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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1074

शत्रुओंमें क्रोध दूसरा शत्रु है । प्रतिकूल विषयमें जो तीक्ष्ण बोधानुभूति होती है उसको क्रोध कहा गया है । अपने लिए प्रतिकूल स्थितियोंसे, जैसे अपमान, अन्याय, असमाधान आदि होता है तब, क्रोधका उदय होता है। जो भावनाएं अंतःकरणके लिए प्रिय है उसके विरुद्ध कुछ होते ही क्रोध आता है। क्रोधका मूल रजोगुण है। काममें व्यत्यय आनेसे भी क्रोध आता है । क्रोध आगकी भांति पहले अपनेको जला कर फिर दूसरोंको जलाता है। मनुस्मृतिमें क्रोधके लक्षण कहते समय (१) बिना अस्तित्वके दोष दीखना (२) साहस (३) द्रोह (४) दूसरोंके गुण सहन न होना (५) गुणोंके स्थान पर दोष दिखाई देना (६) अर्थापहरण (७) आक्रोश (८) वाणीकी कठोरता (९) ताडनादिसे दुःख देना आदि कहे गये हैं। साधु-संतोंने क्रोधको अनर्थकारी कहा है। गंधर्व-नगर—एक काल्पनिक बात । संध्यासमय आकाशमें अन्यान्य बादलोंके कारण नगरादिकोंका भास होता है । वह केवल आभास ही होता है । सूर्य किरणोंकी चक्र गतिके कारण इन नगरोंमें अन्यान्य रंग भी दीखते हैं। इन रंगोंको लेकर कुछ फलाफल भी कहा जाता है किंतु मूलतः इसका अस्तित्व ही नहीं होता। अस्तित्वहीन कल्पनामय बातोंको समझानेके लिए गंधर्व नगरीकी उपमा दी गयी है। जैसे आकाश-पुष्पकी उपमा दी जाती है । गणेश—किसी भी कार्यके प्रारंभको श्रीगणेश। कहते हैं। क्यों कि गणपतिपूजनसे ही कोई कार्यारंभ होता है । गणपति शिव-पार्वतीका पुत्र है। विद्वानोंका मत है कि मूलतः गणेश आर्येतर देवता है। प्रथम गणपति अथवा गणेशको शिवगणोंमें-श्रेष्ठ स्थान मिला। फिर ऋग्वेदके ऋषियोंको "गणानांत्वा गणपति हवामहे !" कह कर इनकी पूजा करने लगी, इतना इस देवताका प्रभाव था । गणपति शिव पार्वतीका पुत्र होने पर भी अयोनि संभव है । गणेशके विचित्र रूपके विषयमें अनेक प्रकारकी जनश्रुतियां प्रचलित हैं तथा अनेक विद्वानोंने अनेक संशोधनात्मक लेख लिखे हैं। ये सारे लेख और संशोधन "विश्वकी प्रत्येक बातको अपनी वैज्ञानिक दृष्टिसे " विचार करनेवाले आधुनिक विद्वानोंका है । इसके मूलमें पाश्चात्य विद्वानोंके मतकी पुनरोक्ति मात्र है किंतु सनातन दृष्टिके विद्वानोंको यह दृष्टिकोण स्वीकार नहीं है। वे गणेशको संपूर्ण वैदिक देवता मानते हैं। अथर्ववेदमें गणपत्यथर्वशीर्ष नामका अथर्वशीर्ष है। उस अथर्वशीर्षकी दृष्टिसे गणेश संपूर्ण वैदिक देवता है । ऋग्वेदके ब्रह्मणस्पति सूक्तको ये वैदिक विद्वान गणपतिसूक्त ही मानते हैं। गणपति अथर्वशीर्षमें गणपतिके आध्यात्मिक रूपका विवेचन है । गणपति एक तत्त्व है । गणपतिको वाङ्मयका मूलाधार माना गया है। योगविद्यामें गणपति मूलाधार चक्रका देवता है । प्रणवोपासना और गणेशोपासना एक मानी गयी है । 'गज" का अर्थ "जहां सबका लय होता है तथा जहां सबका जन्म होता है" ऐसा किया गया है। तांत्रिक साहित्यमें विघ्नराज गणेशका महत्त्वका स्थान है। सभी मंगल कार्योंके प्रारंभमें नवग्रहोंके साथ, उनसे पहले गणेशपूजन करना अनिवार्य है। तांत्रिक गणपतिके साथ उनकी शक्तियां भी होती हैं। उन शक्तियोंका नाम तीव्रा, ज्वालिनी, नंदा, भोगदा आदि हैं। तंत्र मार्गमें गणेशके कई मंत्र कहे गये हैं। बुद्धने भी अपने शिष्य आनंदको 'रहस्यमय गणपति हृदय" नामका मंत्र दिया था । बौद्ध धर्मके साथ गणेश भी भारतके बाहर गया । भारतके बाहर तिब्बत, तुर्कस्तान आदि बौद्ध मठोंमें, मठोंके बाहर, गणपतिकी मूर्तियां मिलती हैं । चीनमें भी गणपतिका प्रवेश हुआ है । चीन जापानमें यह कांगी बने हैं। किंतु ज्ञानेश्वरी १२६