भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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५०२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०

| बिभेषि वीरस्त्वं भूत्वा भूतभाषितभाषया।<br>यशोमूलविघातार्थमुपायस्त्वरिणा कृतः॥ ८० | तुम वीर होकर भी आकाशवाणीसे डर रहे हो तुम्हारे यशरूपी वृक्षको उखाड़ फेंकनेके लिये तुम्हारे किसी शत्रुने ही यह चाल चली है॥ ८०॥ | | पितृष्वसा न हन्तव्या विवाहसमये पुनः।<br>भवितव्यं महाराज भवेच्च कथमन्यथा॥ ८१ | जो कुछ भी हो, विवाहके इस अवसरपर तुम्हें बहनकी हत्या तो करनी ही नहीं चाहिये। हे महाराज! होनहार तो होगी ही, उसे कोई कैसे टाल सकता है?॥ ८१॥ | | एवं तैर्बोध्यमानोऽसौ निवृत्तो नाभवद्यदा।<br>तदा तं वसुदेवोऽपि नीतिज्ञः प्रत्यभाषत॥ ८२<br><br>कंस सत्यं ब्रवीम्यद्य सत्याधारं जगत्त्रयम्।<br>दास्यामि देवकीपुत्रानुत्पन्नांस्तव सर्वशः॥ ८३<br><br>जातं जातं सुतं तुभ्यं न दास्यामि यदि प्रभो।<br>कुम्भीपाके तदा घोरे पतन्तु मम पूर्वजाः॥ ८४ | इस प्रकार उन वृद्ध यादवोंके समझानेपर भी जब वह कंस पापकर्मसे विरत नहीं हुआ, तब नीतिज्ञ वसुदेवजीने उससे कहा—हे कंस! तीनों लोक सत्यपर टिके हुए हैं, अतः मैं इस समय तुमसे सत्य बोल रहा हूँ। उत्पन्न होते ही देवकीके सभी पुत्रोंको लाकर मैं आपको दे दूँगा। हे विभो! यदि क्रमसे उत्पन्न होते हुए ही प्रत्येक पुत्र आपको न दे दूँ तो मेरे पूर्वज भयंकर कुम्भीपाक नरकमें गिर पड़ें॥ ८२–८४॥ | | श्रुत्वाथ वचनं सत्यं पौरवा ये पुरःस्थिताः।<br>ऊचुस्ते त्वरिताः कंसं साधु साधु पुनः पुनः॥ ८५<br><br>न मिथ्या भाषते क्वापि वसुदेवो महामनाः।<br>केशं मुञ्च महाभाग स्त्रीहत्या पातकं तथा॥ ८६ | वसुदेवजीका यह सत्य वचन सुनकर वहाँ जो नागरिक सामने खड़े थे, वे कंससे तुरंत बोल उठे—'बहुत ठीक, बहुत ठीक। महात्मा वसुदेव कभी भी झूठ नहीं बोलते। हे महाभाग! अब इस देवकीके केश छोड़ दीजिये; क्योंकि स्त्रीहत्या पाप है'॥ ८५-८६॥ | | व्यास उवाच<br>एवं प्रबोधितः कंसो यदुवृद्धैर्महात्मभिः।<br>क्रोधं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सत्यवाक्यानुमोदितः॥ ८७ | व्यासजी बोले—उन महात्मा वृद्ध यादवोंके इस प्रकार समझानेपर कंसने क्रोध त्यागकर वसुदेवजीके सत्य वचनपर विश्वास कर लिया॥ ८७॥ | | ततो दुन्दुभयो नेदुर्वादित्राणि च सस्वनुः।<br>जयशब्दस्तु सर्वेषामुतपन्नस्तत्र संसदि॥ ८८ | तब दुन्दुभियाँ तथा अन्य बाजे ऊँचे स्वरमें बजने लगे और उस सभामें उपस्थित सभी लोगोंके मुखसे जय-जयकारकी ध्वनि होने लगी॥ ८८॥ | | प्रसाद्य कंसं प्रतिमोच्य देवकीं<br>महाशशाः शूरसुतस्तदानीम्।<br>जगाम गेहं स्वजनानुवृत्तो<br>नवोढया वीतभयस्तरस्वी॥ ८९ | इस प्रकार उस समय महायशस्वी वसुदेवजी कंसको प्रसन्न करके उससे देवकीको छुड़ाकर उस नवविवाहिताके साथ अपने इष्टजनोंसहित निर्भय होकर शीघ्रतापूर्वक घर चले गये॥ ८९॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥