ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्मनी-अवस्था- सामान्यतया मनुष्यकी तीन अवस्थायें होतीं हैं। इनको (१) जागृति, जगते रहना (२) सुषुप्ति = सोना (३) स्वप्न । इन तीन अवस्थाओंके अलावा एक, चौथी अवस्था होती है। उसको तुर्यावस्था अथवा उन्मनी कहते हैं। इस अवस्थाका वर्णन दो प्रकारसे किया गया है। (१) मनोबय होने से । इसके अनुसार मनका मनत्व (संकल्प विकल्प) रहता ही नहीं। (२) इंद्रिय मनादिको साक्षी रूपसे देखनेकी शक्ति। अपने चित्स्वरूप अथवा आत्मरूपका बोध होनेपर ही यह स्थिति संभव है। केवल सच्चिदानंदके समरसैक्यके बोधसे ही यह संभव हो सकता है। इसलिये तुर्यावस्थाका अर्थ अद्वयानंद ऐसा किया गया है। उन्मनी-मुद्रा- हठयोगकी अनेक मुद्राओंमें एक मुद्रा। इसमें साधक नासिकाग्रमें दृष्टि स्थिर रख कर भुकुटियां ऊपर चढ़ाता है। और धीरे धीरे दृष्टि भ्रुकुटिमध्यमें लाता है। साधकको इस उन्मनी साधनासे महान् लाभ होता है। चित्त एकाग्र होता है ऐसे गोरख कबीर आदि योगमार्गी संतोंने कहा है। उन्मनी मुद्रासे उन्मनी भाव जगता है। उन्मनी अवस्था देखें। उपनिषद्- वैदिक तत्वज्ञानका संग्रह ! उपनिषदोंमें प्राचीन भारतीय तत्वज्ञानका विचार किया गया है। उपनिषदका शब्दार्थ है पास बैठना । अत्यंत भक्तिभावसे, अपनेको गुरु सेवामें विलीन-निःशेष- करके गुरुसे तत्वग्रहण करना उपनिषद् है । अविद्याको नष्ट करके ब्रह्मविद्याको ग्रहण करना उपनिषद् है। ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन करनेवाले ऐसे अनेक उपनिषद हैं जिनमें १२८ प्रकाशित हुए हैं। इनमें १४ उपनिषद प्राचीन मानते हैं। उनमें भी दस अत्यंत महत्वके हैं। उपनिषदोंमें कुछ पद्यमय तो कुछ गद्यमें हैं। कुछ गद्यपद्यात्मक हैं। ई पू. १८०० वर्षोंसे ई. स. ६०० वर्ष तक यह उपनिषदका काल माना जाता है। उपनिषदमें " जिसका ज्ञान होनेसे अन्य सबका ज्ञान अपने आप होता है वह तत्व कौन है ?" ऐसा प्रश्न करके उस तत्वका विचार किया गया है। इस तत्वकी खोज करते करते समग्र विश्वका-सृष्टिका विचार किया गया है। साथ साथ सृष्टिके मूलमें जो सत्य है, उसके परे कुछ भी नहीं और वह मनुष्य मात्रका प्राप्य है यह कहा गया है। वैसे ही उस सत्य-तत्वको प्राप्त करनेकी साधना भी कही गयी है। अर्थात् उपनिषदमें (१) तत्कालीन ऋषि व आचार्योंकी कुछ जानकारी मिलती है। (२) आत्मा अथवा ब्रह्मकी पूर्ण जानकारी-तब तक जो थी वह मिलती है। (३) सृष्टि व सृष्टि रचनाक्रमकी पूर्ण जानकारी है। (४) जीव तथा जीवन विषयक ज्ञान है। (५) मोक्ष विषयक सिद्धांत है। (६) उसकी साधना विषयक विवेचन है। (७) नीति-नियम है। इस प्रकार सृष्टि, सृष्टि कर्ता तथा मानव जीवन विषयक ज्ञान उपनिषद् में हैं। १२८ उपनिषदोंमें (१) ईश (२) केन (३) कठ (४) प्रश्न (५) मुंडक (६) मांडूक्य (७) ऐतरेय (८) तैत्तिरीय (९) छांदोग्य (१०) बृहदारण्यक (११) कौषीतकी (१२) मैत्रेय (१३) श्वेताश्वतर ये उपनिषद प्रमुख हैं। इनके अलावा भी ११५ उपनिषद हैं। उपाधि- जो पीछेसे चिपका हुआ। जैसे किसीको बीए, एम्. ए, तो किसीको, आचार्य-महात्मा तो किसीको नेता आदि "उपाधि" चिपकती है। जन्मतः यह उसकी नहीं ११९ परिशिष्ट ५