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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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शिवका वसतिस्थान कैलास-शरीरमें सहस्रार है और शक्तिका-कुंडलिनीका-सुषुम्नाके मूलमें मूलाधार चक्र । शक्ति जब वक्र होती है, सुप्त होती है तब स्वस्थानमें पड़ी रहती है और जब जागृत होती है, सहज होती है तब, शिवसे मिलनेके लिये तीव्र गतिसे ऊपर चढ़ने लगती है। तंत्र ग्रंथोंमें कुंडलिनी शक्तिका ऐसा ध्यान है।— करना ध्यान कुंडलिनीका रहती मूलाधारमें सूक्ष्म । बैठी है इष्ट देवता रूप साढे तीन कुंडल मारके । कोटि विद्युल्लताके समान तू है स्वयंभू लिंगको घिरे ॥ कई लोग इसके साढे तीन कुंडलके संबंध ॐके साढे तीन मात्राओंसे जोड़ते हैं। वैसे ही कुछ लोग इसके साढे तीन कुंडलके संबंध स्वप्न जागृति सुषुप्ति तुर्यासे जोड़ते हैं और कुंडलिनीकी जागृति को मनुष्यमें स्थित सुप्त प्रणव या बीजकी जागृती कहते हैं अथवा तुर्यावस्थाकी जागृति मानते हैं। जप, तप, योग-साधन, ध्यान, भक्ति, कीर्तन, भजन, ज्ञान, सतत दीर्घ अभ्यास, सत्कर्म, प्राणायाम, तीव्रदुःख आदि कारणोंसे तथा योगियोंद्वारा शक्तिपात करनेसे यह कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है। यह जागृत होते ही स्वाधिष्ठान, मणिपुर आदि चक्रोंसे होकर सहस्रारकी ओर वेगसे चलती है। जाते समय जो कुछ विरोध होता है उसको वह तोडते हुए चलती है। इसकी अद्भुत शक्तिके कारण यदि साधककी ठीक व्यवस्था नहीं रही तो उसकी मृत्यूकी भी संभावना हो सकती हैं। इसलिये वहां अनुभवी गुरुकी आवश्यकता बताई गयी है। उपनिषदोंसे लेकर आधुनिक संत साहित्यतक अनेक ग्रंथोंमें कुंडलिनी जागृतिके अनेक उपाय कहे गये हैं। प्राणायामके अनेक प्रकार, मनकी एकाग्रता, आदिसे कुंडलिनी शक्तिको जागृत करके उसको सुषुम्नाके द्वारा सहस्रार तक चढानेकी विधियां कही गयी हैं। किस चक्रके बाद किस चक्रमें प्रवेश होता है, किस चक्रमें प्रवेश होनेके बाद क्या क्या होता है, इन सबका विस्तृत वर्णन देखनेको मिलता है। जब वह चंद्रनाडी चक्रमें प्रवेश करती है तब वहां अमृत-प्रवाह होने लगता है। तब साधकको अन्य सभी सुख तुच्छ लगने लगते हैं और वह केवल ब्रह्मानंदकी भूखसे आत्मसुख प्राप्तिके लिये अव्याहत साधनारत रहने लगता है। अनाहत चक्रमें जब कुंडलिनी शक्ति आती है तब अतींद्रिय शब्द सुनने लगते हैं। उसके बाद कुंडलिनी शक्तिको "मारुत" कहा गया है। ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायमें इसका विस्तृत और काव्यात्मक वर्णन है। कुरुक्षेत्र—यह वर्तमान हरियाणा राज्यके कर्नाल जिलामें आता है। कुरुराजाने हलसे कसकर यह भूमि बनायी थी इस लिये इसको कुरुक्षेत्र कहते हैं। कुरु कौरवोंका मूल पुरुष है। यह राजा अत्यंत तपस्वी था। इसने शिवजीसे वरदान मांगलिया था कि मैंने जितनी यह भूमि कसी है उतनी भूमि पवित्र मानी जाय। यह धर्मक्षेत्र माना जाय। यह करीब ८० कोसका चौरस प्रदेश है। महाभारत तथा अन्य प्राचीन ग्रंथोंमें इसकी चतुःसीमा बताई गयी है। यजुर्वेद शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक, बृहज्जाबालोपनिषद् आदि प्राचीन ग्रंथोंमें इस क्षेत्रका वर्णन है। कहीं कहीं इस भूमिको देवताओंकी यज्ञभूमि कहा गया है। सूर्य ग्रहणके समय वहां बड़ा मेला लगता है। ज्ञानेश्वरी १२६