भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० २२ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०७


| अभ्युत्थानार्घ्यपाद्यादि चकारोग्रसुतस्तदा।<br>पप्रच्छ कुशलं राजा तत्रागमनकारणम्॥ ४७ | उस समय उग्रसेन-पुत्र कंसने श्रद्धापूर्वक उठकर विधिवत् अर्घ्य, पाद्य आदि अर्पण किया और पुनः कुशल-क्षेम तथा उनके आगमनका कारण पूछा॥ ४७॥ | | नारदस्तं तदोवाच स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>कंस कंस महाभाग गतोऽहं हेमपर्वतम्॥ ४८<br><br>तत्र ब्रह्मादयो देवा मन्त्रं चक्रुः समाहिताः।<br>देवक्यां वसुदेवस्य भार्यायां सुरसत्तमः॥ ४९<br><br>वधार्थं तव विष्णुश्च जन्म चात्र करिष्यति।<br>तत्कथं न हतः पुत्रस्त्वया नीतिं विजानता॥ ५० | तब नारदजीने मुसकराकर कंससे यह वचन कहा—हे कंस! हे महाभाग! मैं सुमेरुपर्वतपर गया था। वहाँ ब्रह्मा आदि देवगण एकत्र होकर आपसमें मन्त्रणा कर रहे थे कि वसुदेवकी पत्नी देवकीके गर्भसे सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णु आपके संहारके उद्देश्यसे अवतार लेंगे; तो फिर नीतिका ज्ञान रखते हुए भी आपने उस शिशुका वध क्यों नहीं किया?॥ ४८-५०॥ | | कंस उवाच<br>अष्टमं च हनिष्येऽहं मृत्युं मे देवभाषितम्। | कंस बोला—आकाशवाणीके द्वारा बताये गये अपने मृत्यु-रूप [देवकीके] आठवें पुत्रका मैं वध करूँगा॥ ५० १/२॥ | | नारद उवाच<br>न जानासि नृपश्रेष्ठ राजनीतिं शुभाशुभाम्॥ ५१<br><br>मायाबलं च देवानां न त्वं वेत्सि वदामि किम्।<br>रिपुरल्पोऽपि शूरेण नोपेक्ष्यः शुभमिच्छता॥ ५२ | नारदजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! आप शुभ तथा अशुभ राजनीतिको नहीं जानते हैं और देवताओंकी माया-शक्ति भी नहीं जानते हैं। अब मैं क्या बताऊँ? अपना कल्याण चाहनेवाले वीरको छोटे-से-छोटे शत्रु की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये॥ ५१-५२॥ | | सम्मेलनक्रियायां तु सर्वे ते ह्यष्टमाः स्मृताः।<br>मूर्खस्त्वमरिसन्त्यागः कृतोऽयं जानता त्वया॥ ५३ | [गणितशास्त्रकी] सम्मेलन-क्रियाके आधारपर तो सभी पुत्र आठवें कहे जा सकते हैं। आप मूर्ख हैं; क्योंकि ऐसा जानते हुए भी आपने शत्रुको छोड़ दिया है॥ ५३॥ | | इत्युक्त्वाशु गतः श्रीमान्नारदो देवदर्शनः।<br>गतेऽथ नारदे कंसः समाहूयाथ बालकम्।<br>पाषाणे पोथयामास सुखं प्राप च मन्दधीः॥ ५४ | ऐसा कहकर श्रीमान् देवदर्शन नारद वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चले गये। नारदके चले जानेपर कंसने उस बालकको मँगवाकर उसे पत्थरपर पटक दिया और उस मन्दबुद्धि कंसको महान् सुख प्राप्त हुआ॥ ५४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां कंसेन देवकीप्रथमपुत्रवधवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥


अथ द्वाविंशोऽध्यायः

देवकीके छः पुत्रोंके पूर्वजन्मकी कथा, सातवें पुत्रके रूपमें भगवान् संकर्षणका अवतार, देवताओं तथा दानवोंके अंशावतारोंका वर्णन

| जनमेजय उवाच<br>किं कृतं पातकं तेन बालकेन पितामह।<br>यज्जातमात्रो निहतस्तथा तेन दुरात्मना॥ १ | जनमेजय बोले—हे पितामह! उस बालकने ऐसा कौन-सा पापकर्म किया था, जिससे जन्म लेते ही उसको दुष्टात्मा कंसने मार डाला?॥ १॥ |