ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वप्रथम इस अक्षरब्रह्मकी महती ऋग्वेदके पहले मंडलमें दीर्घतमा ऋषि निम्न मंत्रमें गाता है, रचा है इस महा अक्षर पर ऋचात्मक पर-ब्रह्म । इसमें अधिष्ठित हैं सभी देव अर्थ-रूपमें स-विश्व ॥ न जानते जो इस अक्षरको क्या करेंगे लेकर वेद । जानते जो इस अक्षरको वे धीमान् होते हैं कृतार्थ ॥ इसके बाद ब्राह्मण और उपनिषदोंने इसको रहस्यात्मक बनाया है । ऐतरेय ब्राह्मणमें- "भूर्भुवः स्वः" इनमेंसे अ + उ+ म् की उत्पति बताकर उसका उत्पत्ति - स्थिति - लयसे संबंध जोडा । इसके बाद उपनिषदोंने इसको रहस्यमय बना दिया है । उपनिषदोंने ॐ के गूढार्थका अनेक प्रकारसे विकास किया है । वेदाध्ययनके प्रारंभ और अंतमें इसका संपुटाकार उपयोग करनेका विधान भी कहा गया । नहीं तो वेदाध्ययन व्यर्थ है !! आगे चल कर कहीं कहीं यह भी कहा गया है "वेद मंत्रोंको ॐकारका संपुट न करनेसे वेदाध्ययन ही नष्ट होगा !! वैसे ही प्रायश्चित्तके लिए भी प्रणवका उपयोग कहा गया है । उपनिषदोंमें तो "ॐ" ही ब्रह्म है । यही सगुण और निर्गुण उपासनाका आलंबन है । उपनिषद् कहते हैं "असीम ब्रह्म "ॐ" में सीमित हो जाता है।" "ॐ" ब्रह्मांडका बीज है । यह सारा विश्व "ॐ" का स्फुरण है । जैसे वृक्ष बीजका स्फुरण है !" उपनिषदोंमें ॐ के अ, उ, म् इन तीन अंगोंका निम्न प्रकारसे विश्लेषण किया गया है । ॐ ┌─────────────┼─────────────┐ अ उ म् अवस्था:- जागृति स्वप्न सुषुप्ति शरीर:- स्थूल सूक्ष्म कारण आत्मरूप:- वैश्वानर तैजस प्राज्ञ स्थिति:- आदि मध्य अंत्य वेद:- ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद लोक:- भूलोक अंतरिक्ष ब्रह्मलोक वाक् मन प्राण यज्ञ दान तप तत्वमसि:- स्वम् असि तत् उद्गीथ:- उत् गीः थम् गुण:- तमस रज सत्त्व ऐसा यह विश्लेषण इतना अधिक है कि "ओं" पर एक छोटीसी पुस्तिका हो सकती है । ॐ की उपासना केवल सोऽहम् अथवा शिवोऽहम्की उपासना ही नहीं "सर्वोऽहम्" का (७) १२१ परिशिष्ट ५