धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें२४५ ] तण्हावग्गो [ १४९ ३३६-यो चेतं सहती जम्मिं तण्हं लोके दुरच्चयं । सोका तम्हा पपतन्ति उदबिन्दू 'व पोक्खरा ॥३॥ (यश्चैतां साहयति जम्मिनीं तृष्णां लोके दुरत्ययाम् । शोकाः तस्मात् प्रपतन्त्युदबिन्दुरिव पुष्करात् ॥ ३ ॥) अनुवाद—इस परापर जनमते रहनेवाली, दुस्त्याज्य तृष्णाको जो लोकमें परास्त करता है, उससे शोक (वैसेही) गिर जाते हैं, जैसे कमल(-पत्र) से जलका विन्दु । ३३७-तं वो वदामि भद्दं वो यावन्तेत्थ समागता । तण्हाय मूलं खणथ उसीरत्थो 'व वीरगं ॥४॥ (तद् वो वदामि भद्रं वो यावन्त इह समागताः । तृष्णाया मूलं खनतोशीरार्थीव वीरगम् ॥ ४ ॥) अनुवाद—इसलिये तुम्हें कहता हूँ, जितने यहाँ आये हो, तुम्हारा सबका मंगल हो, जैसे खसके लिये लोग उसीरको खोदते हैं, वैसे ही तुम तृष्णाकी जड़को खोदो। जेतवन गूथ-सूकर-पोतिक ३३८-यथापि मूले अनुपद्दवे दळ्हे छिन्नोपि रुक्खो पुनरेव रूहति । एवम्पि तण्हानुसये अनूहते निब्बत्तति दुक्खमिदं पुनप्पुनं ॥५॥ (यथाऽपि मूलेऽनुपद्रवे दृढे छिन्नोऽपि वृक्षः पुनरेव रोहति । एवमपि तृष्णाऽनुशयेऽनिहते निर्वर्तते दुःखमिदं पुनः पुनर्भावा)