भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 509
५००श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कालिन्दीपुलिने रम्ये ह्यासीन्मधुवनं पुरा।<br>लवणो मधुपुत्रस्तु तत्रासीद्दानवो बली॥ ५४प्राचीन समयकी बात है—यमुनाके मनोहर तटपर मधुवन नामक एक वन था। वहाँ लवणासुर नामवाला एक बलवान् दानव रहता था, जो मधुका पुत्र था॥ ५४॥
द्विजानां दुःखदः पापो वरदानेन गर्वितः।<br>निहतोऽसौ महाभाग लक्ष्मणस्यानुजेन वै॥ ५५वरप्राप्तिके कारण अभिमानमें चूर वह पापी दैत्य ब्राह्मणोंको दुःख देता था। हे महाभाग! लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने संग्राममें उसका वध कर दिया। उस मदोन्मत्तको मारकर उन्होंने मथुरा नामक परम सुन्दर नगरी बसायी॥ ५५-५६॥
शत्रुघ्नेनाथ संग्रामे तं निहत्य मदोत्कटम्।<br>वासिता मथुरा नाम पुरी परमशोभना॥ ५६
स तत्र पुष्कराक्षौ द्वौ पुत्रौ शत्रुनिषूदनः।<br>निवेश्य राज्ये मतिमान्काले प्राप्ते दिवं गतः॥ ५७कमलके समान नेत्रोंवाले अपने दो पुत्रोंको राज्यकार्यमें नियुक्त करके वे बुद्धिमान् शत्रुघ्न समय आ जानेपर स्वर्ग चले गये॥ ५७॥
सूर्यवंशक्षये तां तु यादवाः प्रतिपेदिरे।<br>मथुरां मुक्तिदां राजन् ययातितनयः पुरा॥ ५८सूर्यवंशके नष्ट हो जानेपर उस मुक्तिदायिनी मथुराको यादवोंने अधिकारमें कर लिया। हे राजन्! पूर्वकालमें राजा ययातिका शूरसेन नामक एक पराक्रमी पुत्र था, जो वहाँका राजा हुआ। हे राजन्! उसने मथुरा और शूरसेन दोनों ही राज्योंके विषयोंका भोग किया॥ ५८—५९॥
शूरसेनाभिधः शूरस्तत्राभून्मेदिनीपतिः।<br>माथुराञ्छूरसेनांश्च बुभुजे विषयान्नृप॥ ५९
तत्रोत्पन्नः कश्यपांशः शापाच्च वरुणस्य वै।<br>वसुदेवोऽतिविख्यातः शूरसेनसुतस्तदा॥ ६०वहाँपर वरुणदेवके शापवश महर्षि कश्यपके अंशस्वरूप परम यशस्वी वसुदेवजी शूरसेनके पुत्र होकर उत्पन्न हुए। पिताके मर जानेपर वे वसुदेवजी वैश्यवृत्तिमें संलग्न होकर जीवन-यापन करने लगे। उस समय वहाँके राजा उग्रसेन थे और उनका कंस नामक एक प्रतापी पुत्र था॥ ६०-६१॥
वैश्यवृत्तिरतः सोऽभून्मृते पितरि माधवः।<br>उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान्॥ ६१
अदितिर्देवकी जाता देवकस्य सुता तदा।<br>शापाद्वै वरुणस्याथ कश्यपानुगता किल॥ ६२वरुणदेवके ही शापके कारण कश्यपकी अनुगामिनी अदिति भी राजा देवककी पुत्री देवकीके रूपमें उत्पन्न हुईं। महात्मा देवकने उस देवकीको वसुदेवको सौंप दिया। विवाह सम्पन्न हो जानेके पश्चात् वहाँ आकाशवाणी हुई—हे महाभाग कंस! इस देवकीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला आठवाँ ऐश्वर्यशाली पुत्र तुम्हारा संहारक होगा॥ ६२—६४॥
दत्ता सा वसुदेवाय देवकेन महात्मना।<br>विवाहे रचिते तत्र वागभूद् गगने तदा॥ ६३
कंस कंस महाभाग देवकीगर्भसम्भवः।<br>अष्टमस्तु सुतः श्रीमांस्तव हन्ता भविष्यति॥ ६४
तच्छ्रुत्वा वचनं कंसो विस्मितोऽभून्महाबलः।<br>देववाचं तु तां मत्वा सत्यां चिन्तामवाप सः॥ ६५उस आकाशवाणीको सुनकर महाबली कंस आश्चर्यचकित हो गया। उस आकाशवाणीको सत्य मानकर वह चिन्तामें पड़ गया। ‘अब मैं क्या करूँ’ ऐसा भलीभाँति सोच-विचारकर उसने यह निश्चय किया कि यदि मैं देवकीको इसी समय शीघ्र मार डालूँ तो मेरी मृत्यु नहीं होगी। मृत्युका भय उत्पन्न करनेवाले
किं करोमीति सञ्चिन्त्य विमर्शमकरोत्तदा।<br>निहत्यैनां न मे मृत्युर्भवेदद्यैव सत्वरम्॥ ६६