धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
DevanagariHindipublished213 पृष्ठ
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२३।१४ ] नागवग्गो [ १४७ (भी) सुखकर है, श्रमणभाव (=संन्यास) लोकमें सुखकर है, और ब्राह्मणपन (=निष्पाप होना) सुखकर है। ३३३-सुखं याव जरा सीलं सुखा सद्धा पतिट्ठिता । सुखो पञ्ञाय पटिलाभो पापानं अकरणं सुखं ॥१४॥ (सुखं यावद् जरां शीलं सुखा श्रद्धा प्रतिष्ठिता । सुखः प्रज्ञायाः प्रतिलाभः पापानां अकरणं सुखम् ॥१४॥) अनुवाद—बुढ़ापेनक आचारका पालन करना सुखकर है, और स्थिर श्रद्धा (सत्यमें विश्वास) सुखकर है, प्रज्ञाका लाभ सुख- कर है, और पापोंका न करना सुखकर है। २३-नागवर्ग समाप्त