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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

ऋग्वेद कालमें बृहस्पति, आंगिरस, अत्रि, वसिष्ठ, गर्ग, आदि ऐसे गुरुजनोंका दर्शन होता है। उसके बाद आजतक वैदिक परंपरामें ऐसे गुरु समय समय पर होते रहे हैं। इसी प्रकार दार्शनिक क्षेत्रमें भी ऐसे गुरु-जनोंकी परंपरा अविच्छिन्न रूपसे चली आयी है। उसके साथ ही साथ जब भारतमें वैदिक कर्मकांडका संकोच हो कर ज्ञानकांडका युग आया, उस उपनिषदकालमें भी जनक याज्ञवल्क्य जैसे गुरु शिष्य परंपरा दीखती है। उन दिनोंमें, भिन्न भिन्न प्रकारके दर्शन लिखे गये और उन उन दर्शनके आचार्योंके पास उनका शिष्यसमुदाय भी रहा। बौद्ध और जैन अनुगममें भी ऐसी गुरुशिष्य परंपरा चलती आयी है। उसके बाद मुस्लिम आक्रमणके बादके युगमें, धर्मसाधना अथवा आध्यात्मिक साधनामें गुरूको असाधारण महत्त्व मिला। जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, शाक्त, तथा नाथसंप्रदायमें गूढ अथवा गुप्तरूपसे साधना होने लगी। आध्यात्मिक गूढ साधनामें गुरूकी प्रतिष्ठा शिखर पर पहुंच गयी। इस समय "केवल गुरुवचनसेही परम गुह्य ऐसा सत्य स्पष्ट हो कर उसका साक्षात् अनुभव आता है!" यह सिद्धांत रूढ हुवा। जिस बुद्धने कहा था "मेरा कोई गुरु नहीं है मैंने अपने अभिज्ञानसे सब कुछ पा लिया है" उसी बुद्धके बौद्धानुगममें "पर-तत्व केवल गुरुके शब्दसे ही हृद्गत हो सकता है!" ऐसे सिद्धांत प्रचलित हुए। और इसी युगमें- गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वर । गुरु साक्षात्परब्रह्म वैसे श्री गुरु-वंदन ॥ जैसे गुरु वंदन होने लगे। वैसे उपनिषद कालमें भी गुरु पूजाका विधान कहा गया है। गुरुकी महानता कही गयी है। मुंडकोपनिषदमें "बिना गुरुके ज्ञान नहीं" इस लिए "शिष्यको हाथमें समिधा लेकर ब्रह्म ज्ञानके लिए ब्रह्म निष्ठगुरूके पास जानेको" कहा गया है। उपनिषदके "नि" का अर्थ शिष्यको गुरुमें गुरुसेवासे निःशेष होना है। शिष्यके हाथमें समिधा होनेका अर्थ भी यही है। समिधा जैसे यज्ञमें निःशेष होती है "वैसे मैं शिष्य गुरुमें निःशेष होने आया हूं!" यह कहना ही हाथमें समिधा लेना है। किंतु गुरुको सर्वस्व माननेकी प्रथा मध्यकालीन धर्म-साधनाका परिणाम है। बौद्धोंका वज्रयान, तथा नाथसंप्रदायमें गुरुको ईश्वरसे भी ऊंचा स्थान है। कबीर भी ऐसा ही कहता है। गुरु और हरि दोनों उपस्थित होने पर वह गुरुकेही पग लगता है। नाथ संप्रदायमें साधक पितृ वंश न कह कर गुरुवंश कहता है। स्वयं ज्ञानेश्वर महाराज पिताका नाम न लेकर "निवृत्तिका ज्ञानदेव" कहते हैं। ज्ञानेश्वर महाराजसे समर्थ रामदास तक मराठी संत साहित्यमें सर्वत्र गुरु-महिमा गायी गयी है। वैसे सभी भाषाके संत साहित्यमें सर्वत्र गुरु-महिमा गायी गयी है। किंतु कन्नड वीरशैव संत-साहित्यका स्वर कुछ अलग ही है। वहां दीक्षाके लिए गुरुकी अत्यंत आवश्यकताको प्रतिपादन करके भी, गुरुका अत्यंत आदर करके भी "अपने आपको जान लिया तो वह ज्ञान ही गुरु" "ज्ञान ही गुरु आचार ही शिष्य !" "अनुभव ही गुरु" ऐसे अनेक सूत्र मिलते हैं। मराठी संत साहित्यमें भी तुकाराम और समर्थ रामदासने "कान फूंकनेवाले नकली गुरुओंकी" अत्यंत कठोर शब्दोंसे प्रताडना की है। निवृत्ति नाथने भी एक स्थान पर "सबको एक ही मंत्र देनेवाले गुरुको अधमतम गुरु" कहा है। ऐसे गुरुओंके लिए समर्थ रामदासने ऐसे गुरु-जन । पैसेमें हैं तीन । मिले भी तो जान । तजना उनको ॥ १४१ परिशिष्ट ५

कहा है । यद्यपि आज "गुरु" यह शब्द निन्द्यव्यंजक-सा बन गया है फिर भी हम यह नहीं भूल सकते "अंगीरससे भगवान रामकृष्ण परमहंस तक" यह एक महान परंपरा रही है । रामकृष्ण परमहंसने "केवल मस्तक पर हाथ रख कर" अपना सारा ज्ञान स्वामी श्री विवेकानंदको दिया था । ऐसे ही ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं "निवृत्तिनाथकी कृपादृष्टि हुई मैं गीतार्थ कहने लगा।" गुरुकी शक्ति ऐसी तर्कातीत है। केवल अनुभवगम्य है। इसीलिये अध्यात्म-शास्त्र कहता है "गुरु देहधारी पर-शिव है!" गुरु-वाक्य—गुरु अपने शिष्यको जब "मैं" इसका बोध देता है तब कहता है तत् त्वम् असि तत्=वह ब्रह्म-त्वम्=तू असि=है । गुरु सर्व प्रथम अपने शिष्यको जो "मैं" कहता है यह समझाता है यह "मैं" "तू परब्रह्म है।" गुरु वाक्यके इस बोधानुभूतिसे वह "सोऽहम्" "वह मैं हूँ" कहने लगता है। मानवी जीवनकी सारी साधना "कोऽहम्=मैं कौन हूँ ?" से प्रारंभ होती है। मानव बालकका जन्मते ही रोना, यही "मैं कौन हूँ ?" की जिज्ञासासे है; ऐसे कुछ तत्वज्ञानी कहते हैं! मैं कौन हूं यह जाननेके प्रयासमें गुरु कहता है "तू वह है।" "तत्त्वमसि" इसी लिये इसे गुरु वाक्य अथवा महावाक्य कहा गया है। इसीको कहीं कहीं तत्पद भी कहा है। चंद्रामृत सरोवर—ऐसी मान्यता है "आकाशस्थ चंद्र-किरणोंसे अमृत स्रवता है जिससे वनस्पति औषधी गुण संपन्न होती है वैसे ही योग-शास्त्र कहता है मनुष्यके सहस्रसारचक्रसे अमृत स्रवता है। इस लिये योग-शास्त्रकी भाषामें सहस्रदल कमल, अथवा सहस्रारचक्र अथवा ब्रह्मरंध्रको कुंडलिनीके आघातसे मस्तिष्कके जिस भागसे अमृत स्रवता है उस भागको चंद्र, चंद्रामृतसरोवर, चंद्रामृतनीर, आदि कहा गया है। चातुवर्ण्य—हिंदू-धर्म शास्त्रमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ऐसे चार वर्ण माने हैं। -गुणकर्म विभागमें इस विषयमें कुछ लिखा है- इन चारों वर्णोंके कर्तव्य और अधिकार, व्यवहार और तारतम्य, आदि कहा गया है । चातुवर्ण्य एक सामाजिक संस्था है। यह हिंदुओंका आदिधर्म है। गौणधर्म नहीं। समाजमें केवल चार वर्ण हैं उससे अधिक नहीं। चार ही वर्ण मिल कर पूर्ण समाज बनता है। किसी भी एक वर्णके अभावमें समाज अधूरा रहता है। प्रत्येक वर्णकी भिन्नता गुणभिन्नता तथा कर्तव्य भिन्नताके कारण होती है । एक ही शरीरके जैसे अलग अलग अवयव होते हैं वैसे ये वर्ण एक ही समाजके भिन्न भिन्न अवयवसे हैं। अवयव और अवयवीका जो संबंध है वही संबंध समाज और प्रत्येक वर्णका है। "हिंदू धर्ममें इस चातुवर्ण्य व्यवस्थाका जो प्राचीनत्व है वह और किसी व्यवस्थाका नहीं" ऐसे विद्वानोंकी राय है। श्रुतिमें अनेक व्यवस्थाएं हैं जो अब तक नष्ट हो गयी हैं किंतु यह व्यवस्था अब तक टिकी रही है। चातुवर्ण्य व्यवस्था जैसे स्थायी रूपसे टिकी रही उतना और किसी समाजकी कोई व्यवस्था स्थायी स्वरूपसे नहीं रही। अध्ययन, अध्यापन, प्रजा संरक्षण, अर्थोत्पादक व्यवहार तथा सेवाकार्यकी व्यवस्था जिस समाजमें भली भांति नहीं है वह व्यवस्था या वह समाज, अधिक काल तक नहीं टिक सकता। इस ज्ञानेश्वरी १३३

दृष्टिसे चातुवर्ण्य व्यवस्था अत्यंत स्वाभाविक समाज व्यवस्था है। यह समाज-व्यवस्था सार्वभौमिक है। भारतमें ये वर्ण संस्कारांकित थे। आगे चल कर, इन चारो वर्णमें भिन्न संस्कार विकसित हुए। जैसे, वर्ण-संस्कार, ब्राह्मणोंका कर्म शूद्रोंमें । इसी कारण धर्म शास्त्रोंमें आपद्धर्म जैसे विचार प्रसूत हो गये । गुणोंके कारण इन चारो वर्णोंमें उत्कर्ष अपकर्ष होते हैं। किंतु गुणभेदसे वर्ण न मान कर जन्मसे वर्ण माननेकी परंपराके कारण चातुर्वण्यावस्था भाज विकृत सी गयी है और समाज भी टूटने लगा है। चित्त—अंतःकरण पंचकमेंसे चौथा । (१) सत्व (२) मन (३) बुद्धि (४) चित्त (५) अहंकार मिलकर अंतःकरण होता है। अंतःकरणका अर्थ अंदरका इंद्रिय । पंच कर्मेंद्रिय और पंच ज्ञानेंद्रिय बाह्य इंद्रिय है। ज्ञान प्राप्तिके ये बाह्य साधन हैं और अंतःकरण आंतरिक साधन । ये जीवके कार्य-साधन हैं और बाह्य साधनोंसे अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली है। इसीको अंतःकरण चतुष्टय (१) मन (२) बुद्धि (३) चित्त (४) अहंकार भी कहा गया है। चिंतनसे विचारोंके संस्कारचित्रोंको अंतःकरणमें संग्रह करके उसको कार्यका रूप देनेवाला अंतरेंद्रिय चित्त है। इस चित्तके (१) क्षिप्त (२) मूढ (३) विक्षिप्त (४) एकाग्र (५) निरुद्ध ऐसे पांच प्रकार हैं। (१) रज प्रधान चंचल चित्तको क्षिप्त कहते हैं (२) तमप्रधान सुस्त चित्तको मूढ चित्त कहते हैं (३) सत्वरज प्रधान करुणादि भावग्रस्त चित्त विक्षिप्त चित्त कहलाता है। (४) सत्व प्रधान मांगल्यमें स्थिर चित्तको एकाग्र चित्त कहते हैं। (५) निवृत्त शांत चित्तको निरुद्ध कहते हैं। यही स्थिति योगकी सिद्धावस्था है। चित्त पर कोई लहरें नहीं उठे । कहीं किसी प्रकारकी प्रेरणा न हो । यही आत्मस्वरूपका बोध होता है। अथवा चित्तकी संपूर्ण निरुद्धावस्था निर्विकल्प समाधि है। यह अवस्था जब सतत टिकी रहती है तब वह सहज समाधि है। ऐसा सिद्ध पुरुष सब कुछ करके कुछ भी नहीं करता । अनंत वक्तृत्वसे मौन रहता है। बिना ओर छोरका कर्म करके भी निष्क्रियसा रहता है !! चिदाकाश—शुद्ध ज्ञानमय स्थिति दर्शानेके लिये इस शब्दका उपयोग किया गया है। आकाशका अर्थ है शून्य । केवल खोखलापन । अर्थात् आकाश शब्दसे अभावका भी भाव आता है। ज्ञानका अभाव ही अज्ञान है। इस लिये ज्ञानके साथ आकाशकी विशालता और अलिप्तता दर्शानेके लिये चिदाकाश कहा गया है। चिदाकाश, विशुद्ध ज्ञानावस्था जो सबसे विलिप्त है और बिना ओर छोरका भी । चौबीस तत्व—सांख्य दर्शनके अनुसार सारा विश्व चौबीस तत्वोंसे बना है। इन चौबीस तत्वोंमें प्रधान तत्व है प्रकृति। इसी प्रकृतिका अव्यक्त, माया, प्रसवधर्मिणी, गुणक्षोभिणी आदि विशेषणोंसे वर्णन किया है। (१) प्रकृति (२) महत्-बुद्धि (३) अहंकार (४) मन (५) चक्षु (६) घ्राण (७) श्रवण (८) त्वचा (९) रसना-ये ५ ज्ञानेंद्रिय और (१०) हाथ (११) पाय (१२) मुख (१३) गुदा (१४) शिश्न ये पांच कर्मेंद्रियां (१५) शब्द (१६) स्पर्श (१७) रूप (१८) रस (१९) गंध ये पांच तन्मात्राएं तथा (२०) पृथ्वी १३३ परिशिष्ट ५

(२१) आप (२२) तेज (२३) वायु (२४) आकाश ये पंचमहाभूत। ये सब मिल कर चोबीस तत्त्व। इससे परे पुरुष। २५। चौदह इंद्र—ब्रह्माके एक दिनमें चौदह इंद्र बदलते हैं। पुराणोंमें इन चौदह इंद्रोंके नाम निम्न हैं। (१) यज्ञ (२) रोचन (३) सत्यजित् (४) त्रिशिख (५) विभु (६) मंत्रद्रुम (७) पुरंदर (८) बलि (९) अद्भुत (१०) भारद्वाज (११) वस्स (१२) वसिष्ठ (१३) विष्णुवृद्ध (१४) शांडिल्य । चौदह भुवन—समग्र ब्रह्मांडमें चौदह भुवन अथवा चौदह लोक हैं ऐसी भारतीय तत्त्वज्ञोंकी मान्यता है। इन चौदह भुवनोंको सप्त स्वर्ग और सप्त पाताल कहा गया है। सप्त स्वर्ग पृथ्वीसे ऊपर हैं। (१) भूलोक, (२) भुवर्लोक, (३) स्वर्लोक (४) महर्लोक (५) जनलोक (६) तपोलोक (७) सत्यलोक ये भूलोकके-पृथ्वीके-ऊपरके हैं तो (१) अतल (२) वितल (३) सुतल (४) तलातल (५) रसातल (६) महातल (७) पाताल ये सात लोक भूलोकके नीचेके हैं। चौदह-मनु—ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु बदलते हैं। उन चौदह मनुओंका नाम निम्न प्रकार है। (१) स्वायंभुव (२) स्वारोचिष (३) उत्तममनु (४) तामसमनु (५) रैवतमनु (६) चाक्षुषमनु (७) वैवस्वतमनु (८) सावर्णिमनु (९) दक्षसावर्णिमनु (१०) ब्रह्मसावर्णिमनु (११) धर्मसावर्णिमनु (१२) रुद्रसावर्णिमनु (१३) देव सावर्णिमनु (१४) इंद्रसावर्णिमनु । सृष्टिक्रममें जब लोकस्थिति बदलती है, बिगड़ती है तब सामाजिक जीवनके हितकी दृष्टिसे जो विधिनिषेध बदलने पड़ते हैं, शास्त्र-नियम बताने पड़ते हैं वह कार्य मनु करते हैं। मनु सुयोग्य शासक होता है। मनुके बनाये गये नियम, शास्त्र, लंबेसमय तक चलते हैं। जब वे समाज हितके अनुपयुक्त हो जाते हैं तब नया मनु आता है। एक मनुका काल मन्वंतर कहलाता है। वर्तमान मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर है। वैवस्वत मनुके कहे गये नियम आजका युग-धर्म है। छैंतीस तत्त्व—जैसे सांख्योंने विश्वके कारणीभूत २५ तत्त्व कहे हैं वैसे गीताके क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोगमें क्षेत्रके ये ३६ तत्त्व कहे हैं। ५ महाभूत, ५ ज्ञानेंद्रिय, ५ कर्मेंद्रिय, ५ ज्ञानेंद्रियोंके विषय, ५ कर्मेंद्रियोंके विषय, २६ अहंकार, २७ बुद्धि, २८ पराप्रकृति, २९ मन ३० सुख ३१ दुःख, ३२ द्वेष, ३३ संघात, ३४ चेतना, ३५ इच्छा, ३६ धृति । शिवागमोंमें—निम्न ३६ तत्त्व कहे हैं— १ परासंवित् २ चित्तका प्रकाशरूप शिव, ३ चित्तका विमर्शांशरूप शक्ति, ४ सादाख्यतत्त्व, ५ ईश्वर, ६ शुद्धविद्या, ७ माया, ८ कला, ९ काल, १० नियति, ११ राग, १२ विद्या, १३ पुरुष, १४ त्रिगुणात्मक प्रकृति, १५ बुद्धि, १६ अहंकार, १७ मन, १८-२२ पंच ज्ञानेंद्रिय, २३-२७ पंच कर्मेंद्रिय, २८-३२ पंच तन्मात्राएं, ३३-३७ पंचमहाभूत.

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अध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोग व पसायदान

परा संवित् छत्तीसके परेका तत्त्व है जैसे उपनिषदका ब्रह्म है । जगत्—सदैव बदलते रहनेवाला जन्म-मरणसे अथवा आवागमनमें बद्ध सभी पदार्थ जगत शब्दके अंतर्गत आते हैं । इस जगतके विषयमें अनेक दार्शनिकोंने अनेक बातें कही हैं । ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें इस जगतकी उत्पत्तिकी जो कथा कही है वह विश्व-साहित्यमें इस विषय का सर्व प्रथम विचार है । उसमें लिखा है "जब कुछ भी नहीं था तब "वह" था । उसके मनमें जो काम निर्माण हुवा उससे इसकी उत्पत्ति हुई !" दूसरे एक सूक्तमें है । "उसके तपसे ऋत सत्य निर्माण हुवा । उसके बाद रात-महारात्र-निर्माण हुई । उसके बाद लहरनेवाला समुद्र निर्माण हुवा । उसके बाद सूर्य, चंद्र, अहोरात्र, और प्राणि निर्माण हुए ।" इन्ही विचारोंको अलग अलग ढंगसे उपनिषदोंमें लिया है । उसके बादके दार्शनिकोंने (१) सांख्योंके अनुसार "प्रकृति-पुरुषके संयोगसे इस जगतकी उत्पत्ति हुई !" (२) चार्वाकके अनुसार "पंचमहाभूतोंके आकस्मिक संयोगसे इसकी उत्पत्ति हुई (३) न्यायदर्शनके अनुसार "परमाणुकी सहायतासे ईश्वर इस जगतकी रचना करता है !" (४) वैशेषिक "परमाणुसंयोगसे जगदुत्पत्ति" मानते हैं । (५) मीमांसा दर्शन "जगतको अनादि अनंत" मानकर प्राणियोंको जन्म मरणके आधीन मानता है । (६) वेदांती "ईश्वर ही अपनेमेंसे आप इसे निर्माण करता है!" ऐसे कहते हैं। (७) जैन, मीमांकों की भांति इसे "अनाद्यनंत" मानते हैं । इसी भांति अन्य सभी धर्मोंमें जगतकी उत्पत्तिके विचार तथा कथा, मिलती हैं । जंगली परंपरागत लोगोंने भी अपने ढंगसे इसका विचार किया है और अपने विचारोंको कहानीके रूपमें कहते आये हैं । पुराणोंमें भी इसकी विविध कहानियां हैं । जप—जीभ, होठ आदिकी हलचल करनेके पहले चिंतनद्वारा किसी शब्दको पुनः पुनः उच्चार करना - हृदयमें-जप कहलाता है । जप एक अनुष्ठान है । जपका हिसाब रखना आवश्यक है । यह संकल्पपूर्वक किया जानेवाला अनुष्ठान है । जपके तीन प्रकार हैं । (१) वाचिक - मंत्रका स्पष्ट - सुनाई दें ऐसा - उच्चार करके जप करना । (२) उपांशु - मंत्र देवता पर ध्यान केंद्रित करके गुनगुनाकर मंत्रोच्चार करना (३) मान - मंत्रार्थमें ध्यान केंद्रित करके केवल हृदयमें उसका उच्चार करना । अलग अलग प्रकारके जपानुष्ठानके अलग अलग नियम हैं । इसका न्यास, ध्यान, तर्पण, यज्ञादि भी होते हैं । किंतु नामस्मरणका विधिविधान नहीं होता । वह सतत चिंतन करना होता है । जालंधरबंध—योगमें बंधोंका महत्त्वपूर्ण स्थान है । विशेषतया प्राणायामके समय जो तीन बंध कहे हैं-मूलबंध जालंधरबंध और उडियान बंध-इनका अत्यंत महत्त्व है । बिना इन तीन बंधोंके प्राणायाम पूर्ण नहीं होता अथवा प्राणायामका पूर्ण फल नहीं मिल सकता । ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायके दो सौ सातके छंदमें इसकी क्रियाका विवेचन किया है । प्राणायामके समय मूलबंध युक्त पूरक करनेके बाद कुंभक करते समय अपनी ढुड्डी गले-सीनेके ऊपर गलेके नीचे वाले गद्देमें-चिपकाकर रखना । सर्वांगासन तथा हलासनमें भी १५५ परिशिष्ट ५

यह बंध होता है । इससे मस्तिष्कके अनेक ज्ञानतंतुजाल पर तनाव आता है। इससे अपने शरीरमें होनेवाले चयापचयपर नियंत्रण होने लगता है। शरीर पोषण क्रिया पर भी अपना स्वामित्व आता है। जालंधर बंधसे नीलकंठमणी तथा उपनीलकंठमणि पर तनाव आनेसे उस ओर शुद्ध रक्त दौड़ता है। इससे, गलेकी वह ग्रंथी दीर्घकालतक लचीली रह सकती है। यही ग्रंथी है जो तारुण्यको चिरकाल रख सकती है। इससे, पीछे मेरुदंडमें भी तनाव आता है। शरीरशुद्धि, मनपर प्रभुत्व, तथा चिर तारुण्यकी दृष्टिसे इस बंधका महत्त्व कहा गया है। जितेंद्रिय—जिन्होंने इंद्रियोंको जीत लिया है वह। भारतीय तत्त्व-ज्ञानके अनुसार इंद्रियां घोड़ेकी भांति हैं। मन उसका लगाम है। बुद्धिके हाथमें वह लगाम होता है। सामान्यतया जानवर जैसे अपने चारेके पीछे दौड़ता है वैसे इंद्रियां अपने अपने विषयके पीछे दौड़ती हैं। अडियल घोडा जैसे गाडी लेकर अपने मनमाने चलता है वैसे । किंतु बुद्धिमान मनुष्य, मनको बुद्धिके आधीन रखता है, इंद्रियां मनसे कसी हुई रहती हैं। बुद्धिके आधीन बुद्धिकी, आज्ञामें, मनके द्वारा जो इंद्रियोंको अपने आधीन रखता है उसको जितेंद्रिय कहते हैं। जीव—विशिष्ट मर्यादाके अंदर रहनेवाला विश्व चैतन्यका अंश । मानवी अंतःकरणमें पडा हुवा परमात्माका प्रतिबिंब ! जीव विश्व चैतन्यका ही एक अंश है किंतु विशिष्ट मर्यादांमें शरीर संयुक्त रहनेसे, अंतःकरणसे अविभक्त रहनेसे अपनेको पृथक् मानता है। यही उसकी अज्ञान दशा है । इसीके कारण शरीरमें चेतना रहती है। यह मानवमें परमात्माकी विभूति है। गीतामें इसीको क्षेत्रज्ञ कहा है। वस्तुतः यह सर्वव्यापी है। स्थिर है, अचल है, सनातन है किंतु अंतःकरणसे अविच्छिन्न रहनेसे अपना स्वभावज्ञान भूलता है। जब इसे यह स्वभावज्ञान होता है तब मुक्तावस्थामें रहता है। तत्त्व—अलग अलग दर्शनोंमें तत्त्वोंकी संख्या अलग अलग है। तत्त्वका वस्तु, वस्तु- स्थिति, यथार्थ स्वरूप, मूलघटक, ब्रह्म, मन, शरीर, देवता आदि शब्दोंके अर्थमें यह शब्द आता है। वेदांतमें "केवल ब्रह्म ही एकमेव तत्त्व है।" आद्य शंकराचार्य तत्त्व शब्दका अर्थ करते समय कहते है । तत् यह सर्वनाम है। सर्वनामका विश्वके प्रत्येक वस्तुको लग सकनेवाला नाम ! ब्रह्म व्यापक होनेसे सबमें व्याप्त है। इस लिए उसे-ब्रह्मको-तत् कहते हैं। उस तत् को त्वं प्रत्यय आकर तत्त्व अर्थात् "ब्रह्म-स्वरूप" ऐसा शब्द बना है। शून्य वादी बौद्ध शून्य ही एकमेव तत्त्व मानते है। ज्ञानेश्वरीमें तत्त्वका अर्थ आत्म तत्त्व है। परब्रह्म है ! तत्त्वज्ञान—मानवी जीवन, उसके साथ ही साथ विश्व, तथा मानवी जीवनके साथ विश्वके संबंधोंका अर्थ करके, प्रत्येक मानवी अनुभवका कार्यकारण संबंध बताते हुए, अर्थ करनेवाली मूलभूत कल्पनाओंकी तर्क-बद्धताकी सुसूत्र व्यवस्था करके दिखाना तत्त्वज्ञानका कार्य है। विकसित मनुष्य=मानवी समाजद्वारा-निर्माण की गयी उसकी संस्कृति तथा सभ्यताका, दूसरे शब्दोंमें कहना हो तो, उसकी सामाजिक संस्थाओंका, अथवा नीति नियम और जीवन परंपराओंका सार तत्त्वज्ञानमें समाया हुवा रहता है। किसी समाजके तत्त्वज्ञानमें जब कोई अदल होता ज्ञानेश्वरी १३६

है तब उस समाजका जीवन-मूल्य ही बदल जाता है। किसी भी व्यक्ति, संस्था, समाज अथवा राष्ट्रके पास जब अपना ऐसा कोई तत्त्वज्ञान होता है तब वह व्यक्ति अथवा समाज या राष्ट्र अपने कानून, नियम, संस्थाएँ साहित्य, कला आदिके लिये स्वप्रकाशित प्रेरणाका स्रोत पा सकता है। अपनी जीवन पद्धतिका विकास कर सकता है और जीवनमें पग पग पर जानेवाली समस्याओंसे निपटनेके लिये किये जानेवाले व्यक्तिगत और सामूहिक पराक्रमको उस तत्त्वज्ञानकी कसौटी पर कस कर देख सकता है, जान सकता है कि इसका मूल्य क्या है ! तत्त्वज्ञान मानवी जीवनके विकासके लिये आवश्यक वह "आंतरिक कवच है" जो सभी प्रकारके बाह्य आक्रमणोंसे संरक्षण प्रदान करके उसे अंतिम समय तक जुझुत्सु बना रखता है। वैदिक संस्कृतिके वातावरणमें भारतीय तत्त्वज्ञानका जन्म हुआ । उपनिषद् भारतीय तत्त्वज्ञानकी प्रौढ़ावस्था है। उपनिषदकालके अनेक गंभीर और महान सिद्धांतोंके बीज वेद मंत्रोंमें मिलते हैं। उपनिषदोंमें जीवन-विकासके लिये आवश्यक तत्त्वज्ञान कहते हुए उसीके आधारभूत अथवा अंगभूत नीतिशास्त्र आदि कहा गया है। उपनिषदोंमें मनुष्यके प्रत्येक सूक्ष्मातिसूक्ष्म अनुभवोंको अत्यंत महत्त्व पूर्ण स्थान दिया गया है। उपनिषदोंमें श्रद्धाके लिए अत्यंत महत्त्वका स्थान है यद्यपि तर्कका विरोध नहीं है। उपनिषदमें विचारोंकी ऊंचाई दिखानेवाली कई उछालें हैं। उसमें "तत्त्वमसि" एक ऊंची उडान है। विश्व-विचारके क्षेत्रमें यह एक ऊंची सी ऊंची उडान है। वैसे ही "पूर्ण है वह, पूर्ण है यह पूर्णसे निष्पन्न होता पूर्ण...! भी एक ऊंची उडान है। जिसके आधारपर जीवनके अनेक सिद्धांत बिठाये गये हैं। भारतीय तत्त्वज्ञान=अपनेकों ब्रह्मका रूप मान कर-विश्वका केंद्रबिंदु बन कर सोचनेको सिखाता है। यह विचारके साथ अनुभवके क्षेत्रमें भी एक उडान है। यही वेदांतकी आत्मा है। गीता उपनिषदोंका निचोड है और ज्ञानेश्वरी गीताका विशदीकरण । ज्ञानेश्वरीमें सारे विश्वको आत्माका स्फुरण मान कर विश्व और विश्वात्माका समरसैक्य दर्शाया है। साथ ही इसको अनुभव करनेका तरीका भी, जो अत्यंत महत्त्वका है। तप—शांत भावसे द्वंद्वोंको सहन करना तप है ! तपकर तपाना तप है । तपसे पाप-क्षालन होता है। जैसे सोना तपनेके पहले शुद्ध नहीं होता वैसे बिना तपके जीवन निर्मल नहीं होता। बिना तपके कोई "महान् निर्माण" नहीं होता । तप जीवनका सार है। तपसे जीवन खिलता है। तप प्रत्येक वर्ण और आश्रमका आधार है। धर्म सूत्रोंने पाप-क्षालनके लिये तपकी आवश्यकता कही है तो उपनिषदोंने ब्रह्म-प्राप्तिके लिये तपकी आवश्यकता कही है। अथर्ववेदमें कहा है "जिस मनुष्यके साथ तपका जितना अधिक संचय है उतना वह अधिक महान होता है।" उपनिषदोंमें "तपसे ब्रह्मका ज्ञान होता है क्यों कि तप ही ब्रह्म है।" ऐसे तपकी महत्ता कही है। गीतामें "श्रद्धापूर्वक तथा फलकी अपेक्षा किये बिना किया जानेवाले तपको सात्विक तप कहा है! भारतीय जीवन परंपरामें तपका अत्यंत महत्त्व है। भारतीय साहित्यमें तपकी महत्ता करनेवाले अनेक वचन हैं। ब्राह्मण ग्रंथ कहते हैं "तप अग्नि है।" "तप दीक्षा है!" "तपसे लोक विजय होता है। इस लिये तपाचरण कर!" मनुस्मृतिमें कहा गया है "जो कुछ दुष्प्राप्य है, दुर्गम है, वह सब तपसे मिलता है। कोई भी तपका अतिक्रमण नहीं कर सकता !" (10) १३७ परिशिष्ट ५

तप भारतीय संस्कृतीकी आधार शिल्प है। तपसे चिंतन और जीवन शक्तिमान है। सरस होता है। उज्ज्वल होता है ! तपसे ज्ञान प्राप्ति तथा ज्ञान-वृद्धि होती है। भागवतमें लिखा है “ तपसे ब्रह्मदेवको सृष्टि निर्माण करनेकी शक्ति मिली ।” तपके अनेक प्रकार कहे गये हैं। किंतु तपका अर्थ देहदंडन नहीं। निसर्गदत्त शक्तियोंका हनन नहीं। किंतु उसको सुस्थित रखना, समभागसे रखना। उद्विग्न न होने देना। महान उद्देश्यसे, निष्काम भावसे शांत होकर द्वंद्वोंका अतिक्रमण करते हुए तन मन वचनसे ध्येय-निष्ठ रहना ही तप है। ऐसा तप ही ऋत है, ऐसा तप ही सत्य है, ऐसा तप ही जीवनसर्वस्व है। इससे ब्रह्म-महानता प्राप्त होती है। तापत्रय—तापका अर्थ है दुःख। क्लेश, कष्ट। यह तीन प्रकारके होते हैं। बाह्य सृष्टिके आघातसे, शीतोष्णादि संयोगसे जो दुःख भोगने होते हैं वे आधिभौतिक दुःख हैं। जैसे रोग, वृद्धावस्थाके दुःख आदि,। देवताके क्रोधसे, अथवा निसर्गकी अवकृपासे जो दुःख भुगतने होते हैं वह आधिदैविक हैं। जैसे अतिवृष्टि अनावृष्टि, आग लगकर, चोरी डाकेसे दुःख भुगतने पड़ते हैं वे और मरणोत्तर पापपुण्यादि भुगतना, आंतरिक ताप अनुताप, वियोगादि सहना आध्यात्मिक दुःख है। इन तीनों प्रकारके दुःखोंको मिलकर तापत्रय कहा जाता है। त्रिग्रंथि अथवा तीन गांठें—हठयोगमें छ चक्रोंके साथ उनकी ग्रंथियोंका उल्लेख है। लिंगमूलमें जो मूलाधारचक्र है— लिंगमध्यमें भी कहा गया है— उसके पास जो ग्रंथि है उसको ब्रह्मग्रंथि कहा गया है। इस चक्रकी देवता ब्रह्मा है। यह पृथ्वीतत्त्वका चक्र है। यह अधोमुख होता है। कुंडलिनी शक्ति निद्रावस्थामें यहीं पड़ी रहती है। दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान। इसकी शक्ति है डाकिनी। देवता-ग्रंथि विष्णु। यह विष्णुगांठ कहलाती है। यह जलतत्त्वका चक्र है। इसे कामभूमि भी कहा गया है। सामान्य जीवका मन यहां जीवात्म-रूपसे अधिष्ठित होता है। इसलिये इसे स्वाधिष्ठान चक्र कहा गया है। इस चक्रके छ दल षड् विकारोंके द्योतक माने गये हैं।— षड् विकार—( १) काम (२) क्रोध (३) लोभ (४) मोह (५) मद (६) मत्सर। नाभिस्थानमें जो मणिपूरनामका चक्र है उसकी अधिष्ठान देवता अथवा गांठको रुद्रग्रंथि कहा जाता है। यह तेजस् तत्त्वकी गांठ है। इसकी शक्ति लाकिनी कहलाती है। इस चक्रके दस दल होते हैं। इन तीन चक्रोंकी ग्रंथियोंको त्रिग्रंथि अथवा तीन गांठें कहा गया है। इन तीन ग्रंथियोंको तीन तृष्णाएँ पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणाका आधार माना जाता है। संन्यास लेते समय इन तीन तृष्णाओंका त्याग करना पड़ता है। इन तीन तृष्णाओंको बंध माना गया है। इन तीन तृष्णाओंसे मुक्तिको ग्रंथिभेद माना गया है। ब्रह्मग्रंथिके भेदनसे कामादि दुष्प्रवृत्तियों पर विजय मिलती है। विष्णुग्रंथिके भेदसे वैष्णवी माया भोग ऐश्वर्य वैभवादिकी अपेक्षापर विजय पायी जाती है। रुद्रग्रंथिके भेदसे प्रतिष्ठादि पर विजय पायी जाती है। हठयोगमें इन तीन ग्रंथियोंके भेदका अत्यंत महत्त्व कहा गया है। पूर्णत्वकी प्राप्तिके लिये इन चक्रोंका भेद होना आवश्यक है। यह हठयोग परंपरा है। इसके साथ ही साथ ज्ञानेश्वरीके कुछ विद्वान तीन गांठे इसका अर्थ करते समय सत्व, रज, तम इन तीन गुणोंके बंधन ऐसा भी कहते हैं। ज्ञानेश्वरी · १६८

त्रिपुटी—जिसमेंसे एकको अलग करनेसे दूसरे जो दो हैं उसका मिलना असंभव है ऐसे एक दूसरेसे संबंधित - अन्योन्याश्रयी - तीन वस्तुओंको त्रिपुटि कहा गया है । जैसे :- कर्ता कर्म क्रिया । ज्ञेय ज्ञाता ज्ञान । ध्येय ध्याता ध्यान । दृश्य, द्रष्टा दर्शन । भोग्य, भोक्ता भोग । ब्रह्म माया जीव । परमात्मा आत्मा जगत् । इन तीनोंका विलय ही सच्चिदानंदस्वरूपप्राप्ति है । त्रिबंध अथवा तीन बंध—हठयोगमें अनेक प्रकारकी मुद्राएँ तथा बंध कहे गये हैं । इनमें मूलबंध, जालंधरबंध तथा उड्डियानबंध ऐसे तीन बंध कहे गये हैं। इन तीनों बंधके विषयमें उन नामोंसे अलग कहा गया है। किंतु कहीं कहीं यह शब्द आया है इसलिये इस शब्दकी व्याख्या की गयी है। इन तीन बंधोसे युक्त जो प्राणायाम किया जाता है उसको त्रिबंध साधना कहा जाता है। तीर्थ-स्थान—पवित्र-स्थान, जल-स्थान, ऋषियोंका आश्रय-स्थान, जल तथा गुरु सेवन स्थळ ऐसा तीर्थ शब्दका अर्थ है। साथ साथ जिसके कारणसे सब पापसे तर जाते हैं उसको तीर्थ कहा गया है। अलग अलग पुराणोंमें तीर्थ शब्दका अलग अलग अर्थ दिया है। स्कंदपुराणमें "जहां श्रेष्ठ ऋषि मुनियोंने आश्रय लिया, जो देवोंका निवास-स्थान है उसको तीर्थ कहते हैं।" कहा गया तो ऋग्वेदमें सरस्वती, शरयू, गंगा, सिंधु, आदि २० नदियोंके स्थानको तीर्थ कहा गया है। सरस्वतीको श्रेष्ठ वाणी तथा विचार देनेवाली कहा गया है। सभी नदियां, उनके उगमस्थान, संगमस्थान, बडे बडे तालाब, ऋषियोंके आश्रमस्थान, पर्वत-शिखर, आदि स्फूर्तिप्रद स्थानोंको तीर्थ-स्थान कहा गया है। हिमालयके सभी स्थानोंको तीर्थ-स्थान माना गया है। पद्मपुराणमें युगभेदसे तीर्थ स्थानोंका महत्व कहा गया है। कृतयुगमें पुष्कर तीर्थ, त्रेतामें नैमिषारण्य, द्वापारमें कुरु-क्षेत्र तो कलियुगके लिये गंगा तीर्थ कहा गया है। फिर अलग अलग संप्रदायके लोग अलग अलग स्थानोंको तीर्थ-स्थान मानते है। पुराणोंमें तीर्थके अनेक प्रकार कहे गये है। जैसे- (१) धर्मतीर्थ-जहां धर्मपालनमें प्रेरणा मिलती है। (२) अर्थतीर्थ=नदीके किनारे और संगमस्थान पर व्यापारादि बडे पैमाने पर चलता है (३) कामतीर्थ-जहां विविधप्रकारकी कलाओंकी उपासना होती है। (४) मोक्षतीर्थ-विद्या, ज्ञान, तप आदि जहां सिखाया जाता है। जहां अध्यात्म केंद्र है ऐसा स्थान । जहां इन सबका समन्वय हुवा है उसको महापुरी कहा गया है। जैसे काशी, प्रयाग, मथुरा, उज्जयिनी, कांची आदि । तुरीयावस्था या तुर्यावस्था—तुरीय, वेदांतकी एक संज्ञा है। अज्ञान और उससे आवृत्त ढकागया चैतन्यके आधारभूत अनावृत, न ढका हुवा शुद्धचैतन्यका नाम तुरीय है। व्यष्टीकी जागृति स्वप्न तथा सुषुप्ति - निद्रावस्था - अवस्थामें आत्माको विश्व, तैजस् तथा प्राज्ञ ऐसी संज्ञा है। तथा विशाल विश्वकी दृष्टिसे वही विराट या वैश्वानर, हिरण्यगर्भ अथवा प्राण, तथा ईश्वर ऐसी संज्ञा है। आत्माकी इन तीनों अवस्थाओंसि भिन्न तथा इन तीनोंके मूलमें जो शुद्ध आत्मतत्त्व है उसे तुरीय कहा गया है। जैसे कि नींद लगनेसे प्रथम सोते अथवा नींदमेंसे जगते समय एक क्षण भर ऐसा रहता है कि तब अहंकार आदि विकारोंका भान नहीं रहता। वैसे ही ज्ञाता और ज्ञेयका लय हुवा रहता है। केवल - शुद्ध - ज्ञानरूप इस अवस्थाको तुरीयावस्था ३३९ परिशिष्ट ५

कहते हैं। इस अवस्था में प्रपंचका उपशम हुवा रहता है। सतत इस स्थितिमें रहना तुरीयावस्थामें रहना अथवा सहजावस्थामें रहना है ! इसको उन्मनी अवस्था भी कहते हैं। दक्षिणायन — जिस समय सूर्यका उदयास्त दक्षिणकी ओर सरकता है ऐसा समय । सामान्यतया कर्कसंक्रांतिके बाद मकरसंक्रांति तकका काल दक्षिणायन माना जाता है। (कर्क संक्रांति आषाढमें आती है और मकर संक्रांति पूसमें) इस कालको पितृयान भी कहते हैं। पितृयानका अर्थ पितरोंको पितृलोकतक ले जानेवाले मार्ग। पितृयानका मार्ग स्वर्गतक होने पर भी मोक्ष तक नहीं माना जाता। योगी लोग देहपातके लिये उत्तरायणका काल पसंद करते हैं। दशोपनिषद् — उपनिषद्का अर्थ पास बैठना। संस्कृतमें ऐसा ही और एक शब्द है उपासना। इसका अर्थ भी पास बैठना है। किंतु उपनिषदमें गुरुके पास बैठना है तो उपासनामें देवताके पास बैठना है। गुरुके पास बैठकर गुरुकी भांति हो जाना उपनिषद् है तो देवताके पास बैठ कर देवताकी भांति हो जाना उपासना है। उपनिषद् गुरु-शिष्योंका हार्दिक संवाद है। यह अत्यंत प्राचीन कालसे चला आया है। उपनिषदोंकी संख्या अनंत होगी। किंतु जो संवाद लिपिबद्ध हो कर आज उपलब्ध हो सकते हैं उनकी संख्या २०० के करीब है। इसमें कुछ अति प्राचीन है। कुछ प्राचीन है। कुछ अर्वाचीन है। संभवतः ई. पू. १८००-२००० से ई. सं. १२०० तक इन उपनिषदोंका काल रहा होगा। इन सब उपनिषदोंमें १४ उपनिषद् महत्त्वके प्राचीन माने जाते हैं। इनमें भी १० अत्यंत महत्त्वके हैं। इसलिये ज्ञानेश्वरने उनको "सकल मति प्रकाश श्रीगणेश" का मुकुटप्राय माना है। वे १० उपनिषद् हैं- (१) ईश (२) केन (३) कठ (४) प्रश्न (५) मुंडक (६) मांडूक्य (७) तैत्तिरीय (८) ऐतरेय (९) छांदोग्य (१०) बृहदारण्यक. इन उपनिषदोंमें ब्रह्म, सृष्टिरचनाक्रम, ब्रह्मप्राप्ति, तथा ब्रह्मप्राप्तिकी साधनाकी विस्तृत चर्चा है। दान — दान वैदिक अर्थशास्त्रका महत्त्वपूर्ण अंग है। वैदिक अर्थशास्त्र केवल धनसंग्रहका अर्थशास्त्र नहीं है किंतु धन कैसा संग्रह करना चाहिए और उसका व्यय कैसा करना चाहिए यह भी कहता है। दान और यज्ञ संपत्तिकी सम-विभाजन व्यवस्था है। दान शब्दकी कई परिभाषाएँ हैं किंतु सबमें "न्यायसे कमाये हुए धनका" विशेषण है। "न्यायसे कमाये हुए धन धान्य पशु आदिका गरजू लोगोंके लिये देना दान है।" दान देनेके लिये दो शर्ते हैं। (१) न्यायसे कमाया हुवा धन (२) दान सत्पात्रको और श्रद्धासे दें। दान चार प्रकारके होते हैं। (१) नित्य (२) नैमित्तिक (३) काम्य (४) विमल। (१) बिना किसी फलाशासे, नित्य नियमित रूपसे, सत्पात्रमें अपनी योग्यताके अनुसार कुछ न कुछ देते रहना। (२) पाप नाश अथवा पुण्य प्राप्तिके उद्देशसे ग्रहण, अमावास्या, तीर्थयात्रामें, आदि विशिष्ट स्थल और कालमें उद्देशपूर्वक दिया गया दान। (३) संततिकी आशासे, संपत्तिकी आशासे, विजय अथवा यश आदिकी आशासे - समारोहपूर्वक दिया जानेवाला दान काम्यदान है। (४) विमल यह सर्वश्रेष्ठ दान है। बिना ज्ञानेश्वरी ११०.

किसी फलाशासे, निष्काम भावसे, ईश्वरार्पण भावसे, सत्पात्र तथा सत्कार्यके लिये दिया गया दान विमल दान है । साथ साथ जब कभी समाज पर विपत्ति आती है, जैसे शत्रुका आक्रमण होता है, अकाल पड़ता है, कोयी रोगादि फैलते हैं ऐसी विपत्तिमें विपत्तिनिवारणार्थ - समाजकी विपत्ति निवारणार्थ अपनेको चाम्य, चांदी, सोना आदिसे तुलवाकर अपने सम - भार दिया जानेवाला तुलादान । यह विपत्तिसे मारे समाज या व्यक्तिको दिया जानेवाला दान है। अथवा किसी सदुद्देशसे, सत्कार्यके लिये दिया जानेवाला दान है। जैसे मंदिर आदि बांधनेके लिये विद्यालय चलानेके लिये, अन्नछत्र चलानेके लिये आदि । इसके अलावा कुछ महादान हैं। जैसे स्वर्ण दान, गजदान, भूमिदान आदि, इन सबमें अन्नदान और ज्ञानदान महत्त्वके कहे गये हैं। दानके साथ दक्षिणाकी व्यवस्था है । दक्षिणा दानवस्तुकी जो कीमत होती है उससे तिहाई होनी चाहिए। वैसे ही दान लेनेवाला विद्वान हो, सुसंस्कृत हो, सत्प्रवृत्त हो, तपस्वी हो । दानकी वस्तु अथवा दक्षिणाका दुरुपयोग न करें। नहीं तो दान लेनेवाला यदि कुपात्र होता है तो अपने साथ दान देनेवालेको भी अधोगति ले जाता है । ऋग्वेद आश्वासन देता है “दानसे किसीकी संपत्ति कम नहीं होती ।” ऋग्वेदमें दानके विषयमें कई सूक्त हैं। उनमें दान देनेवाले राजाओं और लेनेवाले ऋषियोंके नाम हैं। दानका वर्णन है। राजाओंके विषयमें राजाओंको दिग्विजयके बाद दान देना अनिवार्य है। दान और यज्ञ समाजमें संपत्तिका सम-विभाजनकी व्यवस्था है ही साथ साथ वित्तसत्ता दुर्जनोंके हाथमें न जानेकी दक्षता भी है। क्यों कि दुर्जनोंके हाथमें वित्तसत्ता जाना समाजके लिये खतरनाक है । इसीलिये अन्यान्य शास्त्रकारोंने कैसे धन कमाना चाहिए अपने धनका कितना हिस्सा दानमें देना चाहिए, दान लेनेवाला कैसे होना चाहिए आदि बातों पर विचारपूर्वक अपना मत दिया है। सामान्यतया अपने उत्पन्नका छठा भाग दानमें देनेके लिये कहा गया है। इसके साथ “धन न्यायसे कमाया गया है!” “दान श्रद्धा पूर्वक दिया गया हो!” “सत्पात्रको दिया गया हो!” आदि बातों पर बहुत कटाक्ष किया गया है। “जिसे दान दिया जाता है उस. ओर तुच्छता भाव न हो!” “दिया हुवा दान कभी नहीं लौटाया जाय!” “दानका वचन पवित्र वचन है। उसका पालन होना ही चाहिए!” आदिका भी आदेश है। जैन धर्मशास्त्रोंमें भी दानके (१) पात्र (२) करुणा (३) सम (४) अन्वय ऐसे चार प्रकार कहे गये हैं। सत्पात्रको दिया गया दान “पात्र” है। दुःखियोंको दिया गया दान करुणा हैं अपने सम साथियोंको दिया गया दान “सम” है। तथा अपनी संपत्ति किसी उत्तराधिकारीको सौंपना अन्वय है! इसके अलावा अन्नदान औषधदान, गृहदान, ज्ञानदान, मुनियोंके लिये आवश्यक उपकरणादिका दान, आदि कई प्रकारके दान कहे गये हैं। जूआ, चोरी, आदि पापमार्गसे कमाया हुवा धन देने और लेने वालेको दुःखदायक होता है ऐसा भी कहा गया है। इन सब बातोंके साथ ही साथ दानीको कितना दानमें देना चाहिए इसका भी विवेचन किया गया है। इस विषय पर अलग अलग शास्त्रकारोंने अलग अलग मत दिये हैं। कुछ शास्त्रकारोंने एक तिहाई उत्पन्न, दानादिमें देनेको कहा है तो कुछने एक बटा छ दानमें देनेको कहा है। किंतु सबने दानके कारण परपरिवारको किसी भी प्रकारके कष्ट न हो इस लिये सावध रहनेको कहा है। परिवारकी सभी आवश्यकताओंकी पूर्ति होनेके बाद राजाका राजधन देनेके बाद जो रहता है वही दान करनेका विधान है। जैसे दान देनेवालोंको नियम कहे गये हैं वैस ही दान लेने- वालेके लिये भी कुछ नियम हैं। दान लेनेवालोंको भी कुछ आशाएँ दी गयी हैं। अयोग्य व्यक्तिसे १४१ परिशिष्ट ५

दान न लें। अधार्मिक राजासे दान न लें। अश्रद्धासे तुच्छतापूर्वक या दबावमें आकर दिया हुआ दान न लें ! अविद्वान् ब्राह्मणको कोई महादान नहीं लेना चाहिए ! प्राचीन कालसे व्यक्ति तथा समाजमें आनेवाली अपूर्णताको दूर करनेके लिये दानका विधान कहा गया है। पाराशरस्मृतिमें "जिसको किसी बातकी आवश्यकता है उसके घरमें जाकर वह वस्तु देना!" उत्तमतम दान कहा गया है। कई लोग इतने दुर्बल होते हैं कि मांगने के लिये बाहर जाना उनके लिये असंभव होता है। ऐसे लोगोंको उनके घरमें जाकर ही दान देना चाहिए । शास्त्रकारोंने ज्यादा हो या कम "नित्यका दान" आवश्यक और महत्व का माना है। दान एक सामाजिक कर्तव्य है। जिस समाजके धनिक लोग अपना यह सामाजिक कर्तव्य करते हैं उस समाजमें समाधान रहता है । सामाजिक संताप सामूहिक दान भावनाके अभावका द्योतक है। इसीलिये प्राचीन शास्त्रोंके मर्मज्ञ इस युगके महर्षि विनोबाजीने सामूहिक रूपसे भूदान, संपत्तिदान, श्रमदान आदिकी प्रतिष्ठा की है। विनोबाजीकी ग्रामदानकी कल्पना विश्वइतिहासको दी गयी एक महान् देन है। यह उनकी प्रतिभाका-जो स्वयं प्रकाशित है—सुंदरतम उदाहरण है। यह प्राचीन ऋषियोंके दानकी कल्पनाका पूर्ण विकसित रूप है। दीक्षा—किसी महान् कार्यके प्रारंभमें, उसके लिये योग्य हो, अधिकारी हो, इस दृष्टिसे संस्कार संपन्न अधिकार प्राप्त करनेकी क्रिया। किसी भी यज्ञके प्रथम यजमानको क्षौरादि करके, मंत्रोंके साथ कुछ कर्म करके, यज्ञ दीक्षा लेनी होती है। इस कर्मके बाद ही उस यजमानको "दीक्षित हुआ" ऐसा कहा जाता है। वैसे ही आध्यात्मिक साधनामें, योग-साधनामें गुरुसे शिष्यको अनेक प्रकारसे दीक्षा दी जाती है। आध्यात्मिक क्षेत्रमें दीक्षाका अर्थः— देती जो विमल ज्ञान नाशती कर्म वासना । कहते हैं उसे दीक्षा तंत्रज्ञ मुनि सिद्ध जो ॥ ऐसे किया है। आगमोक्त साधनामें दीक्षाको अत्यंत महत्त्व दिया गया है। बिना गुरुदीक्षाके इस मार्गमें प्रवेश नहीं मिल सकता । दीक्षा गुरुका भावात्मक कार्य है । दीक्षासे गुरु-शिष्य चित्त-संयोग होता है । दीक्षाएँ अनेक प्रकारकी होती है । सामान्यतः दोन प्रकारकी दीक्षाएँ मानी जाती हैं । (१) सामान्य दीक्षा जो विशेष दीक्षाके लिए भूमिका तैयार करती है । इस दीक्षामें दीक्षित होनेके बाद ही साधक साधनामें व्रतस्थ होता है। उसको यम-दमादि साधनाके नियमोंका पालन करना पड़ता है। इस दीक्षामें गुरु शिष्यके मस्तक पर आशीर्वावरूप शुभ हस्त रखता है। इस प्रकारकी दीक्षाके प्रभावसे अनेक प्रकारके पापांकुर नष्ट होते हैं। हृदयमें श्रद्धा भक्तिका उदय होता है। इससे गुरु-सेवा, देव-पूजादिका अधिकार मिलता है। इसके बाद (२) यथार्थ दीक्षा दी जा सकती है। आगम-शास्त्रानुसार-भुक्ति और मुक्ति समान सिद्धियाँ हैं । आगम शास्त्रको ही "भुक्ति मुक्ति वर प्रद" कहा गया है। इसमें भुक्तिकी भोगकी साधना सकाम, और मुक्तिकी साधना निष्काम माना गया है। गुरु साधकका अधिकार देख कर सबीज अथवा निर्बीज मंत्र दीक्षा देता है। सबीज दीक्षा अत्यंत सामर्थ्यवान होती है जिससे साधकको अत्यंत कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसमें अनेक प्रकारके संकट और खतरे भी होते हैं। इसलिये निर्बल लोगोंको सबीज दीक्षा नहीं दी जाती निर्बलका अर्थ शरीरसे अथवा मनसे भी हो सकता है। सामान्य निर्बल लोगोंको निर्बीज मंत्र दीक्षा दी जाती है। ऐसी दीक्षामें अनेक प्रकार हैं। दीक्षाके सभी मुख्य तथा उपमुख्य प्रकारोंको लेकर ज्ञानेश्वरी १५२

७५ से अधिक प्रकार हैं। दीक्षा आध्यात्मिक साधनाके क्षेत्रमें अत्यंत महत्त्वका भाग है। सामान्य दीक्षा मानो अच्छा बीज है। अच्छे किसानको, अच्छा बीज मिलने पर भी उसको बोना, उसके पहले खेत तैयार करना, बोनेके बाद भी जंतु, कीडे मकोडोंसे उसकी रक्षा करना, समय पर पानी खाद आदि देनेका काम रहताही है। वह सब ठीक समय पर होता है तो अच्छी फसल आती है। किंतु यथार्थ दीक्षा आगकी चिनगारी है। जहां पडी वहांका कूडा कर्कटकर राख होना निश्चित है। ऐसी दीक्षाको शक्तिपात भी कहते हैं। गुरु अपनी शक्तिसे शिष्यका व्यक्तित्वही बदल देता है। यह एक प्रकारसे व्यक्तित्व परिवर्तन है। जैसे तुरंत दीपसे दीप जलता है या बटन दबाते ही बिजलीका प्रवाह प्रारंभ होता है वैसे ही यह दीक्षा। क्षण भरमें व्यक्तित्व परिवर्तन होता है। वास्तविक अर्थमें यही दीक्षा है ! यह आत्मसंस्काररूप अंतर्दीक्षा है। दीक्षा मिली और सिद्धीका परम पावन दर्शन हुआ ! ऐसी दीक्षामें गुरु क्षणभरमें अपनी ही नहीं अपनी गुरु परंपराकी सारी शक्तियां शिष्यको ऐसे सौंप देता है जैसे पिता मरते समय अपनी परंपरागत सारी संपत्तिका उत्तरदायित्व अपने पुत्रको सौंप देता है। ऐसी दीक्षा पानेके लिये शिष्यको जन्मजन्मांतरसे वास्तविक शिष्य संस्कारोंसे संपन्न होना पड़ता है। इसका संकेत गीताके छठे अध्यायके अंतमें मिलता है। दुःख—सुखके बिना दुःख या दुःखके बिना सुखका अनुभव आना असंभव है। क्यों कि यह सापेक्षिक द्वंद्व है। दुःख शब्दकी व्याख्या करते समय न्यायशास्त्र कहता है। साक्षा-पीडा- देनेवाला जो है वह दुःख है। पीडा दुःखका लक्षण है। अनेक दर्शनकारोंने दुःखकी अनेक व्याख्यायें की हैं। किसीने "प्रतिकूल वेदनाको दुःख," कहा है तो किसीने "अधर्म मूलक उत्पन्न प्रतिकूलताको दुःख" कहा है। और सांख्योंने "बुद्धि तत्त्वके विशिष्ट परिणामको दुःख" कहा है। मनुस्मृति कहती है "परवशता दुःख है।" नीतिशास्त्र दुःखको अधर्मका परिणाम मानता है। दीनता, तथा मुखमालिन्य दुःखका परिणाम है। दुःख तीन प्रकारका होता है। (१) आध्यात्मिक (२) आधिभौतिक (३) आधिदैविक। आध्यात्मिक दुःखमें भी शारीरिक और मानसिक ऐसे दो प्रकार हैं। शारीरिक दुःखका कारण कफ वात पित्तकी विषमता है तो मानसिक दुःख काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन षड्विकारोंके कारण होते हैं। आधिभौतिक और आधिदैविक दुःख बाह्य उपचारोंसे दूर होनेवाले हैं। आधिभौतिक दुःख मनुष्य, पशु, पक्षी, कृमि कीटक आदि निर्माण करते हैं तो आधिदैविक दुःख भूत, पिशाच, निसर्गादि उत्पन्न करते हैं। मन ही दुःखका ग्रहण करता है। प्रत्येक जीवको दुःख होता ही है। इंद्रिय, इंद्रिय विषय, तथा विषय प्रत्यक्ष दुःखका कारण है। पारतंत्र्य, रोग, अपमान, शत्रु, प्रतिकूल गृह-परिवार, निर्धनता, दुष्टकी सेवा, आदि दुःखकी अनेक बातें हो सकतीं हैं। भगवान बुद्धही जीवनमें आनेवाले दुःखोंको अपने तत्त्वज्ञानका केंद्र बना कर सोचनेवाले पहले महापुरुष हैं। दुःखका सर्वव्यापी अस्तित्व, उसके सार्वत्रिक कारण, संपूर्ण दुःख निरसनकी शक्यता, तथा दुःखनिरसनका मार्ग यह बुद्धके कहे श्रेष्ठ प्रकारके चार सत्य हैं। भगवान बुद्ध कहते हैं "जन्म, जरा, रोग, मृत्यु, अनिष्ट संयोग, इष्टवियोग, इच्छाघात आदि बातें दुःखमय हैं।" दुःखका कारण है तृष्णा। इसलिये तृष्णा - त्याग करनेसे दुःखमुक्ति मिलेगी यह भगवान बुद्धका कहना है । "जीवन दुःखोंसे भरा है" यह बात उपनिषद् तथा सांख्य, भगवान बुद्धके पहलेसे कहते आये हैं। प्रापंचिक सुख तथा सुखसाधन यह क्षणिक होनेसे उसका अंतिम परिणाम दुःख ही है। इसलिये "परमसत्य" को छोड़ कर और सब दुःखका ही कारण है। ११३ परिशिष्ट ५

यह उपनिषदोंका कहना है। किंतु बुद्धने अपने सिद्धांतकी नींव ही दुःख पर रखी है। बुद्धके उत्तरकालीन तत्त्वज्ञानपर इस बातका गहरा असर पडा है। भारतीय तत्त्वज्ञानने अविद्याको दुःखका मूल माना है। जैसे अविद्या घटते जाती है अथवा दूर होते जाती है वैसे दुःख मिटता जाता है। ज्ञानके प्रकाशसे मनकी प्रसन्नता बढ़ते जाती है। जैसे जैसे प्रसन्नता बढ़ती जाती है अपने आप शांति मिलती है। यही आध्यात्मिक आनंद है। वासनापूर्तिजन्यआनंद क्षणिक है। इसलिये वासनाके कारणीभूत अविद्याको दूर करना शाश्वत सुखका साधन है। निरालंब शाश्वत सुख जीवनका अंतिम लक्ष्य है। सारी आध्यात्मिक साधना इस लक्ष्यके प्रति ले जाती है। किसी भी सुखके मूलमें जब तक वासना है तब तक वह सुख क्षणिक होगा। क्यों कि वही दुःखका मूल है। इसलिये वासनाक्षय, वासनाका कारणीभूत मूल अविद्याका नाश, आध्यात्मिक साधनाका मूले कुठारः पद्धति है। इसीको संतोंने अपने पारमार्थिक साधनाका आधारशिला माना है। इसलिये संतोंने प्रापंचिक सुखोंसे अर्थात् वासनापूर्ति जन्य क्षणिक सुखोंसे विरक्ति और भगवद् भक्तिमें अनुरक्तिका नया मार्ग सिखाया। विरक्तिसे वासनाक्षय, भक्तिसे आनंद प्राप्ति, ऐसा यह दुहरा मार्ग है ! देव—दिव्य देह धारण करनेवाला। दान देना, चमकना, प्रकाश देना, ऐसे अर्थके दा, दीप अथवा द्युत धातुसे देव शब्द बना है। इसलिये देव शब्दके साथ दिव्यता का बोध होता है। अदृश्य रूपसे वास करनेवाली दिव्य शक्ति देव ! ऐसा अर्थ हो गया है। यह अदृश्य शक्ति सर्वत्र संचार करके भक्तोंकी एक निष्ठ भक्तिके कारण प्रकट होकर भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करती है। यह सदैव भक्तोंके पास रहकर उसका रक्षण करती है। इनमें अनेक प्रकार हैं। वेदकालसे लेकर इस चराचर सृष्टिके परे एक दिव्य सृष्टिकी कल्पना की है। देव इस दिव्य सृष्टिके निवासी हैं। इनकी विविध शक्ति मनुष्यको सुख दुःख देती है। इस परसे देव-धर्म शब्द रूढ हुआ। देव, धर्म और तत्त्वज्ञान यह संस्कृतिका तिहरा रूप है। प्रत्येक देशकी संस्कृतिका यह त्रिकोण है। देह—इसीको शरीर, काया, तन, क्षेत्र आदि कहा गया है। जीवका भला बुरा भोग भोगनेका स्थान देह है। सभी प्रकारकी चेष्टाओंका आश्रय, ज्ञानेंद्रिय तथा कर्मेंद्रियोंके कर्मका आश्रय, हाथ पैर आदि सभी अवयवोंसे युक्त जो है वह, शरीरकी ऐसे अनेक प्रकारकी व्याख्यायें की गयी हैं। मानव देह किसका और कैसे बना है ? इसके विषयमें अनादि कालसे जिज्ञासा बनी रही है। पुराणोंसे लेकर आदिवासियोंके साहित्य तक सर्वत्र इसके विषयमें विस्तृत और चित्रविचित्र विचार आये हैं। ऋग्वेदमें शरीर तथा उसके अवयवोंके शब्द मिलते हैं। इस परसे ऐसे लगता है कि वैदिक ऋषियोंने भी शरीर रचना समझनेका प्रयास किया था। अथर्ववेदमें इसकी विस्तृत चर्चा है। आयुर्वेदके चरक सुश्रुतने भी वही नाम स्वीकार किये हैं। आजसे चार पांच हजार वर्ष पहले लिखे गये शतपथ ब्राह्मण जैसे ग्रंथमें मानवदेहके शरीरमें जो हड्डियां हैं उसकी संख्या ३६० होनेकी बात कही गयी है। गर्भोपनिषदमें स्त्रीके गर्भमें मानवका शरीर किस तरह बनता है इसका विस्तृत विवेचन है। पुराणोंमें अयोनिज मानव देहका विचार आया है। सीता, द्रौपदी, धृष्टद्युम्न, सप्तऋषि, आदि सभी अयोजित हैं। केवल पुराणोंमें ही नहीं आदिवासियोंके साहित्यमें भी अयोजित शरीरधारियोंकी कथायें प्रसिद्ध है। इस देहमें भी देह है। यह जो देह दीखता है वह स्थूल देह है। ज्ञानेश्वरी १४५

हमारी यह देह पंचभूतात्मक है वैसे ही पंचकोशोंसे बनी है। यह स्थूल देह अन्नमयकोशसे बनी है। इस देह पर अभिमान करनेवाले जीवको विश्व कहते हैं। इस शरीरकी सब ज्ञानेंद्रियां बुद्धिशक्ति और कर्मेंद्रियां क्रियाशक्तिसे चलती हैं। ये दोनो शक्तियां समान भावसे अंतःकरणमें रहती हैं। सभी इंद्रियां स्थूल देहके आश्रयसे रहती हैं ऐसा दीखनेपर भी, वास्तवमें ये स्थूल देहका अंश नहीं होती। लिंगदेह जब शरीर छोड़कर जाता है तब ये इंद्रियां स्थूलदेहमें नहीं रहतीं। स्थूलदेहको ही आत्माका भोगायतन कहते हैं। इसी शरीरके सहारे आत्मा पूर्व-कर्मको भुगतता है। बिना देह-संबंधके जीवका कर्तृत्व और भोक्तृत्व व्यर्थ है। स्थूल देहसे मुक्त आत्मा ही कर्ता अथवा भोक्ता हो सकता है। अविद्याके कारण जीवको देहाभिमान होता है। ज्ञानसे अविद्याका क्षय होनेकेबाद यह देहाभिमान नहीं रहता। पांच कर्मेंद्रिय, पांच ज्ञानेंद्रिय, पंच प्राण मन और बुद्धि इन सत्रह तत्त्वोंसे सूक्ष्म देह होता है। प्राणमय कोश, मनोमय कोश तथा विज्ञानमय कोशसे यह बनता है। इस सूक्ष्म देहको लिंग- देह भी कहते हैं। यह लिंगदेह तेजसूका अंश होता है। काष्ठोंमें जैसे अग्नि होता है वैसे यह लिंगदेह होता है। स्थूल देहमें लिंगदेहका तेज व्याप्त होता है। किसीका लिंगदेह विशुद्ध नहीं होता। यह संस्कार और वासनाओंके बोझसे दबा रहता है। मृत्युके समय जो भाव बलवत्तर होते हैं वे अपने पूर्ववर्ती भावोंको अपनेमें मिला लेते हैं। इसलिए मृत्यु समयके संस्कारके अनुसार अगले जन्मकी गति मिलती है। इस लिंगदेहाभिमानी जीवको तेजस् कहते हैं। और ऐसे सभी लिंगदेहोंपर अभिमान करनेवाले तत्त्वको हिरण्यगर्भ । इसी लिंगदेहके पीछे, उसके आश्रयरूप कारण देह होता है। कारणदेहको अनादि अविद्या कहा गया है। यही अविद्या स्थूल और सूक्ष्मदेहका कारण है। ज्ञानसे वह नष्ट होती है इसलिये उसको देह कहा गया है। इस पर अभिमान रखनेवाले जीवको प्राज्ञ कहा गया है। सभी कारण देहोंपर अभिमान रखनेवाला तत्त्व, मायोपाधिक देवता, ईश्वर कहलाता है। कारण देह पंचकोशोंमेंसे आनंदमयकोशका है। ब्रह्म विद्याके प्रभावसे जब तक यह कारणदेह नष्ट नहीं किया जाता तब तक मुक्ति नहीं मिलती। इन सभी देहोंको विकार रहित करना ही देहसिद्धि कहलाती है। भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें इस देह सिद्धिके अनेक प्रकार कहे गये हैं। प्राचीन रसायन शास्त्रियोंने अठारह संस्कारोंसे संस्कृत पारदसे देह सिद्धिकी बात कही है तो पांतजल ऋषिने भूतजयसे देह सिद्धिकी प्रक्रिया कही है। गोरखनाथ और तांत्रिक बौद्धोंने भी देह सिद्धिकी अनेक बातें कही हैं। प्राचीन ग्रंथोंमें शुक्राचार्य, जालंदरनाथ, गोविंदभगवत्पादाचार्य आदि पुरुषोंको देहसिद्धि हुई थी ऐसा कहा गया है। मनुष्य देहसिद्धि होनेके बाद नित्य कौमार्यावस्थामें रहता है। न उन्हे वृद्धावस्था घेरती है न कोई विकार छूता है। प्राचीन ग्रंथोंमें ऐसे ही लोगोंको चिरजीवी कहा है। अश्वत्थामा, बली, व्यास, हनूमान, विभीषण, कृप, परशुराम, मार्कांडेय, इन लोगोंकों चिरजीवी कहा गया है। कल्पांतमें इन चिरजीवियोंके शरीर नष्ट होते हैं। अर्वाचीन कालके कुछ महायोगियोंने आत्माकी भांति शरीर भी अमर हो सकनेकी बात कही है। सारा विश्व सोम-कलासे उत्पन्न होता है और अग्नि उसका भक्षण करता है। सोमकला जब अग्नीसे भी प्रबल होती है तब देह कल्पांत तक टिकते हैं। सोमपानसे सोमकला प्रबल होती है ऐसी बात वेदमें भी कही गयी है। १४५ परिशिष्ट ५

अमरत्व प्राप्त होने पर भी देहतत्व पर संपूर्ण स्वामित्व प्राप्त करनेके प्रथम देहातीत जीवन्मुक्ता- वस्था पाना असंभव है । इसके लिए शरीरभावका त्याग करके सहज भावमें रहना आवश्यक है । सामान्यतया कुछ संतोंने देहकी निंदा करते हुए यह रक्त और मांसका पिंड है, अस्थियोंका पंजर है, मलमूत्रकी खान है, आदि कहा है किंतु यजुर्वेदमें कहा है । सात ऋषि रहते शरीरमें रक्षा करते हैं अप्रमाद हो । सात ऋषि हैं ये जल प्रवाह जाते निद्रिस्यके स्थान तक जो ॥ निद्रिस्यकी रक्षा करते हैं दो देव इस देह यज्ञ शालाकी ॥ इस मंत्रका अर्थ करते समय वेदाचार्योंने कहा है दो आंखें, दो कान, नाकके दो रंध्र, एक मुख ये ही सप्त ऋषि हैं। ये सदैव ज्ञानग्रहण करते हैं इसलिये ऋषि हैं । ये ही ज्ञानग्रहणके देह-यज्ञशाला-की रक्षा करते हैं। जागृतावस्थामें ये सातों बहिर्मुख होते हैं और निद्रावस्थामें अंतर्मुख होते हैं । इनकी इस अंतर्मुखताके कारण निद्रित शरीरको आनंद मिलता है । निद्रावस्थामें भी जो दो देव इसकी रक्षा करते हैं ऐसा कहा है वे दो देव हैं प्राण और अपान ! यदि वे दो निद्रित हो गये तो देह समाप्त होगा ! इसी प्रकार अथर्ववेदमें भी कहा है । आठ चक्र नव-द्वारकी यह काया देवोंकी अयोध्या नगरी । इसमें है सुवर्णमय कोष वही तेजसे भरा स्वर्ग-लोक । उस सुवर्णमय कोशका है जो तीन पर तीनका आधार । इसमें रहता है आत्मयक्ष इसे जानता वह ब्रह्म ज्ञानी ॥ आठ चक्र=(१) मूलाधारचक्र (२) विशुद्ध (३) मणिपूर (४) स्वाधिष्ठान (५) अनाहत (६) आज्ञाचक्र (७) सहस्रारचक्र (८) ब्रह्मरंध्र । नवद्वार=दो आंखे, दो कान, नाकके दो रंध्र, एक मुख, एक गुदद्वार, एक मूत्रद्वार । तथा इसके आधारभूत देवता कानके देवता दिशा, आंखका सूर्य, मुखका अग्नि, हृदयका चंद्रमा इस प्रकार शरीरके आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, एक इंद्र, एक प्रजापति ऐसे ३३ देवता हैं । इसीलिये यह स्वर्ग लोक है । इसीलिये संतोने भी इसको “अस्थिपंजर रक्तमांसका पिंड, मलमूत्रकी खान” आदि कहने पर भी “चौरासी लाख फेरे फिर कर सुंदर नरतनु पाया” कह कर इसकी महती गायी है । मानवदेह पंच भूतात्मक है, नश्वर, नाश होनेवाला है, इस पर भरोसा नहीं कर सकते फिर भी सारे साधनोंका एक मात्र यही आधार है । इहलोक अथवा परलोकके ध्येयकी प्राप्तिके एक मात्र साधन यही है । बिना इसके सारा निरर्थक है । सारे देहमें मानव देह उत्तम है । इसीमें पुरुषोत्तम बसा है । यह कह कर संत इसका सदुपयोग करनेके लिये कहते हैं । हमारे पुराने ग्रंथोंमें कहा है :— मनुष्यत्व मुमुक्षुत्व तथा सज्जन साथ जो । देवानुग्रहसे प्राप्त ये तीन सिद्धि दुर्लभ ॥ यह जो देह मिला है वह पाप पुण्य करनेके लिये नहीं किंतु पाप पुण्यका अतिक्रमण करके जैसा वह (ब्रह्म) पूर्ण है ऐसा यह भी (देह भी) पूर्ण है इसका अनुभव करने के लिये है । इस पूर्णत्वका अनुभव ही इसकी कृतार्थता है । ज्ञानेश्वरी १७६

देहभाव-देहाहंता देहतादात्म्य—देह ही मैं हूं इस भावनासे रहना। देहसे एकरूप होकर अस्वाभिक सुखदुःखादि द्वंद्वोंसे उलझे रहना। जीव इसका दृष्टा है। साक्षी है। स्वामी है। किंतु संस्कार वश वह देह ही मैं हूं ऐसे मान कर रहता है। इस भावको देहतादात्म्य कहा जाता है। यही देहाहंता है। आत्मानारम विवेकसे यह नष्ट होता है और मैं देहसे भिन्न हूँ इसका बोध होता है। यही सहजभाव है। द्वंद्व-द्वंद्वबंध—वस्तुतः जो सत्य नहीं है ऐसे भासमान परस्पर विरोधी अनुभव। इसका आधार द्वैत है। यह सारे द्वंद्व परस्पर विरुद्ध जोडी जोडीसे भासते हैं। इससे मनुष्य स्वभाव, अथवा अपनी सहजावस्था भूल जाता है। उस द्वंद्वोंमें बंध जाता है। इन द्वंद्वोंसे परे जाना ही सहजावस्थामें लीन होना है। द्वंद्वातिक्रमण चिर आनंद है। ये द्वंद्व हैं-जैसे जड, चेतन, पुरुष-प्रकृति, प्रपंच-परमार्थ, प्रकाश-अंधकार, राग-द्वेष, सुख-दुःख, शीत-उष्ण, धर्म, अधर्म, पाप पुण्य, ज्ञान अज्ञान, लाभ-हानि, निंदा-स्तुति, मान-अपमान, जय-पराजय, शत्रु, मित्र सज्जन-दुर्जन, सत्-असत् आशा-निराशा, शाप-आशीर्वाद प्रवृत्ति-निवृत्ति, त्याग-भोग, हिंसा-अहिंसा, हर्ष, शोक प्रेम-वैर, नीति, अनीति, शुभ-अशुभ, सम-विषम, विधि-निषेध नित्य-अनित्य, व्यष्टि- समष्टि, विवेक-अविवेक, विचार-विकार, जन्म-मरण, बंध-मोक्ष उत्क्रांति, अपक्रांति, पुरोगामी प्रतिगामि, मंगल-अमंगल, नया-जुना, अपेक्षा उपेक्षा, जीवन-मरण, विकास-विनाश आदि आदि। ये द्वंद्व सदैव सापेक्ष अथवा साहचर्यसे रहते हैं। यह देहभावके कारण होते हैं। आत्मभावमें ये लय हो जाते हैं। इस स्थितिको द्वंद्वातीत अवस्था कहते हैं। द्वैत—जीव, जगत तथा परमात्मानें भेद भाव है। जीव जगत यह सत्य है। दीखने- वाली सभी भिन्नताएं, विविधताएं सत्य हैं। (१) जीव- शिव भेद; (२) जीव-जीवमें भेद (३) जीव-जडमें भेद (४) जड-जडमें भेद (५) और जड तथा परमात्मानें भेद ये पांच प्रकारके भेद-द्वैत- सत्य हैं। विश्वकी इस विविधताको सत्य माननेवाला विचार द्वैत है। धर्म—जैसे आजकलके विद्वान, अंग्रेजी रिलिजन शब्दके अर्थमें भारतीय धर्म शब्दका प्रयोग करते हैं वैसे धर्म शब्दका अर्थ नहीं है। अंग्रजी रिलिजन शब्द धर्म शब्दका अर्थ नहीं दे सकता। 'धर्म शब्द संस्कृतके जिस धातुसे बना है उससे तो जो लोगोंको धारण करता है, उठाता है अथवा पुण्यारमाओंसे जो धारण किया जाता है वह धर्म है किंतु यह शब्द इतने प्राचीन कालसे चला आया है, इससे विद्वान विचारकोने इस पर इतना अधिक लिखा है कि धर्मका अर्थ और भाव एक सागरकी तरह लहरें मारता जाता है। साथ ही साथ भारतीय जनजीवनमें वह इतना ओतप्रोत हो गया है कि आधुनिक विदेशी आधार विचारोंके तज्ञ किंतु भारतीय जीवन परंपरासे बिलकुल अनभिज्ञ, तथाकथित, स्वयंभामन्य, पुरोगामी लोगोंके लाख कहने पर भी जनजीवन पर उनके कहनेका कोई गहरा और स्थायी प्रभाव नहीं पडता। भले ही प्रलोभन और धमकियोंके सम्मुख, उनका भावावेग कुछ दब जाता है और नित नये दंभको जन्म देता है। धर्म उतना उथला भाव नहीं है कि कुछ तथाकथित युग-निर्माताओंकी लेखनीके एक फटकारसे जन-जीवनसे उठ जाय। वह वैदिक कालसे भारतीय जन-जीवनमें घरकर गया है। उनके १४७ परिशिष्ट ५

श्वास निश्वास और हृदयकी धडकनके साथ समरस हो गया है। ऋग्वेदमें कमसे कम ५६ से अधिक बार यह शब्द आया है और जीवनके कई अंगोंका आधार बन गया है। एक जगह ऋग्वेदमें गाया गया है— इससे सारे दिव्य लोकोंके साथ भूलोक व्याप्त है ॥ इसके लिये देवोंने भी स्तवन रच दिये हैं ॥ इसके नियमोंसे भूम्याकाश संभले हुए हैं ॥ न कभी इसका क्षय होता है न इसकी उर्वरता घटती है। इसके बाद उपनिषदकाल तक अनेक परिवर्तन होने पर भी उपनिषद कहते हैं "धर्म चर !" और गीता "स्वधर्मे निधनं श्रेयः" कहती है। और जैमिनी अपने सूत्रमें "उपदेशसे, आज्ञासे, या विधिसे ज्ञान होनेवाला श्रेयस्कर क्रिया ही धर्म" कहता है तो महाभारतमें भगवान व्यास कहते हैं "जो विश्वको धारण करता है वह धर्म है। धर्म प्रजाको धारण करता है जो धारण सह है वह धर्म है!" उसके साथ अणुवादी वैशेषिक "जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस होता है वह धर्म" कहता है। अभ्युदय और निःश्रेयसका अर्थ लौकिक उत्कर्ष और पारलौकिक सुख है। वैशेषिक अणुवादी दर्शनकार हैं। उनके मतसे धर्म कोई बाह्य आचार नहीं है किंतु मानव पर होनेवाला शुभ संस्कार है। वैशेषिक दर्शनके अनुसार निःश्रेयस जीवनका उच्चतम सुख है। अर्थात धर्म निम्नसे-अभ्युदय-उच्चतम सुख तक जीवन पर शुभ संस्कार करनेवाला साधन है। सुख और धर्मसे संबंध जोडकर दिखानेवाले ऐसे अनेक वाक्य मिल सकते हैं। दक्ष स्मृतिमें तो— चाहते सुख सभी लोग धर्मसे उत्पन्न है सुख। इससे धर्म कर्म नित्य करना अवश्य यत्नसे ॥ वैसे ही मनुस्मृतिमें— अधर्म प्रसवता है दुःख ही देहधारिको। तथा प्रसवता धर्म सुख संयोग अक्षय ॥ कहा है। इसीलिये धर्म साधनाको ही पुरुषार्थ कहा गया है। अधर्मसे प्राप्त होनेवाले निम्न तर सुखोंको त्याज्य माना गया है। निम्नसे उच्च, उच्चसे उच्चतर और उच्चतरसे उच्चतम सुख प्राप्तिका प्रयास करना ही पुरुषार्थ है। एक व्यक्तिके अधर्मसे समाजको भी दुःख अनुभव करना पड सकता है एक मनुष्य अपने निम्न तर सुखकी अपेक्षासे समाजका अहित कर सकता है इसलिए "अधर्म प्रवृत्ति के संकोचके लिये" दंड भयकी आवश्यकता भी अनुभव की गयी है। साथ साथ उच्चतर सुखोंका विचार करते हुए "सुखका अर्थ वासनाका अभाव, जब सुखानुभव होता है तब कोई वासना नहीं होती ! ऐसा कहकर वासनाके अभावके कारण बताये हैं। (१) वासनापूर्ति (२) या वासनाका उत्पन्न ही नहीं होना (३) चित्तकाग्रतासे वासना विलोपसे वही सुख मिलेगा जो वासना पूर्तिसे । यह दार्शनिकोंका मंतव्य है। इसलिये उन्होने वासना विलोपका शास्त्र ही बना दिया है। वासनाविलोपसे जो कर्म होंगे वे परार्थ भावसे होंगे। समाजके परस्पर सहाय्यार्थ होंगे। ज्ञानेश्वरी १७८

वहां “व्यक्तिगत स्वार्थ या व्यक्तिगत वासना पूर्तिके भाव नहीं होंगे !” वासना विलोपसे होनेवाले कर्म ही निष्काम कर्म होंगे। वासना विलोपसे होनेवाले कर्म ही “सच्चे अर्थमें” समाज हितके कर्म होंगे। जो कर्म व्यक्तिके वासना पूर्तिके कर्म हैं उससे समाज हितकी गुंजाइश कमसे कम होती है। इसीलिए अभ्युदयके साथ-भौतिक वैभवके साथ-निःश्रेयस, वासना विलोपकी आवश्यकता है। निःश्रेयसके अभावमें केवल अभ्युदय, व्यक्तिगत वासना पूर्तिके सुखका साधन बननेसे, परार्थ अथवा समाजहितके सभी कार्य केवलमात्र दंभ बन कर रह जायेंगे। तभी महात्मा गांधी जैसे आधुनिक विचारकों ने “बिना धर्मकी राजनीति प्रजाके गलेमें फांसी !” कहा था। यहां धर्मका अर्थ निःश्रेयस अथवा वासना विलोपका अभाव है। भारतीय विचारकों ने, इसी दृष्टिसे जीवनमें विविध परंपराओंका जो निर्माण और प्रचलन किया वह “धर्म” नामसे प्रचलित हुआ ! इस धर्मप्रथाओंमें कहे जानेवाले मंत्र सदैव इसके पीछे जो उद्देश्य हैं उस ओर इंगित कहते हैं। उदाहरणके लिये-अथर्ववेदका यह मंत्र देख सकते हैं:— व्रत चलायें पुत्र पिताका मातासे हो वह सम चित्त । पत्नी बोले मृदु सुख वाणी गृह बने सदा शांति धाम । न करे द्वेष भाई भाईका तथा भगिनि भी कभी कहीं ॥ सहायक बनो परस्पर सम व्रत हो मंगल वाणी ॥ वर्णव्यवस्थाके उद्देश्यमें भी “परस्पर सहायता” है। परस्पर पूरक होकर समाज हित साधना धर्मका एकमेव उद्देश्य है। यज्ञ और दान राजा-प्रजा, गुरु-शिष्य, स्वामी-सेवक, पति-पत्नी, पिता-पुत्र आदिके परस्पर संबंधोंका जो सुंदर विवेचन देखनेको मिलता है वह आश्चर्य जनक है। यह सारा निःश्रेयस प्रधान है। “परस्पर पूरक भावनाका धर्म सिद्धांत” अत्यंत मौलिक और महत्वपूर्ण है। वह सामूहिक शांति समाधानका साधन है। दूसरेके सुखकी अवहेलना करके अपने सुखका विचार करना अधर्म है। दूसरेके सम्मानकी अवहेलना करके अपने सम्मानका विचार करना अधर्म है। इसीलिए “सर्वे सुखिना संतु” की प्रार्थना है। महाभारतमें एक स्थान पर धर्मका रूप समझाते हुए कहा है— सर्व हित रत जो है सबका रहता मित्र । मन कर्मवचनसे जानता है वही धर्म ॥ परस्पर हितका विचार करके महाभारतमें धर्म अधर्म जाननेकी जो उत्तम कसौटी कही है वह आज भी आदर्श कही जा सकती है- “अपने लिये जो अच्छा नहीं लगता, दुःखकारक लगता है ऐसा बर्ताव दूसरोंके साथ नहीं करना चाहिए। यही धर्मका सार-तत्व है। जो इसके विरुद्ध व्यवहार करता है वह “वासनामूलक” करता है !” इसी व्यवहारको अध्यात्मवादी “आत्मौ- पम्यबुद्धि” कहते हैं। ऋग्वेद कालसे लेकर आज तक धर्माधर्मका पर्याप्त विवेचन किया गया है। समय समय पर जो घटनायें होती हैं उससे निर्माण होनेवाली समस्याओंको सुलझाते समय भी-यह धर्म यह अधर्म ऐसा बता कर अधर्मका विरोध किया हुआ मिलता है। ऐसे प्रसंग असामान्य प्रसंग हैं। वे सबके सामने नहीं आते। इसलिये सर्व सामान्य लोगोंकी दृष्टिसे “नित्य आत्म-सुखकी चाह, अन्य सुखके विषयमें विरक्ति, भूतमात्रोंमें करुणा, करुणामय परोपकार भाव, परस्पर सहाय १४९ परिशिष्ट ५

भावनाका विकास, कमसे कम हिंसा, सुखस्वरूपका ज्ञान, सबके सुखपर दृष्टि, सत्प्रवृत्त उद्योग, तथा सिद्धि असिद्धिमें सम भावना इनको धर्मके अंग माने हैं तो किसीने-संतोष, क्षमा, मनःसंयम, अशौच, अंतर्बाह्य पावित्र्य, इंद्रिय-निग्रह, तत्वजिज्ञासू बुद्धि, आत्मज्ञान, सत्य, अक्रोध इन दस गुणोंको धर्मके लक्षण माना है। इसके साथ किसीने दान, निषिद्ध विचारोंका विस्मरण, चित्तकी स्थिरता-वासना विलोपकी साधना-आदि अन्य कुछ गुण कहे हैं। बौद्ध धर्ममें इन गुणोंके साथ अनिंदा, —जो वर्तमान युगमें युग-धर्म है-संयम, हित-मित आहार विहार, चित्तका क्षय-वासना विलोप-भी धर्मके लक्षण माने गये हैं। ये सारे गुण समाज-विकासके लिये अथवा समाजके सामूहिक हितके लिये आवश्यक हैं। बिना इन गुणोंके समाजके सामूहिक हितके लिये आवश्यक "परस्पर सहायताके भाव" की वृद्धि नहीं हो सकती। सबल, शक्तिशाली समाज संघटित नहीं हो सकता। सशक्त समाजका निर्माण नहीं हो सकता। इसलिये धर्मका अर्थ "सशक्त समाज निर्माणके लिये आवश्यक गुणोंका व्यक्तिगत और सामूहिक विकास है।" और अधर्मका अर्थ "सशक्त समाज निर्माणके लिये आवश्यक गुणोंका ह्रास अथवा हनन।" इसीलिये समय समय पर शक्तिशाली नेताओंने "डंडेसे भी" अधर्मका विरोध किया है। इसका नमूना जरासंध कृष्ण संवादमें मिलता है। कृष्ण जरासंधसे कहता है- "हे राजश्रेष्ठ ! कोई भी राजा अन्य सज्जन राजाओंकी हिंसा कैसा कर सकेगा ? तू वह करने जा रहा है। यदि समर्थ इसका विरोध नहीं करेगा तो "तुम्हारा पाप उस समर्थके सिरपर पडेगा !" हम धर्मोचरणी हैं। धर्मका रक्षण करनेमें समर्थ हैं। इसलिये तुम्हारे अधर्मका विरोध करने आये हैं!" भगवान कृष्णसे लेकर महात्मा गांधीतककी यह धर्मपरंपरा है। शस्त्र बल संपन्न भगवान श्रीकृष्णने जरासंधके अधर्म निवारणके लिये उसको युद्धका आव्हान दिया और निःशस्त्र महात्मा गांधीने "धर्महीन अंग्रेजी राज्यके विरुद्ध सामूहिक सत्याग्रहका युद्ध छेड़ा! और घोषणा की धर्म रहित राज्य प्रजाके गलेमें फांसी है !" भारतमें कईबार ऋषियोंने भी यह काम किया है। महात्मा गांधीजीने ऋषिपरंपराका सबल नेतृत्व किया ! ऋषियोंने सदाचारी राजाको प्रेरणा देकर उनसे अधर्मका विरोध किया तो महात्मा गांधीने समग्र जनताको प्रेरणा देकर अधर्मी राज्यका विरोध किया। क्यों कि धर्मानुशासन हो। धर्मानुशासनको महात्मा गांधीजीने रामराज कहा। धर्म किसीकी ओरसे किसी पर थोपी गयी वस्तु या अफीमकी गोली नहीं किंतु मानवी हृदय ही धर्मका उगमस्थान है। मानव कुलने व्यक्तिगत तथा सामूहिक उत्थानके प्रयाससे धर्म भावना, धर्मानुशासन, तथा धार्मिक आचार विचारोंका विकास किया है। धर्म "मानवी हृदयकी गहरी तथा सर्व स्पर्शी" भावना हैं। शाब्दिक कसरत करनेवाला तर्क उस भावना पर यशस्वी आघात नहीं कर सकता। समुदायप्रियता मानवी जीवनकी सहज प्रवृत्ति है। इसीसे मानवकुलका योगक्षेम चलता है। धर्म सामूहिक विचार तथा सामूहिक सामर्थ्यकी आधार शिला है। प्रत्येक मनुष्य जन्मसे मृत्यु तक समाजके "संघ-गर्भमें" जीता है और धर्मके माध्यमसे अपनेमें संघ-शक्तिका अनुभव करता है। जैसे भ्रूण माताके आहारसे जीता और बढ़ता है। प्रत्येक मनुष्य कण कण क्षण क्षणसे संघ-शक्तिका ग्रहण और अनुभव करता है क्यों कि यही उसकी सुरक्षा-भावनाकी नींव है। तथा "परस्पर सहायतासे मानवको संघबद्ध करना ही धर्म-भावनाका मूल उद्देश्य" होनेसे वह मानवी हृदयके सिंहासन पर सहज ही अधिष्ठित हो गया है। मानवी कुलके प्रतिभाशाली, स्फूर्तिसंपन्न, मनीषी, महापुरुषोंने साक्षात्कार, समाधि, निरालंब शाश्वत सुख, आदि बातोंसे जो सामान्य लोगोंके विचारकी सीमामें भी नहीं जाती धर्म-भावनाको बिना ओर छोरके अमर्याद् चैतन्यसे भर दिया है। ज्ञानेश्वरी १५०