकर देवकीने उसी अर्धरात्रिकी शुभ वेलामें एक परम अद्भुत बालकको जन्म दिया। उस सुन्दर बालकको देखकर देवकीको महान् आश्चर्य हुआ॥ २०—२१॥ | | पतिं प्राह महाभागा हर्षोत्फुल्लकलेवरा।<br>पश्य पुत्रमुखं कान्त दुर्लभं हि तव प्रभो॥ २२<br><br>अद्यैनं कालरूपोऽसौ घातयिष्यति भ्रातृजः।<br>वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा तमादाय करे सुतम्॥ २३<br><br>अपश्यच्चाननं तस्य सुतस्याद्भुतकर्मणः।<br>वीक्ष्य पुत्रमुखं शौरिश्चिन्ताविष्टो बभूव ह ॥ २४ | [पुत्रप्राप्तिके कारण] हर्षातिरेकसे प्रफुल्लित अंग-प्रत्यंगोंवाली महाभागा देवकीने पतिसे कहा— हे कान्त ! अपने पुत्रका मुख तो देख लीजिये; क्योंकि हे प्रभो ! इसका दर्शन आपके लिये फिर सर्वथा दुर्लभ हो जायगा। कालरूपी मेरा भाई कंस आज ही इसका वध कर डालेगा। तब 'ठीक है'—ऐसा कहकर वसुदेवजी उस पुत्रको अपने हाथोंमें लेकर अद्भुत कर्मशाली अपने उस पुत्रका मुख निहारने लगे। तत्पश्चात् अपने पुत्रका मुख देखकर वसुदेवजी इस चिन्तासे आकुल हो गये कि मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे इस बालकके लिये मुझे विषाद न हो ॥ २२—२४ १/२ ॥ | | किं करोमि कथं न स्याद्दुःखमस्य कृते मम।<br>एवं चिन्तातुरे तस्मिन्वागुवाचाशरीरिणी ॥ २५<br><br>वसुदेवं समाभाष्य गगने विशदाक्षरा।<br>वसुदेव गृहीत्वैनं गोकुलं नय सत्वरः ॥ २६<br><br>रक्षपालास्तथा सर्वे मया निद्राविमोहिताः।<br>विवृतानि कृतान्यष्ट कपाटानि च शृङ्खलाः ॥ २७<br>मुक्त्वैनं नन्दगेहे त्वं योगमायां समानय। | वसुदेवजीके इस प्रकार चिन्तामग्न होनेपर उन्हें सम्बोधित करके आकाशमें स्पष्ट शब्दोंमें आकाश-वाणी हुई—हे वसुदेव ! तुम इस बालकको लेकर तत्काल गोकुल पहुँचा दो। सभी रक्षकगण मेरे द्वारा निद्रासे अचेत कर दिये गये हैं, आठों फाटकोंको खोल दिया गया है तथा जंजीरें तोड़ दी गयी हैं। इस बालकको नन्दके घर छोड़कर वहाँसे तुम योगमायाको उठा लाओ ॥ २५—२७ १/२ ॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 17 B

अ० २३ ] चतुर्थ स्कन्ध ५१५

संस्कृतहिन्दी
श्रुत्वैवं वसुदेवस्तु तस्मिन्कारागृहे गतः ॥ २८<br>विवृतं द्वारमालोक्य बभूव तरसा नृप ।<br>तमादाय ययावाशु द्वारपालैरलक्षितः ॥ २९यह वाणी सुनकर उस कारागृहमें निरुद्ध वसुदेवजी बाहरकी ओर गये। हे राजन्! इस प्रकार वसुदेवजी फाटकोंको खुला हुआ देखकर बड़ी शीघ्रतापूर्वक उस बालकको लेकर द्वारपालोंकी दृष्टिसे बचते हुए तत्काल कारागारसे निकल पड़े॥ २८-२९॥
कालिन्दीतटमासाद्य पूरं दृष्ट्वा सुनिश्चितम् ।<br>तदैव कटिदघ्नी सा बभूवाशु सरिद्वरा ॥ ३०यमुनाके किनारे पहुँचकर उन्होंने देखा कि इस पारसे उस पार अगाध जल आप्लावित हो रहा है। उनका गोकुल जाना भी सुनिश्चित था। उनके जलमें उतरते ही नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाजीमें कमरभर पानी हो गया॥ ३०॥
योगमायाप्रभावेण ततारानकदुन्दुभिः ।<br>गत्वा तु गोकुलं शौरिर्निशीथे निर्जने पथि ॥ ३१<br>नन्दद्वारे स्थितः पश्यन्विभूतिं पशुसंज्ञिताम् ।योगमायाके प्रभावसे वसुदेवजीने सहजतापूर्वक यमुनाजीको पार कर लिया और वे उस आधी रातमें सुनसान मार्गपर चलते हुए गोकुलमें पहुँचकर नन्दके द्वारपर विपुल गौ-सम्पदा देखते हुए वहाँ स्थित हो गये॥ ३१ १/२॥
तदैव तत्र सञ्जाता यशोदा गर्भसम्भवा ॥ ३२<br>योगमायांशजा देवी त्रिगुणा दिव्यरूपिणी ।<br>जातां तां बालिकां दिव्यां गृहीत्वा करपङ्कजे ॥ ३३<br>तत्रागत्य ददौ देवी सैरन्ध्रीरूपधारिणी ।<br>वसुदेवः सुतं दत्त्वा सैरन्ध्रीकरपङ्कजे ॥ ३४<br>तामादाय ययौ शीघ्रं बालिकां मुदिताशयः ।उसी समय योगमायाके अंशसे जायमान दिव्यरूपमयी त्रिगुणात्मिका भगवतीने यशोदाके गर्भसे अवतार लिया था। तदनन्तर सैरन्ध्रीका रूप धारण करके स्वयं भगवतीने उत्पन्न उस अलौकिक बालिकाको अपने करकमलमें ग्रहण करके वहाँ जाकर वसुदेवजीको दे दिया। वसुदेवजी भी अपने पुत्रको देवीरूपा सैरन्ध्रीके करकमलमें रखकर योगमायास्वरूपा उस बालिकाको लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे तत्काल चल पड़े॥ ३२—३४ १/२॥
कारागारे ततो गत्वा देवक्याः शयने सुताम् ॥ ३५<br>निःक्षिप्य संस्थितः पार्श्वे चिन्ताविष्टो भयातुरः ।कारागारमें पहुँचकर उन्होंने देवकीकी शय्यापर बालिकाको लिटा दिया और भय तथा चिन्तासे युक्त होकर वे पासहीमें एक ओर जाकर बैठ गये॥ ३५ १/२॥
रुरोद सुस्वरं कन्या तदैवागतसंज्ञकाः ॥ ३६<br>उत्तस्थुः सेवका राज्ञः श्रुत्वा तद्रुदितं निशि ।<br>तमूचुर्भूपतिं गत्वा त्वरितास्तेऽतिविह्वलाः ॥ ३७<br>देवक्याश्च सुतो जातः शीघ्रमेहि महामते ।इतनेमें कन्याने उच्च स्वरमें रोना आरम्भ किया। तब प्रसवकालको सूचित करनेके लिये नियुक्त कंसके सेवकगण रातमें रोनेकी वह ध्वनि सुनकर जाग पड़े। आनन्दसे विह्वल वे सेवक तत्काल उसी समय जाकर राजासे बोले—हे महामते! देवकीका पुत्र उत्पन्न हो गया, आप शीघ्र चलिये॥ ३६-३७ १/२॥
तदाकर्ण्य वचस्तेषां शीघ्रं भोजपतिर्ययौ ॥ ३८<br>प्रावृतं द्वारमालोक्य वसुदेवमथाह्वयत् ।उनका यह वचन सुनते ही भोजपति कंस तत्काल जा पहुँचा और वहाँपर दरवाजा खुला हुआ देखकर कंसने वसुदेवजीको बुलवाया॥ ३८ १/२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 C

५१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

५१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
कंस उवाच<br>सुतमानय देवक्या वसुदेव महामते॥ ३९<br>मृत्युर्मे चाष्टमो गर्भस्तन्निहन्मि रिपुं हरिम्।कंस बोला—हे महामतिसम्पन्न वसुदेव! देवकीके पुत्रको यहाँ ले आओ। देवकीका आठवाँ गर्भ मेरी मृत्यु है, अतः मैं उस विष्णुरूप अपने शत्रु का वध करूँगा॥ ३९ १/२॥
व्यास उवाच<br>श्रुत्वा कंसवचः शौरिर्भयत्रस्तविलोचनः॥ ४०<br>तामादाय सुतां पाणौ ददौ चाशु रुदन्निव।<br>दृष्ट्वाथ दारिकां राजा विस्मयं परमं गतः॥ ४१व्यासजी बोले—कंसका वचन सुनकर भयसे सन्त्रस्त नयनोंवाले वसुदेवजीने शीघ्र ही उस कन्याको ले जाकर कंसके हाथोंमें रोते हुए रख दिया। उस बालिकाको देखकर राजा कंस बड़ा विस्मित हुआ॥ ४०-४१॥
देववाणी वृथा जाता नारदस्य च भाषितम्।<br>वसुदेवः कथं कुर्यादनृतं सङ्कटे स्थितः॥ ४२<br>रक्षपालाश्च मे सर्वे सावधाना न संशयः।<br>कुतोऽत्र कन्यका कामं क्व गतः स सुतः किल॥ ४३<br>सन्देहोऽत्र न कर्तव्यः कालस्य विषमा गतिः।आकाशवाणी तथा नारदजीका वचन—दोनों ही मिथ्या सिद्ध हुए और यहाँ संकटकी स्थितिमें पड़ा हुआ यह वसुदेव भी झूठी बात भला कैसे बना सकता है? मेरे सभी रक्षक भी सावधान थे; इसमें कोई सन्देह नहीं है। तब यह बालिका कहाँसे आ गयी और वह बालक कहाँ चला गया? कालकी बड़ी विषम गति होती है, अतएव इसके सम्बन्धमें अब किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ४२-४३ १/२॥
इति सञ्चिन्त्य तां बालां गृहीत्वा पादयोः खलः॥ ४४<br>पोथयामास पाषाणे निर्घृणः कुलपांसनः।<br>सा करान्निःसृता बाला ययावाकाशमण्डलम्॥ ४५<br>दिव्यरूपा तदा भूत्वा तमुवाच मृदुस्वना।<br>किं मया हतया पाप जातस्ते बलवान् रिपुः॥ ४६<br>हनिष्यति दुराराध्यः सर्वथा त्वां नराधमम्।<br>इत्युक्त्वा सा गता कन्या गगनं कामगा शिवा॥ ४७ऐसा सोचकर उस दुष्ट, निर्मम तथा कुलकलंकी कंसने बालिकाके दोनों पैर पकड़कर पत्थरपर पटका। किंतु वह कन्या कंसके हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी। वहाँ दिव्य रूप धारण करके उस कन्याने मधुर स्वरमें उससे कहा—'अरे पापी! मुझे मारनेसे तुम्हारा क्या लाभ होगा; तेरा महाबलशाली शत्रु तो जन्म ले चुका है। वे दुराराध्य परमपुरुष तुझ नराधमका वध अवश्य करेंगे।' ऐसा कहकर स्वेच्छा-विहारिणी तथा कल्याणकारिणी भगवतीस्वरूपा वह कन्या आकाशमें चली गयी॥ ४४—४७॥
कंसस्तु विस्मयाविष्टो गतो निजगृहं तदा।<br>आनाय्य दानवान्सर्वानिदं वचनमब्रवीत्॥ ४८यह सुनकर आश्चर्यसे युक्त कंस अपने महलके लिये प्रस्थान कर गया। वहाँ बकासुर, धेनुकासुर तथा वत्सासुर आदि दानवोंको बुलवाकर अत्यन्त कुपित तथा भयाक्रान्त कंसने उनसे कहा—हे दानवो! मेरा कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम सभी यहाँसे अभी प्रस्थान करो और जहाँ कहीं भी तुमलोगोंको नवजात शिशु मिलें, उन्हें अवश्य मार डालना। बालघातिनी यह पूतना अभी नन्दराजके गोकुलमें चली जाय। वहाँ सद्यःप्रसूत जितने बालक मिलें, उन्हें यह पूतना मेरी आज्ञासे मार डाले। धेनुक, वत्सक, केशी, प्रलम्ब और बक—ये समस्त असुर मेरा कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ निरन्तर विद्यमान रहें॥ ४८—५१ १/२॥
बकधेनुकवत्सादीन्क्रोधाविष्टो भयातुरः।<br>गच्छन्तु दानवाः सर्वे मम कार्यार्थसिद्धये॥ ४९<br>जातमात्राश्च हन्तव्या बालका यत्र कुत्रचित्।<br>पूतनैषा व्रजत्वद्य बालघ्नी नन्दगोकुलम्॥ ५०<br>जातमात्रान्विनिघ्नन्ती शिशूंस्तत्र ममाज्ञया।<br>धेनुको वत्सकः केशी प्रलम्बो बक एव च॥ ५१<br>सर्वे तिष्ठन्तु तत्रैव मम कार्यचिकीर्षया।

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 D

अ० २४ ] चतुर्थ स्कन्ध ५१७

इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसो ययौ निजगृहं खलः॥ ५२<br><br>चिन्ताविष्टोऽतिदीनात्मा चिन्तयित्वैव तं पुनः॥ ५३इस प्रकार सभी दैत्योंको आदेश देकर वह दुष्ट कंस अपने भवनमें चला गया। अपने शत्रुरूप उस बालकके विषयमें बार-बार सोचकर वह अत्यन्त चिन्तातुर तथा खिन्नमनस्क हो गया॥ ५२-५३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कंसं प्रति योगमायावाक्यं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥


अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णावतारकी संक्षिप्त कथा, कृष्णपुत्रका प्रसूतिगृहसे हरण, कृष्णद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवती चण्डिकाद्वारा सोलह वर्षके बाद पुनः पुत्रप्राप्तिका वर देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
प्रातर्नन्दगृहे जातः पुत्रजन्ममहोत्सवः।<br>किंवदन्त्यथ कंसेन श्रुता चारमुखादपि॥ १[हे राजन्!] प्रातःकाल नन्दजीके घरमें पुत्रजन्मका बड़ा भारी समारोह सम्पन्न हुआ, यह बात चारों ओर फैल गयी और कंसने भी किसी दूतके मुखसे यह सुन लिया॥ १॥
जानाति वसुदेवस्य दारास्तत्र वसन्ति हि।<br>पशवो दासवर्गश्च सर्वे ते नन्दगोकुले॥ २<br><br>तेन शङ्कासमाविष्टो गोकुलं प्रति भारत।<br>नारदेनापि तत्सर्वं कथितं कारणं पुरा॥ ३<br><br>गोकुले ये च नन्दाद्यास्तत्पत्न्यश्च सुरांशजाः।<br>देवकीवसुदेवाद्याः सर्वे ते शत्रवः किल॥ ४कंस यह पहलेसे ही जानता था कि वसुदेवकी अन्य भार्या, पशु तथा सेवकगण—सब-के-सब गोकुलमें नन्दके यहाँ रह रहे हैं। हे भारत! इस कारणसे गोकुलके प्रति कंसका सन्देह और बढ़ गया। नारदजीने भी सभी कारण पहले ही बता दिये थे। उन्होंने कह दिया था कि गोकुलमें नन्द आदि गोप, उनकी पत्नियाँ, देवकी तथा वसुदेव आदि जो भी लोग हैं, वे सब देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; इसलिये वे निश्चितरूपसे तुम्हारे शत्रु हैं॥ २—४॥
इति नारदवाक्येन बोधितोऽसौ कुलाधमः।<br>जातः कोपमना राजन् कंसः परमपापकृत्॥ ५हे राजन्! देवर्षि नारदने जब यह बात बतायी थी तो बड़े-से-बड़े पापकर्मोंमें प्रवृत्त रहनेवाला वह कुलकलंकी कंस अत्यधिक कुपित हो गया था॥ ५॥
पूतना निहता तत्र कृष्णेनामिततेजसा।<br>बको वत्सासुरश्चापि धेनुकश्च महाबलः॥ ६<br><br>प्रलम्बो निहतस्तेन तथा गोवर्धनो धृतः।<br>श्रुत्वैतत्कर्म कंसस्तु मेने मरणमात्मनः॥ ७अपरिमित तेजवाले श्रीकृष्णने पूतना, बकासुर, वत्सासुर, महाबली धेनुकासुर तथा प्रलम्बासुरको मार डाला और गोवर्धनपर्वतको उठा लिया—इस अद्भुत कर्मको सुनकर कंसने यह अनुमान लगा लिया कि मेरा भी मरण अब सुनिश्चित है॥ ६-७॥
तथा विनिहतः केशी ज्ञात्वा कंसोऽतिदुर्मनाः।<br>धनुर्यागमिषेणाशु तावानेतुं प्रचक्रमे॥ ८[महान् बलशाली] केशी भी मार डाला गया—यह जानकर कंस अत्यधिक खिन्नमनस्क हो गया, तब उसने धनुष-यज्ञके बहाने [कृष्ण तथा बलराम] दोनोंको शीघ्र ही मथुरामें बुलानेकी योजना बनायी॥ ८॥
५१८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २४

| अक्रूरं प्रेषयामास क्रूरः पापमतिस्तदा।<br>आनेतुं रामकृष्णौ च वधायामितविक्रमौ ॥ ९ | निर्दयी तथा पापबुद्धि कंसने असीम पराक्रमी श्रीकृष्ण तथा बलरामका वध करनेके उद्देश्यसे उन्हें बुलानेके लिये अक्रूरको भेजा ॥ ९ ॥ | | रथमारोप्य गोपालौ गोकुलाद् गान्दिनीसुतः।<br>आगतो मथुरायां तु कंसादेशे स्थितः किल॥ १० | तदनन्तर कंसका आदेश मानकर गान्दिनीपुत्र अक्रूर गोकुल गये और दोनों गोपालों—श्रीकृष्ण तथा बलरामको रथपर बैठाकर गोकुलसे मथुरा लौट आये ॥ १० ॥ | | तावागत्य तदा तत्र धनुर्भङ्गञ्च चक्रतुः।<br>हत्वाथ रजकं कामं गजं चाणूरमुष्टिकम् ॥ ११<br><br>शलं च तोशलं चैव निजघान हरिस्तदा।<br>जघान कंसं देवेशः केशेष्वाकृष्य लीलया ॥ १२ | वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण तथा बलरामने धनुषको तोड़ा। पुनः रजक, कुवलयापीड हाथी, चाणूर और मुष्टिकका संहार करके भगवान् श्रीकृष्णने शल तथा तोशलका वध किया। तत्पश्चात् देवेश श्रीकृष्णने कंसके बाल पकड़कर लीलापूर्वक उसको भी मार डाला॥ ११-१२॥ | | पितरौ मोचयित्वाथ गतदुःखौ चकार ह।<br>उग्रसेनाय राज्यं तद्ददावरिनिषूदनः ॥ १३ | तदनन्तर शत्रुविनाशक श्रीकृष्णने अपने माता-पिताको कारागारसे मुक्त कराकर उनका कष्ट दूर किया और उग्रसेनको उनका राज्य वापस दिला दिया ॥ १३॥ | | वसुदेवस्तयोस्तत्र मौञ्जीबन्धनपूर्वकम्।<br>कारयामास विधिवद् व्रतबन्धं महामनाः ॥ १४ | तदनन्तर महामना वसुदेवने उन दोनोंका मौंजी-बन्धन तथा उपनयन-संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न करवाया ॥ १४ ॥ | | उपनीतौ तदा तौ तु गतौ सान्दीपिनालयम्।<br>विद्याः सर्वाः समभ्यस्य मथुरामागतौ पुनः॥ १५ | उपनयन-संस्कार हो जानेके पश्चात् वे दोनों सान्दीपनिऋषिके आश्रममें विद्याध्ययनके लिये गये और समस्त विद्याओंका अध्ययन करके पुनः मथुरा लौट आये ॥ १५ ॥ | | जातौ द्वादशवर्षीयौ कृतविद्यौ महाबलौ।<br>मथुरायां स्थितौ वीरौ सुतावानकदुन्दुभेः ॥ १६ | आनकदुन्दुभि (वसुदेवजी)-के पुत्र कृष्ण और बलराम बारह वर्षकी अवस्थामें ही सम्पूर्ण विद्याओंमें निष्णात तथा महान् बलशाली होकर मथुरामें ही निवास करने लगे॥ १६॥ | | मागधस्तु जरासन्धो जामातृवधदुःखितः।<br>कृत्वा सैन्यसमाजं स मथुरामागतः पुरीम् ॥ १७ | उधर अपने जामाता कंसके वधसे मगधनरेश जरासन्ध अत्यन्त दुःखित हुआ और उसने विशाल सेना संगठितकर मथुरापुरीपर आक्रमण कर दिया ॥ १७॥ | | स सप्तदशवारं तु कृष्णेन कृतबुद्धिना।<br>जितः संग्राममासाद्य मधुपुर्यां निवासिना ॥ १८ | किंतु मधुपुरी (मथुरा)-में निवास करनेवाले बुद्धिमान् श्रीकृष्णने समरांगणमें उपस्थित होकर सत्रह बार उसे पराजित किया ॥ १८ ॥ | | पश्चाच्च प्रेरितस्तेन स कालयवनाभिधः।<br>सर्वम्लेच्छाधिपः शूरो यादवानां भयङ्करः ॥ १९ | इसके बाद जरासन्धने यादव-समुदायके लिये भयदायक तथा सम्पूर्ण म्लेच्छोंके अधिपति कालयवन नामक योद्धाको श्रीकृष्णका सामना करनेके लिये प्रेरित किया ॥ १९॥ |