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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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होती । वैसे जीवको देहादि प्रपंच चिपक जाता है। मूलतः उसका नहीं होता। नाम रूप, रंग, गुण, आकार आदि जीवकी उपाधि है। इस उपाधिके कारण संसारकी, अन्य उपाधियां मामा, चाचा, लडका, बाप, भाई, भला, बुरा आदि भी चिपकी हुई हैं। देह, मन, इंद्रियादि जीवकी उपाधियां हैं। वैसे ही सारा ब्रह्मांड ब्रह्मकी उपाधि है।—उपाधि सदैव भासमान है। आभास निर्माण करती है, तथ्य नहीं । इसके साथ निरुपाधिक शब्द आता है। मूल ब्रह्म, आत्मा। जहां जिसे कुछ भी न चिपका हो ऐसा शुद्ध चैतन्य। जैसे परब्रह्म निरुपाधिक है। रामकृष्णादि सोपाधिक हैं। उपासना—उपनिषदकी भांति उपासना शब्दका अर्थ भी पास बैठना है। वहां गुरुके पास बैठकर गुरुके समान होना है। तो (२) यहां देवता अथवा ब्रह्मके पास बैठकर देव या ब्रह्म-बनना है। उपासनासे भक्त अपने इष्टके पास बैठकर उसकी कृपासे कृतार्थ होता है। ईश्वर, उपासनाका सर्वश्रेष्ठ विषय है। ईश्वर साकार ब्रह्म है। इसलिये वह वास्तविक उपास्य है। उपासनामें दो प्रकार हैं। (१) सकाम (२) निष्काम। (१) किसी उद्देश्यके लिये ईश्वरके पास जाना सकाम उपासना है। तो केवल ईश्वरके पास बैठनेका ही उद्देश्य रहना निष्काम उपासना है। पूजा, ध्यान, तथा जप उपासनाका त्रिविध रूप है। इसके अलावा निष्काम कर्म, लोकसेवा, शास्त्राभ्यास आदि भी उपासना है। उपासना भारतीय संस्कृतिका प्राचीनतम अंग है जैसे यज्ञ। भारतीय अध्यात्म साधनामें कर्म, ज्ञान, उपासना इसको कांड त्रय कहा गया है ! गीतामेंभी इसका विवेचन है। उपनिषदोंमें ब्रह्मोपासना, प्रणवोपासना आदि उपासना प्रकार हैं ही। ब्रह्म पदारोहणके लिये इसकी आवश्यकता मानी गयी है। मूर्तिपूजा उसका बाह्यरूप है। मूर्तिपूजा कोई अर्वाचीन रूढी नहीं है। भारतमें मूर्तिपूजा भी अत्यंत प्राचीन है। यजुर्वेद, अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण आदिमें भी इसका रूप देखनेको मिलता है। मूर्ति चैतन्य-भावका प्रतीक है। यज्ञाग्नि भी मूर्ति है। उपासनामें (१) बहिरंगोपासना (२) अंतरंगोपासना (३) देव, ऋषि, पितरोपासना (४) अवतारोपासना (५) सगुण ब्रह्मोपासना (६) निर्गुण ब्रह्मोपासना ऐसे छह प्रकार हैं। इन सभी प्रकारका आधार श्रद्धा है। उपासनाके लिए श्रद्धा भक्ति अत्यंत आवश्यक है। बिना इसके उपासना व्यर्थ है। ॐ—प्रणव एकाक्षर ब्रह्म। इसी आदि ध्वनिसे वेदादि ज्ञानका विस्तार माना गया है। उपनिषदोंमें कहा गया है "सभी वेद जिस पदकी घोषणा करते हैं, सभी तप उसीकी बात करते हैं, उसकी इच्छा करनेवाले ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं वह पद ॐ है !" यह पद "अ + उ + म्" मिलकर हुआ है। इसके चार विभाग जागृति, सुषुप्ति, स्वप्न तथा तुर्यावस्थाका द्योतक माने गये हैं वैसे ही विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तथा आत्मा ऐसे चार आत्म- स्वरूपका भी द्योतक माने गये हैं,। वैसे ही अ= विष्णु उ= ईश्वर म=ब्रह्मा इन त्रिमूर्तियोंको भी ॐ में लपेट दिया है ! ज्ञानेश्वरी १२०