भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कर्ममार्ग, कर्मयोग—देहधारीको कर्म अनिवार्य है। बिना कर्मके रहना भी असंभव। और, जैसे बीजसे अंकुर और अंकुरसे बीजकी अनंत परंपरा चलती जाती है वैसे कर्मसे जन्म और जन्मसे कर्मकी भी एक परंपरा है ! इस परंपरासे अथवा उलझनसे छूटकर जन्म-मरण चक्रसे छूटना संभव है क्या ? यदि संभव है तो कैसे ? इस प्रश्नके उत्तरमें गीता कहती है "संभव है।" कुशलता पूर्वक कर्म करके यह संभव है! यह "कर्मकुशलता ही कर्मयोग है!" इस कर्म- कुशलताको समझाते समय गीता कहती है "जैसे जले हुए बीजका अंकुर नहीं फूटता वैसे दग्ध कर्मसे भी जन्मोदय नहीं होता!" यह दग्ध कर्म प्रणाली ही कर्मकुशलता अथवा कर्मयोग है। जिससे कर्म होता रहे और उसमेंसे जन्मका अंकुर नहीं फूटे। बंधनका कारण-रूप कर्म मोक्ष कर्म हो। यह कैसे होगा ? फलाशा छोड़कर। निरिच्छ भावसे कर्म करके। इसके विविध प्रकार बताते हुए गीतामें (१) लाभ-हानिका विचार न करते हुए समबुद्धिसे कर्म कर (२) निरिच्छ भावसे केवल कर्तव्य मान कर कर्म कर (२) फलाशा न रखते हुए लोकसंग्रहार्थ अथवा लोकहितार्थ कर्म कर (३) निष्काम भावसे देहधर्म मानकर कर्म कर (४) ईश्वरार्पण भावसे सभी कर्म कर (५) अनासक्त हो कर प्राप्त कर्म कर (६) सदैव सर्वत्र 'इदं न मम' भावसे कर्म कर (७) शून्य भावसे न करनेका सा कर्मकर कर्म कुशलताके ऐसे अनेक प्रकार बताये हैं। "फलाशा-त्याग" कर्मकुशलताका रहस्य है। यह सांपका विष-दंत तोड कर सांपको खिलानेकी कला है। कर्म पर अपना स्वामित्व स्थापन करके कर्मका नेतृत्व करनेकी कला ही कर्मकुशलता है। तब मनुष्य कर्मसे आवृत्त, बद्ध नहीं होता ! कर्म-क्षय—आध्यात्मिक दृष्टिसे तीन प्रकारके कर्म होते हैं। प्रारब्धकर्म, संचितकर्म, क्रियमाण। पूर्व जन्ममें प्रारंभ किये गये जिस कर्मके परिणामस्वरूप यह जन्म मिला है उस कर्मको प्रारब्ध कर्म कहा जाता है। इसको "दैव" भी कहा गया है। जन्मजन्मांतरसे जिस कर्मके संस्कारोंका संचय हुवा है वह संचित कर्म है। मानवी जीवन अत्यंत गहरा है। वह जन्मजन्मांतरके संस्कारोंका महासंचय अथवा महाकोश है। संस्कारके इस महाकोशको संचित कर्म कहा गया है। इसीसे पुनः पुनः अलग अलग वासनाएं जागृत होकर कर्मकी प्रेरणा देती हैं। इसी संचित-कर्मसे नित नयी वासनाओंका अंकुर फूटता है और कर्मका सिलसिला चल पड़ता है। उनमेंसे नित नये कर्म और कर्म-बीज बनते, अंकुरते रहते हैं। कर्म और जन्मचक्रको गति मिलती है और क्रियमाण-वर्तमानमें चालू क्रियायें हैं। इस जन्ममें जीते जागते काया-वाचा-मनसे जो कर्म होते हैं वे सब क्रियमाण हैं। इन कर्मोंके साथ इन कर्मजन्य संस्कार भी क्रियमाणमें आते हैं। प्रत्येक जीव इन तीन प्रकारके कर्मसे बंधा हुवा है। इसी कर्म-बंधनके कारण वह बद्ध है। कर्माधीन है। साधकको शांत भावसे तटस्थ भावसे, साक्षीरूप रहकर इदं न मम भावका अनुभव करते हुए सबकुछ आत्मार्पण करके सतत और सर्वत्र आत्म-चिंतनरत रह करके इन तीनों प्रकारके कर्मोंका नाश करना है। वास्तविक साधना यही है। इससे वासना विलोप हो कर पूर्णत्वके शाश्वत आनंदका अनुभव आने लगता है जिसे महानंद कहा गया है। कल्पवृक्ष अथवा कल्पलता—यह स्वर्गका एक वृक्ष है। भारतीय साहित्यमें अत्यंत प्राचीन कालसे इसका उल्लेख मिलता है। इसकी छायामें बैठकर जो कुछ चाहते हैं वह सब मिलता है। यह चित्र विचित्र महीन कपडे, स्वादिष्ट अन्न, मद्य, मध, तथा अलंकार देता है, ऐसे कालिदासने लिखा है। भारतके प्राचीन शिल्पमें इसकी आकृतियां देखनेको मिलती हैं। राजाके १२३ परिशिष्ट ५