देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० २१] चतुर्थ स्कन्ध ५०३
अथैकविंशोऽध्यायः
देवकीके प्रथम पुत्रका जन्म, वसुदेवद्वारा प्रतिज्ञानुसार उसे कंसको अर्पित करना और कंसद्वारा उस नवजात शिशुका वध
| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>अथ काले तु सम्प्राप्ते देवकी देवरूपिणी।<br>गर्भं दधार विधिवद्वसुदेवेन सङ्गता॥ १ | व्यासजी बोले—हे राजन्! इसके बाद समय आनेपर देवस्वरूपिणी देवकीने वसुदेवके संयोगसे विधिवत् गर्भ धारण किया॥ १॥ |
| पूर्णेऽथ दशमे मासे सुषुवे सुतमुत्तमम्।<br>रूपावयवसम्पन्नं देवकी प्रथमं यदा॥ २<br><br>तदाह वसुदेवस्तां सत्यवाक्यानुमोदितः।<br>भावित्वाच्च महाभागो देवकीं देवमातरम्॥ ३ | दसवाँ माह पूर्ण होनेपर जब देवकीने अत्यन्त रूपसम्पन्न तथा सुडौल अंगोंवाले अत्युत्तम प्रथम पुत्रको जन्म दिया तब सत्यप्रतिज्ञासे बँधे हुए महाभाग वसुदेवने होनहारसे विवश होकर देवमाता देवकीसे कहा—॥ २-३॥ |
| वरोरु समयं मे त्वं जानासि स्वसुतार्पणे।<br>मोचिता त्वं महाभागे शपथेन मया तदा॥ ४<br><br>इमं पुत्रं सुकेशान्ते दास्यामि भ्रातृसूनवे।<br>(खले कंसे विनाशार्थं दैवे किं वा करिष्यसि।)<br>विचित्रकर्मणां पाको दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः॥ ५<br><br>सर्वेषां किल जीवानां कालपाशानुवर्तिनाम्।<br>भोक्तव्यं स्वकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम्॥ ६<br><br>प्रारब्धं सर्वथैवात्र जीवस्य विधिनिर्मितम्। | हे सुन्दरि! अपने सभी पुत्र कंसको अर्पित कर देनेकी मेरी प्रतिज्ञाको तुम भलीभाँति जानती हो। हे महाभागे! उस समय इसी प्रतिज्ञाके द्वारा मैंने तुम्हें कंससे मुक्त कराया था। अतएव हे सुन्दर केशोंवाली! मैं यह पुत्र तुम्हारे चचेरे भाई कंसको अर्पित कर दे रहा हूँ। (जब दुष्ट कंस अथवा प्रारब्ध विनाशके लिये उद्यत ही है तो तुम कर ही क्या सकोगी?) अद्भुत कर्मोंका परिणाम आत्मज्ञानसे रहित प्राणियोंके लिये दुर्ज्ञेय होता है। कालके पाशमें बँधे हुए समस्त जीवोंको अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मोंका फल निश्चितरूपसे भोगना ही पड़ता है। प्रत्येक जीवका प्रारब्ध निश्चित-रूपसे विधिके द्वारा ही निर्मित है॥ ४—६ ½ ॥ |
| देवक्युवाच<br>स्वामिन् पूर्वं कृतं कर्म भोक्तव्यं सर्वथा नृभिः॥ ७<br><br>तीर्थैस्तपोभिर्दानैर्वा किं न याति क्षयं हि तत्।<br>लिखितो धर्मशास्त्रेषु प्रायश्चित्तविधिर्नृप॥ ८<br><br>पूर्वार्जितानां पापानां विनाशाय महात्मभिः। | देवकी बोली—हे स्वामिन्! मनुष्योंको अपने पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है; किंतु क्या तीर्थाटन, तपश्चरण एवं दानादिसे वह कर्म-फल नष्ट नहीं हो सकता? हे महाराज! पूर्व अर्जित पापोंके विनाशके लिये महात्माओंने धर्मशास्त्रोंमें तो नानाविध प्रायश्चित्तके विधानका उल्लेख किया है॥ ७—८ ½ ॥ |
| ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः॥ ९<br><br>द्वादशाब्दव्रते चीर्णे शुद्धिं याति यतस्ततः।<br>मन्वादिभिर्यथोद्दिष्टं प्रायश्चित्तं विधानतः॥ १० | ब्रह्महत्या करनेवाला, स्वर्णका हरण करनेवाला, सुरापान करनेवाला तथा गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला महापापी भी बारह वर्षतक व्रतका अनुष्ठान कर लेनेपर शुद्ध हो जाता है। हे अनघ! उसी प्रकार मनु आदिके द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्तका विधानपूर्वक |