देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ५०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नारदोऽपि मुनिश्रेष्ठो ज्ञानवान्धर्मतत्परः।<br>कथमेवंविधं पापं कृतवान्ब्रह्मवित्तमः॥ २<br><br>कर्ता कारयिता पापे तुल्यपापौ स्मृतौ बुधैः।<br>स कथं प्रेरयामास मुनिः कंसं खलं तदा॥ ३ | महान् ज्ञानी, धर्मपरायण तथा ब्रह्मवेत्ता होते हुए भी मुनिश्रेष्ठ नारदने इस प्रकारका पाप क्यों किया? विद्वज्जनोंने पाप करने तथा करानेवाले—इन दोनोंको समान पापी बताया है; तो फिर उन देवर्षि नारदने इस पापकर्मके लिये दुष्ट कंसको प्रेरित क्यों किया?॥ २-३॥ |
| संशयोऽयं महाम्मेऽत्र ब्रूहि सर्वं सविस्तरम्।<br>येन कर्मविपाकेन बालको निधनं गतः॥ ४ | इस विषयमें मुझे यह महान् सन्देह हो गया है। जिस कर्मफलसे वह बालक मारा गया, उसके बारेमें मुझे सब कुछ विस्तारपूर्वक बताइये॥ ४॥ |
| व्यास उवाच<br>नारदः कौतुकप्रेक्षी सर्वदा कलहप्रियः।<br>देवकार्यार्थमागत्य सर्वमेतच्चकार ह॥ ५ | व्यासजी बोले— देवर्षि नारदको कौतुक करना तथा कलह करा देना अत्यन्त प्रिय है। अतः देवताओंका कार्य साधनेके लिये ही उन्होंने उपस्थित होकर यह सब किया था॥ ५॥ |
| न मिथ्याभाषणे बुद्धिर्मुनेस्तस्य कदाचन।<br>सत्यवक्ता सुराणां स कर्तव्ये निरतः शुचिः॥ ६ | उन मुनि नारदकी बुद्धि झूठ बोलनेमें कभी भी प्रवृत्त नहीं हो सकती। सत्यवादी तथा पवित्र हृदयवाले वे सदा देवताओंका कार्य सिद्ध करनेमें तत्पर रहते हैं॥ ६॥ |
| एवं षड् बालकास्तेन जाता जाता निपातिताः।<br>षड् गर्भाः शापयोगेन सम्भूय मरणं गताः॥ ७ | इस प्रकार कंसने देवकीके छः पुत्रोंको बारी-बारीसे जन्म लेते ही मार डाला। पूर्वजन्ममें प्राप्त शापके कारण वे छः बालक जन्म लेते ही मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ७॥ |
| शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तेषां शापस्य कारणम्।<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पुत्रा मरीचेः षण्महाबलाः॥ ८<br><br>ऊर्णायां चैव भार्यायामासन्धर्मविचक्षणाः।<br>ब्रह्माणं जहसुर्वीक्ष्य सुतां यभितुमुद्यतम्॥ ९ | हे राजन्! सुनिये, अब मैं उनके शापका कारण बताऊँगा। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें मरीचिकी भार्या ऊर्णाके गर्भसे छः अत्यन्त बलशाली पुत्र उत्पन्न हुए; ये धर्मशास्त्रमें पूर्णरूपसे निष्णात थे॥ ८ १/२॥<br>एक बार ब्रह्माजीको अपनी पुत्री सरस्वतीके साथ समागमके लिये उद्यत देखकर वे हँस पड़े थे। |
| शशाप तांस्तदा ब्रह्मा दैत्ययोनिं विशन्त्वधः।<br>कालनेमिसुता जातास्ते षड्गर्भा विशाम्पते॥ १० | तब ब्रह्माजीने उन्हें शाप दे दिया कि तुमलोगोंका पतन हो जाय और तुम सब दैत्ययोनिमें जन्म लो। हे महाराज! इस प्रकार वे छहों पुत्र कालनेमिके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए॥ ९-१०॥ |
| अवतारे परे ते तु हिरण्यकशिपोः सुताः।<br>जातास्ते ज्ञानसंयुक्ताः पूर्वशापभयान्नृप॥ ११<br><br>तस्मिञ्जन्मनि शान्ताश्च तपश्चक्रुः समाहिताः।<br>तेषां प्रीतोऽभवद् ब्रह्मा षड्गर्भाणां वरन्ददौ॥ १२ | हे राजन्! अगले जन्ममें वे हिरण्यकशिपुके पुत्र हुए। उनका पूर्वज्ञान अभी बना हुआ था। अतः वे सब पूर्वशापसे भयभीत होकर उस जन्ममें समाहितचित्त हो शान्तभावसे तप करने लगे। इससे ब्रह्माजीने अत्यधिक प्रसन्न होकर उन छहोंको वरदान दे दिया॥ ११-१२॥ |