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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

१६० दोहावली कलियुगमें दो ही आधार हैं सोरठा कलि पाखंड प्रचार प्रबल पाप पामँर पतित । तुलसी उभय अधार राम नाम सुरसरि सलिल ॥५६६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुगमें केवल पाखण्डका प्रचार है; संसारमें पाप बहुत प्रबल हो गया है, सब ओर पामर और पतित ही नजर आते हैं। ऐसी स्थितिमें दो ही आधार हैं—एक श्रीरामनाम और दूसरा देवनदी श्रीगङ्गाजीका पवित्र जल ॥५६६॥ भगवत्प्रेम ही सब मंगलोंकी खान है दोहा रामचंद्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ । राम राज सब काज सुभ समय सुहावन सोइ ॥५६७॥ भावार्थ—जिस समय भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको निरखने के लिये चित्त चकोर बन जाता है, वही समय रामराज्यकी भांति सुहावना होता है और तभी सब काम शुभ होते हैं ॥५६७॥ बीज राम गुन गन नयन जल अंकुर पुलकालि । सुकृती सुतन सुखेत बर बिलसत तुलसी सालि ॥५६८॥ भावार्थ—जब परम पुण्यात्मा पुरुषके [ पापरहित ] निर्मल तनुरूपी सुन्दर और श्रेष्ठ खेतमें श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहरूपी बीज बोये जायँ और प्रेमाश्रुओंके [ पवित्र ] जलसे उन्हें सींचा जाय, तुलसीदासजी कहते हैं कि तब उनमेंसे [ आनन्दातिरेकके

दोहावली १९१ कारण] पुलकावलिरूपी [ शुभ ] अङ्कुर उत्पन्न होते हैं और तभी उसमें [ भगवत्प्रेमरूपी] धानकी खेती लहलहाती है ॥५६८॥ तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम । सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम ॥५६९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नित्य-निरन्तर भगवान् श्रीसीतारामजीके सुन्दर सगुण स्वरूपका प्रेमसहित स्मरण-ध्यान करते रहो; इससे आदि, मध्य और अन्तमें सदा ही अच्छे शकुन, परम मङ्गल और कल्याण होगा ॥५६९॥ पुरुषारथ स्वारथ सकल परमारथ परिनाम । सुलभ सिद्धि सब साहिबी सुमिरत सीता राम ॥५७०॥ भावार्थ—श्रीसीतारामजीका स्मरण करते ही मनुष्यके लिये सभी सिद्धियाँ और सबपर स्वामित्व सुलभ हो जाते हैं। तथा सभी तरहके स्वार्थ (लौकिक कार्य), पुरुषार्थ (आध्यात्मिक कार्य) सफल होते हैं और अन्तमें परमार्थ (श्रीभगवान्) की प्राप्ति होती है ॥५७०॥ दोहावलीके दोहोंकी महिमा मनिमय दोहा दीप जहँ उर घर प्रगट प्रकास । तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास ॥५७१॥ भावार्थ—जिसके हृदयरूपी घरमें इन दोहोंरूपी मणिमय दीपकका प्रकाश प्रकट होगा, वहाँ मोहरूपी अन्धकार, भयरूपी रात्रि और कलिकालरूपी कालिमाका विलास नहीं हो सकता ॥५७१॥ का भाषा का संस्कृत प्रेम चाहिए साँच । काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच ? ॥५७२॥

१६२ दोहावली भावार्थ—क्या भाषा, क्या संस्कृत, [श्रीभगवान्‌के गुण गानेके लिये तो] सच्चा प्रेम चाहिये। जहाँ कम्बलहीसे काम चल जाता हो, वहाँ बढ़िया दुशाल लेकर क्या करना है? ॥५७२॥ रामकी दीनबन्धुता मनि मानिक महँगे किये सहँगे तृन जल नाज। तुलसी एते जानिये राम गरीब नेवाज ॥५७३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बस, इतना जान रखना चाहिये कि श्रीरामचन्द्रजी 'गरीबनिवाज'—दीनबन्धु हैं। इसीसे उन्होंने मणि-माणिक्य आदि (जिनके बिना आनन्दसे हमारा काम चल सकता है) महँगे किये हैं और तृण, जल तथा अन्न (जिनके बिना पशु-पक्षी और मनुष्यादि प्राणियोंका काम ही नहीं चल सकता) आदि वस्तुओंको सस्ता कर दिया है ॥५७३॥