ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1148, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंआयतन- घर, सदन. आयास- श्रम, थकान. आराधन- पूजन, उपासना. आराध्य- जिसकी आराधनाकी जाती वह. आराध्यलिंग- आराधना करनेयोग्य दैवत. आरोगन- खाना, भोजन करना. आरोहण- चढ़ना. आर्जव- सरलता, ऋजुता, निष्कपटवृत्ति. आर्त- दुःखी, पीड़ित. व्यथित, दीन. आर्तबंधु- दीनबंधु, पीड़ितोंको संकटमुक्त करनेवाला. आलेख- लिपि. आह्वाहन बुलाना मंत्रोंद्वार देवताओंका. आवाहन- बुलाना चुनौती देना. आव्हेर- मराठी शब्द, अस्वीकार, तिरस्कार. आस- लालसा, लोभ. आसक्ति- प्राप्त वस्तुके विषयमें ममत | संग, अनुराग, लोभ. आसरा- आश्रय, छिपकर रहनेकी जगह. आसुरी- वृत्तिविशेष, ईश्वर विन्मुखता. भोगमयता. क्रूरकर्म, मूढ़ता. आस्था- उत्कट इच्छा, प्रेम, लगन, आदर, श्रद्धा. आहुति- मंत्रोच्चारपूर्वक हवन करना, यज्ञमें अर्पण. इ इंद्रधनुष- मेघपर सूर्यकिरण पड़नेसे दीखने वाली रंगीन कमान. इंद्रनील- नीलमणि एक नीलारत्न. इंद्रनीलसुनील- इंद्रनीलके समान सुंदर नीला. इंद्रियकंदन- इंद्रिय दमन, इंद्रिय निग्रह. इंद्रियानल- इंद्रियरूपी अग्नि. इष्ट- प्रिय, मनभाया. अग्निद्वारा प्राप्त भोग, हित कल्याण. ई ईप्सित- इच्छा किया हुवा अभीष्ठ.
ईश- नियामक, स्वामी, चालक. ईशितव्य- नियमित किये गये नियम. उ उच्चैःश्रवा- अमृतमंथनके समय समुद्रसे निकलाहुवा घोड़ा. इसके सात मुख थे, यह सूर्यके रथमें जोड़ा गया; इसीसे सात वार माने जाते हैं. उच्छेद- उन्मूलन, उखाडना, नाश करना. उत्तुंग- ऊंचा. उत्कंठोन्माद-उत्कटतासे पगलाना, लालसासे पगलाना, उतावलेपनमें आना. उत्कर्ष- उन्नति, ऊपर उठना, समृद्ध. उदास, उदासीन.-तटस्थ ऊपरकी सतह पर बैठा हुवा, अपेक्षा उपेक्षासे परे, उत् ऊपर. आसीन बैठा हुवा परस्पर विरोधी द्वंद्वोंसे उपरे उठा हुवा. उद्विग्न- व्याकुल, उद्वेगयुक्त, व्यग्र. उद्भिज- वृक्षादिक. उद्बोध- जागृति, अल्पबोध. उन्मत्त- पागल, मतवाला. उन्मन- अनमना. उन्मनि- मनरहित अवस्था. उन्मेष- ज्ञानप्रफुल्लता, प्रकाश, प्रतिभा. उन्मेषसागर-ज्ञानसागर, प्रकाशसागर आदि. उन्मेख सुलोचन } ज्ञानरूप दृष्टि रखनेवाला. उन्मेखसूक्ष्मक्षण } उन्मेषसूर्यकांतस्फुलिंग-ज्ञानरूपी सूर्यकांत मणिकी चिनगारियां. उपपत्ति- युक्तिवाद, हेतु, कारण, किसीका मेल बिठाना, मान्य होना. उपराम- निवृत्ति, विरति, शांति विराम. उपहिताकार-उपाधिविषयक चैतन्याकार. उपासना- पूजा करना, पास बैठना, तदाकार होना, शास्त्रानुसार पूजा यज्ञादि करना. उबग- उकतानेकी क्रिया, ऊबनेकी क्रिया. उर्मी- लहर, तरंग, विकार, अहंवृत्ति.
ज्ञानेश्वरी २०२