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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1071

काम—चार पुरुषार्थोंमें प्रथम पुरुषार्थ, वेदके नासदीय सूक्तमें, उसके, परमात्माके मनमें उत्पन्न कामसे ही विश्वकी उत्पत्ति होनेकी बात कही है। काम “संतान रूपसे अमर होनेकी आत्माकी स्वाभाविक इच्छाकी प्रक्रियाजन्य एक भूख है।” वेदमें “आत्मा भ्राता पुत्र रूपसे” कहते हुए इसका वर्णन किया है। अथर्व वेदमें कामको “महान् विश्व-शक्ति” माना है। ब्राह्मणोंमें यज्ञवेदीको स्त्री तथा अग्निको पुरुष माना है। छांदोग्य उपनिषदमें “प्रजातंतु नहीं तोड़ना !” यह आज्ञा है । बृहदारण्यकमें स्त्री पुरुष संभोगको यज्ञ-विधि माना है। तथा “गीतामें उत्पत्ति हेतु में काम” कहा गया है। प्राचीन ऋषिमुलियोंने इसकी उपेक्षा या अवहेलना न करके जीवनमें कामको भी महत्त्वका आवश्यक स्थान दिया है। जीवनमें सर्वत्र प्रमाणबद्धता है। प्रमाणबद्धतामें ही सौष्ठव और सौंदर्य है। वेद तथा उपनिषदोंमें कामको मानवी मनकी महत्त्वपूर्ण प्रेरक शक्तिके रूपमें स्वीकार किया है। किंतु इसकी भी सीमा है। जब यह अपनी सीमाको पार करता है तब मनुष्य उन्मत्त हो कर उचित मनुचितके भानको खो देता है। ऐसी स्थितिमें यह विकार और सभी पापका मूल मान कर निषिद्ध माना गया है। कामधेनु—इच्छापूर्ति करनेवाली गाय। देव-दानवोंने जब समुद्र मंथन किया तब समुद्रमेंसे यह गाय निकली। शिववाहन नंदी इसी गायका बछड़ा है। वह वसिष्ठके साथ रहकर उसके यज्ञादि संपन्न करती थी। उसने वसिष्ठाश्रममें अतिथि बन कर आये हुए विश्वामित्रको इच्छा- भोजन खिलाया था। सूर्यवंशी दिलीपने इसकी सेवा की थी। इसके प्रसादसे ही रघुका जन्म हुआ था। कालकूट—समुद्रमंथनके समय अमृतके पहले जो विष उबलकर आया जिससे विश्व जलने लगा और फिर शंकर लोक-कल्याणके लिये जिसको पी गये वह विष। इसको हलाहल भी कहते हैं। इसको शंकर-भगवानने गलेमें ही रखा, पेटमें उतरने नहीं दिया। जिससे शंकर भगवानका गला-नीला हो गया इस लिये शंकर-भगवानको “नीलकंठ” कहते हैं। कुंडलिनी—मनुष्य शरीरमें अथवा मानवी जीवनमें जो महान् सुप्त शक्तियां होती हैं उनमेंसे एक सुप्त शक्ति ! योग शास्त्रमें इसका विस्तृत वर्णन है। यह सदैव मूलाधार चक्रमें साडेतीन कुंडली मार कर सुप्तावस्थामें रहती है। कुंडलिनी इस शब्दसे इसकी वक्रभावापन्न अवस्था स्पष्ट होती है। जब यह शक्ति अपनी वक्रता छोड कर सरल होती है, स्वाभाविक होती है, तब शिवसे अभिन्न होने तक चैन नहीं लेती ! आत्मा, नित्य शक्तिसंपन्न होता है। वह सर्वकाल निष्क्रिय होता है किंतु उसकी शक्ति कभी निष्क्रिय तो कभी सक्रिय होती है। इस शक्तिके चित् अचित् ये दो भेद होते हैं। चित् शक्ति सदैव आत्मासे अभिन्न होती है। इस शक्तिको वैष्णव साधक शुद्ध सत्त्व कहते हैं तो तांत्रिक बिंदु या महामाया कहते हैं। कुंडलिनी शब्दकी अनेक व्याख्यायें की गयी हैं। जैसे (१) सुप्त प्राणशक्ति (२) शेष, अनंत ब्रह्मांडकी रचना करनेके बाद जो आधारभूत शक्ति बची रही वह (३) सुप्त मानसिकशक्ति (४) दिव्य आदिशक्तिका व्यक्त रूप (५) प्रज्ञापरिमितता (६) विश्वव्यापी विद्युत शक्ति (७) चित्शक्ति (८) जीवात्माकी प्रणवरूपी आदिशक्ति (९) आध्यात्मिक शक्ति (१०) शरीरस्थित सुप्त चेतना। १२५ परिशिष्ट ५