भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1070, कुल 1172 में से

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सिंहासन पर वह होना ही चाहिए ऐसी मान्यता है। केवल हिंदू धर्ममें ही नहीं पूर्व पश्चिम पृथ्विीके सभी धर्मोंमें ये कल्पनाएँ हैं। ईसाई और मुसलमान धर्मके स्वर्गमें भी यह वृक्ष होता है। माना जाता है कि इस वृक्षमें बारह प्रकारके फल लगते हैं। काकीमुख - सुषुम्ना नाडीका ऊपरका सिरा जो ब्रह्मरंध्रके पास होता है। काकीमुद्रा - हठयोगकी एक मुद्रा। इसमें जीभको कौवेकी चोंचकी भांति गोल बना कर इसमेंसे धीरे धीरे श्वास अंदर लेना - पूरक करना-होता है। प्राणायामके जो अनेक प्रकार हैं उनमें शीतका प्राणायाममें यह एक प्रकार है। इससे सभी शारीरिक रोग नष्ट होते हैं और शरीर संपूर्ण स्वस्थ रहता है। कलियुग - चारयुगोंमें एक, अंतिम युग। महाभारत युद्ध जब प्रारंभ हुवा था उसी समय द्वापरका अंत होकर कलियुगका प्रारंभ हुवा है। दूसरे शब्दमें कहें तो, भारत-युद्धसे कलियुगका प्रारंभ कह सकते हैं। इस युगका प्रारंभ ई. पू० ३१०२ फरवरी २८ से प्रारंभ हुवा ऐसे माना जाता है। भारत युद्धके कालके विषयमें विद्वानोंमें बडा मतभेद है। कुछ विद्वान मानते हैं कि भारत युद्ध ई. पू. १४२० में हुवा था । किंतु मैसूर राज्यके विजापुर जिलाके ऐहोलेमें जो शिला- शासन मिला है उसके विषयमें कहा जाता है कि भारत युद्धके कालनिर्णयमें वह अत्यंत महत्त्वका है। वह पूर्व चालुक्यके दूसरे पुलकेशीके समयका है। उसमें लिखा है कि जब कलियुगके ३७३५ वर्ष बीत चुके हैं शकके ५५६ वर्ष बीते तब यह प्रशस्ति लिखी जा रही है। इसका अर्थ है शालिवाहन शक से ३१७९ वर्ष पूर्व भारत युद्ध हुवा था अर्थात तभी कलियुग प्रारंभ हुवा। जेसलमेरमें भी एक शिला लेख मिला है वह भी यही गणित कहता है। उसमें शालिवाहन शक और युधिष्ठिर शकका अंतर ३१७९ है। कलियुग ४३००० वर्षका है। प्राचीन ग्रंथोंमें कलियुगका अर्थ असत्प्रवृत्तियोंका बढ़ते जाना ऐसा कहा गया है। कल्प, कल्पांत - ब्रह्माके एक दिनको कल्प कहा जाता है। चार युगोंकि एक हजार आवर्तनोंसे ब्रह्माका एक दिन- प्रातःकालसे संध्याकाल होता है। इतने ही समयकी एक रात्र होती है। इस अहोरात्रको दिन रातको कल्प कहा जाता है। एक कल्पमें ४३२००००००० वर्ष होते हैं। एक कल्पमें १४ मन्वंतर होते हैं जैसे दिवसमें २४ घंटे होते हैं। इस समय छटा मन्वंतर चला है। ऋग्वेदमें भी कल्पकी कल्पना है। आधुनिक विज्ञानके अनुसार भूगर्भशास्त्रसे यह कल्प कुछ कुछ ठीक बैठता है। कल्पके प्रारंभमें विश्वकी सृष्टि होती है और कल्पांतमें विश्वका अंत। कहीं कहीं ब्रह्माका दिनोदय सृष्टि रचना, ब्रह्माका दिन सृष्टीका जीवन और ब्रह्माकी रात्र सृष्टिलय ऐसा भी कहा गया है। गीताके अनुसार कल्पारंभमें सृष्टि उत्पन्न होती है और कल्पांतमें वह डूब जाती है। ज्ञानेश्वरीमें कल्पांतके दृश्यका वर्णन जहां तहां है। ज्ञानेश्वरी १२४

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