ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1075, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानेश्वर महाराजने एक विशेष प्रकारके गणेशकी रचना की है। वह आद्य है वह ॐ है। आत्मरूप है। सकल मतिप्रकाश है। गणपति विद्याकी देवता है और ज्ञानेश्वर महाराजने वेद, उपनिषद, षड्दर्शन, पुराण, स्मृति, नाटक, काव्य, आदिसे गणेशको सजाया है। भारतीय धार्मिक, आध्यात्मिक, तथा सांस्कृतिक जीवनके लिये प्रेरणारूप साहित्यका महागणपतिकी रचना करके उनका वंदन करना ज्ञानेश्वर महाराजकी स्वतंत्र प्रतिभाका एक सुंदर निदर्शन है ! गुण-कर्म-विभाग—गुण-कर्म विभाग चातुर्वर्ण्यका आधार है। गुणोंके क्रमानुसार किया हुआ समाज-संगठन चातुर्वर्ण्य व्यवस्था है। ब्रह्मासे लेकर चींटी तक सारा विश्व गुणोंसे विभाजित है अथवा गुणोंपर आधारित है। प्रत्येक प्राणिमात्रमें अर्थात् मनुष्यमें भी कम अधिक प्रमाणमें इन गुणोंका होना स्वाभाविक है और अनिवार्य भी। प्रत्येक मनुष्यका स्वभाव इन गुणोंपर आधारित है। इस सिद्धांतके अनुसार मानवी समाजका-केवल हिंदू समाजका नहीं-चार वर्णोंमें विभाजन करके उनको उस उस स्वाभावानुसार समाज-हितके काम बांट दिये, जिससे समाज सुसंगठित हो, व्यवस्थित रूपसे समाजका सर्वांगीण विकास हो। इसको वर्णव्यवस्था कहते हैं। यह समाज- व्यवस्था स्वाभाविक व्यवस्था है। विद्वानोंका कहना है कि प्राचीन ग्रीक ग्रंथोंमें भी समाजके चार प्रकारोंका विवेचन किया हुआ मिलता है तथा ये भेद व्यवसायके आधार पर पडे या वंशके आधार पर ! ऐसे वाद विवाद भी हुए हैं। पार्सियोंके अवेस्तामें भी चार प्रकारके वर्णोंका उल्लेख है। किंतु भारतके प्राचीन शास्त्रकारोंने उनको एक वैज्ञानिक रूप दिया है। अमुक गुणके अमुक स्वभाव हैं ! किस प्रकारके स्वभाववाले गिरोहको किस प्रकारका काम देना चाहिए ? इन बातोंका अत्यंत गहराईके साथ अध्ययन करके प्रत्येक गिरोहको स्वधर्मके रूपमें विशिष्ट काम दिया गया जिस कामसे वह समाजके लिये अधिक से अधिक उपयुक्त हो। वर्णका अर्थ है रंग। उपनिषदमें गुणकी नहीं रंगकी कल्पना है। जैसे सांख्य शास्त्र ब्रह्मासे लेकर चींटी तक तीन गुणोंके आधीन कहता है वैसे प्राचीन उपनिषद् सारे विश्वको तीन वर्णका मानता है। "वर्ण मिश्रणसे विश्वकी विविधता दर्शन" तथा "गुण मिश्रणसे विश्वकी विविधता दर्शन" दोनों एक ही हैं। उपनिषदके तीन वर्णोंका विकास सांख्यके तीन गुणोंमें हुआ और गीताने समाजव्यवस्थाके लिए गुण कर्म विभागसे चातुर्वर्ण्यकी बात कही। इस प्रकार गुण-विभागसे कर्म-विभाग और कर्म-विभागसे वर्ण रचना की है ऐसे गीतामें श्रीकृष्णने कहा है। और महाभारतमें युधिष्ठिरने यक्ष प्रश्नके उत्तर देते समय कहा है—"कुल, स्वाध्याय, या श्रुति यह ब्राह्मणत्वका कारण नहीं किंतु सदाचार ब्राह्मणत्वका आधार है। जिसने सदाचार छोड दिया वह ब्राह्मण लाशके समान है !" युधिष्ठिर नहुषसे हुई अपनी बातोंमें भी यही कहता है "गुण ही यदि वर्णका आधार माने गये तो शूद्रादिमें सत्य अहिंसादि गुण रहे तो क्या उस शूद्रको ब्राह्मण कहना होगा ? " नहुषके इस प्रश्नके उत्तरमें युधिष्ठिर कहता है— ये हैं लक्षण शूद्रमें यदि ये द्विजमें नहीं। न शूद्र शूद्र है राजन् औ' द्विज द्विज भी नहीं ॥ ये लक्षण जहां होते कहना उनको द्विज। जहां नहीं इन्हें स्थान उनको शूद्र जानना ॥ १२९ परिशिष्ट ५