भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1064, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1064

(८) विश्वके अग्याग्य मानवोंके धार्मिक जीवनके परिणामस्वरूप जो अतींद्रिय अनुभव आता है वही ईश्वर साक्षात्कारका अनुभव है। विश्वके अग्याग्य मानवी समुदायके मनीषी ऋषी मुनि तथा साधुसंतोंका अनुभव इसका साक्षी है। (१) न्याय-दर्शनमें ईश्वरका महत्त्वका स्थान है। बिना ईश्वरानुग्रहके किसीके विश्वकी समस्याओंका यथार्थ ज्ञान हो ही नहीं सकता। बिना ईश्वरानुग्रहके मुक्ति असंभव है। ईश्वर सृष्टि स्थिति लयका कर्ता है। नैयायिक (१) कार्यकारण संबंध (२) अदृष्ट, (३) वेदप्रामाण्य इन तीन आधारभूत प्रमाणोंसे ईश्वरका प्रतिपादन करते हैं। (२) योग-दर्शनमें ईश्वर ही सब कुछ है। योगमें क्लेश, कर्म विपाक और आशयसे रहित पुरुष विशेष ही ईश्वर है। योगदर्शनके ईश्वर प्रमाणके आधार है (१) वेद (२) विश्वकी ज्ञान प्रवाहका मूलस्रोत ही ईश्वर है। गुरुत्वका आदिपीठ ईश्वर है। (३) प्रकृति पुरुषकी संयोजक शक्ति ही ईश्वर है। (३) मीमांसादर्शनमें प्राचीन मीमांसक निरीश्वरवादी थे किंतु आगे यह बात गलत होनेका भान हुवा होगा मीमांसकोंको। उत्तरकालीन मीमांसकोंने (१) कर्मफलके दाताके रूपमें (२) तथा यज्ञपतिके रूपमें ईश्वरको स्वीकार किया। (४) वेदांतदर्शनमें (१) सविशेष ब्रह्म ईश्वर है (२) विश्वके सृष्टि स्थिति लयका कारण ईश्वर है। (३) यह सारा विश्व उस सर्वज्ञ ईश्वरकी लीला है। (५) गीतामें सभी पहलुओंसे ईश्वरका विचार हुवा है। ज्ञानेश्वरीके सैकडो ओवियोंमें इसका विवेचन देखनेको मिल सकता है। उड्डियानबंध - उड्डियान — सारा श्वास बाहर करके पेट अंदर खींच कर निःश्वास करना । एक प्रकारसे यह बाह्य-कुंभक-सा है। प्राणायाममें बाहरका वायु-पूरकद्वारा-अंदर खींच कर पेटमें रोककर कुंभक करते हैं। वैसे ही पेटका वायु-श्वास-बाहर डालकर-रेचकद्वारा उड्डियान करके बाहर रोका जाता है। पेटको संपूर्ण श्वास रहित करके पापडकी भांति-पीठसे चिपका देनेकी क्रिया ही उड्डियानबंध है। हठ योगमें इसको "मृत्युगण केसरी" कहा गया है। यह बंध त्रिदोषोंका नाश करता है। प्राणको स्थिर करता है। सुषुम्नाका द्वार खोलता है। उत्तरायण — सूर्यका उत्तरकी ओर मुडना । मकर संक्रांतिसे कर्क संक्रांति तक का काळ सामान्यतया जानेवारी १४ से छ महीने। इन दिनोंमें मरनेसे मोक्ष प्राप्ति होती है ऐसी मान्यता है। उत्तरायणमें अधिक सूर्यप्रकाश रहता है। उदान — पंच-प्राणमें यह चौथा है। यह कंठस्थानमें होता है। इसकी गति ऊपरकी ओर होती है। यह वाणीका-वाक् शक्तिका-आधार है। बोलना गाना आदि क्रियायें इसी उदानके कारण होती हैं। वाणी मनुष्यका सारतत्त्व है। वाङ्मय इसका रूप है। इसी उदानके कारण वाग्ब्रह्मका स्फोट होता है। उदानसे शब्दोत्पत्ति है ! संभवतः इसीलिए प्रणवको उद्गीथ कहते हों। बौद्ध साहित्यमें उदानका अत्यंत महत्त्व माना गया है। यह कहा गया है कि बुद्धके सारे उपदेशका मूल उदान है। उपनिषदमें प्रणवको उद्गीथ कहा गया है। ज्ञानेश्वरी ११८