ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्फूर्ति-स्थान है। वहां विश्व समरसैक्यकी बोधानुभूति है जिससे मनुष्य प्राणिमात्रका प्रतिनिधि बन कर सदैव विश्व - हितरत रह कर— “विश्व ही मेरा घर । ऐसी मति है स्थिर । हुवा स चराचर । अपनेमें आप ॥ बन जाता है। गीतामें भी इसका पर्याप्त विचार किया गया है। ज्ञानेश्वरीमें भी पर्याप्त लिखा है। आगे प्रणवमें भी इसके अतिरिक्त कुछ देख सकेंगे। करुणा—मनुष्यके आध्यात्मिक विकासके लिये करुणा अत्यंत आवश्यक वृत्ति है। दुःखी जीवोंके विषयमें सहानुभूतिसे करुणाका उदय होता है। चित्तकी शांति, समता, प्रसन्नता आदिके विकासके लिये भी करुणावृत्ति आवश्यक है। पातंजल योगसूत्रोंमें मैत्री, मुदिता, व उपेक्षाके साथ करुणाका भी उल्लेख किया गया है। बौद्ध साधनामें करुणाका महत्त्वका स्थान है। ईश्वरको जैसे करुणामय कहा गया है वैसे ही बोधिसत्वको भी करुणासे ओतप्रोत कहा गया है। दुःखियोंके हितके लिए सदैव तैयार रहना ही करुणा है। कर्म—करना, हलचल, व्यापार, आदि इसके शब्दार्थ हैं। ऋग्वेदमें कई बार यह शब्द आया है। वहां “वीर कृत्य” अथवा “धर्मके काम” इस अर्थमें यह शब्द आया है। मीमांसा में “फलापेक्षासे लोगोंसे जो जो कुछ किया जाता है, तथा प्रवाह रूपसे जो बीजमेंसे अंकुर अंकुरमेंसे बीज-ऐसे- अनादि अनंत है” वह ! ऐसा कर्म शब्दका अर्थ किया गया है। गीतामें “मनुष्य जो कुछ करता है वह सब कर्म” ऐसा कहा गया है। सोना, उठना, श्वासोच्छ्वास, हृदयक्रिया रक्ताभिसरण, और क्या अंतमें मरनाभी एक कर्मही है। इसीलिए ईशावास्योपनिषदमें “देहधारीके लिए बिना कर्मके दूसरा रास्ता ही नहीं !” ऐसा कहा गया है। गीतामें फिर एक बार “मनुष्य बिना कुछ किये क्षण भर भी नहीं रह सकता” कहते हुए कर्मकी व्याख्या स्पष्ट की है। कर्म पर विचार करनेवाले विचारकोंने इसके दो विभाग किये हैं। अर्थकर्म और गुणकर्म। आत्मगत अपूर्व उत्पन्न करनेवाला कर्म अर्थकर्म है। जैसे अग्निहोत्रादि । इस अर्थकर्मके तीन विभाग है। नित्यकर्म, नैमित्तिककर्म, तथा काम्यकर्म । नित्यकर्म, संध्या, अग्निहोत्र आदि। नित्य-कर्म करनेसे कोई पुण्य नहीं मिलता, किंतु नहीं करनेसे पाप लगता है। अग्निहोत्रादि नित्यकर्ममें व्यत्यय आया तो उसके लिये प्रायश्चित्त है। नैमित्तिक कर्म, मातापितादिके मृत्युदिवसके उपलक्ष्यमें किया जानेवाला श्रद्धादि, ग्रहणादि पर्वकालोंमें समुद्र-स्नानादि, नैमित्तिक कर्म यदि निमित्त न हो, तब करनेकी आवश्यकता नहीं। तथा मनमें कोई इच्छा रखकर इच्छासे प्रेरित होकर, किया जानेवाला काम्य कर्म। काम्य कर्ममें अनेक प्रकार हैं। काम्य कर्ममें भी तीन प्रकार हैं। (१) केवळ ऐहिक सुखप्राप्तिके लिये किये जानेवाले कर्म (२) केवळ पारलौकिक सुखप्राप्तिके लिये किये जानेवाले कर्म (३) तथा ऐहिक और पारलौकिक सुख प्राप्तिके लिये किये जानेवाले कर्म। ये सारे अर्थकर्मके प्रकार हुए। गुणकर्मके अनेक प्रकार हैं। ये मनुष्यके संस्कारोंके विकासके किये अथवा संस्कारक्षम बनानेके लिये किये जानेवाले कर्म हैं। जैसे स्वाध्याय आदि। इसके अलावा वर्णाश्रमके कर्म, प्राप्तकर्म, कर्तव्य कर्म, आदि कर्मके अनेक प्रकार हैं जिसका विवेचन लोकमान्य तिलकजीके गीता रहस्यमें देखनेको मिलेगा। ज्ञानेश्वरी १२२