भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1073, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1073

बुद्ध पूर्व कालमें वह एक महाजनपद था। ई. पू० ३२१ से ई. स. १८५ तक यह मौर्य साम्राज्यमें था। इसके बाद गुप्त साम्राज्यमें गया। हर्षवर्धनके काल तक यह भाग सांस्कृतिक उन्नतीके शिखर पर था। इसके बादका इतिहास विदेशियोंके आक्रमण और विनाश लीलाओंसे भरा हुवा है। थानेश्वर, पानीपत, तरावडी, कैथल, कनाल आदि युद्धक्षेत्र इसी कुरुक्षेत्रके अंतर्गत हैं। कुरुक्षेत्रमें (१) ब्रह्मसर (२) संनिहितसर (३) ज्योतिसर (४) स्थानेश्वर (५) कालेसर ऐसे पांच सरोवर हैं। वैसे ही (१) चंद्रकूप (२) विष्णुकूप (३) रुद्रकूप (४) देवीकूप ऐसे चार कूप हैं। साथ साथ पहले जो (१) काम्यवन, (२) अदितिवन (३) व्यासवन (४) फलकीवन (५) सूर्यवन (६) मधुवन (७) शीतवन थे ऐसा कहा जाता है वहां आज (१) काम्यतीर्थ (२) अदितितीर्थ (३) फल्गुतीर्थ (४) सूर्यकुंडतीर्थ ऐसे कुंड हैं। परशुराम, प्रजापति, अंबरीष, ययाति, आदि राजाओंका इस क्षेत्रसे संबंध आता है। आज वहां एक दिनसे अधिक रहना अयोग्य माना जाता है। संभवतः ई. पू. २ री सदीसे तीर्थयात्रार्थ वहां जाकर तुरंत लौट आनेका रिवाज प्रारंभ हो गया है। कृच्छ्र—प्रायश्चित्तार्थ किया जानेवाला एक व्रत। इस व्रतमें पहले तीन दिन एक बार केवल हविष्यान्न खाना है। फिर तीन दिन केवल रातको खाना। फिर तीन दिन जब जो मिले वह एक ही कौर खाना। इसके बादके तीन दिन संपूर्ण निर्जल उपवास। खडा खडा दिन और बैठ कर रात बिताना। इन दिनोंमें सत्य बोलना; तीन बार स्नान, अकुलीन स्त्री पुरुषोंसे संभाषण वर्ज, सूर्यपूजन, अग्निहोत्र आदि नियम कहे गये हैं। इसके बाद तेरहवें दिन ब्राह्मणभोजनके साथ भोजन करना। यह विधि गौतमधर्मसूत्रमें कही गयी है। कूटस्थ—निर्विकार आत्मा जो स्थूल वा सूक्ष्म देहसे विच्छिन्न नहीं होता है वह सुनारकी ऐरणीकी भांति निर्विकार होता है। देह अविद्याका कल्पना जन्य है। कल्पनाके लिए आधार चाहिए। आत्मा सर्व व्यापी है। देहद्वयसे वह विच्छिन्नसा लगता है। सुनारकी ऐरणी पर कुछ भी वस्तु रख कर उस पर कितने ही प्रहार करने पर भी ऐरणीको कोई विकार नहीं होता वैसे ही, आत्माके आधारसे रहनेवाले जीवको विषयादिसे कितना ही क्लेश होने पर भी आत्मा निर्विकार रहता है। ऐसा वह निर्विकार आत्मा ही कूटस्थ कहलाता है। कैवल्य—मोक्ष इस शब्दके अर्थमें इसका प्रयोग होता है। त्रिविध दुःखोंका अंत ही कैवल्य है। आत्मसाक्षात्कारके बाद कर्तृत्वादि अभिमान नष्ट होते हैं। कर्मसे निवृत्ति होती है। अनंतकर्म करनेके बाद भी कर्तृत्वका भान नहीं होता। न करनेका-सा अनंत कर्म करना, न चलनेका सा बिना ओर छोरका चलना, न बोलनेका-सा अनंत संभाषण सुख, सदैव ब्रह्मभावमें लीन रहना, इस स्थितिको कैवल्य कहा गया है। केवल ब्रह्म-भाव प्राप्ति ही कैवल्य है ! क्रोध—प्राचीन चिंतनशील ऋषिमुनियोंने (१) काम (२) क्रोध (३) लोभ (४) मोह (५) मद (६) मत्सर इनको षड्विकार अथवा छ शत्रु माना है। मनुष्यके छ ३२७ परिशिष्ट ५

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 1073, कुल 1172 में से · BharatKosha