धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९९ ) (=परम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न न करके, बाह्य आचार और व्रतोंसे कृतकृत्यता मानना ), 'कामराग (=स्थूल-शरीर- धारियों के भोगोंकी तृष्णा ), रूपराग (=प्रकाशमय शरीर धारियोंके भोगोंकी तृष्णा ), अरूपराग (=रूपरहित देवताओंके भोगोंकी तृष्णा ), प्रतिघ (=प्रतिहिंसा ), मान (=अभि- मान ), औद्धत्य (=उद्धतपना ), और अविद्या । सम्बोज्झङ्ग (=संबोध्यंग )—स्मृति, धर्मविचय [(=धर्मपरीक्षा ), वीर्य (=उद्योग ), प्रीति, प्रश्रब्धि (=शान्ति ), समाधि, उपेक्षा । सामणेर (=श्रामणेर )—भिक्षु होनेका उम्मेदवार बौद्ध साधु, जिसे भिक्षुसंघने अभी उपसम्पन्न (=भिक्षुदीक्षासे दीक्षित ) नहीं किया । सील (=शील )—हिंसा-विरति, मिथ्याभाषण-विरति, चोरीसे विरति, व्यभिचारविरति, मादक द्रव्य सेवन-विरति—यह पाँच शील (=सदाचार ) गृहस्थ और भिक्षु दोनोंके समान हैं। अपराह्नभोजन त्याग, नृत्य गीत त्याग, माला आदिके शृंगार का त्याग, महार्घ शय्याका त्याग, तथा सोने चाँदीका त्याग, यह पाँच केवल भिक्षुओंके शील हैं। सेख (=शैक्ष्य )—अर्हत् (=मुक्त ) पदको नहीं प्राप्त हुए, आर्य (=स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी ) शैक्ष्य कहे जाते हैं, क्योंकि वह अभी शिक्षणीय हैं। सोतापन्न (=स्रोतआपन्न )—आध्यात्मिक विकास करते जब प्राणी इस प्रकारकी मानसिक स्थितिमें पहुँच जाता है, कि, फिर वह नीचे नहीं गिर सकता और निरन्तर आगे ही बढ़ता