भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० २१ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०५


भोगान्ते च यदोत्पत्तेः समयस्तस्य जायते ॥ २४ <br><br> लिङ्गदेहेन सहितं जायते जीवसंज्ञितम्। <br> तदैव सञ्चितेभ्यश्च कर्मभ्यः कर्मभिः पुनः ॥ २५ <br><br> योजयत्येव तं कालं कर्माणि प्राक्कृतानि च। <br> देहेनानेन भाव्यानि शुभानि चाशुभानि च ॥ २६ <br><br> प्रारब्धानि च जीवेन भोक्तव्यानि सुलोचने। <br> प्रायश्चित्तेन नश्यन्ति वर्तमानानि भामिनि ॥ २७ <br><br> सञ्चितानि तथैवाशु यथार्थं विहितेन च। <br> प्रारब्धकर्मणां भोगात्संक्षयो नान्यथा भवेत् ॥ २८इस प्रकार भोग पूर्ण हो जानेपर जब पुनः उसके जन्मका समय आता है, तब लिंगदेहके साथ संयोग होनेपर उसकी 'जीव' संज्ञा हो जाती है। उसी समय जीवका संचित कर्मोंसे सम्बन्ध हो जाता है और पुनः लिंगदेहके आविर्भावके समय परमात्मा उन कर्मोंके साथ जीवको जोड़ देते हैं। हे सुलोचने! इसी शरीरके द्वारा जीवको संचित, वर्तमान और प्रारब्ध—इन तीन प्रकारके शुभ अथवा अशुभ कर्म भोगने पड़ते हैं। हे भामिनि! केवल वर्तमान कर्म ही प्रायश्चित्त आदिके द्वारा नष्ट किये जा सकते हैं। इसी प्रकार समुचित शास्त्रोक्त उपायोंद्वारा संचित कर्मोंको भी विनष्ट किया जा सकता है, किंतु प्रारब्ध कर्मोंका क्षय तो भोगसे ही सम्भव है, अन्यथा नहीं॥ २४—२८॥
तेनायं ते कुमारो वै देयः कंसाय सर्वथा। <br> न मिथ्या वचनं मेऽस्ति लोकनिन्दाभिदूषितम् ॥ २९अतएव मुझे तुम्हारे इस पुत्रको हर प्रकारसे कंसको अर्पित कर ही देना चाहिये। ऐसा करनेसे मेरा वचन भी मिथ्या नहीं होगा और लोकनिन्दाका दोष भी मुझे नहीं लगेगा॥ २९॥
अनित्येऽस्मिंस्तु संसारे धर्मसारे महात्मनाम्। <br> दैवाधीनं हि सर्वेषां मरणं जननं तथा ॥ ३० <br><br> तस्माच्छोको न कर्तव्यो देहिना हि निरर्थकः। <br> सत्यं यस्य गतं कान्ते वृथा तस्यैव जीवितम् ॥ ३१इस अनित्य संसारमें महापुरुषोंके लिये धर्म ही एकमात्र सार-तत्त्व है। इस लोकमें प्राणियोंका जन्म तथा मरण दैवके अधीन है। अतएव हे प्रिये! प्राणियोंको व्यर्थ शोक नहीं करना चाहिये। इस संसारमें जिसने सत्य छोड़ दिया उसका जीवन निरर्थक ही है॥ ३०-३१॥
इहलोको गतो यस्मात्परलोकः कुतस्ततः। <br> अतो देहि सुतं सुभ्रु कंसाय प्रददाम्यहम् ॥ ३२जिसका यह लोक बिगड़ गया, उसके लिये परलोक कहाँ? अतः हे सुन्दर भौंहोंवाली! यह बालक मुझे दे दो और मैं इसे कंसको सौंप दूँ॥ ३२॥
सत्यसंस्तरणाद्देवि शुभमग्रे भविष्यति। <br> कर्तव्यं सुकृतं पुम्भिः सुखे दुःखे सति प्रिये ॥ ३३ <br><br> (सत्यसंरक्षणाद्देवि शुभमेव भविष्यति)हे देवि! सत्य-पथका अनुगमन करनेसे आगे कल्याण होगा। हे प्रिये! सुख अथवा दुःख—किसी भी परिस्थितिमें मनुष्योंको सत्कर्म ही करना चाहिये। <br> (हे देवि! सत्यकी भलीभाँति रक्षा करनेसे कल्याण ही होगा)॥ ३३॥
व्यास उवाच <br> इत्युक्तवति कान्ते सा देवकी शोकसंयुता। <br> ददौ पुत्रं प्रसूतं च वेपमाना मनस्विनी ॥ ३४व्यासजी बोले— अपने प्रिय पतिके ऐसा कहनेपर शोक-सन्तप्त तथा काँपती हुई मनस्विनी देवकीने वह नवजात शिशु वसुदेवको दे दिया॥ ३४॥
वसुदेवोऽपि धर्मात्मा आदाय स्वसुतं शिशुम्। <br> जगाम कंससदनं मार्गे लोकैरभिष्टुतः ॥ ३५धर्मात्मा वसुदेव भी अपने पुत्र उस अबोध शिशुको लेकर कंसके महलकी ओर चल पड़े। मार्गमें लोग उनकी प्रशंसा कर रहे थे॥ ३५॥