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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

१५० ] धम्मपदं [ २७।७ अनुवाद—जैसे जड़के दृढ़ और न कटी होनेपर कटा हुआ भी वृक्ष फिर उग आता है, एसी प्रकार तृष्णारूपी अनुशय (=मूल) के न नष्ट होनेपर, यह दुःख फिर फिर पैदा होता है। ३३६—यस्स छत्तिंसती सोता मनापासवना भुसा । वाहा वहन्ति दुद्दिट्ठिं सङ्कप्पा रागनिस्सिता ॥६॥ (यस्य षट्त्रिंशत् स्रोतांसि मनापश्रवणानि भृयासुः । वाहा वहन्ति दुर्द्दृष्टिं संकल्पा रागनिःसृताः ॥६॥) अनुवाद—जिसके, छत्तीस स्रोत' मनको अच्छी लगनेवाली (चीजों) को ही लानेवाले हों, (उसके लिए) रागश्रित सङ्कल्प रूपी वाहन बुरी धारणाओंको वहन करते हैं । ३४०—सवन्ति सव्वधि सोता लता उब्भिज्ज तिट्ठति । तञ्च दिस्वा लतं जातं मूलं पञ्ञाय छिन्दथ ॥७॥ (स्रवन्ति सर्वतः स्रोतांसि लता उद्भिद्य तिष्ठति । तां च दृष्ट्वा लतां जातां, मूलं प्रज्ञया छिन्दत ॥७॥) अनुवाद—(यह) स्रोत चारों ओर बहते हैं, (जिसके कारण) (तृष्णा रूपी) लता अंकुरित होती है, उस

२४।१० ] तण्हावग्गो [ १५१ उत्पन्न हुई लताको जानकर, प्रज्ञासे ( उसकी ) जड़को काटो । ३४१-सरितानि सिनेहितानि च सोमनस्सानि भवन्ति जन्तुनो । ते सोतसिता सुखेसिनो ते वे जाति-जरूपगा नरा ॥८॥ ( सरितः स्निग्धाश्च सौमनस्या भवन्ति जन्तोः । ते स्रोतःसृताः सुखैषिणस्ते वै जातिजरोपगा नराः ॥८॥ ) अनुवाद—( यह ) ( तृष्णा रूपी ) नदियाँ स्निग्ध और प्राणियोंके चित्तको खुश रखनेवाली होती हैं; ( जिनके कारण ) नर स्रोतमें बँधे, सुखकी खोज करते, जन्म और जराके फेरमें पड़ते हैं । ३४२-तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो 'व बाधितो । संयोजनसङ्ग सत्तका दुक्खमुपेन्ति पुनप्पुनं चिराय ॥६॥ ( तृष्णया पुरस्कृताः प्रजाः परिसर्पन्ति शश इव बद्धः । संयोजनसंगसक्तका दुःखमुपयन्ति पुनः पुनः चिराय ॥९॥) अनुवाद—तृष्णाके पीछे पड़े प्राणी, बंधे खरगोशकी भाँति चक्कर काटते हैं; संयोजनों (=मनके बंधनो ) में फँसे ( जन ) पुनः पुनः चिरकाल तक दुःखको पाते हैं । ३४३-तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो'व बाधितो । तस्मा तसिनं विनोद्ये भिक्खू अकङ्क्षी विरागमत्तनो ॥ १०॥ ( तृष्णया पुरस्कृताः प्रजाः परिसर्पन्ति शश इव बद्धः ।

२१. पकिण्णकवग्गो (प्रकीर्णक वर्ग)

१५२ ] धम्मपद [ २४।१२ तस्मात् तृष्णां विनोदयेद् भिक्षुराकांक्षी विरागमात्मनः ॥१०॥) अनुवाद—तृष्णाके पीछे पड़े प्राणी बँधे खरगोशकी भाँति चक्कर काटते हैं; इसलिए भिक्षुको चाहिए कि वह अपने वैराग्यकी इच्छा रख, तृष्णाको दूर करे । वेणुवन विभन्तक (भिक्षु) ३४४—यो निब्बनथो वनाधिमुत्तो वनमुत्तो वनमेव धावति । तं पुग्गलमेव पस्सथ मुत्तो बन्धनमेव धावति ॥११॥ (यो निर्वाणार्थी वनाऽधिमुक्तो वनमुक्तो वनमेव धावति । तं पुद्गलमेव पश्यत मुक्तो बन्धनमेव धावति ॥११॥) अनुवाद—जो निर्वाणकी इच्छा वाला (पुरुष) वन (=तृष्णा) से मुक्त हो, वनसे सुमुक्त हो, फिर वन (=तृष्णा) ही की ओर दौड़ता है, उस व्यक्तिको (वैसे ही) जानो जैसे कोई (बन्धन) से मुक्त (पुरुष) फिर बन्धन ही की ओर दौड़े । जेतवन बन्धनागार ३४५—न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा यदायसं दारुजं पब्बजञ्च । सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ॥१२॥ (न तद् दृढं बन्धनमाहुर्धीरा यद् आयसं दारुजं पार्वजं च ।

२४।१४ ] तण्हावग्गो [ १५३ सारवद्रत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तेसु दारेसु च याऽपेक्षा ॥१२॥) अनुवाद—( यह ) जो लोहे लकड़ी या रस्सीका बन्धन है, उसे बुद्धि- मान ( जन ) दृढ़ बन्धन नहीं कहते, ( वस्तुतः दृढ़ बन्धन है जो यह) धन (=सारवत्) में रक्त होना, या मणि, कुण्डल, पुत्र स्त्रीमें इच्छाका होना है। ३४६-एतं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा ओहारिनं सिथिलं दुप्पमुञ्चं । एतम्पि छेत्वान परिव्बजन्ति अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय ॥ १३॥ ( एतद् दृढं बन्धनमाहुर्धीरा अपहारि शिथिलं दुष्प्रमोचम् । एतदपि छित्त्वा परिव्रजन्त्य- -नपेक्षिणः कामसुखं प्रहाय ॥ १३ ॥ ) अनुवाद—धीर पुरुष इसीको दृढ़ बन्धन, अपहारक शिथिल और दुस्त्याज्य कहते हैं,, (वह) अपेक्षा रहित हो, तथा काम-सुखों- को छोड़, इस (दृढ़) बन्धनको छिन्नकर, प्रव्रजित होते हैं। राजगृह ( वेणुवन ) खेमा ( बिम्बसार-महिषी ) ३४७-ये रागरत्तानुपतन्ति सोतं सयं कतं मक्कटको 'व जालं । एतम्पि छेत्वान बजन्ति धीरा अनपेक्खिनो सब्बदुक्खं पहाय ॥ १४॥

१५४ ] धम्मपदं [ २४।१६ ( ये रागरक्ता अनुपतन्ति स्रोतः स्वयंस्कृतं मर्कटक इव जालम् । एतदपि छित्वा व्रजन्ति धीरा अनपेक्षिणः सर्वदुःखं प्रहाय ॥१४॥) अनुवाद—जो रागमें रक्त हैं, वह जैसे मकड़ी अपने बनाये जालमें पड़ती है, (वैसे ही) अपने बनाये, स्रोतमें पड़ते हैं, धीर (पुरुष) इस (स्रोत) को भी छेद कर सारे दुःखोंको छोड़ आकांक्षा रहित हो चल देते हैं । राजगृह (वेणुवन) उग्गसेन (सेठ्ठी) ३४८-मुञ्च पुरे मुञ्च पच्छतो मज्झे मुञ्च भवस्स पारगू । सब्बत्थ विमुत्तमानसो न पुन जातिजरं उपेहिसि ॥१५॥ (मुंच पुरो मुंच पश्चात् मध्ये मुंच भवस्य पारगः । सर्वत्र विमुक्तमानसो न पुनः जातिजरे उपैषि ॥१५॥) अनुवाद—आगे पीछे और मध्यकी (सभी वस्तुओंको) त्याग दो, (और उन्हें छोड़) भव(सागर)के पार हो जाओ; जिसका मन चारों ओरसे मुक्त हो गया, (वह) फिर जन्म और जरा को प्राप्त नहीं होता । जेतवन (चुल्ल) धनुग्गह पडित ३४९-वितक्कपमथितस्स जन्तुनो तिव्वरागास्स सुभानुपस्सिनो । भिय्यो तण्हा पवड्ढति एसो खो दळ्हं करोति बन्धनं ॥१६॥ (वितर्क-प्रमथितस्य जन्तोः तीव्ररागस्य शुभानुदर्शिनः । भूयः तृष्णा प्रवर्द्धते एष खलु दृढं करोति बन्धनम् ॥१६॥)

२४।१८ ] तण्हावग्गो [ १५५ अनुवाद—जो प्राणी सन्देहसे मथित, तीव्र रागसे युक्त, सुन्दर ही सुन्दरको देखने वाला है, उसकी तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है, वह (अपनेलिए) और भी दृढ़ बन्धन तय्यार करता है। ३५०-वितक्कूपसमे च यो रतो असुभं भावयति सदा सतो । एस खो व्यन्तिकाद्दिनी एसच्छेज्जति मारबन्धनं ॥१७॥ ( वितर्कौपशमे च यो रतो ऽशुभंभावयते सदा स्मृतः। एष खलु व्यन्तीकरिष्यति एष छेत्स्यति मारबन्धनम् ॥१७॥) अनुवाद—सन्देहके शान्त करनेमें जो रत है, सचेत रह (जो) अशुभ (दुनियाके अन्धेरे पहलू) की भी सदा भावना करता है। वह मारके बन्धनको छिन्न करेगा, विनाश करेगा। जेतवन मार ३५१-निट्ठङ्गतो असन्तासी वीततण्हो अनङ्गणो। उच्छिन्दि भवसल्लानि अन्तिमोऽयं समुस्सयो ॥१८॥ (निष्ठांगतोऽसंत्रासी वीततृष्णोऽनंगणः। उत्सृज्य भवशल्यानि, अन्तिमोऽयं समुच्छ्रयः ॥१८॥) अनुवाद—जिसके (पाप-पुण्य) समाप्त हो गये; जो त्रास-उत्पादक नहीं है, जो तृणारहित और मलरहित है, वह भवके शल्योको उखाडेगा, यह उसका अंतिम देह है।

१५६ ] धम्मपदं [ २४।२० ३५२--वीततण्हो अनादानो निरुत्तिपदकोविदो । अक्खरानं सन्निपातं जञ्ञा पुव्वापरानि च । स वे अन्तिमसारीरो महापण्णो'ति वुच्चति ॥१६॥ ( वीततृष्णोऽनादानो निरुक्तिपदकोविदो । अक्षराणां सन्निपातं जानाति पूर्वापराणि च । स वै अन्तिमशरीरो महाप्राज्ञ इत्युच्यते ॥१९॥) अनुवाद—जो तृणारहित, परिग्रहरहित, भाषा और काव्यका जान- कार है; और (जो) अक्षरोंके पहिले पीछे रखनेको जानता है, यह निश्चय ही अन्तिम शरीर वाला तथा महाप्राज्ञ कहा जाता है। वाराणसीसे गयाके रास्तेमें उपक ( आजीवक ) ३५३--सब्वाभिभू सव्वविदूहमस्मि सव्वेसु धम्मेसु अनूपलित्तो । सब्बञ्जहो तण्हक्खये विमुत्तो सयं अभिञ्ञाय कमुद्दिसेय्यं ॥२०॥ ( सर्वाभिभूः सर्वविदहमस्मि सर्वेषु धर्मेष्वनुपलिप्तः । सर्वजहः तृष्णाक्षये विमुक्तः स्वयमभिज्ञाय कमिहोद्दिशेयम् ॥ २० ॥) अनुवाद—मैं (राग आदि) सभीका परास्त करनेवाला हूँ, (दुःखोंसे मुक्ति पानेकी) सभी (बातों) का जानकार हूँ, सभी धर्मों (-पदार्थों) में अलिप्त हूँ, सर्वत्यागी, तृष्णाके नाशसे

२७।२२ ] तण्हावग्गो [ ३५७ मुक्त हूँ, ( विमल ज्ञानको ) अपने ही जानकर ( मैं अब ) किसको ( अपना गुरु ) बतलाऊँ ? जेतवन सक्क देवराज ३५४-सब्बदानं धम्मदानं जिनाति सब्बं रसं धम्मरसो जिनाति । सब्बं रतिं धम्मरती जिनाति तण्हक्खयो सब्बदुक्खं जिनाति ॥२१॥ ( सर्वदानं धर्मदानं जयति सर्वं रसं धर्मरसो जयति । सर्वां रतिं धर्मरतिर्जयति तृष्णाक्षयः सर्वदुःखं जयति ॥ २१ ॥ ) अनुवाद—धर्मका दान सारे दानोंसे बढ़कर है, धर्मरस सारे रसोंसे प्रबल है, धर्ममें रति सब रतियोंसे बढ़कर है, तृष्णाका विनाश सारे दुःखोंको जीत लेता है । जेतवन ( अपुत्रक श्रेष्ठी ) ३५५-हनन्ति भोगा दुम्मेधं नो चे पारगवेसिनो । भोगतण्हाय दुम्मेधो हन्ति अञ्ञे'व अत्तनं ॥२२॥ ( घ्नन्ति भोगा दुर्मेधसं न चेत् पारगवेषिणः । भोगतृष्णाया दुर्मेधा हन्त्यन्य इवात्मनः ॥ २२ ॥ ) अनुवाद—( संसारको ) पार होनेकी कोशिश न करनेवाले दुर्बुद्धि ( पुरुष ) को भोग नष्ट करते हैं, भोगकी तृष्णामें पड़कर (वह) दुर्बुद्धि परायेकी भाँति अपने हीको हनन करता है ।

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२२. निरयवग्गो (निरय वर्ग)

२४।२६ ] तण्हावग्गो [ १५९ ३५६-तिणदोसानि खेत्तानि इच्छादोसो अयं पजा । ' तस्मा हि विगतित्छेसु दिन्नं होति महप्फलं ॥२६॥ ( तृणदोषाणि क्षेत्राणि, इच्छादोषेयं प्रजा । तस्माद्धि विगतेच्छेषु दत्तं भवति महाफलम् ॥ २६ ॥ ) अनुवाद—खेतोंका दोष तृण है, इस प्रजाका दोष इच्छा है; इसलिये विगतेच्छ(=इच्छारहित)को देनेमें महाफल होता है । २४-तृष्णावर्ग समाप्त

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२५।५ ] भिक्खुवग्गो [ १६१ अनुवाद—कायाका संवर (=संयम ) ठीक है, ठीक है वचनका संवर; मनका संवर ठीक है, ठीक है सर्वत्र (इन्द्रियों)का संवर; सर्वत्र संवर-युक्त भिक्षु सारे दुःखोंसे छूट जाता है । जेतवन हंसघातक (भिक्षु) ३६२—हत्थसञ्‍ञतो पादसञ्‍ञतो वाचाय सञ्‍ञतो सञ्‍ञतुत्तमो । अज्झत्तरतो समाहितो एको सन्तुसितो तमाहु भिक्खू ॥३॥ (हस्तसंयतः पादसंयतो वाचा संयतः संयतोत्तमः । अध्यात्मरतः समाहित एकः सन्तुष्टस्तमाहुर्भिक्षुम् ॥३॥) अनुवाद—जिसके हाथ, पैर और वचनमें संयम है, (जो) उत्तम संयमी है, जो घटके भीतर (=अध्यात्म) रत, समाधियुक्त, अकेला (और) सन्तुष्ट है, उसे भिक्षु कहते हैं । जेतवन कोकालिक ३६३—यो मुखसञ्‍ञतो भिक्खू मन्तभाणी अनुद्धतो । अत्थं धम्मञ्च दीपेति मधुरं तस्स भासितं ॥४॥ (यो मुखसंयतो भिक्षुर्मंत्रमाणी, अनुद्धतः । अर्थं धर्मं च दीपयति मधुरं तस्य भाषितम् ॥४॥) अनुवाद—जो मुखमें संयम रखता है, मनन करके बोलता है, उद्धत नहीं है, अर्थ और धर्मको प्रकट करता है, उसका भाषण मधुर होता है । जेतवन धम्माराम (थेर) ३६४—धम्मारामो धम्मरतो धम्मं अनुविचिन्तयं । धम्मं अनुस्सरं भिक्खू सद्धम्मा न परिहायति ॥५॥ ११

१६२ ] धम्मपदं [ २५।७ ( धर्म्मारामो धर्म्मरतो धर्म्मं अनुविचिन्तयन् । धर्म्ममनुस्मरन् भिक्षुः सद्धर्म्मान्न परिहीयते ॥५॥) अनुवाद—धर्ममें रमण करनेवाला, धर्ममें रत, धर्मका चिन्तन करते, धर्मका अनुसरण करते भिक्षु सच्चे धर्मसे च्युत नहीं होता । राजगृह ( वेणुवन ) विपक्ष-सेवक ( भिक्खु ) ३६५—सलाभं नातिमञ्ञेय्य, नान्नेसं पिहयं चरे । अन्नेसं पिहयं भिक्खू समाधिं नाधिगच्छति ॥६॥ ( स्वलाभं नाऽतिमन्येत, नाऽन्येषां स्पृहयन्, चरेत् । अन्येषां स्पृहयन् भिक्षुः समाधिं नाऽधिगच्छति ॥६॥) अनुवाद—अपने लाभकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। दूसरोंके ( लाभ ) की स्पृहा न करनी चाहिये। दूसरोंके ( लाभकी ) स्पृहा करनेवाला भिक्षु समाधि (=चित्तकी एकाग्रता )को नहीं प्राप्त करता । ३६६—अप्पलाभोपि चे भिक्खू स-लाभं नातिमञ्ञति । तं वे देवा पसंसन्ति सुद्धाजीविं अतन्दितं ॥७॥ ( अल्पलाभोऽपि चेद् भिक्षुः स्वलाभं नाऽतिमन्येत । तं वै देवाः प्रशंसन्ति शुद्धाऽऽजीवं अनन्दितम् ॥७॥) अनुवाद—चाहे अल्प ही हो, भिक्षु अपने लाभकी अवहेलना न करे । उसीकी देवता प्रशंसा करते हैं, ( जो ) शुद्ध जीविकावाला और आलस्यरहित है ।

२५।१० ] भिक्खुवग्गो [ १६३ जेतवन ( पाँच अग्रदायक भिक्षु ) ३६७-सव्वसो नाम-रूपस्मिं यस्स नत्थि ममायितं । असता च न सोचति स वे भिक्खूति वुच्चति ॥८॥ ( सर्वशो नामरूपे यस्य नाऽस्ति ममायितम् । असति च न शोचति सवै भिक्षुरित्युच्यते ॥८॥) अनुवाद—नाम-रूप(=जगत)में जिसकी विल्कुल ही ममता नहीं, न होनेपर ( जो ) शोक नहीं करता, वही भिक्षु कहा जाता है । जेतवन बहुतसे भिक्षु ३६८-मेत्ताविहारी यो भिक्खू पसन्नो बुद्धसासने । अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्खारूपसमं सुखं ॥६॥ ( मैत्रीविहारी यो भिक्षुः प्रसन्नो बुद्धशासने । अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ॥९॥) अनुवाद—मैत्री(-भावना) से विहार करता जो भिक्षु बुद्धके उप- देशमें प्रसन्न (=श्रद्धावान् ) रहता है, (वह) सभी संस्कारों को शमन करनेवाले शान्त ( और ) सुखमय पदको प्राप्त करता है । ३६९-सिञ्च भिक्खू ! इमं नावं सित्ता ते लहुमेस्सति । छेत्वा रागञ्च दोसञ्च ततो निब्वाणमेहिसि ॥१०॥ ( सिंच भिक्षो ! इमां नावं सिक्ता ते लघुत्वं एष्यति । छित्त्वा रागं च द्वेषं च ततो निर्वाणमेष्यसि ॥१०॥) ५/२८

१६३ ] धम्मपदं [ २५।१२ अनुवाद—हे भिक्षु ! इस नावको उलीचो, उलीचने पर (यह) तुम्हारे लिये हल्की हो जायेगी। राग और द्वेषको छेदनकर, फिर तुम निर्वाणको प्राप्त होगे। ३७०—पंच छिन्दे पञ्च जहे पञ्चवुत्तरि भावये । पञ्च सङ्गातिगो भिक्खू ओघतिण्णो'ति वुच्चति ॥ ११॥ (पंच छिन्धि पंच जहीहि पंचोत्तरं भावय। पंचसंगाऽतिगो भिक्षुः, 'ओघतीर्ण' इत्युच्यते ॥११॥) अनुवाद—(जो रूप, राग, मान, उद्धतपना और अविद्या इन) पाँचको छेदन करे, (जो नित्य आत्माकी कल्पना, सन्देह, शील-व्रत पर अधिक जोर, भोगोंमें राग, और प्रतिहिंसा इन) पाँचको त्याग करे; उपरान्त (जो श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा) इन पाँचकी भावना करे; (जो, राग, द्वेष, मोह, मान, और झूठी धारणा इन) पाँचके संसर्गको अतिक्रमण कर चुका है; (वह काम, भव दृष्टि और अविद्यारूपी) ओघो (=बाढ़ों) से उत्तीर्ण हुआ कहा जाता है। ३७१—झाय भिक्खू ! मा च पामदो मा ते कामगुणे भमस्सु चित्तं । मा लोहगुळं गिली पमत्तो मा कंदी दुक्खमिदन्ति डय्हमानो ॥१२॥ (ध्याय भिक्षो ! मा च प्रमादः, मा ते कामगुणे भ्रमतु चित्तम् ।

२५।१५ ] भिक्खुवग्गो [ १६५ मा लोहगोलं गिल पमत्तः, मा क्रन्दीः दुखमिदमिति दह्यमानः ॥१२॥) अनुवाद—हे भिक्षु ! ध्यानमें लगो, मत गफलत करो, तुम्हारा चित्त मत भोगोके चक्करमें पडें, प्रमत्त होकर मत लोहेके गोलेको निगलो, '( हाय ! ) यह दुःख' कहकर दग्ध होते ( पीछे ) मत तुम्हें क्रन्दन करना पडे । ३७२–नत्थि झानं अपञ्ञस्स पञ्ञा नत्थि अझायतो । यम्हि झानञ्च पञ्ञा च स वे निब्बाणसन्तिके ॥१३॥ ( नाऽस्ति ध्यानमप्रज्ञस्य प्रज्ञा नाऽस्त्यध्यायतः । यस्मिन् ध्यानं च प्रज्ञा च सवै निर्वाणाऽन्तिके ॥१३॥) अनुवाद—प्रज्ञाविहीन ( पुरुष ) को ध्यान नहीं ( होता ) है, ध्यान ( एकाग्रता ) न करनेवालेको प्रज्ञा नहीं हो सकती । जिसमें ध्यान और प्रज्ञा ( दोनों ) हैं, वही निर्वाणके समीप है । ३७३–सुञ्ञागारं पविट्ठस्स सन्तचित्तस्स भिक्खुनो । अमानुसी रती होति सम्माधम्मं विपस्सतो ॥१४॥ ( शून्यागारं प्रविष्टस्य शान्तचित्तस्य भिक्षोः । अमानुषी रतिर्भवति सम्यग् धर्मं विपश्यतः ॥१४॥) अनुवाद—शून्य (=एकान्त ) गृहमें प्रविष्ट, शान्तचित्त भिक्षुको भली प्रकार धर्मका साक्षात्कार करते, अमानुषी रति (=आनंद ) होती है । ३७४–यतो यतो सम्मसति खन्धानं उदयव्वयं । लभती पीतिपामोज्जं अमतं तं विजानतं ॥१५॥

२३. नागवग्गो (नाग वर्ग)

१६६ ] धम्मपदं [ २५।१७ ( यतो यतः संमृशति स्कन्धानां उदयव्ययम् । लभते प्रीतिप्रामोद्यं अमृतं तद् विजानताम् ॥ १५ ॥) अनुवाद—( पुरुष ) जैसे जैसे ( रूप, वेदना, संज्ञा, सस्कार, विज्ञान इन ) पाँच स्कन्धोंकी उत्पत्ति और विनाश पर विचार करता है, ( वैसे ही वैसे, वह ) ज्ञानियोंकी प्रीति और प्रमोद ( रूपी ) अमृतको प्राप्त करता है । ३७५–तत्रायमादि भवति इध पञ्ञस्स भिक्खुनो । इन्द्रियगुत्ती सन्तुट्ठी पातिमोक्खे च संवरो । मित्ते भजस्सु कल्याणे सुद्धाजीवे अतन्दिते ॥१६॥ ( तत्राऽयमादिर्भवतीह प्राज्ञस्य भिक्षोः । इन्द्रियगुप्तिः सन्तुष्टिः प्रातिमोक्षे च संवरः । मित्राणि भजस्व कल्याणानि शुद्धाजीवान्यतन्द्रितानि ॥१६॥) अनुवाद—यहाँ प्राज्ञ भिक्षुको आदि( में करना ) है—इन्द्रिय- संयम, सन्तोष और प्रातिमोक्ष(=भिक्षुओंके आचार )की रक्षा । ( वह, इसके लिये ) निरालस, शुद्ध जीविकावाले, अच्छे मित्रोंका सेवन करे । ३७६–पटिसन्थारवुत्तस्स आचारकुसलो सिया । ततो पामोज्जबहुलो दुक्खस्सन्तं करिस्सति ॥ १७॥ ( प्रतिसंस्तारवृत्तस्याऽऽचारकुशलः स्यात् । ततः प्रामोद्यबहुलो दुःखस्याऽन्तं करिष्यति ॥१७॥) अनुवाद—जो प्रेम सत्कार स्वभाववाला तथा आचार( शास्त्र)में निपुण है, वह सानन्द दुःखका अन्त करेगा ।

२५।२० ] भिक्खुवग्गो [ १६७ जेतवन पाँच सौ भिक्षु ३७७-वस्सिका विय पुप्फानि मद्दवानि पमुञ्चति । एवं रागञ्च दोसञ्च विप्पमुञ्चेथ भिक्खवो ॥१८॥ ( वर्षिका इव पुष्पाणि मर्दितानि प्रमुंचति । एवं रागं च द्वेषं च विप्रमुंचत भिक्षवः ॥१८॥ अनुवाद—जैसे जूही कुम्हलाये फूलोंको छोड़ देती है, वैसे ही हे भिक्षुओ ! ( तुम ) राग और द्वेषको छोड़ दो । जेतवन ( शान्तकाय थेर ) ३७८-सन्तकायो सन्तवाचो सन्तवा सुसमाहितो । वन्तलोकामिसो भिक्खू उपसन्तो 'ति वुच्चति ॥१९॥ (शान्तकायो शान्तवाक् शान्तिमान् सुसमाहितः । वान्तलोकाऽऽमिषो भिक्षुः 'उपशान्त' इत्युच्यते ॥१९॥ अनुवाद—काया (और) बचनसे शान्त, भली प्रकार समाधियुक्त, शान्ति सहित (तथा) लोकके आमिषको वमन कर दिये हुए भिक्षुको 'उपशान्त' कहा जाता है । जेतवन लङ्कगूल (थेर) ३७६-अत्तना चोदय'त्तानं पटिवासे अत्तमत्तना । सो अत्तगुत्तो सतिमा सुखं भिक्खू विहाहिसि ॥२०॥ ( आत्मना चोदयेदात्मानं प्रतिवसेदात्मानं आत्मना । स आत्मगुप्तः स्मृतिमान् सुखं भिक्षो! विहरिष्यसि ॥२०

१६८ ] धम्मपदं [ २५।२३ अनुवाद—(जो) अपने ही आपको प्रेरित करेगा, अपने ही आपको संलग्न करेगा; वह आत्म-गुप्त (=अपने द्वारा रक्षित) स्मृति-संयुक्त भिक्षु सुखसे विहार करेगा ! ३८०—अत्ता हि अत्तनो नाथो अत्ता हि अत्तनो गति । ’ तस्मा सञ्ञममत्तानं अस्सं भद्रं'व वाणिजो ॥२१॥ (आत्मा ह्यात्मनो नाथ आत्मा ह्यात्मनो गतिः । तस्मात् संयमयात्मानं अश्वं भद्रमिव वणिक् ॥२१॥ अनुवाद—(मनुष्य) अपने ही अपना स्वामी है, अपने ही अपनी गति है; इसलिये अपनेको संयमी बनावे, जैसे कि सुन्दर घोड़ेको बनिया (संयत करता है) । राजगृह (वेणुवन) वक्कलि (थेर) ३८१—पामोज्जबहुलो भिक्खू पसन्नो बुद्धसासने । अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्खारूपसमं सुखं ॥२२॥ (प्रामोद्यबहुलो भिक्षुः प्रसन्नो बुद्धशासने । अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ॥२२॥ अनुवाद—बुद्धके उपदेशमें प्रसन्न बहुत प्रमोद्युक्त भिक्षु संस्कारोंको उपशमन करनेवाले सुखमय शान्त पदको प्राप्त करता है। श्रावस्ती (पूर्वाराम) सुमन (सामनेर) ३८२—यो ह वे दहरो भिक्खू युञ्जते । बुद्धसासने । सो इमं लोकं पभासेति अब्भा मुत्तो 'व चन्दिमा ॥२३॥

२५।२३ ] भिक्खुवग्गो [ १६९ (यो ह वै दहरो भिक्खुयुंक्ते बुद्धशासने। स इमं लोकं प्रभासयत्यभ्रान् मुक्त इव चन्द्रमा ॥२३॥) अनुवाद—जो भिक्षु यौवनमें बुद्ध-शासन (=बुद्धोपदेश, बुद्ध-धर्म ) में संलग्न होता है, वह मेघसे मुक्त चन्द्रमाकी भाँति इस लोकको प्रकाशित करता है। २५–भिक्षुवर्ग समाप्त