देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ८७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।<br>निश्चयं हृदये कृत्वा विचरस्व यथासुखम्॥ २५ | किये गये शुभ तथा अशुभ कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है—ऐसा मनमें निश्चय करके आनन्दपूर्वक विचरण कीजिये॥ २५॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा नारदो राजन् गतो मां प्रतिबोध्य च।<br>अहं तच्चिन्तयन्वाक्यं यदुक्तं मुनिना तदा॥ २६<br><br>स्थितः सरस्वतीतीरे कल्पे सारस्वते वरे।<br>कालातिवाहनायैतत्कृतं भागवतं मया॥ २७<br><br>पुराणमुत्तमं भूप सर्वसंशयनाशनम्।<br>नानाख्यानसमायुक्तं वेदप्रामाण्यसंश्रितम्॥ २८ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! ऐसा कहकर मुझे समझानेके पश्चात् नारदजी वहाँसे चले गये। मुनि नारदने मुझसे जो वाक्य कहा था उसपर विचार करता हुआ मैं उस श्रेष्ठ सारस्वतकल्पमें सरस्वतीके तटपर ठहर गया। हे राजन्! समय व्यतीत करनेके उद्देश्यसे वहींपर मैंने सम्पूर्ण सन्देहोंको दूर करनेवाले, नानाविध आख्यानोंसे युक्त, वैदिक प्रमाणोंसे ओतप्रोत तथा पुराणोंमें उत्तम इस श्रीमद्देवीभागवतकी रचना की थी॥ २६–२८॥ | | सन्देहोऽत्र न कर्तव्यः सर्वथा नृपसत्तम।<br>यथेन्द्रजालिकः कश्चित्पाञ्चालीं दारवीं करे॥ २९<br><br>कृत्वा नर्तयते कामं स्वेच्छया वशवर्तिनीम्।<br>तथा नर्तयते माया जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३० | हे राजेन्द्र! इसमें किसी तरहका संशय नहीं करना चाहिये। जिस प्रकार कोई इन्द्रजाल करनेवाला अपने हाथमें काठकी पुतली लेकर उसे अपने अधीन करके अपने इच्छानुसार नचाता है, उसी प्रकार यह माया चराचर जगत्को नचाती रहती है॥ २९-३०॥ | | ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं सदेवासुरमानुषम्।<br>पञ्चेन्द्रियसमायुक्तं मनश्चित्तानुवर्तनम्॥ ३१ | ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितने भी पाँच इन्द्रियोंसे सम्बन्ध रखनेवाले देवता, मानव तथा दानव हैं; वे सभी मन तथा चित्तका अनुसरण करते हैं॥ ३१॥ | | गुणास्तु कारणं राजन् सर्वेषां सर्वथा त्रयः।<br>कार्यं कारणसंयुक्तं भवतीति विनिश्चयः॥ ३२ | हे राजन्! सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण ही सभी कार्योंके सर्वथा कारण होते हैं। यह निश्चित है कि कोई भी कार्य किसी-न-किसी कारणसे अवश्य सम्बद्ध रहता है॥ ३२॥ | | भिन्नभिन्नस्वभावास्ते गुणा मायासमुद्भवाः।<br>शान्तो घोरस्तथा मूढस्त्रयस्तु विविधा यतः॥ ३३ | मायासे उत्पन्न हुए ये तीनों गुण भिन्न-भिन्न स्वभाववाले होते हैं; क्योंकि ये तीनों गुण (क्रमशः) शान्त, घोर तथा मूढ-भेदानुसार तीन प्रकारके होते हैं॥ ३३॥ | | तत्समेतः पुमान्नित्यं तद्विहीनः कथं भवेत्।<br>न भवत्येव संसारे रहितस्तन्तुभिः पटः॥ ३४<br><br>तथा गुणैस्त्रिभिर्हीनो न देहीति विनिश्चयः।<br>देवदेहो मनुष्यो वा तिरश्चो वा नराधिप॥ ३५<br><br>गुणैर्विरहितो न स्यान्मृद्धीनो घटो यथा।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्त्रयश्चामी गुणाश्रयाः॥ ३६<br><br>कदाचित्प्रीतियुक्तास्ते तथाप्रीतियुताः पुनः।<br>तथा विषादयुक्तास्ते भवन्ति गुणयोगतः॥ ३७ | इन तीनों गुणोंसे सदा युक्त रहनेवाला प्राणी इन गुणोंसे विहीन कैसे रह सकता है? जिस प्रकार संसारमें तन्तुविहीन वस्त्रकी सत्ता नहीं हो सकती, उसी प्रकार तीनों गुणोंसे रहित प्राणीकी सत्ता नहीं हो सकती, यह पूर्णरूपेण निश्चित है। हे नरेश! जिस प्रकार मिट्टीके बिना घटका होना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार देवता, मानव अथवा पशु-पक्षी भी गुणोंके बिना नहीं रह सकते। यहाँतक कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये तीनों भी इन गुणोंके आश्रित रहते हैं। गुणोंका संयोग होनेसे ही वे कभी प्रसन्न रहते हैं, कभी अप्रसन्न रहते हैं तथा कभी विषादग्रस्त हो जाते हैं॥ ३४–३७॥ |
अ० ३१] षष्ठ स्कन्ध ८७९
अ० ३१] षष्ठ स्कन्ध ८७९
| श्लोक | अर्थ |
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| ब्रह्मा कदाचित्सत्त्वस्थस्तदा शान्तः समाधिमान्।<br>प्रीतियुक्तो भवेत्सर्वभूतेषु ज्ञानसंयुतः ॥ ३८<br><br>पुनः सत्त्वविहीनस्तु रजोगुणसमावृतः।<br>तदा भवेद् घोररूपः सर्वत्राप्रीतिसंयुतः ॥ ३९<br><br>यदा तमोगुणाविष्टो बाहुल्येन भवेद्विधिः।<br>तदा विषादसम्पन्नो मूढो भवति नान्यथा ॥ ४० | जब ब्रह्मा सत्त्वगुणमें स्थित रहते हैं तब वे शान्त, समाधिस्थ, ज्ञानसम्पन्न तथा सभी प्राणियोंके प्रति प्रेमसे युक्त हो जाते हैं। वे ही जब सत्त्वगुणसे विहीन होकर रजोगुणकी अधिकतासे युक्त होते हैं, तब उनका रूप भयावह हो जाता है और वे सबके प्रति अप्रीतिकी भावनासे युक्त हो जाते हैं। वे ही ब्रह्मा जब तमोगुणकी अधिकतासे आविष्ट हो जाते हैं, तब वे विषादग्रस्त तथा मूढ़ हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ ३८-४० ॥ |
| माधवोऽपि सदा सत्त्वसंश्रितः सर्वथा भवेत्।<br>यदा शान्तः प्रीतियुक्तो भवेज्ज्ञानसमन्वितः ॥ ४१<br><br>स एव रजआधिक्यादप्रीतिसंयुतो भवेत्।<br>घोरश्च सर्वभूतेषु गुणाधीनो रमापतिः ॥ ४२ | सदा सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाले विष्णु इसी गुणके कारण शान्त, प्रीतिमान् तथा ज्ञानसम्पन्न रहते हैं। वे ही रमापति विष्णु रजोगुणकी अधिकताके कारण अप्रीतिसे युक्त हो जाते हैं और तमोगुणके अधीन होकर सभी प्राणियोंके लिये घोररूप हो जाते हैं ॥ ४१-४२ ॥ |
| रुद्रोऽपि सत्त्वसंयुक्तः प्रीतिमाञ्छान्तिमान्भवेत्।<br>रजोनिमीलितः सोऽपि घोरः प्रीतिविवर्जितः ॥ ४३<br><br>तमोगुणयुतः सोऽपि मूढो विषादयुग्भवेत्।<br>एते यदि गुणाधीना ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥ ४४ | इसी प्रकार रुद्र भी सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर प्रेम तथा शान्तिसे समन्वित रहते हैं, किंतु रजोगुणसे आविष्ट होनेपर वे भी भयानक तथा प्रेमविहीन हो जाते हैं। इसी तरह तमोगुणसे आविष्ट होनेपर वे रुद्र मूढ़ तथा विषादग्रस्त हो जाते हैं ॥ ४३ १/२ ॥ |
| सूर्यवंशोद्भवास्तद्वत्सोमवंशभवा अपि।<br>मन्वादयश्च ये प्रोक्ताश्चतुर्दश युगे युगे ॥ ४५<br><br>अन्येषां चैव का वार्ता संसारेऽस्मिन्नृपोत्तम।<br>मायाधीनं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ४६ | हे नृपश्रेष्ठ! यदि ये ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि तथा युग-युगमें जो सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी चौदहों मनु कहे गये हैं—वे भी गुणोंके अधीन रहते हैं, तब इस संसारमें अन्य लोगोंकी कौन-सी बात ? देवता, दानव तथा मानवसमेत यह सम्पूर्ण जगत् मायाका वशवर्ती है ॥ ४४-४६ ॥ |
| तस्माद् राजन्न कर्तव्यः सन्देहोऽत्र कदाचन।<br>देही मायापराधीनश्चेष्टते तद्वशानुगः ॥ ४७ | अतएव हे राजन्! इस विषयमें कदापि सन्देह नहीं करना चाहिये। प्राणी मायाके अधीन है और वह उसीके वशवर्ती होकर चेष्टा करता है ॥ ४७ ॥ |
| सा च माया परे तत्त्वे संविद्रूपेऽपि सर्वदा।<br>तदधीना प्रेरिता च तेन जीवेषु सर्वदा ॥ ४८ | वह माया भी सदा संविद्रूप परमतत्त्वमें स्थित रहती है। वह उसीके अधीन रहती हुई उसीसे प्रेरित होकर जीवोंमें सदा मोहका संचार करती है ॥ ४८ ॥ |
| ततो मायाविशिष्टां तां संविदं परमेश्वरीम्।<br>मायेश्वरीं भगवतीं सच्चिदानन्दरूपिणीम् ॥ ४९<br><br>ध्यायेत्तथाराधयेच्च प्रणमेच्च जपेदपि।<br>तेन सा सदया भूत्वा मोचयत्येव देहिनम् ॥ ५० | अतः विशिष्टमायास्वरूपा, प्रज्ञामयी, परमेश्वरी, मायाकी अधिष्ठात्री, सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती जगदम्बाका ध्यान, पूजन, वन्दन तथा जप करना चाहिये। उससे वे भगवती प्राणीपर दया करके उसे मुक्त कर देती हैं और अपनी अनुभूति कराकर अपनी |
| ८८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| स्वमायां संहरत्येव स्वानुभूतिप्रदानतः।<br>भुवनं खलु माया स्यादीश्वरी तस्य नायिका॥ ५१<br><br>भुवनेशी ततः प्रोक्ता देवी त्रैलोक्यसुन्दरी।<br>तद्रूपे यदि सक्तं स्याच्चित्तं भूमिपते सदा॥ ५२<br><br>मायया किं भवेत्तत्र सदसद्भूतया नृप।<br>तस्मान्मायानिरासार्थं नान्यद्वै देवतान्तरम्॥ ५३<br><br>समर्थं तु विना देवीं सच्चिदानन्दरूपिणीम्। | मायाको हर लेती हैं। समस्त भुवन मायारूप है तथा वे ईश्वरी उसकी नायिका हैं। इसीलिये त्रैलोक्यसुन्दरी भगवतीको 'भुवनेशी' कहा गया है। हे पृथ्वीपते! यदि उन भगवतीके रूपमें चित्त सदा आसक्त हो जाय तो सत्-असत्स्वरूपा माया अपना क्या प्रभाव डाल सकती है? अतः हे राजन्! सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती परमेश्वरीको छोड़कर अन्य कोई भी देवता उस मायाको दूर करनेमें समर्थ नहीं है॥ ४९-५३ १/२॥ | | तमोराशिं नाशयितुं शक्तं नैव तमो भवेत्॥ ५४<br><br>किन्तु भानुप्रभाचन्द्रविद्युद्वह्निप्रभादयः।<br>तस्मान्मायेश्वरीमम्बां स्वप्रकाशां तु संविदम्॥ ५५<br><br>आराधयेदतिप्रीत्या मायागुणनिवृत्तये। | एक अन्धकार किसी दूसरे अन्धकारको दूर करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; किंतु सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत् तथा अग्नि आदिकी प्रभा उस अन्धकारको मिटा देती है। अतएव मायाके गुणोंसे निवृत्ति प्राप्त करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक स्वयंप्रकाशित तथा ज्ञानस्वरूपिणी भगवती मायेश्वरीकी आराधना करनी चाहिये॥ ५४-५५ १/२॥ | | इति सम्यङ्मयाख्यातं वृत्रासुरवधादिकम्॥ ५६<br><br>यत्पृष्टं राजशार्दूल किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि। | हे राजेन्द्र! वृत्रासुर-वध आदिकी कथाके विषयमें आपने जो पूछा था, उसका वर्णन मैंने भलीभाँति कर दिया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ५६ १/२॥ | | पूर्वार्धोऽयं पुराणस्य कथितस्तव सुव्रत॥ ५७<br><br>यत्र देव्यास्तु महिमा विस्तरेणोपपादितः।<br>एतद्रहस्यं श्रीमातुर्न देयं यस्य कस्यचित्॥ ५८<br><br>देयं भक्ताय शान्ताय देवीभक्तिरताय च।<br>शिष्याय ज्येष्ठपुत्राय गुरुभक्तियुताय च॥ ५९ | हे सुव्रत! श्रीमद्देवीभागवतपुराणका पूर्वार्ध मैंने आपसे कहा, जिसमें देवीकी महिमाका विस्तार-पूर्वक वर्णन किया गया है। भगवती जगदम्बाका यह रहस्य जिस किसीको नहीं सुना देना चाहिये। भक्त, शान्त, देवीकी भक्तिमें लीन, ज्येष्ठ पुत्र तथा गुरुभक्तिसे युक्त शिष्यके समक्ष ही इसका वर्णन करना चाहिये॥ ५७-५९॥ | | इदमखिलकथानां सारभूतं पुराणं<br>निखिलनिगमतुल्यं सप्रमाणानुविद्धम्।<br>पठति परमभावाद्यः शृणोतीह भक्त्या<br>स भवति धनवान्वै ज्ञानवान्मानवोऽत्र॥ ६० | इस संसारमें जो मनुष्य सम्पूर्ण कथाओंके सार-स्वरूप, समस्त वेदोंकी तुलना करनेवाले तथा नानाविध प्रमाणोंसे परिपूर्ण इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणका विशेष श्रद्धाके साथ भक्तिपूर्वक पाठ करता है तथा इसका श्रवण करता है, वह ऐश्वर्यसम्पन्न तथा ज्ञानवान् हो जाता है॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे भगवतीमाहात्म्यवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
॥ षष्ठः स्कन्धः समाप्तः ॥
॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण पूर्वार्ध सम्पूर्णम् ॥