भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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२४ तण्हावग्गो जेतवन कपिलमच्छ ३३४-मनुजस्स पमत्तचारिनो तण्हा वड्ढति मालुवा विय । सो पलवती हुराहुं फलमिच्छं 'व वनस्मिं वानरो ॥१॥ ( मनुजस्य प्रमत्तचारिणः तृष्णा वर्द्धते मालुवेव । स प्लवतेऽहरहः फलमिच्छन् इव वने वानरः ॥ १ ॥ ) अनुवाद—प्रमत्त होकर आचरण करनेवाले मनुष्यकी तृष्णा मालुवा (लता) की भाँति बढ़ती है, वनमें 'वानरकी भाँति फलकी इच्छा करते दिनोंदिन वह भटकता रहता है। ३३५-यं एसा सहती जम्मी तण्हा लोके विसत्तिका । सोका तस्स पवड्ढन्ति अभिवड्डं 'व वीरणं ॥२॥ ( यं एषा साहयति जन्मिनी तृष्णा लोके विषात्मिका । शोकास्तस्य प्रवर्द्धन्तेऽभिवर्द्धमानं इव वीरणम् ॥ २ ॥ ) अनुवाद—यह ( बराबर ) जनमते रहनेवाली विषरूपी तृष्णा जिसको पकड़ती है, वर्द्धनशील वीरण ( =चटाई बनानेका एक तृण ) की भाँति उसके शोक बढ़ते हैं। १४८ ]