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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

( १९९ ) (=परम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न न करके, बाह्य आचार और व्रतोंसे कृतकृत्यता मानना ), 'कामराग (=स्थूल-शरीर- धारियों के भोगोंकी तृष्णा ), रूपराग (=प्रकाशमय शरीर धारियोंके भोगोंकी तृष्णा ), अरूपराग (=रूपरहित देवताओंके भोगोंकी तृष्णा ), प्रतिघ (=प्रतिहिंसा ), मान (=अभि- मान ), औद्धत्य (=उद्धतपना ), और अविद्या । सम्बोज्झङ्ग (=संबोध्यंग )—स्मृति, धर्मविचय [(=धर्मपरीक्षा ), वीर्य (=उद्योग ), प्रीति, प्रश्रब्धि (=शान्ति ), समाधि, उपेक्षा । सामणेर (=श्रामणेर )—भिक्षु होनेका उम्मेदवार बौद्ध साधु, जिसे भिक्षुसंघने अभी उपसम्पन्न (=भिक्षुदीक्षासे दीक्षित ) नहीं किया । सील (=शील )—हिंसा-विरति, मिथ्याभाषण-विरति, चोरीसे विरति, व्यभिचारविरति, मादक द्रव्य सेवन-विरति—यह पाँच शील (=सदाचार ) गृहस्थ और भिक्षु दोनोंके समान हैं। अपराह्नभोजन त्याग, नृत्य गीत त्याग, माला आदिके शृंगार का त्याग, महार्घ शय्याका त्याग, तथा सोने चाँदीका त्याग, यह पाँच केवल भिक्षुओंके शील हैं। सेख (=शैक्ष्य )—अर्हत् (=मुक्त ) पदको नहीं प्राप्त हुए, आर्य (=स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी ) शैक्ष्य कहे जाते हैं, क्योंकि वह अभी शिक्षणीय हैं। सोतापन्न (=स्रोतआपन्न )—आध्यात्मिक विकास करते जब प्राणी इस प्रकारकी मानसिक स्थितिमें पहुँच जाता है, कि, फिर वह नीचे नहीं गिर सकता और निरन्तर आगे ही बढ़ता

( २०० ) जाता है; ऐसी अवस्थामें पहुँचे पुरुषको सोतापन्न कहते हैं। स्रोत (=श्रोतः)=निर्वाणगामी नदी प्रवाहमें जो आपन्न (=पड़ गया) है।* प्रज्ञाप्रासादमारुह्याऽशोच्यः शोचतो जनान्। भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति योगभाष्य १।४७ कामं कामयानस्य यदा कामः समृध्यते। अथैनमपरः कामः क्षिप्रमेव प्रधावते ॥ न्यायभाष्य ४।१।५७ न तेन वृद्धो भवति—म० ० । धम्म० १६।४

महाबोधि-सभा (संस्थापक—भिक्षु श्री देवमित्र धर्मपाल) चालीस वर्षसे यह सभा भारतियोंको आत्मविस्मृतिसे उठाने, एवं भगवान् बुद्धके दिव्य सन्देशको पहुँचानेका प्रयत्न कर रही है। निम्न संस्थाओंका यह संचालन कर रही है— १. मूलगन्धकुटी विहार, ऋषिपत्तन, सारनाथ (बनारस)। एक लाखसे ऊपर रुपये खर्च कर ७०० वर्ष बाद सभाने (१) इस मन्दिरको उस पवित्र स्थान पर बनवाया है, जहाँ पर भगवान् बुद्धने संसारको सब प्रथम अपना धर्म-सन्देश दिया। (२) इसके साथ ही ८०००) के व्ययसे पुस्तकालय-भवन बनाया गया है। इसके साथ पुस्तकालय, अन्तर्राष्ट्रीय-विद्यालय, भिक्षु-आश्रम, निःशुल्क हिन्दी स्कूल हैं। शीघ्र ही एक धर्मार्थ चिकित्सालय भी खुलने जा रहा है। २. श्रीधर्मराजिका-चैत्य-विहार, ४ए, कालेज स्कायर, कलकत्ता। मंदिर, विश्रामगृह, पुस्तकालय, वाचनालयके साथ। ३. झाडिवत्था-स्मारक धर्मशाला, मेकवर्गोपगंज, गया। संसार भरके बौद्ध यात्रियोंकेलिये धर्मशाला, साथ ही एक निःशुल्क पाठशाला भी है। ४. महाबोधि-विश्रामगृह, बोधगया। ५. फोस्टर-स्मारक-शाला, पेराम्बुर, मद्रास। विश्राम-गृह, प्रचार- केन्द्र और प्राथमिक स्कूल। ६. Mahabodhi Journal (Calcutta), यह मासिकपत्र ४० वर्ष से निकल रहा है। वार्षिक मूल्य ५) है। ७५) भेजकर आजही सब ग्राहक बन सकते हैं। इनके अतिरिक्त इङ्गलैण्ड और युरोपमें बौद्धधर्म-प्रचारकेलिये लन्दनमें प्रचारक-मंडल (Buddhist Mission, 41, Gloucester Road, London, N. W. 1.) है। कोलम्बो में भी चिकित्सालय, विद्यालय आदि कितनी ही संस्थायें हैं। ऐसी संस्था आपकी सहायताका पात्र है। —ब्रह्मचारी देवप्रिय, प्रधान मंत्री, महाबोधिसभा, ऋषिपत्तन, सारनाथ (बनारस)।

विक्रेय पुस्तकें अनागारिक धर्मपाल— भगवान बुद्धके उपदेश (हिन्दी) What did Lord Buddha teach ? 0 4 0 Relation between Buddhism and Hinduism 0 4 0 World's Debt to Buddhism 0 4 0 पंडित शिवनारायण— Sarnath—A Guide 0 3 0 Buddhism 0 2 0 Asoka 0 2 0 Dr. S. N. दासगुप्त— Message of Buddhism 0 2 0 Miss A. C. Albers,— Jataka Stories for children 0 4 0 Life of Buddha for children 0 4 0 महाबोधि-पुस्तक-भंडार, ऋषिपतन सारनाथ (बनारस) । Allahabad Law Journal Press, Allahabad