ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसी प्रकार, महाभारतमें भारद्वाज तथा भृगु ऋषि भी इसी प्रकारके विचार कहते हैं । वर्ण उत्कर्ष होता है नरका पुण्य कर्मसे । तथा पाप कृत्यसे जो जाता है हीन वर्णमें ॥ यह महाभारतके शांतिपर्वमें कहा गया है। महाभारतमें हीन वर्णसे श्रेष्ठ वर्ण तथा श्रेष्ठ वर्णसे हीन वर्णमें हुए उत्कर्षापकर्षकी घटनाओंका विवेचन भी मिलता है। गीता और ज्ञानेश्वरीमें इन्हीं गुणकर्म विभागानुसार कर्तव्य कर्मका विचार किया गया है। गुणत्रय—सांख्यशास्त्रमें सत्व, रज, तम ऐसे तीन गुणोंका विवेचन किया गया है। गीतामें इसीका विस्तृत विवेचन है। किंतु इसकी मूल कल्पना बृहदारण्यकोपनिषदमें दीखती है। बृहदारण्यकमें “इस विश्वमें जो कुछ है वह तीन वर्णोंके समन्वयसे बना है !” ऐसा कहा गया है। ये तीन वर्ण हैं काला, लाल, और सफेद। यही गुणोंकी मूल कल्पना है। वस्तुतः पंचमहाभूतोंमें तीनभूतोंका रंग आंखोंसे दिखाई देता है। पृथ्वीका काला, तेजस्, अग्निका लाल, पानीका कोई रंग नहीं सफेद ! वायु और आकाशका रंग नहीं है। “विश्वमें जो कुछ वस्तु दीखती है इन तीन रंगोंके कारण!” इस कल्पनाका सांख्योंने “ब्रह्मसे चींटी तक जो कुछ दीखता है वह सब तीन गुणोंसे प्रभावित है” कहते हुए विकास किया है। सांख्यशास्त्रके बाद, गीतामें विश्वमें जो कुछ है वह सब प्रकृति है कहते हुए प्रकृतिकों “इन तीन गुणोंका कल्लोल” कहा। सांख्योंने विशेषतः नैतिक जीवनको ध्यानमें रख कर इन तीन गुणोंका विचार किया है। गुणातीत—ब्रह्मसे चींटीतक जो कुछ दीखता है वह सब प्रकृति है और प्रकृति गुणोंका कल्लोल है तथा केवल मात्र ब्रह्म, प्रकृतिसे परे अर्थात गुणातीत है। किंतु ब्रह्मलीन मनुष्य भी गुणातीत है। उस पर गुणोंका अधिकार नहीं रहता। जैसे आत्मा प्रकृतिके परे है वैसे आत्मरत या आत्मलीन सिद्धपुरुषभी गुणोंसे परे रहता है। गुणातीतावस्था ही जीवन्मुक्तावस्था है। गुरु—इस शब्दके अनेक अर्थ हैं। जैसे “जिसका स्तवन किया जाता है वह” “जो धर्म का उपदेश देता है वह” “जो अज्ञान दूर करता है वह!” आदि। वैदिक सूत्र ग्रंथोंमें सर्व प्रथम यह शब्द आया है। गुरु-सान्निध्यमें रह कर उनकी आज्ञासे कर्म करते हुए समावर्तन करना वैदिक परंपराकी शिक्षा व्यवस्था थी । वैदिक सूत्रकालमें गुरुगृहमें रह कर गुरुसेवा करके विद्याध्ययन करनेकी प्रथा रूढ हुई। अध्ययन कालमें गुरु-गृहमें रहना, वहां गुरुकी आज्ञानुसार गुरु और गुरुकुलकी सेवा करना, तथा अध्ययन पूरा होने पर गुरु दक्षिणा देकर घर जाना यह उस समयकी भारतीय परंपरा थी। इस परंपराके अनुसार गुरु-शिष्योंके संबंध कैसे रहने चाहिए, गुरु कैसा रहना चाहिए, शिष्यके क्या कर्तव्य होते हैं इन सबका विस्तृत विवेचन उस समयके अनेक ग्रंथोंमें देखनेको मिलता है। तंत्र सारमें गुरुके गुणोंके विषयमें लिखा है— शांत कुलीन विनीत दक्ष निर्मल संयमी । सुविचारी सदाचारी ज्ञानी ज्ञानविभूषित ॥ अध्यात्म ज्ञानमें पूर्ण मंत्र तंत्र विशारद । गुरु सो है कहा जाता कृपा शासनमें पढु ॥ ज्ञानेश्वरी १३०