भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1077

ऋग्वेद कालमें बृहस्पति, आंगिरस, अत्रि, वसिष्ठ, गर्ग, आदि ऐसे गुरुजनोंका दर्शन होता है। उसके बाद आजतक वैदिक परंपरामें ऐसे गुरु समय समय पर होते रहे हैं। इसी प्रकार दार्शनिक क्षेत्रमें भी ऐसे गुरु-जनोंकी परंपरा अविच्छिन्न रूपसे चली आयी है। उसके साथ ही साथ जब भारतमें वैदिक कर्मकांडका संकोच हो कर ज्ञानकांडका युग आया, उस उपनिषदकालमें भी जनक याज्ञवल्क्य जैसे गुरु शिष्य परंपरा दीखती है। उन दिनोंमें, भिन्न भिन्न प्रकारके दर्शन लिखे गये और उन उन दर्शनके आचार्योंके पास उनका शिष्यसमुदाय भी रहा। बौद्ध और जैन अनुगममें भी ऐसी गुरुशिष्य परंपरा चलती आयी है। उसके बाद मुस्लिम आक्रमणके बादके युगमें, धर्मसाधना अथवा आध्यात्मिक साधनामें गुरूको असाधारण महत्त्व मिला। जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, शाक्त, तथा नाथसंप्रदायमें गूढ अथवा गुप्तरूपसे साधना होने लगी। आध्यात्मिक गूढ साधनामें गुरूकी प्रतिष्ठा शिखर पर पहुंच गयी। इस समय "केवल गुरुवचनसेही परम गुह्य ऐसा सत्य स्पष्ट हो कर उसका साक्षात् अनुभव आता है!" यह सिद्धांत रूढ हुवा। जिस बुद्धने कहा था "मेरा कोई गुरु नहीं है मैंने अपने अभिज्ञानसे सब कुछ पा लिया है" उसी बुद्धके बौद्धानुगममें "पर-तत्व केवल गुरुके शब्दसे ही हृद्गत हो सकता है!" ऐसे सिद्धांत प्रचलित हुए। और इसी युगमें- गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वर । गुरु साक्षात्परब्रह्म वैसे श्री गुरु-वंदन ॥ जैसे गुरु वंदन होने लगे। वैसे उपनिषद कालमें भी गुरु पूजाका विधान कहा गया है। गुरुकी महानता कही गयी है। मुंडकोपनिषदमें "बिना गुरुके ज्ञान नहीं" इस लिए "शिष्यको हाथमें समिधा लेकर ब्रह्म ज्ञानके लिए ब्रह्म निष्ठगुरूके पास जानेको" कहा गया है। उपनिषदके "नि" का अर्थ शिष्यको गुरुमें गुरुसेवासे निःशेष होना है। शिष्यके हाथमें समिधा होनेका अर्थ भी यही है। समिधा जैसे यज्ञमें निःशेष होती है "वैसे मैं शिष्य गुरुमें निःशेष होने आया हूं!" यह कहना ही हाथमें समिधा लेना है। किंतु गुरुको सर्वस्व माननेकी प्रथा मध्यकालीन धर्म-साधनाका परिणाम है। बौद्धोंका वज्रयान, तथा नाथसंप्रदायमें गुरुको ईश्वरसे भी ऊंचा स्थान है। कबीर भी ऐसा ही कहता है। गुरु और हरि दोनों उपस्थित होने पर वह गुरुकेही पग लगता है। नाथ संप्रदायमें साधक पितृ वंश न कह कर गुरुवंश कहता है। स्वयं ज्ञानेश्वर महाराज पिताका नाम न लेकर "निवृत्तिका ज्ञानदेव" कहते हैं। ज्ञानेश्वर महाराजसे समर्थ रामदास तक मराठी संत साहित्यमें सर्वत्र गुरु-महिमा गायी गयी है। वैसे सभी भाषाके संत साहित्यमें सर्वत्र गुरु-महिमा गायी गयी है। किंतु कन्नड वीरशैव संत-साहित्यका स्वर कुछ अलग ही है। वहां दीक्षाके लिए गुरुकी अत्यंत आवश्यकताको प्रतिपादन करके भी, गुरुका अत्यंत आदर करके भी "अपने आपको जान लिया तो वह ज्ञान ही गुरु" "ज्ञान ही गुरु आचार ही शिष्य !" "अनुभव ही गुरु" ऐसे अनेक सूत्र मिलते हैं। मराठी संत साहित्यमें भी तुकाराम और समर्थ रामदासने "कान फूंकनेवाले नकली गुरुओंकी" अत्यंत कठोर शब्दोंसे प्रताडना की है। निवृत्ति नाथने भी एक स्थान पर "सबको एक ही मंत्र देनेवाले गुरुको अधमतम गुरु" कहा है। ऐसे गुरुओंके लिए समर्थ रामदासने ऐसे गुरु-जन । पैसेमें हैं तीन । मिले भी तो जान । तजना उनको ॥ १४१ परिशिष्ट ५