भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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१५० ] धम्मपदं [ २७।७ अनुवाद—जैसे जड़के दृढ़ और न कटी होनेपर कटा हुआ भी वृक्ष फिर उग आता है, एसी प्रकार तृष्णारूपी अनुशय (=मूल) के न नष्ट होनेपर, यह दुःख फिर फिर पैदा होता है। ३३६—यस्स छत्तिंसती सोता मनापासवना भुसा । वाहा वहन्ति दुद्दिट्ठिं सङ्कप्पा रागनिस्सिता ॥६॥ (यस्य षट्त्रिंशत् स्रोतांसि मनापश्रवणानि भृयासुः । वाहा वहन्ति दुर्द्दृष्टिं संकल्पा रागनिःसृताः ॥६॥) अनुवाद—जिसके, छत्तीस स्रोत' मनको अच्छी लगनेवाली (चीजों) को ही लानेवाले हों, (उसके लिए) रागश्रित सङ्कल्प रूपी वाहन बुरी धारणाओंको वहन करते हैं । ३४०—सवन्ति सव्वधि सोता लता उब्भिज्ज तिट्ठति । तञ्च दिस्वा लतं जातं मूलं पञ्ञाय छिन्दथ ॥७॥ (स्रवन्ति सर्वतः स्रोतांसि लता उद्भिद्य तिष्ठति । तां च दृष्ट्वा लतां जातां, मूलं प्रज्ञया छिन्दत ॥७॥) अनुवाद—(यह) स्रोत चारों ओर बहते हैं, (जिसके कारण) (तृष्णा रूपी) लता अंकुरित होती है, उस