ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउर्वरा- उपजाऊ, भूमि. उल्लसित- उत्साहित, प्रफुल्ल, हर्षित. उष्मा- गरमी, क्रोध, ताप, धूप. ऊस- अख, गन्ना. ऋ ऋजुता- अंतःकरणकी सरलता, ज्ञानका एक लक्षण, ब्राह्मणोंका स्वभाव, इंद्रियोंको स्वैर न जाने देना, सत्कार्यतत्परता, ऋतु- कालखंड विशेष-वसंतऋतु ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर. ऋद्धि- समृद्धि, ऋद्धि-सिद्धि, समृद्धि सफलता. ऋषि- मंत्रद्रष्टा, आध्यात्मिक तथा वैज्ञानिक तत्वोंका दर्शन करनेवाला, चिंतनशील, विशिष्ट प्रकारकी जीवन-दृष्टि रखकर उसके अनुसार जीवन बितानेवाले एक- निष्ठ ऋषियोंको देवर्षि, राजर्षि, तथा ब्रह्मर्षि कहते हैं. इसके अलावा महर्षि एक सामान्य संज्ञा भी है. ए एकनिष्ठ- निश्चयात्मक, किसी एकपर पक्का निष्ठावाला. एकसर- एकदा, एकनिष्ठासे अनुकरण. एकांगुष्ठानतप-एक ही अंगूठेके बलपर खडा रह कर तप करना. एकांत- निर्जन प्रदेशमें एकाएकी रहना. एकार्णव- प्रलयकालका सर्वत्र व्याप्त पानी, केवलमात्र समुद्र, सर्वव्यापी महासागर. ओ ओप- चकाकी, चमक, तजेला. ओस- वीरान, शून्य, हवासे मिला पानी. क कंकण- हाथमें पहननेका आभूषण. किसी शुभकार्यमें, धर्मकार्यमें, कार्य निष्ठाकी प्रतिज्ञाका द्योतक मंत्र पूर्त सूतका ताग, कंकण बद्ध प्रतिज्ञाबद्ध कंगूरा- शिखर, बडे महलका ऊपरी भाग. कंचुकी- अंगिया, चोली. कंठनाल- गलेकी नली, कंठनसिका. कंदर्प- काम, मन्मथ. कंदर्पसर्पदर्प- कामरूपी अजगरका अभिमान कंदर्पशरण- कामके आधीन कदली- कदलीवृक्ष, केलेका पेड. कनकद्रुम- स्वर्णवृक्ष. कमलकोश- कमल परागका स्थान, कमल सिकुडनेके बाद वहां भ्रमर फंसता है ! कमलका मध्य भाग. करण- इंद्रिय. कर्तव्य- करनेकी आवश्यकता, विहित कर्म आवश्यक करना तथा अनावश्यक टालना, प्राप्त कर्म, समाजजीव- नमें अपने हिस्सेमें आनेवाला, तथा स्वधर्मके कारण करणीय कर्म, नैतिक प्रेरणा स्वरूप कर्म, नैतिक दृष्टिसे आवश्यक कर्म. कर्तृत्व- कर्ताका भाव, कर्म-स्वामित्व, कर्मणोंमेसे एक. कर्म- करने तथा सहज बननेवाली क्रिया गीतामें १ शुभाशुभ ज्ञानदाय कर्म, (२) क्रिया- विशेष (३) शास्त्रोक्त कर्म (४) स्वधर्मरूप कर्तव्य कर्म, (५) हलचल (६) शरीरश्रम, (७) लोकसंग्रहात्मक, (८) प्रकृतिके कार्यरूप, (९) वर्णा- श्रमानुसार आदि अनेक प्रकारके कर्म कहे गये हैं जो निष्काम भावसे फलकी अपेक्षा रहित हो कर करने चाहिए. २०३ परिशिष्ट ६