देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 513, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ | | :--- | :--- |
| तथा कृत्वा नरः पापान्मुच्यते वा न वानघ।<br>विगीतवचनास्ते किं मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ११<br><br>याज्ञवल्क्यादयः सर्वे धर्मशास्त्रप्रवर्तकाः।<br>भवितव्यं भवत्येव यद्येवं निश्चयः प्रभो ॥ १२<br><br>आयुर्वेदः स मिथ्यैव मन्त्रवादास्तथाखिलाः।<br>उद्यमस्तु वृथा सर्वमेवं चेद्दैवनिर्मितम् ॥ १३ | अनुष्ठान करके मनुष्य क्या पापसे मुक्त नहीं हो जाता है? [यदि प्रायश्चित्त-विधानके द्वारा पापसे मुक्ति नहीं मिलती है तो] क्या याज्ञवल्क्य आदि धर्मशास्त्रप्रणेता तत्त्वदर्शी मुनियोंके वचन निरर्थक हो जायँगे? हे स्वामिन्! होनी होकर ही रहती है—यदि यह निश्चित है तब तो सभी आयुर्वेद एवं सभी मन्त्रशास्त्र झूठे सिद्ध हो जायँगे और इस प्रकार भाग्यलेखके समक्ष सभी उद्यम अर्थहीन हो जायँगे॥ ९—१३॥ | | भवितव्यं भवत्येव प्रवृत्तिस्तु निरर्थिका।<br>अग्निष्टोमादिकं व्यर्थं नियतं स्वर्गसाधनम् ॥ १४<br><br>यदा तदा प्रमाणं हि वृथैव परिभाषितम्।<br>वितथे तत्प्रमाणे तु धर्मोच्छेदः कुतो न हि ॥ १५ | ‘जो होना है, वह अवश्य घटित होता है’ यदि [यही सत्य है] तो सत्कर्मोंकी ओर प्रवृत्त होना व्यर्थ हो जायगा और अग्निष्टोम आदि स्वर्गप्राप्तिके शास्त्र-सम्मत साधन भी निरर्थक हो जायँगे। जब वेद-शास्त्रादिके उपदेश ही व्यर्थ हो गये, तब उन प्रमाणोंके झूठा हो जानेपर क्या धर्मका समूल नाश नहीं हो जायगा?॥ १४-१५॥ | | उद्यमे च कृते सिद्धिः प्रत्यक्षेणैव साध्यते।<br>तस्मादत्र प्रकर्तव्यः प्रपञ्चश्चित्तकल्पितः ॥ १६<br><br>यथायं बालकः क्षेमं प्राप्नोति मम पुत्रकः।<br>मिथ्या यदि प्रकर्तव्यं वचनं शुभमिच्छता ॥ १७<br><br>न तत्र दूषणं किञ्चित्प्रवदन्ति मनीषिणः। | उद्यम करनेपर सिद्धिकी प्रत्यक्ष प्राप्ति हो जाती है। अतएव अपने मनमें भलीभाँति सोच करके कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मेरा यह बालक पुत्र बच जाय। किसीके कल्याणकी इच्छासे यदि झूठ बोल दिया जाय तो इसमें किसी प्रकारका दोष नहीं होता है—ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं॥ १६-१७ ½ ॥ | | वसुदेव उवाच<br>निशामय महाभागे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ १८<br><br>उद्यमः खलु कर्तव्यः फलं दैववशानुगम्।<br>त्रिविधानीह कर्माणि संसारेऽत्र पुराविदः ॥ १९<br><br>प्रवदन्तीह जीवानां पुराणेष्ववागमेषु च।<br>सञ्चितानि च जीर्णानि प्रारब्धानि सुमध्यमे ॥ २०<br><br>वर्तमानानि वामोरु त्रिविधानीह देहिनाम्।<br>शुभाशुभानि कर्माणि बीजभूतानि यानि च ॥ २१ | वसुदेव बोले—हे महाभागे! सुनो, मैं तुमसे यह सत्य कह रहा हूँ। मनुष्यको उद्यम करना चाहिये, उसका फल दैवके अधीन रहता है। प्राचीन तत्त्ववेत्ताओंने इस संसारमें प्राणियोंके तीन प्रकारके कर्म पुराणों तथा शास्त्रोंमें बताये हैं। हे सुमध्यमे! संचित, प्रारब्ध और वर्तमान—ये तीन प्रकारके कर्म देहधारियोंके होते हैं। हे सुजघने! प्राणियोंद्वारा सम्पादित जो भी शुभाशुभ कर्म होते हैं, वे बीजका रूप धारण कर लेते हैं और अनेक जन्मोंके उपार्जित वे कर्म समय पाकर फल देनेके लिये उपस्थित हो जाते हैं॥ १८—२१ ½ ॥ | | बहुजन्मसमुत्थानि काले तिष्ठन्ति सर्वथा।<br>पूर्वदेहं परित्यज्य जीवः कर्मवशानुगः ॥ २२<br><br>स्वर्गं वा नरकं वापि प्राप्नोति स्वकृतेन वै।<br>दिव्यं देहञ्च सम्प्राप्य यातनादेहमर्थजम् ॥ २३<br>भुनक्ति विविधान् भोगान्स्वर्गे वा नरकेऽथवा। | जीव अपना पूर्व शरीर छोड़कर अपने द्वारा किये गये कर्मोंके अधीन होकर स्वर्ग अथवा नरकमें जाता है। सुकर्म करनेवाला जीव दिव्य शरीर प्राप्त करके स्वर्गमें नानाविध सुखोंका उपभोग करता है तथा दुष्कर्म करनेवाला विषयभोगजन्य यातना देह प्राप्त करके नरकमें अनेक प्रकारके कष्ट भोगता है॥ २२-२३ ½ ॥ |