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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अर्थात् विश्वमें जहां कहीं हलचल है वहां यह तत्व व्याप्त है और सब पर अपना स्वामित्व रखता है। ईश्वर शब्दसे स्वामित्व और सर्व-व्यापकत्वका बोध होता है। भारतीय तत्त्वज्ञान तथा सांस्कृतिक साहित्यमें इस शब्दका अत्यंत महत्त्व है। ऋग्वेदमें ईश्वर शब्द कहीं नहीं आया है। किंतु ईश ईशर् धातुजन्य ईश, ईशज, ईशान आदि शब्द इंद्रादिके लिये आये हैं। संभवतः भगवद्गीतामें ईश्वर शब्दका पहला ?- प्रयोग हुआ है। मनुस्मृतिमें भी इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। वहांसे यह परमेश्वरके रूपमें - संप्रदायातीत रूप- भारतीय तत्त्वज्ञानमें स्थान स्थान पर आया है। ईश्वर या परमेश्वर वैदिक देवता समूहका देवता नहीं है। यह उससे परेकी शक्ति है। ब्रह्मा विष्णु महेश भी परमेश्वर नहीं है। वस्तुतः वैदिक देवताओंके पीछे जो एक शक्ति थी और इंद्र, अग्नि, यम मातरिश्वा आदि नामसे पहचानी जाती थी उस शक्तिका परिचय देनेके लिये ईश्वर या परमेश्वर शब्दका प्रयोग किया गया है। संभवतः वेदांतके नपुंसकलिंगी ब्रह्मका - पूजार्थ - पुल्लिंगी ईश्वर अथवा परमेश्वर बन गया हो, क्यों कि नपुंसकलिंगीकी पूजा अर्चा नहीं होती। इस दृष्टिसे ज्ञानमार्गके ब्रह्मका भक्तिमार्गी ईश्वरमें परिवर्तन कह सकते हैं। या ईश्वर निराकार निर्गुण ब्रह्मका साकार सगुण रूप है ! वेदांतियोंका "ब्रह्म" नकारात्मक सत्ता है। नेति नेति है। प्रत्येक प्रश्नका नहीं नहीं नहीं उत्तर देनेके बाद जो रहता है - प्रश्न और उत्तर दोनों मौन है - वह ब्रह्म है तो ईश्वर प्रत्येक प्रश्नका उत्तर "हाँ" में देता है। ईश्वर सर्वव्यापी है। सभी ईश्वर है। भारतके विविध दर्शनोंके मूल सूत्रोंमें ईश्वरका दर्शन होता है। उसका रूप खिलता जाता है। यह ईश्वर संप्रदायातीत है। विश्व-व्यापारमें जो योजकता और नियमितता दिखाई देती है उसको देख कर "यह सब चलानेवाला कोई शासक" है इस कल्पनामेंसे ईश्वरका उदय हुआ होगा। ब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंमें "शासक" का भाव नहीं है। इसी बातको लेकर दार्शनिकोंने ईश्वरके विषयमें निम्न आठ बातें कहीं हैं। (१) विश्व रचना और व्यापार नियमबद्ध है। इसकी गतिके नियम सूक्ष्म, सुसूत्र और निश्चित हैं। कहीं कोई गड़बड़ नहीं, अव्यवस्था नहीं। इसलिये इसका निर्माण तथा संचालन करने- वाला कोई शासक है और वह ईश्वर है। (२) विश्वकी गतिमें एक निश्चित प्रेरणा है। इसलिये इसका कोई प्रेरक है। वही ईश्वर है। (३) विश्वमें सर्वत्र संकल्प और हेतुका दर्शन होता है। वह जिसके मतमें है वही ईश्वर है। (४) प्राणियोंके सो जाने पर भी विश्व रहता ही है। इसलिये इन सबका अनुभव लेनेवाला कोई है। और वही ईश्वर है। (५) इस विश्वमें सुंदर मंगलमय जो जो कुछ है उसके मूलमें नित्य नूतन अनंत प्रतिभा होनी ही चाहिए। यह प्रतिभा जिसकी है वही ईश्वर है। (६) शुभ-अशुभ, भला-बुरा आदिका निश्चय करनेवाली कोई शक्ति होनी ही चाहिए, वैसे ही उसका निर्णय करनेवाला कोई न्यायाधीश। वही ईश्वर है। (७) जिसका मूल्य माने बिना धैर्यसे संसारमें कुछ करना असंभव है वह मूल्य ही ईश्वर है। ११० परिशिष्ट ५

(८) विश्वके अग्याग्य मानवोंके धार्मिक जीवनके परिणामस्वरूप जो अतींद्रिय अनुभव आता है वही ईश्वर साक्षात्कारका अनुभव है। विश्वके अग्याग्य मानवी समुदायके मनीषी ऋषी मुनि तथा साधुसंतोंका अनुभव इसका साक्षी है। (१) न्याय-दर्शनमें ईश्वरका महत्त्वका स्थान है। बिना ईश्वरानुग्रहके किसीके विश्वकी समस्याओंका यथार्थ ज्ञान हो ही नहीं सकता। बिना ईश्वरानुग्रहके मुक्ति असंभव है। ईश्वर सृष्टि स्थिति लयका कर्ता है। नैयायिक (१) कार्यकारण संबंध (२) अदृष्ट, (३) वेदप्रामाण्य इन तीन आधारभूत प्रमाणोंसे ईश्वरका प्रतिपादन करते हैं। (२) योग-दर्शनमें ईश्वर ही सब कुछ है। योगमें क्लेश, कर्म विपाक और आशयसे रहित पुरुष विशेष ही ईश्वर है। योगदर्शनके ईश्वर प्रमाणके आधार है (१) वेद (२) विश्वकी ज्ञान प्रवाहका मूलस्रोत ही ईश्वर है। गुरुत्वका आदिपीठ ईश्वर है। (३) प्रकृति पुरुषकी संयोजक शक्ति ही ईश्वर है। (३) मीमांसादर्शनमें प्राचीन मीमांसक निरीश्वरवादी थे किंतु आगे यह बात गलत होनेका भान हुवा होगा मीमांसकोंको। उत्तरकालीन मीमांसकोंने (१) कर्मफलके दाताके रूपमें (२) तथा यज्ञपतिके रूपमें ईश्वरको स्वीकार किया। (४) वेदांतदर्शनमें (१) सविशेष ब्रह्म ईश्वर है (२) विश्वके सृष्टि स्थिति लयका कारण ईश्वर है। (३) यह सारा विश्व उस सर्वज्ञ ईश्वरकी लीला है। (५) गीतामें सभी पहलुओंसे ईश्वरका विचार हुवा है। ज्ञानेश्वरीके सैकडो ओवियोंमें इसका विवेचन देखनेको मिल सकता है। उड्डियानबंध - उड्डियान — सारा श्वास बाहर करके पेट अंदर खींच कर निःश्वास करना । एक प्रकारसे यह बाह्य-कुंभक-सा है। प्राणायाममें बाहरका वायु-पूरकद्वारा-अंदर खींच कर पेटमें रोककर कुंभक करते हैं। वैसे ही पेटका वायु-श्वास-बाहर डालकर-रेचकद्वारा उड्डियान करके बाहर रोका जाता है। पेटको संपूर्ण श्वास रहित करके पापडकी भांति-पीठसे चिपका देनेकी क्रिया ही उड्डियानबंध है। हठ योगमें इसको "मृत्युगण केसरी" कहा गया है। यह बंध त्रिदोषोंका नाश करता है। प्राणको स्थिर करता है। सुषुम्नाका द्वार खोलता है। उत्तरायण — सूर्यका उत्तरकी ओर मुडना । मकर संक्रांतिसे कर्क संक्रांति तक का काळ सामान्यतया जानेवारी १४ से छ महीने। इन दिनोंमें मरनेसे मोक्ष प्राप्ति होती है ऐसी मान्यता है। उत्तरायणमें अधिक सूर्यप्रकाश रहता है। उदान — पंच-प्राणमें यह चौथा है। यह कंठस्थानमें होता है। इसकी गति ऊपरकी ओर होती है। यह वाणीका-वाक् शक्तिका-आधार है। बोलना गाना आदि क्रियायें इसी उदानके कारण होती हैं। वाणी मनुष्यका सारतत्त्व है। वाङ्मय इसका रूप है। इसी उदानके कारण वाग्ब्रह्मका स्फोट होता है। उदानसे शब्दोत्पत्ति है ! संभवतः इसीलिए प्रणवको उद्गीथ कहते हों। बौद्ध साहित्यमें उदानका अत्यंत महत्त्व माना गया है। यह कहा गया है कि बुद्धके सारे उपदेशका मूल उदान है। उपनिषदमें प्रणवको उद्गीथ कहा गया है। ज्ञानेश्वरी ११८

उन्मनी-अवस्था- सामान्यतया मनुष्यकी तीन अवस्थायें होतीं हैं। इनको (१) जागृति, जगते रहना (२) सुषुप्ति = सोना (३) स्वप्न । इन तीन अवस्थाओंके अलावा एक, चौथी अवस्था होती है। उसको तुर्यावस्था अथवा उन्मनी कहते हैं। इस अवस्थाका वर्णन दो प्रकारसे किया गया है। (१) मनोबय होने से । इसके अनुसार मनका मनत्व (संकल्प विकल्प) रहता ही नहीं। (२) इंद्रिय मनादिको साक्षी रूपसे देखनेकी शक्ति। अपने चित्स्वरूप अथवा आत्मरूपका बोध होनेपर ही यह स्थिति संभव है। केवल सच्चिदानंदके समरसैक्यके बोधसे ही यह संभव हो सकता है। इसलिये तुर्यावस्थाका अर्थ अद्वयानंद ऐसा किया गया है। उन्मनी-मुद्रा- हठयोगकी अनेक मुद्राओंमें एक मुद्रा। इसमें साधक नासिकाग्रमें दृष्टि स्थिर रख कर भुकुटियां ऊपर चढ़ाता है। और धीरे धीरे दृष्टि भ्रुकुटिमध्यमें लाता है। साधकको इस उन्मनी साधनासे महान् लाभ होता है। चित्त एकाग्र होता है ऐसे गोरख कबीर आदि योगमार्गी संतोंने कहा है। उन्मनी मुद्रासे उन्मनी भाव जगता है। उन्मनी अवस्था देखें। उपनिषद्- वैदिक तत्वज्ञानका संग्रह ! उपनिषदोंमें प्राचीन भारतीय तत्वज्ञानका विचार किया गया है। उपनिषदका शब्दार्थ है पास बैठना । अत्यंत भक्तिभावसे, अपनेको गुरु सेवामें विलीन-निःशेष- करके गुरुसे तत्वग्रहण करना उपनिषद् है । अविद्याको नष्ट करके ब्रह्मविद्याको ग्रहण करना उपनिषद् है। ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन करनेवाले ऐसे अनेक उपनिषद हैं जिनमें १२८ प्रकाशित हुए हैं। इनमें १४ उपनिषद प्राचीन मानते हैं। उनमें भी दस अत्यंत महत्वके हैं। उपनिषदोंमें कुछ पद्यमय तो कुछ गद्यमें हैं। कुछ गद्यपद्यात्मक हैं। ई पू. १८०० वर्षोंसे ई. स. ६०० वर्ष तक यह उपनिषदका काल माना जाता है। उपनिषदमें " जिसका ज्ञान होनेसे अन्य सब‌का ज्ञान अपने आप होता है वह तत्व कौन है ?" ऐसा प्रश्न करके उस तत्वका विचार किया गया है। इस तत्वकी खोज करते करते समग्र विश्वका-सृष्टिका विचार किया गया है। साथ साथ सृष्टिके मूलमें जो सत्य है, उसके परे कुछ भी नहीं और वह मनुष्य मात्रका प्राप्य है यह कहा गया है। वैसे ही उस सत्य-तत्वको प्राप्त करनेकी साधना भी कही गयी है। अर्थात् उपनिषदमें (१) तत्कालीन ऋषि व आचार्योंकी कुछ जानकारी मिलती है। (२) आत्मा अथवा ब्रह्मकी पूर्ण जानकारी-तब तक जो थी वह मिलती है। (३) सृष्टि व सृष्टि रचनाक्रमकी पूर्ण जानकारी है। (४) जीव तथा जीवन विषयक ज्ञान है। (५) मोक्ष विषयक सिद्धांत है। (६) उसकी साधना विषयक विवेचन है। (७) नीति-नियम है। इस प्रकार सृष्टि, सृष्टि कर्ता तथा मानव जीवन विषयक ज्ञान उपनिषद् में हैं। १२८ उपनिषदोंमें (१) ईश (२) केन (३) कठ (४) प्रश्न (५) मुंडक (६) मांडूक्य (७) ऐतरेय (८) तैत्तिरीय (९) छांदोग्य (१०) बृहदारण्यक (११) कौषीतकी (१२) मैत्रेय (१३) श्वेताश्वतर ये उपनिषद प्रमुख हैं। इनके अलावा भी ११५ उपनिषद हैं। उपाधि- जो पीछेसे चिपका हुआ। जैसे किसीको बीए, एम्. ए, तो किसीको, आचार्य-महात्मा तो किसीको नेता आदि "उपाधि" चिपकती है। जन्मतः यह उसकी नहीं ११९ परिशिष्ट ५

होती । वैसे जीवको देहादि प्रपंच चिपक जाता है। मूलतः उसका नहीं होता। नाम रूप, रंग, गुण, आकार आदि जीवकी उपाधि है। इस उपाधिके कारण संसारकी, अन्य उपाधियां मामा, चाचा, लडका, बाप, भाई, भला, बुरा आदि भी चिपकी हुई हैं। देह, मन, इंद्रियादि जीवकी उपाधियां हैं। वैसे ही सारा ब्रह्मांड ब्रह्मकी उपाधि है।—उपाधि सदैव भासमान है। आभास निर्माण करती है, तथ्य नहीं । इसके साथ निरुपाधिक शब्द आता है। मूल ब्रह्म, आत्मा। जहां जिसे कुछ भी न चिपका हो ऐसा शुद्ध चैतन्य। जैसे परब्रह्म निरुपाधिक है। रामकृष्णादि सोपाधिक हैं। उपासना—उपनिषदकी भांति उपासना शब्दका अर्थ भी पास बैठना है। वहां गुरुके पास बैठकर गुरुके समान होना है। तो (२) यहां देवता अथवा ब्रह्मके पास बैठकर देव या ब्रह्म-बनना है। उपासनासे भक्त अपने इष्टके पास बैठकर उसकी कृपासे कृतार्थ होता है। ईश्वर, उपासनाका सर्वश्रेष्ठ विषय है। ईश्वर साकार ब्रह्म है। इसलिये वह वास्तविक उपास्य है। उपासनामें दो प्रकार हैं। (१) सकाम (२) निष्काम। (१) किसी उद्देश्यके लिये ईश्वरके पास जाना सकाम उपासना है। तो केवल ईश्वरके पास बैठनेका ही उद्देश्य रहना निष्काम उपासना है। पूजा, ध्यान, तथा जप उपासनाका त्रिविध रूप है। इसके अलावा निष्काम कर्म, लोकसेवा, शास्त्राभ्यास आदि भी उपासना है। उपासना भारतीय संस्कृतिका प्राचीनतम अंग है जैसे यज्ञ। भारतीय अध्यात्म साधनामें कर्म, ज्ञान, उपासना इसको कांड त्रय कहा गया है ! गीतामेंभी इसका विवेचन है। उपनिषदोंमें ब्रह्मोपासना, प्रणवोपासना आदि उपासना प्रकार हैं ही। ब्रह्म पदारोहणके लिये इसकी आवश्यकता मानी गयी है। मूर्तिपूजा उसका बाह्यरूप है। मूर्तिपूजा कोई अर्वाचीन रूढी नहीं है। भारतमें मूर्तिपूजा भी अत्यंत प्राचीन है। यजुर्वेद, अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण आदिमें भी इसका रूप देखनेको मिलता है। मूर्ति चैतन्य-भावका प्रतीक है। यज्ञाग्नि भी मूर्ति है। उपासनामें (१) बहिरंगोपासना (२) अंतरंगोपासना (३) देव, ऋषि, पितरोपासना (४) अवतारोपासना (५) सगुण ब्रह्मोपासना (६) निर्गुण ब्रह्मोपासना ऐसे छह प्रकार हैं। इन सभी प्रकारका आधार श्रद्धा है। उपासनाके लिए श्रद्धा भक्ति अत्यंत आवश्यक है। बिना इसके उपासना व्यर्थ है। ॐ—प्रणव एकाक्षर ब्रह्म। इसी आदि ध्वनिसे वेदादि ज्ञानका विस्तार माना गया है। उपनिषदोंमें कहा गया है "सभी वेद जिस पदकी घोषणा करते हैं, सभी तप उसीकी बात करते हैं, उसकी इच्छा करनेवाले ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं वह पद ॐ है !" यह पद "अ + उ + म्" मिलकर हुआ है। इसके चार विभाग जागृति, सुषुप्ति, स्वप्न तथा तुर्यावस्थाका द्योतक माने गये हैं वैसे ही विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तथा आत्मा ऐसे चार आत्म- स्वरूपका भी द्योतक माने गये हैं,। वैसे ही अ= विष्णु उ= ईश्वर म=ब्रह्मा इन त्रिमूर्तियोंको भी ॐ में लपेट दिया है ! ज्ञानेश्वरी १२०

सर्वप्रथम इस अक्षरब्रह्मकी महती ऋग्वेदके पहले मंडलमें दीर्घतमा ऋषि निम्न मंत्रमें गाता है, रचा है इस महा अक्षर पर ऋचात्मक पर-ब्रह्म । इसमें अधिष्ठित हैं सभी देव अर्थ-रूपमें स-विश्व ॥ न जानते जो इस अक्षरको क्या करेंगे लेकर वेद । जानते जो इस अक्षरको वे धीमान् होते हैं कृतार्थ ॥ इसके बाद ब्राह्मण और उपनिषदोंने इसको रहस्यात्मक बनाया है । ऐतरेय ब्राह्मणमें- "भूर्भुवः स्वः" इनमेंसे अ + उ+ म् की उत्पति बताकर उसका उत्पत्ति - स्थिति - लयसे संबंध जोडा । इसके बाद उपनिषदोंने इसको रहस्यमय बना दिया है । उपनिषदोंने ॐ के गूढार्थका अनेक प्रकारसे विकास किया है । वेदाध्ययनके प्रारंभ और अंतमें इसका संपुटाकार उपयोग करनेका विधान भी कहा गया । नहीं तो वेदाध्ययन व्यर्थ है !! आगे चल कर कहीं कहीं यह भी कहा गया है "वेद मंत्रोंको ॐकारका संपुट न करनेसे वेदाध्ययन ही नष्ट होगा !! वैसे ही प्रायश्चित्तके लिए भी प्रणवका उपयोग कहा गया है । उपनिषदोंमें तो "ॐ" ही ब्रह्म है । यही सगुण और निर्गुण उपासनाका आलंबन है । उपनिषद् कहते हैं "असीम ब्रह्म "ॐ" में सीमित हो जाता है।" "ॐ" ब्रह्मांडका बीज है । यह सारा विश्व "ॐ" का स्फुरण है । जैसे वृक्ष बीजका स्फुरण है !" उपनिषदोंमें ॐ के अ, उ, म् इन तीन अंगोंका निम्न प्रकारसे विश्लेषण किया गया है । ॐ ┌─────────────┼─────────────┐ अ उ म् अवस्था:- जागृति स्वप्न सुषुप्ति शरीर:- स्थूल सूक्ष्म कारण आत्मरूप:- वैश्वानर तैजस प्राज्ञ स्थिति:- आदि मध्य अंत्य वेद:- ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद लोक:- भूलोक अंतरिक्ष ब्रह्मलोक वाक् मन प्राण यज्ञ दान तप तत्वमसि:- स्वम् असि तत् उद्गीथ:- उत् गीः थम् गुण:- तमस रज सत्त्व ऐसा यह विश्लेषण इतना अधिक है कि "ओं" पर एक छोटीसी पुस्तिका हो सकती है । ॐ की उपासना केवल सोऽहम् अथवा शिवोऽहम्की उपासना ही नहीं "सर्वोऽहम्" का (७) १२१ परिशिष्ट ५

स्फूर्ति-स्थान है। वहां विश्व समरसैक्यकी बोधानुभूति है जिससे मनुष्य प्राणिमात्रका प्रतिनिधि बन कर सदैव विश्व - हितरत रह कर— “विश्व ही मेरा घर । ऐसी मति है स्थिर । हुवा स चराचर । अपनेमें आप ॥ बन जाता है। गीतामें भी इसका पर्याप्त विचार किया गया है। ज्ञानेश्वरीमें भी पर्याप्त लिखा है। आगे प्रणवमें भी इसके अतिरिक्त कुछ देख सकेंगे। करुणा—मनुष्यके आध्यात्मिक विकासके लिये करुणा अत्यंत आवश्यक वृत्ति है। दुःखी जीवोंके विषयमें सहानुभूतिसे करुणाका उदय होता है। चित्तकी शांति, समता, प्रसन्नता आदिके विकासके लिये भी करुणावृत्ति आवश्यक है। पातंजल योगसूत्रोंमें मैत्री, मुदिता, व उपेक्षाके साथ करुणाका भी उल्लेख किया गया है। बौद्ध साधनामें करुणाका महत्त्वका स्थान है। ईश्वरको जैसे करुणामय कहा गया है वैसे ही बोधिसत्वको भी करुणासे ओतप्रोत कहा गया है। दुःखियोंके हितके लिए सदैव तैयार रहना ही करुणा है। कर्म—करना, हलचल, व्यापार, आदि इसके शब्दार्थ हैं। ऋग्वेदमें कई बार यह शब्द आया है। वहां “वीर कृत्य” अथवा “धर्मके काम” इस अर्थमें यह शब्द आया है। मीमांसा में “फलापेक्षासे लोगोंसे जो जो कुछ किया जाता है, तथा प्रवाह रूपसे जो बीजमेंसे अंकुर अंकुरमेंसे बीज-ऐसे- अनादि अनंत है” वह ! ऐसा कर्म शब्दका अर्थ किया गया है। गीतामें “मनुष्य जो कुछ करता है वह सब कर्म” ऐसा कहा गया है। सोना, उठना, श्वासोच्छ्वास, हृदयक्रिया रक्ताभिसरण, और क्या अंतमें मरनाभी एक कर्मही है। इसीलिए ईशावास्योपनिषदमें “देहधारीके लिए बिना कर्मके दूसरा रास्ता ही नहीं !” ऐसा कहा गया है। गीतामें फिर एक बार “मनुष्य बिना कुछ किये क्षण भर भी नहीं रह सकता” कहते हुए कर्मकी व्याख्या स्पष्ट की है। कर्म पर विचार करनेवाले विचारकोंने इसके दो विभाग किये हैं। अर्थकर्म और गुणकर्म। आत्मगत अपूर्व उत्पन्न करनेवाला कर्म अर्थकर्म है। जैसे अग्निहोत्रादि । इस अर्थकर्मके तीन विभाग है। नित्यकर्म, नैमित्तिककर्म, तथा काम्यकर्म । नित्यकर्म, संध्या, अग्निहोत्र आदि। नित्य-कर्म करनेसे कोई पुण्य नहीं मिलता, किंतु नहीं करनेसे पाप लगता है। अग्निहोत्रादि नित्यकर्ममें व्यत्यय आया तो उसके लिये प्रायश्चित्त है। नैमित्तिक कर्म, मातापितादिके मृत्युदिवसके उपलक्ष्यमें किया जानेवाला श्रद्धादि, ग्रहणादि पर्वकालोंमें समुद्र-स्नानादि, नैमित्तिक कर्म यदि निमित्त न हो, तब करनेकी आवश्यकता नहीं। तथा मनमें कोई इच्छा रखकर इच्छासे प्रेरित होकर, किया जानेवाला काम्य कर्म। काम्य कर्ममें अनेक प्रकार हैं। काम्य कर्ममें भी तीन प्रकार हैं। (१) केवळ ऐहिक सुखप्राप्तिके लिये किये जानेवाले कर्म (२) केवळ पारलौकिक सुखप्राप्तिके लिये किये जानेवाले कर्म (३) तथा ऐहिक और पारलौकिक सुख प्राप्तिके लिये किये जानेवाले कर्म। ये सारे अर्थकर्मके प्रकार हुए। गुणकर्मके अनेक प्रकार हैं। ये मनुष्यके संस्कारोंके विकासके किये अथवा संस्कारक्षम बनानेके लिये किये जानेवाले कर्म हैं। जैसे स्वाध्याय आदि। इसके अलावा वर्णाश्रमके कर्म, प्राप्तकर्म, कर्तव्य कर्म, आदि कर्मके अनेक प्रकार हैं जिसका विवेचन लोकमान्य तिलकजीके गीता रहस्यमें देखनेको मिलेगा। ज्ञानेश्वरी १२२

कर्ममार्ग, कर्मयोग—देहधारीको कर्म अनिवार्य है। बिना कर्मके रहना भी असंभव। और, जैसे बीजसे अंकुर और अंकुरसे बीजकी अनंत परंपरा चलती जाती है वैसे कर्मसे जन्म और जन्मसे कर्मकी भी एक परंपरा है ! इस परंपरासे अथवा उलझनसे छूटकर जन्म-मरण चक्रसे छूटना संभव है क्या ? यदि संभव है तो कैसे ? इस प्रश्नके उत्तरमें गीता कहती है "संभव है।" कुशलता पूर्वक कर्म करके यह संभव है! यह "कर्मकुशलता ही कर्मयोग है!" इस कर्म- कुशलताको समझाते समय गीता कहती है "जैसे जले हुए बीजका अंकुर नहीं फूटता वैसे दग्ध कर्मसे भी जन्मोदय नहीं होता!" यह दग्ध कर्म प्रणाली ही कर्मकुशलता अथवा कर्मयोग है। जिससे कर्म होता रहे और उसमेंसे जन्मका अंकुर नहीं फूटे। बंधनका कारण-रूप कर्म मोक्ष कर्म हो। यह कैसे होगा ? फलाशा छोड़कर। निरिच्छ भावसे कर्म करके। इसके विविध प्रकार बताते हुए गीतामें (१) लाभ-हानिका विचार न करते हुए समबुद्धिसे कर्म कर (२) निरिच्छ भावसे केवल कर्तव्य मान कर कर्म कर (२) फलाशा न रखते हुए लोकसंग्रहार्थ अथवा लोकहितार्थ कर्म कर (३) निष्काम भावसे देहधर्म मानकर कर्म कर (४) ईश्वरार्पण भावसे सभी कर्म कर (५) अनासक्त हो कर प्राप्त कर्म कर (६) सदैव सर्वत्र 'इदं न मम' भावसे कर्म कर (७) शून्य भावसे न करनेका सा कर्मकर कर्म कुशलताके ऐसे अनेक प्रकार बताये हैं। "फलाशा-त्याग" कर्मकुशलताका रहस्य है। यह सांपका विष-दंत तोड कर सांपको खिलानेकी कला है। कर्म पर अपना स्वामित्व स्थापन करके कर्मका नेतृत्व करनेकी कला ही कर्मकुशलता है। तब मनुष्य कर्मसे आवृत्त, बद्ध नहीं होता ! कर्म-क्षय—आध्यात्मिक दृष्टिसे तीन प्रकारके कर्म होते हैं। प्रारब्धकर्म, संचितकर्म, क्रियमाण। पूर्व जन्ममें प्रारंभ किये गये जिस कर्मके परिणामस्वरूप यह जन्म मिला है उस कर्मको प्रारब्ध कर्म कहा जाता है। इसको "दैव" भी कहा गया है। जन्मजन्मांतरसे जिस कर्मके संस्कारोंका संचय हुवा है वह संचित कर्म है। मानवी जीवन अत्यंत गहरा है। वह जन्मजन्मांतरके संस्कारोंका महासंचय अथवा महाकोश है। संस्कारके इस महाकोशको संचित कर्म कहा गया है। इसीसे पुनः पुनः अलग अलग वासनाएं जागृत होकर कर्मकी प्रेरणा देती हैं। इसी संचित-कर्मसे नित नयी वासनाओंका अंकुर फूटता है और कर्मका सिलसिला चल पड़ता है। उनमेंसे नित नये कर्म और कर्म-बीज बनते, अंकुरते रहते हैं। कर्म और जन्मचक्रको गति मिलती है और क्रियमाण-वर्तमानमें चालू क्रियायें हैं। इस जन्ममें जीते जागते काया-वाचा-मनसे जो कर्म होते हैं वे सब क्रियमाण हैं। इन कर्मोंके साथ इन कर्मजन्य संस्कार भी क्रियमाणमें आते हैं। प्रत्येक जीव इन तीन प्रकारके कर्मसे बंधा हुवा है। इसी कर्म-बंधनके कारण वह बद्ध है। कर्माधीन है। साधकको शांत भावसे तटस्थ भावसे, साक्षीरूप रहकर इदं न मम भावका अनुभव करते हुए सबकुछ आत्मार्पण करके सतत और सर्वत्र आत्म-चिंतनरत रह करके इन तीनों प्रकारके कर्मोंका नाश करना है। वास्तविक साधना यही है। इससे वासना विलोप हो कर पूर्णत्वके शाश्वत आनंदका अनुभव आने लगता है जिसे महानंद कहा गया है। कल्पवृक्ष अथवा कल्पलता—यह स्वर्गका एक वृक्ष है। भारतीय साहित्यमें अत्यंत प्राचीन कालसे इसका उल्लेख मिलता है। इसकी छायामें बैठकर जो कुछ चाहते हैं वह सब मिलता है। यह चित्र विचित्र महीन कपडे, स्वादिष्ट अन्न, मद्य, मध, तथा अलंकार देता है, ऐसे कालिदासने लिखा है। भारतके प्राचीन शिल्पमें इसकी आकृतियां देखनेको मिलती हैं। राजाके १२३ परिशिष्ट ५

सिंहासन पर वह होना ही चाहिए ऐसी मान्यता है। केवल हिंदू धर्ममें ही नहीं पूर्व पश्चिम पृथ्विीके सभी धर्मोंमें ये कल्पनाएँ हैं। ईसाई और मुसलमान धर्मके स्वर्गमें भी यह वृक्ष होता है। माना जाता है कि इस वृक्षमें बारह प्रकारके फल लगते हैं। काकीमुख - सुषुम्ना नाडीका ऊपरका सिरा जो ब्रह्मरंध्रके पास होता है। काकीमुद्रा - हठयोगकी एक मुद्रा। इसमें जीभको कौवेकी चोंचकी भांति गोल बना कर इसमेंसे धीरे धीरे श्वास अंदर लेना - पूरक करना-होता है। प्राणायामके जो अनेक प्रकार हैं उनमें शीतका प्राणायाममें यह एक प्रकार है। इससे सभी शारीरिक रोग नष्ट होते हैं और शरीर संपूर्ण स्वस्थ रहता है। कलियुग - चारयुगोंमें एक, अंतिम युग। महाभारत युद्ध जब प्रारंभ हुवा था उसी समय द्वापरका अंत होकर कलियुगका प्रारंभ हुवा है। दूसरे शब्दमें कहें तो, भारत-युद्धसे कलियुगका प्रारंभ कह सकते हैं। इस युगका प्रारंभ ई. पू० ३१०२ फरवरी २८ से प्रारंभ हुवा ऐसे माना जाता है। भारत युद्धके कालके विषयमें विद्वानोंमें बडा मतभेद है। कुछ विद्वान मानते हैं कि भारत युद्ध ई. पू. १४२० में हुवा था । किंतु मैसूर राज्यके विजापुर जिलाके ऐहोलेमें जो शिला- शासन मिला है उसके विषयमें कहा जाता है कि भारत युद्धके कालनिर्णयमें वह अत्यंत महत्त्वका है। वह पूर्व चालुक्यके दूसरे पुलकेशीके समयका है। उसमें लिखा है कि जब कलियुगके ३७३५ वर्ष बीत चुके हैं शकके ५५६ वर्ष बीते तब यह प्रशस्ति लिखी जा रही है। इसका अर्थ है शालिवाहन शक से ३१७९ वर्ष पूर्व भारत युद्ध हुवा था अर्थात तभी कलियुग प्रारंभ हुवा। जेसलमेरमें भी एक शिला लेख मिला है वह भी यही गणित कहता है। उसमें शालिवाहन शक और युधिष्ठिर शकका अंतर ३१७९ है। कलियुग ४३००० वर्षका है। प्राचीन ग्रंथोंमें कलियुगका अर्थ असत्प्रवृत्तियोंका बढ़ते जाना ऐसा कहा गया है। कल्प, कल्पांत - ब्रह्माके एक दिनको कल्प कहा जाता है। चार युगोंकि एक हजार आवर्तनोंसे ब्रह्माका एक दिन- प्रातःकालसे संध्याकाल होता है। इतने ही समयकी एक रात्र होती है। इस अहोरात्रको दिन रातको कल्प कहा जाता है। एक कल्पमें ४३२००००००० वर्ष होते हैं। एक कल्पमें १४ मन्वंतर होते हैं जैसे दिवसमें २४ घंटे होते हैं। इस समय छटा मन्वंतर चला है। ऋग्वेदमें भी कल्पकी कल्पना है। आधुनिक विज्ञानके अनुसार भूगर्भशास्त्रसे यह कल्प कुछ कुछ ठीक बैठता है। कल्पके प्रारंभमें विश्वकी सृष्टि होती है और कल्पांतमें विश्वका अंत। कहीं कहीं ब्रह्माका दिनोदय सृष्टि रचना, ब्रह्माका दिन सृष्टीका जीवन और ब्रह्माकी रात्र सृष्टिलय ऐसा भी कहा गया है। गीताके अनुसार कल्पारंभमें सृष्टि उत्पन्न होती है और कल्पांतमें वह डूब जाती है। ज्ञानेश्वरीमें कल्पांतके दृश्यका वर्णन जहां तहां है। ज्ञानेश्वरी १२४

काम—चार पुरुषार्थोंमें प्रथम पुरुषार्थ, वेदके नासदीय सूक्तमें, उसके, परमात्माके मनमें उत्पन्न कामसे ही विश्वकी उत्पत्ति होनेकी बात कही है। काम “संतान रूपसे अमर होनेकी आत्माकी स्वाभाविक इच्छाकी प्रक्रियाजन्य एक भूख है।” वेदमें “आत्मा भ्राता पुत्र रूपसे” कहते हुए इसका वर्णन किया है। अथर्व वेदमें कामको “महान् विश्व-शक्ति” माना है। ब्राह्मणोंमें यज्ञवेदीको स्त्री तथा अग्निको पुरुष माना है। छांदोग्य उपनिषदमें “प्रजातंतु नहीं तोड़ना !” यह आज्ञा है । बृहदारण्यकमें स्त्री पुरुष संभोगको यज्ञ-विधि माना है। तथा “गीतामें उत्पत्ति हेतु में काम” कहा गया है। प्राचीन ऋषिमुलियोंने इसकी उपेक्षा या अवहेलना न करके जीवनमें कामको भी महत्त्वका आवश्यक स्थान दिया है। जीवनमें सर्वत्र प्रमाणबद्धता है। प्रमाणबद्धतामें ही सौष्ठव और सौंदर्य है। वेद तथा उपनिषदोंमें कामको मानवी मनकी महत्त्वपूर्ण प्रेरक शक्तिके रूपमें स्वीकार किया है। किंतु इसकी भी सीमा है। जब यह अपनी सीमाको पार करता है तब मनुष्य उन्मत्त हो कर उचित मनुचितके भानको खो देता है। ऐसी स्थितिमें यह विकार और सभी पापका मूल मान कर निषिद्ध माना गया है। कामधेनु—इच्छापूर्ति करनेवाली गाय। देव-दानवोंने जब समुद्र मंथन किया तब समुद्रमेंसे यह गाय निकली। शिववाहन नंदी इसी गायका बछड़ा है। वह वसिष्ठके साथ रहकर उसके यज्ञादि संपन्न करती थी। उसने वसिष्ठाश्रममें अतिथि बन कर आये हुए विश्वामित्रको इच्छा- भोजन खिलाया था। सूर्यवंशी दिलीपने इसकी सेवा की थी। इसके प्रसादसे ही रघुका जन्म हुआ था। कालकूट—समुद्रमंथनके समय अमृतके पहले जो विष उबलकर आया जिससे विश्व जलने लगा और फिर शंकर लोक-कल्याणके लिये जिसको पी गये वह विष। इसको हलाहल भी कहते हैं। इसको शंकर-भगवानने गलेमें ही रखा, पेटमें उतरने नहीं दिया। जिससे शंकर भगवानका गला-नीला हो गया इस लिये शंकर-भगवानको “नीलकंठ” कहते हैं। कुंडलिनी—मनुष्य शरीरमें अथवा मानवी जीवनमें जो महान् सुप्त शक्तियां होती हैं उनमेंसे एक सुप्त शक्ति ! योग शास्त्रमें इसका विस्तृत वर्णन है। यह सदैव मूलाधार चक्रमें साडेतीन कुंडली मार कर सुप्तावस्थामें रहती है। कुंडलिनी इस शब्दसे इसकी वक्रभावापन्न अवस्था स्पष्ट होती है। जब यह शक्ति अपनी वक्रता छोड कर सरल होती है, स्वाभाविक होती है, तब शिवसे अभिन्न होने तक चैन नहीं लेती ! आत्मा, नित्य शक्तिसंपन्न होता है। वह सर्वकाल निष्क्रिय होता है किंतु उसकी शक्ति कभी निष्क्रिय तो कभी सक्रिय होती है। इस शक्तिके चित् अचित् ये दो भेद होते हैं। चित् शक्ति सदैव आत्मासे अभिन्न होती है। इस शक्तिको वैष्णव साधक शुद्ध सत्त्व कहते हैं तो तांत्रिक बिंदु या महामाया कहते हैं। कुंडलिनी शब्दकी अनेक व्याख्यायें की गयी हैं। जैसे (१) सुप्त प्राणशक्ति (२) शेष, अनंत ब्रह्मांडकी रचना करनेके बाद जो आधारभूत शक्ति बची रही वह (३) सुप्त मानसिकशक्ति (४) दिव्य आदिशक्तिका व्यक्त रूप (५) प्रज्ञापरिमितता (६) विश्वव्यापी विद्युत शक्ति (७) चित्शक्ति (८) जीवात्माकी प्रणवरूपी आदिशक्ति (९) आध्यात्मिक शक्ति (१०) शरीरस्थित सुप्त चेतना। १२५ परिशिष्ट ५

शिवका वसतिस्थान कैलास-शरीरमें सहस्रार है और शक्तिका-कुंडलिनीका-सुषुम्नाके मूलमें मूलाधार चक्र । शक्ति जब वक्र होती है, सुप्त होती है तब स्वस्थानमें पड़ी रहती है और जब जागृत होती है, सहज होती है तब, शिवसे मिलनेके लिये तीव्र गतिसे ऊपर चढ़ने लगती है। तंत्र ग्रंथोंमें कुंडलिनी शक्तिका ऐसा ध्यान है।— करना ध्यान कुंडलिनीका रहती मूलाधारमें सूक्ष्म । बैठी है इष्ट देवता रूप साढे तीन कुंडल मारके । कोटि विद्युल्लताके समान तू है स्वयंभू लिंगको घिरे ॥ कई लोग इसके साढे तीन कुंडलके संबंध ॐके साढे तीन मात्राओंसे जोड़ते हैं। वैसे ही कुछ लोग इसके साढे तीन कुंडलके संबंध स्वप्न जागृति सुषुप्ति तुर्यासे जोड़ते हैं और कुंडलिनीकी जागृति को मनुष्यमें स्थित सुप्त प्रणव या बीजकी जागृती कहते हैं अथवा तुर्यावस्थाकी जागृति मानते हैं। जप, तप, योग-साधन, ध्यान, भक्ति, कीर्तन, भजन, ज्ञान, सतत दीर्घ अभ्यास, सत्कर्म, प्राणायाम, तीव्रदुःख आदि कारणोंसे तथा योगियोंद्वारा शक्तिपात करनेसे यह कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है। यह जागृत होते ही स्वाधिष्ठान, मणिपुर आदि चक्रोंसे होकर सहस्रारकी ओर वेगसे चलती है। जाते समय जो कुछ विरोध होता है उसको वह तोडते हुए चलती है। इसकी अद्भुत शक्तिके कारण यदि साधककी ठीक व्यवस्था नहीं रही तो उसकी मृत्यूकी भी संभावना हो सकती हैं। इसलिये वहां अनुभवी गुरुकी आवश्यकता बताई गयी है। उपनिषदोंसे लेकर आधुनिक संत साहित्यतक अनेक ग्रंथोंमें कुंडलिनी जागृतिके अनेक उपाय कहे गये हैं। प्राणायामके अनेक प्रकार, मनकी एकाग्रता, आदिसे कुंडलिनी शक्तिको जागृत करके उसको सुषुम्नाके द्वारा सहस्रार तक चढानेकी विधियां कही गयी हैं। किस चक्रके बाद किस चक्रमें प्रवेश होता है, किस चक्रमें प्रवेश होनेके बाद क्या क्या होता है, इन सबका विस्तृत वर्णन देखनेको मिलता है। जब वह चंद्रनाडी चक्रमें प्रवेश करती है तब वहां अमृत-प्रवाह होने लगता है। तब साधकको अन्य सभी सुख तुच्छ लगने लगते हैं और वह केवल ब्रह्मानंदकी भूखसे आत्मसुख प्राप्तिके लिये अव्याहत साधनारत रहने लगता है। अनाहत चक्रमें जब कुंडलिनी शक्ति आती है तब अतींद्रिय शब्द सुनने लगते हैं। उसके बाद कुंडलिनी शक्तिको "मारुत" कहा गया है। ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायमें इसका विस्तृत और काव्यात्मक वर्णन है। कुरुक्षेत्र—यह वर्तमान हरियाणा राज्यके कर्नाल जिलामें आता है। कुरुराजाने हलसे कसकर यह भूमि बनायी थी इस लिये इसको कुरुक्षेत्र कहते हैं। कुरु कौरवोंका मूल पुरुष है। यह राजा अत्यंत तपस्वी था। इसने शिवजीसे वरदान मांगलिया था कि मैंने जितनी यह भूमि कसी है उतनी भूमि पवित्र मानी जाय। यह धर्मक्षेत्र माना जाय। यह करीब ८० कोसका चौरस प्रदेश है। महाभारत तथा अन्य प्राचीन ग्रंथोंमें इसकी चतुःसीमा बताई गयी है। यजुर्वेद शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक, बृहज्जाबालोपनिषद् आदि प्राचीन ग्रंथोंमें इस क्षेत्रका वर्णन है। कहीं कहीं इस भूमिको देवताओंकी यज्ञभूमि कहा गया है। सूर्य ग्रहणके समय वहां बड़ा मेला लगता है। ज्ञानेश्वरी १२६

बुद्ध पूर्व कालमें वह एक महाजनपद था। ई. पू० ३२१ से ई. स. १८५ तक यह मौर्य साम्राज्यमें था। इसके बाद गुप्त साम्राज्यमें गया। हर्षवर्धनके काल तक यह भाग सांस्कृतिक उन्नतीके शिखर पर था। इसके बादका इतिहास विदेशियोंके आक्रमण और विनाश लीलाओंसे भरा हुवा है। थानेश्वर, पानीपत, तरावडी, कैथल, कनाल आदि युद्धक्षेत्र इसी कुरुक्षेत्रके अंतर्गत हैं। कुरुक्षेत्रमें (१) ब्रह्मसर (२) संनिहितसर (३) ज्योतिसर (४) स्थानेश्वर (५) कालेसर ऐसे पांच सरोवर हैं। वैसे ही (१) चंद्रकूप (२) विष्णुकूप (३) रुद्रकूप (४) देवीकूप ऐसे चार कूप हैं। साथ साथ पहले जो (१) काम्यवन, (२) अदितिवन (३) व्यासवन (४) फलकीवन (५) सूर्यवन (६) मधुवन (७) शीतवन थे ऐसा कहा जाता है वहां आज (१) काम्यतीर्थ (२) अदितितीर्थ (३) फल्गुतीर्थ (४) सूर्यकुंडतीर्थ ऐसे कुंड हैं। परशुराम, प्रजापति, अंबरीष, ययाति, आदि राजाओंका इस क्षेत्रसे संबंध आता है। आज वहां एक दिनसे अधिक रहना अयोग्य माना जाता है। संभवतः ई. पू. २ री सदीसे तीर्थयात्रार्थ वहां जाकर तुरंत लौट आनेका रिवाज प्रारंभ हो गया है। कृच्छ्र—प्रायश्चित्तार्थ किया जानेवाला एक व्रत। इस व्रतमें पहले तीन दिन एक बार केवल हविष्यान्न खाना है। फिर तीन दिन केवल रातको खाना। फिर तीन दिन जब जो मिले वह एक ही कौर खाना। इसके बादके तीन दिन संपूर्ण निर्जल उपवास। खडा खडा दिन और बैठ कर रात बिताना। इन दिनोंमें सत्य बोलना; तीन बार स्नान, अकुलीन स्त्री पुरुषोंसे संभाषण वर्ज, सूर्यपूजन, अग्निहोत्र आदि नियम कहे गये हैं। इसके बाद तेरहवें दिन ब्राह्मणभोजनके साथ भोजन करना। यह विधि गौतमधर्मसूत्रमें कही गयी है। कूटस्थ—निर्विकार आत्मा जो स्थूल वा सूक्ष्म देहसे विच्छिन्न नहीं होता है वह सुनारकी ऐरणीकी भांति निर्विकार होता है। देह अविद्याका कल्पना जन्य है। कल्पनाके लिए आधार चाहिए। आत्मा सर्व व्यापी है। देहद्वयसे वह विच्छिन्नसा लगता है। सुनारकी ऐरणी पर कुछ भी वस्तु रख कर उस पर कितने ही प्रहार करने पर भी ऐरणीको कोई विकार नहीं होता वैसे ही, आत्माके आधारसे रहनेवाले जीवको विषयादिसे कितना ही क्लेश होने पर भी आत्मा निर्विकार रहता है। ऐसा वह निर्विकार आत्मा ही कूटस्थ कहलाता है। कैवल्य—मोक्ष इस शब्दके अर्थमें इसका प्रयोग होता है। त्रिविध दुःखोंका अंत ही कैवल्य है। आत्मसाक्षात्कारके बाद कर्तृत्वादि अभिमान नष्ट होते हैं। कर्मसे निवृत्ति होती है। अनंतकर्म करनेके बाद भी कर्तृत्वका भान नहीं होता। न करनेका-सा अनंत कर्म करना, न चलनेका सा बिना ओर छोरका चलना, न बोलनेका-सा अनंत संभाषण सुख, सदैव ब्रह्मभावमें लीन रहना, इस स्थितिको कैवल्य कहा गया है। केवल ब्रह्म-भाव प्राप्ति ही कैवल्य है ! क्रोध—प्राचीन चिंतनशील ऋषिमुनियोंने (१) काम (२) क्रोध (३) लोभ (४) मोह (५) मद (६) मत्सर इनको षड्विकार अथवा छ शत्रु माना है। मनुष्यके छ ३२७ परिशिष्ट ५

शत्रुओंमें क्रोध दूसरा शत्रु है । प्रतिकूल विषयमें जो तीक्ष्ण बोधानुभूति होती है उसको क्रोध कहा गया है । अपने लिए प्रतिकूल स्थितियोंसे, जैसे अपमान, अन्याय, असमाधान आदि होता है तब, क्रोधका उदय होता है। जो भावनाएं अंतःकरणके लिए प्रिय है उसके विरुद्ध कुछ होते ही क्रोध आता है। क्रोधका मूल रजोगुण है। काममें व्यत्यय आनेसे भी क्रोध आता है । क्रोध आगकी भांति पहले अपनेको जला कर फिर दूसरोंको जलाता है। मनुस्मृतिमें क्रोधके लक्षण कहते समय (१) बिना अस्तित्वके दोष दीखना (२) साहस (३) द्रोह (४) दूसरोंके गुण सहन न होना (५) गुणोंके स्थान पर दोष दिखाई देना (६) अर्थापहरण (७) आक्रोश (८) वाणीकी कठोरता (९) ताडनादिसे दुःख देना आदि कहे गये हैं। साधु-संतोंने क्रोधको अनर्थकारी कहा है। गंधर्व-नगर—एक काल्पनिक बात । संध्यासमय आकाशमें अन्यान्य बादलोंके कारण नगरादिकोंका भास होता है । वह केवल आभास ही होता है । सूर्य किरणोंकी चक्र गतिके कारण इन नगरोंमें अन्यान्य रंग भी दीखते हैं। इन रंगोंको लेकर कुछ फलाफल भी कहा जाता है किंतु मूलतः इसका अस्तित्व ही नहीं होता। अस्तित्वहीन कल्पनामय बातोंको समझानेके लिए गंधर्व नगरीकी उपमा दी गयी है। जैसे आकाश-पुष्पकी उपमा दी जाती है । गणेश—किसी भी कार्यके प्रारंभको श्रीगणेश। कहते हैं। क्यों कि गणपतिपूजनसे ही कोई कार्यारंभ होता है । गणपति शिव-पार्वतीका पुत्र है। विद्वानोंका मत है कि मूलतः गणेश आर्येतर देवता है। प्रथम गणपति अथवा गणेशको शिवगणोंमें-श्रेष्ठ स्थान मिला। फिर ऋग्वेदके ऋषियोंको "गणानांत्वा गणपति हवामहे !" कह कर इनकी पूजा करने लगी, इतना इस देवताका प्रभाव था । गणपति शिव पार्वतीका पुत्र होने पर भी अयोनि संभव है । गणेशके विचित्र रूपके विषयमें अनेक प्रकारकी जनश्रुतियां प्रचलित हैं तथा अनेक विद्वानोंने अनेक संशोधनात्मक लेख लिखे हैं। ये सारे लेख और संशोधन "विश्वकी प्रत्येक बातको अपनी वैज्ञानिक दृष्टिसे " विचार करनेवाले आधुनिक विद्वानोंका है । इसके मूलमें पाश्चात्य विद्वानोंके मतकी पुनरोक्ति मात्र है किंतु सनातन दृष्टिके विद्वानोंको यह दृष्टिकोण स्वीकार नहीं है। वे गणेशको संपूर्ण वैदिक देवता मानते हैं। अथर्ववेदमें गणपत्यथर्वशीर्ष नामका अथर्वशीर्ष है। उस अथर्वशीर्षकी दृष्टिसे गणेश संपूर्ण वैदिक देवता है । ऋग्वेदके ब्रह्मणस्पति सूक्तको ये वैदिक विद्वान गणपतिसूक्त ही मानते हैं। गणपति अथर्वशीर्षमें गणपतिके आध्यात्मिक रूपका विवेचन है । गणपति एक तत्त्व है । गणपतिको वाङ्मयका मूलाधार माना गया है। योगविद्यामें गणपति मूलाधार चक्रका देवता है । प्रणवोपासना और गणेशोपासना एक मानी गयी है । 'गज" का अर्थ "जहां सबका लय होता है तथा जहां सबका जन्म होता है" ऐसा किया गया है। तांत्रिक साहित्यमें विघ्नराज गणेशका महत्त्वका स्थान है। सभी मंगल कार्योंके प्रारंभमें नवग्रहोंके साथ, उनसे पहले गणेशपूजन करना अनिवार्य है। तांत्रिक गणपतिके साथ उनकी शक्तियां भी होती हैं। उन शक्तियोंका नाम तीव्रा, ज्वालिनी, नंदा, भोगदा आदि हैं। तंत्र मार्गमें गणेशके कई मंत्र कहे गये हैं। बुद्धने भी अपने शिष्य आनंदको 'रहस्यमय गणपति हृदय" नामका मंत्र दिया था । बौद्ध धर्मके साथ गणेश भी भारतके बाहर गया । भारतके बाहर तिब्बत, तुर्कस्तान आदि बौद्ध मठोंमें, मठोंके बाहर, गणपतिकी मूर्तियां मिलती हैं । चीनमें भी गणपतिका प्रवेश हुआ है । चीन जापानमें यह कांगी बने हैं। किंतु ज्ञानेश्वरी १२६

ज्ञानेश्वर महाराजने एक विशेष प्रकारके गणेशकी रचना की है। वह आद्य है वह ॐ है। आत्मरूप है। सकल मतिप्रकाश है। गणपति विद्याकी देवता है और ज्ञानेश्वर महाराजने वेद, उपनिषद, षड्दर्शन, पुराण, स्मृति, नाटक, काव्य, आदिसे गणेशको सजाया है। भारतीय धार्मिक, आध्यात्मिक, तथा सांस्कृतिक जीवनके लिये प्रेरणारूप साहित्यका महागणपतिकी रचना करके उनका वंदन करना ज्ञानेश्वर महाराजकी स्वतंत्र प्रतिभाका एक सुंदर निदर्शन है ! गुण-कर्म-विभाग—गुण-कर्म विभाग चातुर्वर्ण्यका आधार है। गुणोंके क्रमानुसार किया हुआ समाज-संगठन चातुर्वर्ण्य व्यवस्था है। ब्रह्मासे लेकर चींटी तक सारा विश्व गुणोंसे विभाजित है अथवा गुणोंपर आधारित है। प्रत्येक प्राणिमात्रमें अर्थात् मनुष्यमें भी कम अधिक प्रमाणमें इन गुणोंका होना स्वाभाविक है और अनिवार्य भी। प्रत्येक मनुष्यका स्वभाव इन गुणोंपर आधारित है। इस सिद्धांतके अनुसार मानवी समाजका-केवल हिंदू समाजका नहीं-चार वर्णोंमें विभाजन करके उनको उस उस स्वाभावानुसार समाज-हितके काम बांट दिये, जिससे समाज सुसंगठित हो, व्यवस्थित रूपसे समाजका सर्वांगीण विकास हो। इसको वर्णव्यवस्था कहते हैं। यह समाज- व्यवस्था स्वाभाविक व्यवस्था है। विद्वानोंका कहना है कि प्राचीन ग्रीक ग्रंथोंमें भी समाजके चार प्रकारोंका विवेचन किया हुआ मिलता है तथा ये भेद व्यवसायके आधार पर पडे या वंशके आधार पर ! ऐसे वाद विवाद भी हुए हैं। पार्सियोंके अवेस्तामें भी चार प्रकारके वर्णोंका उल्लेख है। किंतु भारतके प्राचीन शास्त्रकारोंने उनको एक वैज्ञानिक रूप दिया है। अमुक गुणके अमुक स्वभाव हैं ! किस प्रकारके स्वभाववाले गिरोहको किस प्रकारका काम देना चाहिए ? इन बातोंका अत्यंत गहराईके साथ अध्ययन करके प्रत्येक गिरोहको स्वधर्मके रूपमें विशिष्ट काम दिया गया जिस कामसे वह समाजके लिये अधिक से अधिक उपयुक्त हो। वर्णका अर्थ है रंग। उपनिषदमें गुणकी नहीं रंगकी कल्पना है। जैसे सांख्य शास्त्र ब्रह्मासे लेकर चींटी तक तीन गुणोंके आधीन कहता है वैसे प्राचीन उपनिषद् सारे विश्वको तीन वर्णका मानता है। "वर्ण मिश्रणसे विश्वकी विविधता दर्शन" तथा "गुण मिश्रणसे विश्वकी विविधता दर्शन" दोनों एक ही हैं। उपनिषदके तीन वर्णोंका विकास सांख्यके तीन गुणोंमें हुआ और गीताने समाजव्यवस्थाके लिए गुण कर्म विभागसे चातुर्वर्ण्यकी बात कही। इस प्रकार गुण-विभागसे कर्म-विभाग और कर्म-विभागसे वर्ण रचना की है ऐसे गीतामें श्रीकृष्णने कहा है। और महाभारतमें युधिष्ठिरने यक्ष प्रश्नके उत्तर देते समय कहा है—"कुल, स्वाध्याय, या श्रुति यह ब्राह्मणत्वका कारण नहीं किंतु सदाचार ब्राह्मणत्वका आधार है। जिसने सदाचार छोड दिया वह ब्राह्मण लाशके समान है !" युधिष्ठिर नहुषसे हुई अपनी बातोंमें भी यही कहता है "गुण ही यदि वर्णका आधार माने गये तो शूद्रादिमें सत्य अहिंसादि गुण रहे तो क्या उस शूद्रको ब्राह्मण कहना होगा ? " नहुषके इस प्रश्नके उत्तरमें युधिष्ठिर कहता है— ये हैं लक्षण शूद्रमें यदि ये द्विजमें नहीं। न शूद्र शूद्र है राजन् औ' द्विज द्विज भी नहीं ॥ ये लक्षण जहां होते कहना उनको द्विज। जहां नहीं इन्हें स्थान उनको शूद्र जानना ॥ १२९ परिशिष्ट ५

इसी प्रकार, महाभारतमें भारद्वाज तथा भृगु ऋषि भी इसी प्रकारके विचार कहते हैं । वर्ण उत्कर्ष होता है नरका पुण्य कर्मसे । तथा पाप कृत्यसे जो जाता है हीन वर्णमें ॥ यह महाभारतके शांतिपर्वमें कहा गया है। महाभारतमें हीन वर्णसे श्रेष्ठ वर्ण तथा श्रेष्ठ वर्णसे हीन वर्णमें हुए उत्कर्षापकर्षकी घटनाओंका विवेचन भी मिलता है। गीता और ज्ञानेश्वरीमें इन्हीं गुणकर्म विभागानुसार कर्तव्य कर्मका विचार किया गया है। गुणत्रय—सांख्यशास्त्रमें सत्व, रज, तम ऐसे तीन गुणोंका विवेचन किया गया है। गीतामें इसीका विस्तृत विवेचन है। किंतु इसकी मूल कल्पना बृहदारण्यकोपनिषदमें दीखती है। बृहदारण्यकमें “इस विश्वमें जो कुछ है वह तीन वर्णोंके समन्वयसे बना है !” ऐसा कहा गया है। ये तीन वर्ण हैं काला, लाल, और सफेद। यही गुणोंकी मूल कल्पना है। वस्तुतः पंचमहाभूतोंमें तीनभूतोंका रंग आंखोंसे दिखाई देता है। पृथ्वीका काला, तेजस्, अग्निका लाल, पानीका कोई रंग नहीं सफेद ! वायु और आकाशका रंग नहीं है। “विश्वमें जो कुछ वस्तु दीखती है इन तीन रंगोंके कारण!” इस कल्पनाका सांख्योंने “ब्रह्मसे चींटी तक जो कुछ दीखता है वह सब तीन गुणोंसे प्रभावित है” कहते हुए विकास किया है। सांख्यशास्त्रके बाद, गीतामें विश्वमें जो कुछ है वह सब प्रकृति है कहते हुए प्रकृतिकों “इन तीन गुणोंका कल्लोल” कहा। सांख्योंने विशेषतः नैतिक जीवनको ध्यानमें रख कर इन तीन गुणोंका विचार किया है। गुणातीत—ब्रह्मसे चींटीतक जो कुछ दीखता है वह सब प्रकृति है और प्रकृति गुणोंका कल्लोल है तथा केवल मात्र ब्रह्म, प्रकृतिसे परे अर्थात गुणातीत है। किंतु ब्रह्मलीन मनुष्य भी गुणातीत है। उस पर गुणोंका अधिकार नहीं रहता। जैसे आत्मा प्रकृतिके परे है वैसे आत्मरत या आत्मलीन सिद्धपुरुषभी गुणोंसे परे रहता है। गुणातीतावस्था ही जीवन्मुक्तावस्था है। गुरु—इस शब्दके अनेक अर्थ हैं। जैसे “जिसका स्तवन किया जाता है वह” “जो धर्म का उपदेश देता है वह” “जो अज्ञान दूर करता है वह!” आदि। वैदिक सूत्र ग्रंथोंमें सर्व प्रथम यह शब्द आया है। गुरु-सान्निध्यमें रह कर उनकी आज्ञासे कर्म करते हुए समावर्तन करना वैदिक परंपराकी शिक्षा व्यवस्था थी । वैदिक सूत्रकालमें गुरुगृहमें रह कर गुरुसेवा करके विद्याध्ययन करनेकी प्रथा रूढ हुई। अध्ययन कालमें गुरु-गृहमें रहना, वहां गुरुकी आज्ञानुसार गुरु और गुरुकुलकी सेवा करना, तथा अध्ययन पूरा होने पर गुरु दक्षिणा देकर घर जाना यह उस समयकी भारतीय परंपरा थी। इस परंपराके अनुसार गुरु-शिष्योंके संबंध कैसे रहने चाहिए, गुरु कैसा रहना चाहिए, शिष्यके क्या कर्तव्य होते हैं इन सबका विस्तृत विवेचन उस समयके अनेक ग्रंथोंमें देखनेको मिलता है। तंत्र सारमें गुरुके गुणोंके विषयमें लिखा है— शांत कुलीन विनीत दक्ष निर्मल संयमी । सुविचारी सदाचारी ज्ञानी ज्ञानविभूषित ॥ अध्यात्म ज्ञानमें पूर्ण मंत्र तंत्र विशारद । गुरु सो है कहा जाता कृपा शासनमें पढु ॥ ज्ञानेश्वरी १३०

ऋग्वेद कालमें बृहस्पति, आंगिरस, अत्रि, वसिष्ठ, गर्ग, आदि ऐसे गुरुजनोंका दर्शन होता है। उसके बाद आजतक वैदिक परंपरामें ऐसे गुरु समय समय पर होते रहे हैं। इसी प्रकार दार्शनिक क्षेत्रमें भी ऐसे गुरु-जनोंकी परंपरा अविच्छिन्न रूपसे चली आयी है। उसके साथ ही साथ जब भारतमें वैदिक कर्मकांडका संकोच हो कर ज्ञानकांडका युग आया, उस उपनिषदकालमें भी जनक याज्ञवल्क्य जैसे गुरु शिष्य परंपरा दीखती है। उन दिनोंमें, भिन्न भिन्न प्रकारके दर्शन लिखे गये और उन उन दर्शनके आचार्योंके पास उनका शिष्यसमुदाय भी रहा। बौद्ध और जैन अनुगममें भी ऐसी गुरुशिष्य परंपरा चलती आयी है। उसके बाद मुस्लिम आक्रमणके बादके युगमें, धर्मसाधना अथवा आध्यात्मिक साधनामें गुरूको असाधारण महत्त्व मिला। जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, शाक्त, तथा नाथसंप्रदायमें गूढ अथवा गुप्तरूपसे साधना होने लगी। आध्यात्मिक गूढ साधनामें गुरूकी प्रतिष्ठा शिखर पर पहुंच गयी। इस समय "केवल गुरुवचनसेही परम गुह्य ऐसा सत्य स्पष्ट हो कर उसका साक्षात् अनुभव आता है!" यह सिद्धांत रूढ हुवा। जिस बुद्धने कहा था "मेरा कोई गुरु नहीं है मैंने अपने अभिज्ञानसे सब कुछ पा लिया है" उसी बुद्धके बौद्धानुगममें "पर-तत्व केवल गुरुके शब्दसे ही हृद्गत हो सकता है!" ऐसे सिद्धांत प्रचलित हुए। और इसी युगमें- गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वर । गुरु साक्षात्परब्रह्म वैसे श्री गुरु-वंदन ॥ जैसे गुरु वंदन होने लगे। वैसे उपनिषद कालमें भी गुरु पूजाका विधान कहा गया है। गुरुकी महानता कही गयी है। मुंडकोपनिषदमें "बिना गुरुके ज्ञान नहीं" इस लिए "शिष्यको हाथमें समिधा लेकर ब्रह्म ज्ञानके लिए ब्रह्म निष्ठगुरूके पास जानेको" कहा गया है। उपनिषदके "नि" का अर्थ शिष्यको गुरुमें गुरुसेवासे निःशेष होना है। शिष्यके हाथमें समिधा होनेका अर्थ भी यही है। समिधा जैसे यज्ञमें निःशेष होती है "वैसे मैं शिष्य गुरुमें निःशेष होने आया हूं!" यह कहना ही हाथमें समिधा लेना है। किंतु गुरुको सर्वस्व माननेकी प्रथा मध्यकालीन धर्म-साधनाका परिणाम है। बौद्धोंका वज्रयान, तथा नाथसंप्रदायमें गुरुको ईश्वरसे भी ऊंचा स्थान है। कबीर भी ऐसा ही कहता है। गुरु और हरि दोनों उपस्थित होने पर वह गुरुकेही पग लगता है। नाथ संप्रदायमें साधक पितृ वंश न कह कर गुरुवंश कहता है। स्वयं ज्ञानेश्वर महाराज पिताका नाम न लेकर "निवृत्तिका ज्ञानदेव" कहते हैं। ज्ञानेश्वर महाराजसे समर्थ रामदास तक मराठी संत साहित्यमें सर्वत्र गुरु-महिमा गायी गयी है। वैसे सभी भाषाके संत साहित्यमें सर्वत्र गुरु-महिमा गायी गयी है। किंतु कन्नड वीरशैव संत-साहित्यका स्वर कुछ अलग ही है। वहां दीक्षाके लिए गुरुकी अत्यंत आवश्यकताको प्रतिपादन करके भी, गुरुका अत्यंत आदर करके भी "अपने आपको जान लिया तो वह ज्ञान ही गुरु" "ज्ञान ही गुरु आचार ही शिष्य !" "अनुभव ही गुरु" ऐसे अनेक सूत्र मिलते हैं। मराठी संत साहित्यमें भी तुकाराम और समर्थ रामदासने "कान फूंकनेवाले नकली गुरुओंकी" अत्यंत कठोर शब्दोंसे प्रताडना की है। निवृत्ति नाथने भी एक स्थान पर "सबको एक ही मंत्र देनेवाले गुरुको अधमतम गुरु" कहा है। ऐसे गुरुओंके लिए समर्थ रामदासने ऐसे गुरु-जन । पैसेमें हैं तीन । मिले भी तो जान । तजना उनको ॥ १४१ परिशिष्ट ५

कहा है । यद्यपि आज "गुरु" यह शब्द निन्द्यव्यंजक-सा बन गया है फिर भी हम यह नहीं भूल सकते "अंगीरससे भगवान रामकृष्ण परमहंस तक" यह एक महान परंपरा रही है । रामकृष्ण परमहंसने "केवल मस्तक पर हाथ रख कर" अपना सारा ज्ञान स्वामी श्री विवेकानंदको दिया था । ऐसे ही ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं "निवृत्तिनाथकी कृपादृष्टि हुई मैं गीतार्थ कहने लगा।" गुरुकी शक्ति ऐसी तर्कातीत है। केवल अनुभवगम्य है। इसीलिये अध्यात्म-शास्त्र कहता है "गुरु देहधारी पर-शिव है!" गुरु-वाक्य—गुरु अपने शिष्यको जब "मैं" इसका बोध देता है तब कहता है तत् त्वम् असि तत्=वह ब्रह्म-त्वम्=तू असि=है । गुरु सर्व प्रथम अपने शिष्यको जो "मैं" कहता है यह समझाता है यह "मैं" "तू परब्रह्म है।" गुरु वाक्यके इस बोधानुभूतिसे वह "सोऽहम्" "वह मैं हूँ" कहने लगता है। मानवी जीवनकी सारी साधना "कोऽहम्=मैं कौन हूँ ?" से प्रारंभ होती है। मानव बालकका जन्मते ही रोना, यही "मैं कौन हूँ ?" की जिज्ञासासे है; ऐसे कुछ तत्वज्ञानी कहते हैं! मैं कौन हूं यह जाननेके प्रयासमें गुरु कहता है "तू वह है।" "तत्त्वमसि" इसी लिये इसे गुरु वाक्य अथवा महावाक्य कहा गया है। इसीको कहीं कहीं तत्पद भी कहा है। चंद्रामृत सरोवर—ऐसी मान्यता है "आकाशस्थ चंद्र-किरणोंसे अमृत स्रवता है जिससे वनस्पति औषधी गुण संपन्न होती है वैसे ही योग-शास्त्र कहता है मनुष्यके सहस्रसारचक्रसे अमृत स्रवता है। इस लिये योग-शास्त्रकी भाषामें सहस्रदल कमल, अथवा सहस्रारचक्र अथवा ब्रह्मरंध्रको कुंडलिनीके आघातसे मस्तिष्कके जिस भागसे अमृत स्रवता है उस भागको चंद्र, चंद्रामृतसरोवर, चंद्रामृतनीर, आदि कहा गया है। चातुवर्ण्य—हिंदू-धर्म शास्त्रमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ऐसे चार वर्ण माने हैं। -गुणकर्म विभागमें इस विषयमें कुछ लिखा है- इन चारों वर्णोंके कर्तव्य और अधिकार, व्यवहार और तारतम्य, आदि कहा गया है । चातुवर्ण्य एक सामाजिक संस्था है। यह हिंदुओंका आदिधर्म है। गौणधर्म नहीं। समाजमें केवल चार वर्ण हैं उससे अधिक नहीं। चार ही वर्ण मिल कर पूर्ण समाज बनता है। किसी भी एक वर्णके अभावमें समाज अधूरा रहता है। प्रत्येक वर्णकी भिन्नता गुणभिन्नता तथा कर्तव्य भिन्नताके कारण होती है । एक ही शरीरके जैसे अलग अलग अवयव होते हैं वैसे ये वर्ण एक ही समाजके भिन्न भिन्न अवयवसे हैं। अवयव और अवयवीका जो संबंध है वही संबंध समाज और प्रत्येक वर्णका है। "हिंदू धर्ममें इस चातुवर्ण्य व्यवस्थाका जो प्राचीनत्व है वह और किसी व्यवस्थाका नहीं" ऐसे विद्वानोंकी राय है। श्रुतिमें अनेक व्यवस्थाएं हैं जो अब तक नष्ट हो गयी हैं किंतु यह व्यवस्था अब तक टिकी रही है। चातुवर्ण्य व्यवस्था जैसे स्थायी रूपसे टिकी रही उतना और किसी समाजकी कोई व्यवस्था स्थायी स्वरूपसे नहीं रही। अध्ययन, अध्यापन, प्रजा संरक्षण, अर्थोत्पादक व्यवहार तथा सेवाकार्यकी व्यवस्था जिस समाजमें भली भांति नहीं है वह व्यवस्था या वह समाज, अधिक काल तक नहीं टिक सकता। इस ज्ञानेश्वरी १३३

दृष्टिसे चातुवर्ण्य व्यवस्था अत्यंत स्वाभाविक समाज व्यवस्था है। यह समाज-व्यवस्था सार्वभौमिक है। भारतमें ये वर्ण संस्कारांकित थे। आगे चल कर, इन चारो वर्णमें भिन्न संस्कार विकसित हुए। जैसे, वर्ण-संस्कार, ब्राह्मणोंका कर्म शूद्रोंमें । इसी कारण धर्म शास्त्रोंमें आपद्धर्म जैसे विचार प्रसूत हो गये । गुणोंके कारण इन चारो वर्णोंमें उत्कर्ष अपकर्ष होते हैं। किंतु गुणभेदसे वर्ण न मान कर जन्मसे वर्ण माननेकी परंपराके कारण चातुर्वण्यावस्था भाज विकृत सी गयी है और समाज भी टूटने लगा है। चित्त—अंतःकरण पंचकमेंसे चौथा । (१) सत्व (२) मन (३) बुद्धि (४) चित्त (५) अहंकार मिलकर अंतःकरण होता है। अंतःकरणका अर्थ अंदरका इंद्रिय । पंच कर्मेंद्रिय और पंच ज्ञानेंद्रिय बाह्य इंद्रिय है। ज्ञान प्राप्तिके ये बाह्य साधन हैं और अंतःकरण आंतरिक साधन । ये जीवके कार्य-साधन हैं और बाह्य साधनोंसे अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली है। इसीको अंतःकरण चतुष्टय (१) मन (२) बुद्धि (३) चित्त (४) अहंकार भी कहा गया है। चिंतनसे विचारोंके संस्कारचित्रोंको अंतःकरणमें संग्रह करके उसको कार्यका रूप देनेवाला अंतरेंद्रिय चित्त है। इस चित्तके (१) क्षिप्त (२) मूढ (३) विक्षिप्त (४) एकाग्र (५) निरुद्ध ऐसे पांच प्रकार हैं। (१) रज प्रधान चंचल चित्तको क्षिप्त कहते हैं (२) तमप्रधान सुस्त चित्तको मूढ चित्त कहते हैं (३) सत्वरज प्रधान करुणादि भावग्रस्त चित्त विक्षिप्त चित्त कहलाता है। (४) सत्व प्रधान मांगल्यमें स्थिर चित्तको एकाग्र चित्त कहते हैं। (५) निवृत्त शांत चित्तको निरुद्ध कहते हैं। यही स्थिति योगकी सिद्धावस्था है। चित्त पर कोई लहरें नहीं उठे । कहीं किसी प्रकारकी प्रेरणा न हो । यही आत्मस्वरूपका बोध होता है। अथवा चित्तकी संपूर्ण निरुद्धावस्था निर्विकल्प समाधि है। यह अवस्था जब सतत टिकी रहती है तब वह सहज समाधि है। ऐसा सिद्ध पुरुष सब कुछ करके कुछ भी नहीं करता । अनंत वक्तृत्वसे मौन रहता है। बिना ओर छोरका कर्म करके भी निष्क्रियसा रहता है !! चिदाकाश—शुद्ध ज्ञानमय स्थिति दर्शानेके लिये इस शब्दका उपयोग किया गया है। आकाशका अर्थ है शून्य । केवल खोखलापन । अर्थात् आकाश शब्दसे अभावका भी भाव आता है। ज्ञानका अभाव ही अज्ञान है। इस लिये ज्ञानके साथ आकाशकी विशालता और अलिप्तता दर्शानेके लिये चिदाकाश कहा गया है। चिदाकाश, विशुद्ध ज्ञानावस्था जो सबसे विलिप्त है और बिना ओर छोरका भी । चौबीस तत्व—सांख्य दर्शनके अनुसार सारा विश्व चौबीस तत्वोंसे बना है। इन चौबीस तत्वोंमें प्रधान तत्व है प्रकृति। इसी प्रकृतिका अव्यक्त, माया, प्रसवधर्मिणी, गुणक्षोभिणी आदि विशेषणोंसे वर्णन किया है। (१) प्रकृति (२) महत्-बुद्धि (३) अहंकार (४) मन (५) चक्षु (६) घ्राण (७) श्रवण (८) त्वचा (९) रसना-ये ५ ज्ञानेंद्रिय और (१०) हाथ (११) पाय (१२) मुख (१३) गुदा (१४) शिश्न ये पांच कर्मेंद्रियां (१५) शब्द (१६) स्पर्श (१७) रूप (१८) रस (१९) गंध ये पांच तन्मात्राएं तथा (२०) पृथ्वी १३३ परिशिष्ट ५

(२१) आप (२२) तेज (२३) वायु (२४) आकाश ये पंचमहाभूत। ये सब मिल कर चोबीस तत्त्व। इससे परे पुरुष। २५। चौदह इंद्र—ब्रह्माके एक दिनमें चौदह इंद्र बदलते हैं। पुराणोंमें इन चौदह इंद्रोंके नाम निम्न हैं। (१) यज्ञ (२) रोचन (३) सत्यजित् (४) त्रिशिख (५) विभु (६) मंत्रद्रुम (७) पुरंदर (८) बलि (९) अद्भुत (१०) भारद्वाज (११) वस्स (१२) वसिष्ठ (१३) विष्णुवृद्ध (१४) शांडिल्य । चौदह भुवन—समग्र ब्रह्मांडमें चौदह भुवन अथवा चौदह लोक हैं ऐसी भारतीय तत्त्वज्ञोंकी मान्यता है। इन चौदह भुवनोंको सप्त स्वर्ग और सप्त पाताल कहा गया है। सप्त स्वर्ग पृथ्वीसे ऊपर हैं। (१) भूलोक, (२) भुवर्लोक, (३) स्वर्लोक (४) महर्लोक (५) जनलोक (६) तपोलोक (७) सत्यलोक ये भूलोकके-पृथ्वीके-ऊपरके हैं तो (१) अतल (२) वितल (३) सुतल (४) तलातल (५) रसातल (६) महातल (७) पाताल ये सात लोक भूलोकके नीचेके हैं। चौदह-मनु—ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु बदलते हैं। उन चौदह मनुओंका नाम निम्न प्रकार है। (१) स्वायंभुव (२) स्वारोचिष (३) उत्तममनु (४) तामसमनु (५) रैवतमनु (६) चाक्षुषमनु (७) वैवस्वतमनु (८) सावर्णिमनु (९) दक्षसावर्णिमनु (१०) ब्रह्मसावर्णिमनु (११) धर्मसावर्णिमनु (१२) रुद्रसावर्णिमनु (१३) देव सावर्णिमनु (१४) इंद्रसावर्णिमनु । सृष्टिक्रममें जब लोकस्थिति बदलती है, बिगड़ती है तब सामाजिक जीवनके हितकी दृष्टिसे जो विधिनिषेध बदलने पड़ते हैं, शास्त्र-नियम बताने पड़ते हैं वह कार्य मनु करते हैं। मनु सुयोग्य शासक होता है। मनुके बनाये गये नियम, शास्त्र, लंबेसमय तक चलते हैं। जब वे समाज हितके अनुपयुक्त हो जाते हैं तब नया मनु आता है। एक मनुका काल मन्वंतर कहलाता है। वर्तमान मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर है। वैवस्वत मनुके कहे गये नियम आजका युग-धर्म है। छैंतीस तत्त्व—जैसे सांख्योंने विश्वके कारणीभूत २५ तत्त्व कहे हैं वैसे गीताके क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोगमें क्षेत्रके ये ३६ तत्त्व कहे हैं। ५ महाभूत, ५ ज्ञानेंद्रिय, ५ कर्मेंद्रिय, ५ ज्ञानेंद्रियोंके विषय, ५ कर्मेंद्रियोंके विषय, २६ अहंकार, २७ बुद्धि, २८ पराप्रकृति, २९ मन ३० सुख ३१ दुःख, ३२ द्वेष, ३३ संघात, ३४ चेतना, ३५ इच्छा, ३६ धृति । शिवागमोंमें—निम्न ३६ तत्त्व कहे हैं— १ परासंवित् २ चित्तका प्रकाशरूप शिव, ३ चित्तका विमर्शांशरूप शक्ति, ४ सादाख्यतत्त्व, ५ ईश्वर, ६ शुद्धविद्या, ७ माया, ८ कला, ९ काल, १० नियति, ११ राग, १२ विद्या, १३ पुरुष, १४ त्रिगुणात्मक प्रकृति, १५ बुद्धि, १६ अहंकार, १७ मन, १८-२२ पंच ज्ञानेंद्रिय, २३-२७ पंच कर्मेंद्रिय, २८-३२ पंच तन्मात्राएं, ३३-३७ पंचमहाभूत.

ज्ञानेश्वरी ३३७

अध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोग व पसायदान

परा संवित् छत्तीसके परेका तत्त्व है जैसे उपनिषदका ब्रह्म है । जगत्—सदैव बदलते रहनेवाला जन्म-मरणसे अथवा आवागमनमें बद्ध सभी पदार्थ जगत शब्दके अंतर्गत आते हैं । इस जगतके विषयमें अनेक दार्शनिकोंने अनेक बातें कही हैं । ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें इस जगतकी उत्पत्तिकी जो कथा कही है वह विश्व-साहित्यमें इस विषय का सर्व प्रथम विचार है । उसमें लिखा है "जब कुछ भी नहीं था तब "वह" था । उसके मनमें जो काम निर्माण हुवा उससे इसकी उत्पत्ति हुई !" दूसरे एक सूक्तमें है । "उसके तपसे ऋत सत्य निर्माण हुवा । उसके बाद रात-महारात्र-निर्माण हुई । उसके बाद लहरनेवाला समुद्र निर्माण हुवा । उसके बाद सूर्य, चंद्र, अहोरात्र, और प्राणि निर्माण हुए ।" इन्ही विचारोंको अलग अलग ढंगसे उपनिषदोंमें लिया है । उसके बादके दार्शनिकोंने (१) सांख्योंके अनुसार "प्रकृति-पुरुषके संयोगसे इस जगतकी उत्पत्ति हुई !" (२) चार्वाकके अनुसार "पंचमहाभूतोंके आकस्मिक संयोगसे इसकी उत्पत्ति हुई (३) न्यायदर्शनके अनुसार "परमाणुकी सहायतासे ईश्वर इस जगतकी रचना करता है !" (४) वैशेषिक "परमाणुसंयोगसे जगदुत्पत्ति" मानते हैं । (५) मीमांसा दर्शन "जगतको अनादि अनंत" मानकर प्राणियोंको जन्म मरणके आधीन मानता है । (६) वेदांती "ईश्वर ही अपनेमेंसे आप इसे निर्माण करता है!" ऐसे कहते हैं। (७) जैन, मीमांकों की भांति इसे "अनाद्यनंत" मानते हैं । इसी भांति अन्य सभी धर्मोंमें जगतकी उत्पत्तिके विचार तथा कथा, मिलती हैं । जंगली परंपरागत लोगोंने भी अपने ढंगसे इसका विचार किया है और अपने विचारोंको कहानीके रूपमें कहते आये हैं । पुराणोंमें भी इसकी विविध कहानियां हैं । जप—जीभ, होठ आदिकी हलचल करनेके पहले चिंतनद्वारा किसी शब्दको पुनः पुनः उच्चार करना - हृदयमें-जप कहलाता है । जप एक अनुष्ठान है । जपका हिसाब रखना आवश्यक है । यह संकल्पपूर्वक किया जानेवाला अनुष्ठान है । जपके तीन प्रकार हैं । (१) वाचिक - मंत्रका स्पष्ट - सुनाई दें ऐसा - उच्चार करके जप करना । (२) उपांशु - मंत्र देवता पर ध्यान केंद्रित करके गुनगुनाकर मंत्रोच्चार करना (३) मान - मंत्रार्थमें ध्यान केंद्रित करके केवल हृदयमें उसका उच्चार करना । अलग अलग प्रकारके जपानुष्ठानके अलग अलग नियम हैं । इसका न्यास, ध्यान, तर्पण, यज्ञादि भी होते हैं । किंतु नामस्मरणका विधिविधान नहीं होता । वह सतत चिंतन करना होता है । जालंधरबंध—योगमें बंधोंका महत्त्वपूर्ण स्थान है । विशेषतया प्राणायामके समय जो तीन बंध कहे हैं-मूलबंध जालंधरबंध और उडियान बंध-इनका अत्यंत महत्त्व है । बिना इन तीन बंधोंके प्राणायाम पूर्ण नहीं होता अथवा प्राणायामका पूर्ण फल नहीं मिल सकता । ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायके दो सौ सातके छंदमें इसकी क्रियाका विवेचन किया है । प्राणायामके समय मूलबंध युक्त पूरक करनेके बाद कुंभक करते समय अपनी ढुड्डी गले-सीनेके ऊपर गलेके नीचे वाले गद्देमें-चिपकाकर रखना । सर्वांगासन तथा हलासनमें भी १५५ परिशिष्ट ५

यह बंध होता है । इससे मस्तिष्कके अनेक ज्ञानतंतुजाल पर तनाव आता है। इससे अपने शरीरमें होनेवाले चयापचयपर नियंत्रण होने लगता है। शरीर पोषण क्रिया पर भी अपना स्वामित्व आता है। जालंधर बंधसे नीलकंठमणी तथा उपनीलकंठमणि पर तनाव आनेसे उस ओर शुद्ध रक्त दौड़ता है। इससे, गलेकी वह ग्रंथी दीर्घकालतक लचीली रह सकती है। यही ग्रंथी है जो तारुण्यको चिरकाल रख सकती है। इससे, पीछे मेरुदंडमें भी तनाव आता है। शरीरशुद्धि, मनपर प्रभुत्व, तथा चिर तारुण्यकी दृष्टिसे इस बंधका महत्त्व कहा गया है। जितेंद्रिय—जिन्होंने इंद्रियोंको जीत लिया है वह। भारतीय तत्त्व-ज्ञानके अनुसार इंद्रियां घोड़ेकी भांति हैं। मन उसका लगाम है। बुद्धिके हाथमें वह लगाम होता है। सामान्यतया जानवर जैसे अपने चारेके पीछे दौड़ता है वैसे इंद्रियां अपने अपने विषयके पीछे दौड़ती हैं। अडियल घोडा जैसे गाडी लेकर अपने मनमाने चलता है वैसे । किंतु बुद्धिमान मनुष्य, मनको बुद्धिके आधीन रखता है, इंद्रियां मनसे कसी हुई रहती हैं। बुद्धिके आधीन बुद्धिकी, आज्ञामें, मनके द्वारा जो इंद्रियोंको अपने आधीन रखता है उसको जितेंद्रिय कहते हैं। जीव—विशिष्ट मर्यादाके अंदर रहनेवाला विश्व चैतन्यका अंश । मानवी अंतःकरणमें पडा हुवा परमात्माका प्रतिबिंब ! जीव विश्व चैतन्यका ही एक अंश है किंतु विशिष्ट मर्यादांमें शरीर संयुक्त रहनेसे, अंतःकरणसे अविभक्त रहनेसे अपनेको पृथक् मानता है। यही उसकी अज्ञान दशा है । इसीके कारण शरीरमें चेतना रहती है। यह मानवमें परमात्माकी विभूति है। गीतामें इसीको क्षेत्रज्ञ कहा है। वस्तुतः यह सर्वव्यापी है। स्थिर है, अचल है, सनातन है किंतु अंतःकरणसे अविच्छिन्न रहनेसे अपना स्वभावज्ञान भूलता है। जब इसे यह स्वभावज्ञान होता है तब मुक्तावस्थामें रहता है। तत्त्व—अलग अलग दर्शनोंमें तत्त्वोंकी संख्या अलग अलग है। तत्त्वका वस्तु, वस्तु- स्थिति, यथार्थ स्वरूप, मूलघटक, ब्रह्म, मन, शरीर, देवता आदि शब्दोंके अर्थमें यह शब्द आता है। वेदांतमें "केवल ब्रह्म ही एकमेव तत्त्व है।" आद्य शंकराचार्य तत्त्व शब्दका अर्थ करते समय कहते है । तत् यह सर्वनाम है। सर्वनामका विश्वके प्रत्येक वस्तुको लग सकनेवाला नाम ! ब्रह्म व्यापक होनेसे सबमें व्याप्त है। इस लिए उसे-ब्रह्मको-तत् कहते हैं। उस तत् को त्वं प्रत्यय आकर तत्त्व अर्थात् "ब्रह्म-स्वरूप" ऐसा शब्द बना है। शून्य वादी बौद्ध शून्य ही एकमेव तत्त्व मानते है। ज्ञानेश्वरीमें तत्त्वका अर्थ आत्म तत्त्व है। परब्रह्म है ! तत्त्वज्ञान—मानवी जीवन, उसके साथ ही साथ विश्व, तथा मानवी जीवनके साथ विश्वके संबंधोंका अर्थ करके, प्रत्येक मानवी अनुभवका कार्यकारण संबंध बताते हुए, अर्थ करनेवाली मूलभूत कल्पनाओंकी तर्क-बद्धताकी सुसूत्र व्यवस्था करके दिखाना तत्त्वज्ञानका कार्य है। विकसित मनुष्य=मानवी समाजद्वारा-निर्माण की गयी उसकी संस्कृति तथा सभ्यताका, दूसरे शब्दोंमें कहना हो तो, उसकी सामाजिक संस्थाओंका, अथवा नीति नियम और जीवन परंपराओंका सार तत्त्वज्ञानमें समाया हुवा रहता है। किसी समाजके तत्त्वज्ञानमें जब कोई अदल होता ज्ञानेश्वरी १३६