भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 515
५०६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लोका ऊचुः<br>पश्यन्तु वसुदेवं भो लोका एवं मनस्विनम्।<br>स्ववाक्यमनुरुध्यैव बालमादाय यात्यसौ॥ ३६<br><br>मृत्युवे दातुकामोऽद्य सत्यवागनसूयकः।<br>सफलं जीवितं चास्य धर्मं पश्यन्तु चाद्भुतम्॥ ३७<br><br>यः पुत्रं याति कंसाय दातुं कालात्मनेऽपि हि।<br>व्यास उवाच<br>इति संस्तूयमानस्तु प्राप्तः कंसालयं नृप॥ ३८<br><br>ददावस्मै कुमारं तं जातमात्रममानुषम्।<br>कंसोऽपि विस्मयं प्राप्तो दृष्ट्वा धैर्यं महात्मनः॥ ३९लोगोंने कहा— हे नागरिको! इस मनस्वी वसुदेवको देखो; इस अबोध बालकको लेकर ये द्वेषरहित एवं सत्यवादी वसुदेव अपने वचनकी रक्षाके लिये आज इसे मृत्युको समर्पित करने जा रहे हैं। इनका जीवन सफल हो गया है। इनके इस अद्भुत धर्मपालनको देखो, जो साक्षात् कालरूप कंसको अपना पुत्र देनेके लिये जा रहे हैं॥ ३६-३७ १/२॥<br><br>व्यासजी बोले— हे राजन्! इस प्रकार लोगोंद्वारा प्रशंसित होते हुए वे वसुदेव कंसके महलमें पहुँच गये और उस दिव्य नवजात शिशुको कंसको अर्पित कर दिया। महात्मा वसुदेवके इस धैर्यको देखकर कंस भी विस्मित हो गया॥ ३८-३९॥
गृहीत्वा बालकं प्राह स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>धन्यस्त्वं शूरपुत्राद्य ज्ञातः पुत्रसमर्पणात्॥ ४०उस बालकको अपने हाथोंमें लेकर कंसने मुसकराते हुए यह वचन कहा—हे शूरसेनतनय! आप धन्य हैं; आज आपके इस पुत्र-समर्पणके कृत्यसे मैंने आपका महत्त्व जान लिया॥ ४०॥
मम मृत्युर्न चायं वै गिरा प्रोक्तस्तु चाष्टमः।<br>न हन्तव्यो मया कामं बालोऽयं यातु ते गृहम्॥ ४१यह बालक मेरी मृत्युका कारण नहीं है; क्योंकि आकाशवाणीके द्वारा देवकीका आठवाँ पुत्र मेरी मृत्युका कारण बताया गया है। अतएव मैं इस बालकका वध नहीं करूँगा, आप इसे अपने घर ले जाइये॥ ४१॥
अष्टमस्तु प्रदातव्यस्त्वया पुत्रो महामते।<br>इत्युक्त्वा वसुदेवाय ददावाशु खलः शिशुम्॥ ४२हे महामते! आप मुझे देवकीका आठवाँ पुत्र दे दीजियेगा। ऐसा कहकर उस दुष्ट कंसने तुरंत वह शिशु वसुदेवको वापस दे दिया॥ ४२॥
गच्छत्वयं गृहे बालः क्षेमं व्याहृतवान्नृपः।<br>तमादाय तदा शौरिर्जगाम स्वगृहं मुदा॥ ४३राजा कंसने कहा कि यह बालक अपने घर जाय और सकुशल रहे। तत्पश्चात् उस बालकको लेकर शूरसेन-पुत्र वसुदेव प्रसन्नतापूर्वक अपने घरकी ओर चल पड़े॥ ४३॥
कंसोऽपि सचिवानाह वृथा किं घातये शिशुम्।<br>अष्टमाद्देवकीपुत्रान्मम मृत्युरुदाहृतः॥ ४४<br><br>अतः किं प्रथमं बालं हत्वा पापं करोम्यहम्।<br>साधु साध्विति तेऽप्युक्त्वा संस्थिता मन्त्रिसत्तमाः॥ ४५<br><br>विसर्जितास्तु कंसेन जग्मुस्ते स्वगृहान्प्रति।<br>गतेषु तेषु सम्प्राप्तो नारदो मुनिसत्तमः॥ ४६इसके बाद कंसने भी अपने मन्त्रियोंसे कहा कि मैं इस शिशुकी व्यर्थ ही हत्या क्यों करता; क्योंकि मेरी मृत्यु तो देवकीके आठवें पुत्रसे कही गयी है, अतः देवकीके प्रथम शिशुका वध करके मैं पाप क्यों करूँ? तब वहाँ विद्यमान श्रेष्ठ मन्त्रिगण ‘साधु, साधु’—ऐसा कहकर और कंससे आज्ञा पाकर अपने-अपने घर चले गये। उनके चले जानेपर मुनिश्रेष्ठ नारदजी वहाँ आ गये॥ ४४—४६॥