भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 510

| अ० २० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५०१ | | :--- | :--- |

| उपायो नान्यथा चास्मिन्कार्ये मृत्युभयावहे।<br>इयं पितृष्वसा पूज्या कथं हन्मीत्यचिन्तयत्॥ ६७ | इस विषम अवसरपर दूसरा कोई उपाय नहीं है, किंतु यह मेरी पूज्य चचेरी बहन है। अतः इसकी हत्या कैसे करूँ, वह ऐसा सोचने लगा॥ ६५-६७॥ | | पुनर्विचारयामास मरणं मेऽस्त्यहो स्वसा।<br>पापेनापि प्रकर्तव्या देहरक्षा विपश्चिता॥ ६८<br><br>प्रायश्चित्तेन पापस्य शुद्धिर्भवति सर्वदा।<br>प्राणरक्षा प्रकर्तव्या बुधैरप्येनसा तथा॥ ६९ | उसने पुनः सोचा—अरे! यही बहन तो मेरी मृत्युस्वरूपा है। बुद्धिमान् मनुष्यको पापकर्मसे भी अपने शरीरकी रक्षा कर लेनी चाहिये। बादमें प्रायश्चित्त कर लेनेसे उस पापकी शुद्धि हो जाती है। अतः चतुर लोगोंको चाहिये कि पापकर्मसे भी अपने प्राणकी रक्षा कर लें॥ ६८-६९॥ | | विचिन्त्य मनसा कंसः खड्गमादाय सत्वरः।<br>जग्राह तां वरारोहां केशेष्वाकृष्य पापकृत्॥ ७०<br><br>कोशात्खड्गमुपाकृष्य हन्तुकामो दुराशयः।<br>पश्यतां सर्वलोकानां नवोढां तां चकर्ष ह॥ ७१ | मनमें ऐसा सोचकर पापी कंसने बाल खींचकर उस सुन्दरी देवकीको तुरंत पकड़ लिया। तत्पश्चात् म्यानसे तलवार निकालकर उसे मारनेकी इच्छासे बुरे विचारोंवाला कंस सभी लोगोंके सामने ही उस नवविवाहिता देवकीको अपनी ओर खींचने लगा॥ ७०-७१॥ | | हन्यमानाञ्च तां दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत्।<br>वसुदेवानुगा वीरा युद्धायोद्यतकार्मुकाः॥ ७२<br><br>मुञ्च मुञ्चेति प्रोचुस्तं ते तदाद्भुतसाहसाः।<br>कृपया मोचयामासुर्देवकीं देवमातरम्॥ ७३ | उसे मारी जाती देखकर लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया। वसुदेवजीके वीर साथीगण धनुष लेकर युद्धके लिये तैयार हो गये। अद्भुत साहसवाले वे सब कंससे कहने लगे—कृपा करके इसे छोड़ दो, छोड़ दो। वे देवमाता देवकीको कंससे छुड़ाने लगे॥ ७२-७३॥ | | तद्युद्धमभवद् घोरं वीराणाञ्च परस्परम्।<br>वसुदेवसहायानां कंसेन च महात्मना॥ ७४<br><br>वर्तमाने तथा युद्धे दारुणे लोमहर्षणे।<br>कंसं निवारयामासुर्वृद्धा ये यदुसत्तमाः॥ ७५ | तब शक्तिशाली कंसके साथ वसुदेवजीके पराक्रमी सहायकोंका घोर युद्ध होने लगा। उस भीषण लोमहर्षक युद्धके निरन्तर होते रहनेपर जो श्रेष्ठ तथा वृद्ध यदुगण थे, उन्होंने कंसको युद्ध करनेसे रोक दिया॥ ७४-७५॥ | | पितृष्वसेयं ते वीर पूजनीया च बालिशा।<br>न हन्तव्या त्वया वीर विवाहोत्सवसङ्गमे॥ ७६<br><br>स्त्रीहत्या दुःसहा वीर कीर्तिघ्नी पापकृत्तमा।<br>भूतभाषितमात्रेण न कर्तव्या विजानता॥ ७७ | [उन्होंने कंससे कहा—] हे वीर! यह तुम्हारी पूजनीय चचेरी बहन है। इस विवाहोत्सवके शुभ अवसरपर तुम्हें इस अबोध देवकीकी हत्या नहीं करनी चाहिये। हे वीर! स्त्रीहत्या दुःसह कार्य है; यह यशका नाश करनेवाली है और इससे घोर पाप लगता है। केवल आकाशवाणी सुनकर तुम-जैसे बुद्धिमान्‌को बिना सोचे-समझे यह हत्या नहीं करनी चाहिये॥ ७६-७७॥ | | अन्तर्हितेन केनापि शत्रुणा तव चास्य वा।<br>उदितेति कुतो न स्याद्वागनर्थकरी विभो॥ ७८<br><br>यशसस्ते विघाताय वसुदेवगृहस्य च।<br>अरिणा रचिता वाणी गुणमायाविदा नृप॥ ७९ | हे विभो! हो-न-हो तुम्हारे या इन वसुदेवके किसी गुप्त शत्रुने यह अनर्थकारी वाणी बोल दी हो। हे राजन्! तुम्हारा यश और वसुदेवका गार्हस्थ्य नष्ट करनेके लिये किसी मायावी शत्रुने यह कृत्रिम वाणी घोषित कर दी हो॥ ७८-७९॥ |