ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थात् विश्वमें जहां कहीं हलचल है वहां यह तत्व व्याप्त है और सब पर अपना स्वामित्व रखता है। ईश्वर शब्दसे स्वामित्व और सर्व-व्यापकत्वका बोध होता है। भारतीय तत्त्वज्ञान तथा सांस्कृतिक साहित्यमें इस शब्दका अत्यंत महत्त्व है। ऋग्वेदमें ईश्वर शब्द कहीं नहीं आया है। किंतु ईश ईशर् धातुजन्य ईश, ईशज, ईशान आदि शब्द इंद्रादिके लिये आये हैं। संभवतः भगवद्गीतामें ईश्वर शब्दका पहला ?- प्रयोग हुआ है। मनुस्मृतिमें भी इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। वहांसे यह परमेश्वरके रूपमें - संप्रदायातीत रूप- भारतीय तत्त्वज्ञानमें स्थान स्थान पर आया है। ईश्वर या परमेश्वर वैदिक देवता समूहका देवता नहीं है। यह उससे परेकी शक्ति है। ब्रह्मा विष्णु महेश भी परमेश्वर नहीं है। वस्तुतः वैदिक देवताओंके पीछे जो एक शक्ति थी और इंद्र, अग्नि, यम मातरिश्वा आदि नामसे पहचानी जाती थी उस शक्तिका परिचय देनेके लिये ईश्वर या परमेश्वर शब्दका प्रयोग किया गया है। संभवतः वेदांतके नपुंसकलिंगी ब्रह्मका - पूजार्थ - पुल्लिंगी ईश्वर अथवा परमेश्वर बन गया हो, क्यों कि नपुंसकलिंगीकी पूजा अर्चा नहीं होती। इस दृष्टिसे ज्ञानमार्गके ब्रह्मका भक्तिमार्गी ईश्वरमें परिवर्तन कह सकते हैं। या ईश्वर निराकार निर्गुण ब्रह्मका साकार सगुण रूप है ! वेदांतियोंका "ब्रह्म" नकारात्मक सत्ता है। नेति नेति है। प्रत्येक प्रश्नका नहीं नहीं नहीं उत्तर देनेके बाद जो रहता है - प्रश्न और उत्तर दोनों मौन है - वह ब्रह्म है तो ईश्वर प्रत्येक प्रश्नका उत्तर "हाँ" में देता है। ईश्वर सर्वव्यापी है। सभी ईश्वर है। भारतके विविध दर्शनोंके मूल सूत्रोंमें ईश्वरका दर्शन होता है। उसका रूप खिलता जाता है। यह ईश्वर संप्रदायातीत है। विश्व-व्यापारमें जो योजकता और नियमितता दिखाई देती है उसको देख कर "यह सब चलानेवाला कोई शासक" है इस कल्पनामेंसे ईश्वरका उदय हुआ होगा। ब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंमें "शासक" का भाव नहीं है। इसी बातको लेकर दार्शनिकोंने ईश्वरके विषयमें निम्न आठ बातें कहीं हैं। (१) विश्व रचना और व्यापार नियमबद्ध है। इसकी गतिके नियम सूक्ष्म, सुसूत्र और निश्चित हैं। कहीं कोई गड़बड़ नहीं, अव्यवस्था नहीं। इसलिये इसका निर्माण तथा संचालन करने- वाला कोई शासक है और वह ईश्वर है। (२) विश्वकी गतिमें एक निश्चित प्रेरणा है। इसलिये इसका कोई प्रेरक है। वही ईश्वर है। (३) विश्वमें सर्वत्र संकल्प और हेतुका दर्शन होता है। वह जिसके मतमें है वही ईश्वर है। (४) प्राणियोंके सो जाने पर भी विश्व रहता ही है। इसलिये इन सबका अनुभव लेनेवाला कोई है। और वही ईश्वर है। (५) इस विश्वमें सुंदर मंगलमय जो जो कुछ है उसके मूलमें नित्य नूतन अनंत प्रतिभा होनी ही चाहिए। यह प्रतिभा जिसकी है वही ईश्वर है। (६) शुभ-अशुभ, भला-बुरा आदिका निश्चय करनेवाली कोई शक्ति होनी ही चाहिए, वैसे ही उसका निर्णय करनेवाला कोई न्यायाधीश। वही ईश्वर है। (७) जिसका मूल्य माने बिना धैर्यसे संसारमें कुछ करना असंभव है वह मूल्य ही ईश्वर है। ११० परिशिष्ट ५